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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

३१- भगवती दक्षिणाके प्राकट्यका प्रसङ्ग, उनका ध्यान, पूजा-विधान तथा स्तोत्र-वर्णन एवं चरित्र-श्रवणकी फल-श्रुति

प्रकृतिखण्ड २४१

चूर्णसे तैयार किया हुआ यह मिष्टान्न है। गुड़ और घृतके साथ अग्निपर यह सिद्ध किया गया है। इसे आप स्वीकार करें। [पिष्टक—] देवि! धान्यके चूर्णसे बनाये गये स्वस्तिक आदि चिह्नोंसे युक्त इस पिष्टकको भक्तिपूर्वक आपकी सेवामें समर्पित किया है; स्वीकार कीजिये। [ईख—] देवि! ईख इस भूतलका एक विशिष्ट वृक्ष है, इससे गुड़ आदि अनेक पदार्थ तैयार किये जाते हैं; अतः यह सुस्वादु रससे युक्त ईख सेवामें अर्पित है। इसे ग्रहण करें। [व्यजन—] कमले! शीतल वायु प्रदान करनेवाला यह व्यजन तथा स्वच्छ चँवर उष्णकालके लिये परम सुखदायी है। इसे ग्रहण कीजिये। [ताम्बूल—] देवि! यह उत्तम ताम्बूल कर्पूर आदि सुगन्धित वस्तुओंसे सुवासित एवं जिह्वाको स्फूर्ति प्रदान करनेवाला है। इसे आप स्वीकार कीजिये। [जल—] देवि! प्यासको शान्त करनेवाला अत्यन्त शीतल, सुवासित एवं जगत्के लिये जीवन-स्वरूप यह जल स्वीकार कीजिये। [माल्य—] देवि! विविध ऋतुओंके पुष्पोंसे गूँथी गयी, असीम शोभाको देनेवाली तथा देवराजके लिये भी परम प्रिय इस पवित्र मालाको स्वीकार करें। [आचमनीय—] कृष्णकान्ते! यह पवित्र तीर्थ-जल, स्वयं शुद्ध तथा अन्यको भी सदा शुद्ध करनेवाला है। इसे आप रम्य आचमनीयके रूपमें स्वीकार करें। [शय्या—] देवि! यह अमूल्य रत्नोंसे बनी हुई सुन्दर शय्या वस्त्र और आभूषणोंसे सजायी गयी है, पुष्प और चन्दनसे चर्चित है। इसे आप स्वीकार करें। [अपूर्व द्रव्य—] देवि! यही नहीं, किंतु पृथ्वीपर जितने भी अपूर्व द्रव्य शरीरको सजानेके लिये परम उपयोगी हैं तथा देवराज इन्द्रके भी योग्य हैं, वे दुर्लभ वस्तुएँ आपकी सेवामें उपस्थित हैं। इन्हें स्वीकार करें*।'

