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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

३०- विमानसे उतरकर शङ्खचूड़का भगवान्‌को भक्तिपूर्वक प्रणाम करना तथा शंकरजी, भद्रकाली और स्वामी कार्तिकेयका शङ्खचूड़को आशीर्वाद देना

प्रकृतिखण्ड १६७

मनीषी पुरुषोंका कथन है कि स्त्रियोंका यह रूप मध्यम है। जो तमोमय-रूपवाली स्त्रियाँ हैं, उन्हें कुमार्गपर जानेसे रोक पाना बहुत कठिन होता है। विद्वानोंके मतमें यह स्त्रियोंका अधम रूप है। देवि! तुमने जो कहा है, सत् और असत्‌का विचार रखनेवाले कुलीन पुरुष निर्जन, निर्जल अथवा एकान्त स्थानमें किसी परस्त्रीसे कुछ भी नहीं पूछते, सो ठीक है; मैं भी यही मानता हूँ। परंतु शोभने! मैं तो इस समय ब्रह्माकी आज्ञा पाकर ही तुम्हारे कार्यसाधनके लिये तुम्हारे पास आया हूँ और गान्धर्व-विवाहकी विधिके अनुसार तुम्हें अपनी सहधर्मिणी बनाऊँगा। देवताओंमें भगदड़ मचा देनेवाला शङ्खचूड़ मैं ही हूँ। दनुवंशमें मेरी उत्पत्ति हुई है। विशेष बात तो यह है कि मैं पूर्वजन्ममें श्रीहरिके साथ रहनेवाला उन्हींका अंश सुदामा नामक गोप था। जो सुप्रसिद्ध आठ गोप स्वयं भगवान्‌के पार्षद थे, उनमें एक मैं ही था। देवी राधिकाके शापसे इस समय मैं दानवेन्द्र बना हूँ। भगवान् श्रीकृष्णका मन्त्र मुझे इष्ट है, अतः पूर्वजन्मकी बातोंको मैं जान जाता हूँ। तुम भी पूर्वजन्ममें श्रीकृष्णके पास रहनेवाली तुलसी थी। यह जाननेकी योग्यता तो तुम्हें भी प्राप्त है। तुम भी जो भारतवर्षमें उत्पन्न हुई हो, इसमें मुख्य कारण श्रीराधिकाका रोष ही है।

मुनिवर! जब इस प्रकार कहकर शङ्खचूड़ चुप हो गया, उस समय तुलसीका मन हर्षसे उल्लसित हो उठा, उसके मुखपर मुसकराहट छा गयी। तब उसने यों कहना आरम्भ किया।

तुलसीने कहा—इस प्रकारके सद्विचारसे सम्पन्न विज्ञ पुरुष ही विश्वमें सदा प्रशंसित होते हैं। स्त्री ऐसे ही सत्पतिकी निरन्तर अभिलाषा करती है। सचमुच ही इस समय मैं आपके सद्विचारसे परास्त हो गयी। निन्दाका पात्र तथा अपवित्र तो वह पुरुष माना जाता है, जिसे स्त्रीने जीत लिया हो। स्त्रीजित मनुष्यकी तो पितर, देवता तथा बान्धव—सभी निन्दा करते हैं। यहाँ-तक कि माता, पिता तथा भ्राता भी मन-ही-मन तथा वाणीद्वारा भी उसकी निन्दा करनेसे नहीं चूकते। जिस प्रकार जन्म तथा मृत्युके अशौचमें ब्राह्मण दस दिनोंपर शुद्ध हो जाता है, क्षत्रिय बारह दिनोंपर और वैश्य पंद्रह दिनोंपर शुद्ध होते हैं तथा शूद्रोंकी शुद्धि एक महीनेपर होती है, वैसे ही गान्धर्व-विवाह-सम्बन्धी पति-पत्नीकी संतान भी समयानुसार शुद्ध हो जाती है। उसमें वर्णसंकर-दोष नहीं आ सकता। यह बात शास्त्रोंमें प्रसिद्ध है। स्त्रीजित मनुष्यकी तो आजीवन शुद्धि नहीं होती। चितापर जलते समय ही वह इस पापसे मुक्त होता है। स्त्रीजित मनुष्यके पितर उसके दिये हुए पिण्ड और तर्पणको इच्छापूर्वक ग्रहण नहीं करते। देवता भी उसके समर्पण किये हुए पुष्प और जल आदिके लेनेमें सम्मत नहीं होते। जिसके मनको स्त्रीने हरण कर लिया है, उस व्यक्तिको ज्ञान, तप, जप, होम, पूजन, विद्या अथवा यशसे क्या लाभ हुआ? मैंने विद्याका प्रभाव जाननेके लिये ही आपकी परीक्षा की है। कारण, कामिनी स्त्रीका प्रधान कर्तव्य है कि कान्तकी परीक्षा करके ही उसे पतिरूपमें स्वीकार करे।