मुने! देवराज इन्द्रने इस सूत्ररूप मन्त्रको


* प्रशस्यानि प्रकृष्टानि दुर्लभानि वराणि च। अमूल्यरत्नसारं च निर्मितं विश्वकर्मणा ॥
आसनं च विचित्रं च महालक्ष्मि प्रगृह्यताम् ॥
शुद्धं गङ्गोदकमिदं सर्ववन्दितमीप्सितम्। पापेन्धनवह्निरूपं च गृह्यतां कमलालये ॥
पुष्पचन्दनदूर्वादिसंयुतं जाह्नवीजलम्। शङ्खगर्भस्थितं शुद्धं गृह्यतां पद्मवासिनि ॥
सुगन्धिपुष्पतैलं च सुगन्धामलकीफलम्। देहसौन्दर्यबीजं च गृह्यतां श्रीहरेः प्रिये ॥
वृक्षनिर्यासस्वरूपं च गन्धद्रव्यादिसंयुतम्। श्रीकृष्णकान्ते धूपं च पवित्रं प्रतिगृह्यताम् ॥
मलयाचलसम्भूतं वृक्षसारं मनोहरम्। सुगन्धयुक्तं सुखदं चन्दनं देवि गृह्यताम् ॥
जगच्चक्षुःस्वरूपं च ध्वान्तप्रध्वंसकारणम्। प्रदीपं शुद्धरूपं च गृह्यतां परमेश्वरि ॥
नानोपहाररूपं च नानारससमन्वितम्। नानास्वादुकरं चैव नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥
अन्नं ब्रह्मस्वरूपं च प्राणरक्षणकारणम्। तुष्टिदं पुष्टिदं चैव देव्यन्नं प्रतिगृह्यताम् ॥
शाल्यक्षतसुपक्वं च शर्करागव्यसंयुक्तम्। स्वादुयुक्तं महालक्ष्मि परमान्नं प्रगृह्यताम् ॥
शर्करागव्यपक्वं च सुस्वादु सुमनोहरम्। मया निवेदितं लक्ष्मि स्वस्तिकं प्रतिगृह्यताम् ॥
नानाविधानि रम्याणि पक्वानि च फलानि च। स्वादुयुक्तानि कमले गृह्यतां फलदानि च ॥
सुरभिस्तनसम्भूतं सुस्वादु सुमनोहरम्। मर्त्यामृतं सुगव्यं च गृह्यतामच्युतप्रिये ॥
सुस्वादुरससंयुक्तमिक्षुवृक्षसमुद्भवम् । अग्निपक्वमतिस्वादु गुडं च प्रतिगृह्यताम् ॥
यवगोधूमशस्यानां चूर्णीणुसमुद्भवम्। सुपक्वं गुडगव्याक्तं मिष्टान्नं देवि गृह्यताम् ॥
शस्यचूर्णोद्भवं पक्वं स्वस्तिकादिसमन्वितम्। मया निवेदितं देवि पिष्टकं प्रतिगृह्यताम् ॥
पार्थिवो वृक्षभेदश्च विविधद्रव्यकारणम्। सुस्वादुरससंयुक्तं ईक्षुश्च प्रतिगृह्यताम् ॥

२४२
संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
पढ़कर भगवती महालक्ष्मीको उपर्युक्त द्रव्य समर्पण | रत्नमय भूषण उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। उनके
करनेके पश्चात् भक्तिपूर्वक विधिसहित उनके | मुखपर मुस्कान छायी थी। भक्तपर कृपा करनेके
मूलमन्त्रका दस लाख जप किया, जिसके फलस्वरूप | लिये वे परम आतुर थीं। उनके गलेमें रत्नोंका हार
उन्हें मन्त्रसिद्धि प्राप्त हो गयी। यह मूल-मन्त्र | शोभा पा रहा था। असंख्य चन्द्रमाके समान
सभीके लिये कल्पवृक्षके समान है। ब्रह्माजीकी | उनकी प्रभा थी। ऐसी शान्तस्वरूपा जगदम्बा
कृपासे यह उन्हें प्राप्त हुआ था। पूर्वमें श्रीबीज | भगवती महालक्ष्मीको देखकर देवराज इन्द्र उनकी
(श्रीं), मायाबीज (ह्रीं), कामबीज (क्लीं) और | स्तुति करने लगे। उस समय इन्द्रके सर्वाङ्गमें
वाणीबीज (ऐं) का प्रयोग करके 'कमलवासिनी' | पुलकावली छा गयी थी। उनके नेत्र आनन्दके
इस शब्दके अन्तमें 'ङे' विभक्ति लगानेपर | आँसुओंसे पूर्ण थे और उनकी अञ्जलि बँधी थी।
अन्तमें 'स्वाहा' शब्द जोड़ दिया जाय (श्रीं ह्रीं | ब्रह्माजीकी कृपासे सम्पूर्ण अभीष्ट प्रदान करनेवाला
क्लीं ऐं कमलवासिन्यै स्वाहा) - यही इस मन्त्रराजका | वैदिक स्तोत्रराज उन्हें स्मरण था। इसीको पढ़कर
स्वरूप है। कुबेरने इसी मन्त्रसे भगवती महालक्ष्मीकी | उन्होंने स्तुति आरम्भ की।
आराधना करके परम ऐश्वर्य प्राप्त किया। | देवराज इन्द्र बोले- भगवती कमलवासिनीको
इसी मन्त्रके प्रभावसे दक्षसावर्णि मनुको | नमस्कार है। देवी नारायणीको बार-बार नमस्कार
राजाधिराजकी पदवी प्राप्त हुई है तथा मङ्गल सातों | है। संसारकी सारभूता कृष्णप्रिया भगवती पद्माको
द्वीपोंके राजा हुए हैं। | अनेकशः नमस्कार है। कमलरत्नके समान नेत्रवाली
नारद ! प्रियव्रत, उत्तानपाद तथा राजा केदार- | कमलमुखी भगवती महालक्ष्मीको नमस्कार है।
इन सिद्धपुरुषोंको राजेन्द्र कहलानेका सौभाग्य | पद्मासना, पद्मिनी एवं वैष्णवी नामसे प्रसिद्ध भगवती
इसी मन्त्रने दिया है। | महालक्ष्मीको बार-बार नमस्कार है।
इस मन्त्रके सिद्ध हो जानेपर भगवती | सर्वसम्पत्स्वरूपिणी सर्वदात्री देवीको नमस्कार है।
महालक्ष्मीने इन्द्रको दर्शन दिये। उस समय वे | सुखदायिनी, मोक्षदायिनी और सिद्धिदायिनी देवीको
वरदायिनी सर्वोत्तम रत्नसे निर्मित विमानपर | बारंबार नमस्कार है। भगवान् श्रीहरिमें भक्ति उत्पन्न
विराजमान थीं और अपनी प्रभासे सप्तद्वीपवती | करनेवाली तथा हर्ष प्रदान करनेमें परम कुशल
पृथ्वीको आच्छादित कर रही थीं। उनकी | देवीको बार-बार नमस्कार है। भगवान् श्रीकृष्णके
अङ्गकान्ति श्वेत चम्पाके पुष्पके समान थी। | वक्षःस्थलपर विराजमान एवं उनकी हृदयेश्वरी देवीको
शीतवायुप्रदं चैव दाहे च सुखदं परम्। कमले गृह्यतां चेदं व्यजनं श्वेतचामरम्॥
ताम्बूलं च वरं रम्यं कर्पूरादिसुवासितम्। जिह्वाजाड्यच्छेदकरं ताम्बूलं देवि गृह्यताम्॥
सुवासितं शीतलं च पिपासानाशनकारणम्। जगज्जीवनरूपं च जीवनं देवि गृह्यताम्॥
देहसौन्दर्यबीजं च सदा शोभाविवर्धनम्। कार्पासजं च कृमिजं वसनं देवि गृह्यताम् ॥
रत्नस्वर्णविकारं च देहभूषाविवर्धनम्। शोभाधानं श्रीकरं च भूषणं प्रतिगृह्यताम्॥
नानाकुसुवनिर्माणं बहुशोभाप्रदं परम्। सुरभूपप्रियं शुद्धं माल्यं देवि प्रगृह्यताम्॥
पुण्यतीर्थोदकं चैव विशुद्धं शुद्धिदं सदा। गृह्यतां कृष्णकान्ते त्वं रम्याचमनीयकम्॥
रत्नसारादिनिर्माणं पुष्पचन्दनसंयुतम्। रत्नभूषणभूषाढ्यं सुतल्पं देवि गृह्यताम्॥
यद्यद् द्रव्यमपूर्वं च पृथिव्यामपि दुर्लभम् । देवभूपार्हभोग्यं च तद्द्रव्यं देवि गृह्यताम्॥
(प्रकृतिखण्ड ३९। १५-४०)

प्रकृतिखण्ड २४३
बारंबार प्रणाम है। रत्नपद्मे ! शोभने ! तुम श्रीकृष्णकी
शोभास्वरूपा हो, सम्पूर्ण सम्पत्तिकी अधिष्ठात्री देवी
एवं महादेवी हो; तुम्हें मैं बार-बार प्रणाम करता
हूँ। शस्यकी अधिष्ठात्री देवी एवं शस्यस्वरूपा हो,
तुम्हें बारंबार नमस्कार है। बुद्धिस্বরূপा एवं बुद्धिप्रदा
भगवतीके लिये अनेकशः प्रणाम है। देवि ! तुम
वैकुण्ठमें महालक्ष्मी, क्षीरसमुद्रमें लक्ष्मी, राजाओंके
भवनमें राजलक्ष्मी, इन्द्रके स्वर्गमें स्वर्गलक्ष्मी, गृहस्थोंके
घरमें गृहलक्ष्मी, प्रत्येक घरमें गृहदेवता, गोमाता
सुरभि और यज्ञकी पत्नी दक्षिणाके रूपमें विराजमान
रहती हो। तुम देवताओंकी माता अदिति हो।
कमलालयवासिनी कमला भी तुम्हीं हो। हव्य प्रदान
करते समय 'स्वाहा' और कव्य प्रदान करनेके
अवसरपर 'स्वधा' का जो उच्चारण होता है, वह
तुम्हारा ही नाम है। सबको धारण करनेवाली
विष्णुस्वरूपा पृथ्वी तुम्हीं हो। भगवान् नारायणकी
उपासनामें सदा तत्पर रहनेवाली देवि ! तुम
शुद्ध सत्त्वस्वरूपा हो। तुममें क्रोध और हिंसाके
लिये किञ्चिन्मात्र भी स्थान नहीं है।
तुम्हें वरदा, शारदा, शुभा, परमार्थदा एवं
हरिदास्यप्रदा कहते हैं। तुम्हारे बिना सारा जगत्
भस्मीभूत एवं निःसार है। जीते-जी ही मृतक है,
शवके तुल्य है। तुम सम्पूर्ण प्राणियोंकी श्रेष्ठ माता
हो। सबके बान्धवरूपमें तुम्हारा ही पधारना हुआ
है। तुम्हारे बिना भाई भी भाई-बन्धुओंके लिये
बात करने योग्य भी नहीं रहता है। जो तुमसे हीन
है, वह बन्धुजनोंसे हीन है तथा जो तुमसे युक्त है,
वह बन्धुजनोंसे भी युक्त है। तुम्हारी ही कृपासे
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त होते हैं। जिस
प्रकार बचपनमें दुधमुँहे बच्चोंके लिये माता है,
वैसे ही तुम अखिल जगत्की जननी होकर सबकी
सभी अभिलाषाएँ पूर्ण किया करती हो। स्तनपायी
बालक माताके न रहनेपर भाग्यवश जी भी सकता
है; परंतु तुम्हारे बिना कोई भी नहीं जी सकता।
यह बिलकुल निश्चित है। अम्बिके! सदा प्रसन्न
रहना तुम्हारा स्वाभाविक गुण है। अतः मुझपर
प्रसन्न हो जाओ। सनातनी ! मेरा राज्य शत्रुओंके
हाथमें चला गया है, तुम्हारी कृपासे वह मुझे पुनः
प्राप्त हो जाय। हरिप्रीये ! मुझे जबतक तुम्हारा दर्शन
नहीं मिला था, तभीतक मैं बन्धुहीन, भिक्षुक तथा
सम्पूर्ण सम्पत्तियोंसे शून्य था। सुरेश्वरि ! अब तो
मुझे राज्य दो, श्री दो, बल दो, कीर्ति दो, धन दो
और यश भी प्रदान करो। हरिप्रीये ! मनोवाञ्छित
वस्तुएँ दो, बुद्धि दो, भोग दो, ज्ञान दो, धर्म दो
तथा सम्पूर्ण अभिलषित सौभाग्य दो। इसके सिवा
मुझे प्रभाव, प्रताप, सम्पूर्ण अधिकार, युद्धमें विजय,
पराक्रम तथा परम ऐश्वर्यकी प्राप्ति भी कराओ।*
नारद! इस प्रकार कहकर सम्पूर्ण देवताओंके