गुणहीन, वृद्ध, अज्ञानी, दरिद्र, मूर्ख, रोगी, कुरूप, परम क्रोधी, अशोभन मुखवाले, पङ्गु, अङ्गहीन, नेत्रहीन, बधिर, जड़, मूक तथा नपुंसकके समान पापी वरको जो अपनी कन्या देता है, उसे ब्रह्महत्याका पाप लगता है। शान्त, गुणी, नवयुवक, विद्वान् तथा साधुस्वभाववाले वरको अपनी कन्या अर्पण करनेवाले पुरुषको दस अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है। जो व्यक्ति कन्याको पाल-पोसकर विपत्तिवश अथवा धनके

१६८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

लोभसे बेच देता है, वह 'कुम्भीपाक' नरकमें पचता है*। उस पापीको नरकमें भोजनके स्थानपर कन्याके मल-मूत्र प्राप्त होते हैं। कीड़ों और कौओंंद्वारा उसका शरीर नोचा जाता है। बहुत लम्बे समयतक वह कुम्भीपाक नरकमें रहता है। फिर जगत्में जन्म पाकर उसका रोगग्रस्त रहना निश्चित है।

तपको ही सर्वस्व माननेवाले नारद! इस प्रकार कहकर देवी तुलसी चुप हो गयी।

इतनेमें ब्रह्माजीने आकर कहा—शङ्खचूड़!

तुम इस देवीके साथ क्या बातचीत कर रहे हो? अब गान्धर्व-विवाहके नियमानुसार इसे पत्नीरूपसे स्वीकार कर लेना तुम्हारे लिये परम आवश्यक है; क्योंकि तुम पुरुषोंमें रत्न हो और यह साध्वी देवी भी कन्याओंमें रत्न समझी जाती है। इसके बाद ब्रह्माजीने तुलसीसे कहा—'पतिव्रते! तुम ऐसे गुणी पतिकी क्या परीक्षा करती हो? देवता, दानव और असुर—सबको कुचल डालनेकी इसमें शक्ति है। जिस प्रकार भगवान् नारायणके पास लक्ष्मी, श्रीकृष्णके पास राधिका, मेरे पास सावित्री, भगवान् वाराहके पास पृथ्वी, यज्ञके पास दक्षिणा, अत्रिके पास अनसूया, नलके पास दमयन्ती, चन्द्रमाके पास रोहिणी, कामदेवके पास रति, कश्यपके पास अदिति, वसिष्ठके पास अरुन्धती, गौतमके पास अहल्या, कर्दमके पास देवहूति, बृहस्पतिके पास तारा, मनुके पास शतरूपा, अग्निके पास स्वाहा, इन्द्रके पास शची, गणेशके पास पुष्टि, स्कन्दके पास देवसेना तथा धर्मके पास साध्वी मूर्ति पत्नीरूपसे शोभा पाती हैं, वैसे ही तुम भी इस शङ्खचूड़की सौभाग्यवती प्रिया बन जाओ। शङ्खचूड़की मृत्युके पश्चात् तुम पुनः गोलोकमें भगवान् श्रीकृष्णके पास चली जाओगी और फिर वैकुण्ठमें चतुर्भुज भगवान् विष्णुको प्राप्त करोगी।†'

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! शङ्खचूड़ और तुलसीको इस प्रकार आशीर्वाद-रूपमें आज्ञा देकर ब्रह्माजी अपने लोकमें चले गये। तब शङ्खचूड़ने गान्धर्व-विवाहके अनुसार तुलसीको अपनी पत्नी बना लिया। उस समय स्वर्गमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं। आकाशसे पुष्प बरसने लगे। तदनन्तर शङ्खचूड़ अपने भवनमें जाकर तुलसीके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगा।

अपनी चिरसङ्गिनी धर्मपत्नी परम सुन्दरी तुलसीके साथ आनन्दमय जीवन बिताते हुए राजाधिराज प्रतापी शङ्खचूड़ने दीर्घकालतक राज्य किया। देवता, दानव, असुर, गन्धर्व, किन्नर और राक्षस—सभी शङ्खचूड़के शासनकालमें सदा शान्त रहते थे। अधिकार छिन जानेके कारण देवताओंकी स्थिति भिक्षुक-जैसी हो गयी थी। अतः वे सभी अत्यन्त उदास होकर ब्रह्माकी सभामें गये और अपनी स्थिति बतलाकर बार-बार अत्यन्त विलाप


* यः कन्यापालनं कृत्वा करोति विक्रयं यदि। विपदा धनलोभेन कुम्भीपाकं स गच्छति॥
(प्रकृतिखण्ड १६। ९८)

† पश्चात् प्राप्स्यसि गोविन्दं गोलोके पुनरेव च। चतुर्भुजं च वैकुण्ठे शङ्खचूडे मृते सति॥
(प्रकृतिखण्ड १६। ११४)