  • इन्द्र उवाच
    ॐ नमो महालक्ष्म्यै ॥
    ॐ नमः कमलवासिन्यै नारायण्यै नमो नमः। कृष्णप्रियायै सारायै पद्मायै च नमो नमः ॥
    पद्मपत्रेक्षणायै च पद्मास्यायै नमो नमः। पद्मासनायै पद्मिन्यै वैष्णव्यै च नमो नमः ॥
    सर्वसम्पत्स्वरूपायै सर्वदात्र्यै नमो नमः। सुखदायै मोक्षदायै सिद्धिदायै नमो नमः ॥
    हरिभक्तिप्रदात्र्यै च हर्षदात्र्यै नमो नमः। कृष्णवक्षःस्थितायै च कृष्णेशायै नमो नमः ॥
    कृष्णशोभास्वरूपायै रत्नपद्मे च शोभने। सम्पत्त्यधिष्ठातृदेव्यै महादेव्यै नमो नमः ॥
    शस्याधिष्ठातृदेव्यै च शस्यायै च नमो नमः। नमो बुद्धिस্বরূপायै बुद्धिदायै नमो नमः ॥
    वैकुण्ठे या महालक्ष्मीर्या लक्ष्मीः क्षीरसागरे। स्वर्गलक्ष्मीरिन्द्रगेहे राजलक्ष्मीर्नृपालये ॥
    गृहलक्ष्मीश्च गृहिणां गेहे च गृहदेवता। सुरभिः सा गवां माता दक्षिणा यज्ञकामिनी ॥
    अदितिर्देवमाता त्वं कमला कमलालये। स्वाहा त्वं च हविर्दाने कव्यदाने स्वधा स्मृता ॥