प्रकृतिखण्ड

१६९

करने लगे। तब विधाता ब्रह्मा देवताओंको साथ लेकर भगवान् शंकरके स्थानपर गये। वहाँ पहुँचकर मस्तकपर चन्द्रमाको धारण करनेवाले सर्वेश शिवसे सभी बातें कह सुनायीं। फिर ब्रह्मा और शंकर देवताओंको साथ लेकर वैकुण्ठके लिये प्रस्थित हुए। वैकुण्ठ परम धाम है। यह सबके लिये दुर्लभ है। वहाँ बुढ़ापा और मृत्युका प्रभाव नहीं है। भगवान् श्रीहरिके भवनका प्रवेशद्वार परम श्रेष्ठ है। वहाँ पहुँचकर रत्नमय सिंहासनपर बैठे हुए द्वारपालोंको जब देखा, तब इन ब्रह्मादि देवताओंका मन आश्चर्यसे भर गया। वे सभी परम सुन्दर थे। सभी पीताम्बर धारण किये हुए थे। रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित थे। सबके गलेमें दिव्य वनमाला लहरा रही थी; सुन्दर शरीर श्याम रंगके थे। उनके शङ्ख, चक्र, गदा और पद्मसे सुशोभित चार भुजाएँ थीं और प्रसन्न वदन मुस्कानसे भरे थे। उन मनोहर द्वारपालोंके नेत्र कमलके सदृश विशाल थे।

उन द्वारपालोंसे अनुमति पाकर ब्रह्मा क्रमशः सोलह द्वारोंको पार करके भगवान् श्रीहरिकी सभामें पहुँचे। उस सभाभवनमें चारों ओर देवर्षि तथा पार्षद विराजमान थे। सभी पार्षदोंके चार भुजाएँ थीं; सबका रूप भगवान् नारायणके समान था और सभी कौस्तुभमणिसे अलंकृत थे। वह सभा बाहरसे पूर्ण चन्द्रमण्डलके आकारकी गोल और भीतरसे चौकोर थी। बड़ी मनोहर दिखायी देती थी। श्रेष्ठ रत्नोंके सारभूत सर्वोत्तम दिव्य मणियोंसे उसका निर्माण हुआ था। हीरोंके सारभागसे ही वह सजी हुई थी। श्रीहरिके इच्छानुसार बने हुए उस भवनमें अमूल्य दिव्य रत्न जड़े गये थे। माणिक्य-मालाएँ जालीके रूपमें शोभा दे रही थीं और दिव्य मोतियोंकी झालरें उसकी छबि बढ़ा रही थीं। मण्डलाकार करोड़ों रत्नमय दर्पणोंसे वह सभा सुशोभित थी। उसकी दीवारोंमें लिखित अनेक प्रकारके विचित्र चित्र उसकी सुन्दरता बढ़ा रहे थे। सर्वोत्कृष्ट पद्मराग-मणिसे निर्मित कृत्रिम कमलोंसे वह परम सुशोभित थी। स्यमन्तकमणिसे बनी हुई सैकड़ों सीढ़ियाँ उस भवनकी शोभा बढ़ाती थीं। रेशमकी डोरीमें गूँथे हुए दिव्य चन्दन-वृक्षके सुन्दर पल्लव वन्दनवारका काम दे रहे थे। यहाँके खंभोंका निर्माण इन्द्रनील-मणिसे हुआ था। उत्तम रत्नोंसे भरे कलशोंसे संयुक्त वह सभा अत्यन्त मनोरम जान पड़ती थी। पारिजात-पुष्पोंके बहुत-से हार उसे अलंकृत किये हुए थे। कस्तूरी एवं कुङ्कुमसे युक्त सुगन्धपूर्ण चन्दनके द्रवसे वह भवन सुसज्जित तथा सुसंस्कृत किया गया था। सुगन्धित वायुसे वह सभा सब ओरसे सुवासित थी। उसका विस्तार एक सहस्र योजन था। सर्वत्र सेवक खड़े थे। वहाँ सभी कुछ दिव्य था। सभी उस सभाभवनको देखकर मुग्ध हो गये।

नारद! भगवान् श्रीहरि उस अनुपम सभाके मध्य भागमें इस प्रकार विराजमान थे मानो नक्षत्रोंके बीच चन्द्रमा हो। देवताओंसहित ब्रह्मा और शंकरने उनके साक्षात् दर्शन किये। उस समय श्रीहरि दिव्य रत्नोंसे निर्मित अद्भुत सिंहासनपर विराजित थे। दिव्य किरीट, कुण्डल और वनमालाने उनकी छबिको और भी अधिक बढ़ा दिया था। उनके सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे अनुलिप्त थे। एक हाथमें कमल शोभा पा रहा था। भगवान्‌का श्रीविग्रह अतिशय शान्त था। लक्ष्मीजी उनके चरणकमलोंकी सेवामें संलग्न थीं। भक्तके दिये हुए सुवासित ताम्बूलको प्रभु चबा रहे थे। देवी गङ्गा उत्तम भक्तिके साथ सफेद चँवर डुलाकर उनकी सेवा कर रही थीं। उपस्थित समाज अत्यन्त भक्तिविनम्र होकर उनका स्तव-गान कर रहा था।