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सर्वकोश
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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

२- पृथ्वीका देवताओंके साथ ब्रह्मलोकमें जाकर अपनी व्यथा-कथा सुनाना, ब्रह्माजीका उन सबके साथ कैलासगमन, कैलाससे ब्रह्मा, शिव तथा धर्मका वैकुण्ठमें जाकर श्रीहरिकी आज्ञासे गोलोकमें जाना और वहाँ विरजाटट, शतशृङ्गपर्वत, रासमण्डल एवं वृन्दावन आदिके प्रदेशोंका अवलोकन करना, गोलोकका विस्तृत वर्णन

गणपतिखण्ड
४१३
नारद! यों कहकर भगवान् विष्णु शीघ्र ही
वैकुण्ठको चले गये। श्रीहरिके चले जानेपर
परशुराम हरिका स्मरण करके विष्णुप्रदत्त स्तोत्रद्वारा,
जो सम्पूर्ण विघ्नोंका नाशक तथा धर्म-अर्थ-
काम-मोक्षका कारण है; उन दुर्गाकी स्तुति
करनेको उद्यत हुए। उन्होंने गङ्गाके शुभजलमें
स्नान करके धुले हुए वस्त्र धारण किये। फिर
अञ्जलि बाँधकर भक्तैश्वर गुरुको प्रणाम किया।
फिर आचमन करके दुर्गाको सिर झुकाकर
नमस्कार किया। उस समय भक्तिके कारण उनके
कंधे झुके हुए थे, आँखोंमें आनन्दाश्रु छलक आये
थे और सारा अङ्ग पुलकायमान हो गया था।
परशुरामने कहा- प्राचीन कालकी बात
है; गोलोकमें जब परिपूर्णतम श्रीकृष्ण सृष्टि-
रचनाके लिये उद्यत हुए, उस समय उनके
शरीरसे तुम्हारा प्राकट्य हुआ था। तुम्हारी कान्ति
करोड़ों सूर्योंके समान थी। तुम वस्त्र और
अलंकारोंसे विभूषित थीं। शरीरपर अग्निमें तपाकर
शुद्ध की हुई साड़ीका परिधान था। नव तरुण
अवस्था थी। ललाटपर सिंदूरकी बेंदी शोभित हो
रही थी। मालतीकी मालाओंसे मण्डित गुँथी हुई
सुन्दर चोटी थी। बड़ा ही मनोहर रूप था।
मुखपर मन्द मुस्कान थी। अहो ! तुम्हारी मूर्ति
बड़ी सुन्दर थी, उसका वर्णन करना कठिन है।
तुम मुमुक्षुओंको मोक्ष प्रदान करनेवाली तथा
स्वयं महाविष्णुकी विधि हो। बाले ! तुम सबको
मोहित कर लेनेवाली हो। तुम्हें देखकर श्रीकृष्ण
उसी क्षण मोहित हो गये। तब तुम उनसे
सम्भावित होकर सहसा मुस्कराती हुई भाग
चलीं। इसी कारण सत्पुरुष तुम्हें 'मूलप्रकृति'
ईश्वरी राधा कहते हैं। उस समय सहसा श्रीकृष्णने
तुम्हें बुलाकर वीर्यका आधान किया। उससे एक
महान् डिम्ब उत्पन्न हुआ। उस डिम्बसे महाविराट्की
उत्पत्ति हुई, जिसके रोमकूपोंमें समस्त ब्रह्माण्ड
स्थित हैं। फिर राधाके शृङ्गारक्रमसे तुम्हारा
निःश्वास प्रकट हुआ। वह निःश्वास महावायु हुआ
और वही विश्वको धारण करनेवाला विराट्
कहलाया। तुम्हारे पसीनेसे विश्वगोलक पिघल
गया। तब विश्वका निवासस्थान वह विराट्
जलकी राशि हो गया। तब तुमने अपनेको पाँच
भागोंमें विभक्त करके पाँच मूर्ति धारण कर ली।
उनमें परमात्मा श्रीकृष्णकी जो प्राणाधिष्ठात्री मूर्ति
है, उसे भविष्यवेत्ता लोग कृष्णप्राणाधिका 'राधा'
कहते हैं। जो मूर्ति वेद-शास्त्रोंकी जननी तथा
वेदाधिष्ठात्री है, उस शुद्धरूपा मूर्तिको मनीषीगण
'सावित्री' नामसे पुकारते हैं। जो शान्ति तथा
शान्तरूपिणी ऐश्वर्यकी अधिष्ठात्री मूर्ति है, उस
सत्त्वस्वरूपिणी शुद्ध मूर्तिको संतलोग 'लक्ष्मी'
नामसे अभिहित करते हैं। अहो ! जो रागकी
अधिष्ठात्री देवी तथा सत्पुरुषोंको पैदा करनेवाली
है, जिसकी मूर्ति शुक्ल वर्णकी है, उस शास्त्रकी
ज्ञाता मूर्तिको शास्त्रज्ञ 'सरस्वती' कहते हैं। जो
मूर्ति बुद्धि, विद्या, समस्त शक्तिकी अधिदेवता,
सम्पूर्ण मङ्गलोंकी मङ्गलस्थान, सर्वमङ्गलस्वरूपिणी
और सम्पूर्ण मङ्गलोंकी कारण है, वही तुम इस
समय शिवके भवनमें विराजमान हो।
तुम्हीं शिवके समीप शिवा (पार्वती),
नारायणके निकट लक्ष्मी और ब्रह्माकी प्रिया
वेदजननी सावित्री और सरस्वती हो। जो
परिपूर्णतम एवं परमानन्दस्वरूप हैं, उन रासेश्वर
श्रीकृष्णकी तुम परमानन्दरूपिणी राधा हो।
देवाङ्गनाएँ भी तुम्हारे कलांशकी अंशकलासे
प्रादुर्भूत हुई हैं। सारी नारियाँ तुम्हारी विद्यास्वरूपा
हैं और तुम सबकी कारणरूपा हो। अम्बिके !
सूर्यकी पत्नी छाया, चन्द्रमाकी भार्या सर्वमोहिनी
रोहिणी, इन्द्रकी पत्नी शची, कामदेवकी पत्नी
ऐश्वर्यशालिनी रति, वरुणकी पत्नी वरुणानी,
वायुकी प्राणप्रिया स्त्री, अग्निकी प्रिया स्वाहा,
कुबेरकी सुन्दरी भार्या, यमकी पत्नी सुशीला,
नैर्ऋतकी जाया कैटभी, ईशानकी पत्नी शशिकला,

४१४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

मनुकी प्रिया शतरूपा, कर्दमकी भार्या देवहूति, वसिष्ठकी पत्नी अरुन्धती, देवमाता अदिति, अगस्त्य मुनिकी प्रिया लोपामुद्रा, गौतमकी पत्नी अहल्या, सबकी आधाररूपा वसुन्धरा, गङ्गा, तुलसी तथा भूतलकी सारी श्रेष्ठ सरिताएँ—ये सभी तथा इनके अतिरिक्त जो अन्य स्त्रियाँ हैं, वे सभी तुम्हारी कलासे उत्पन्न हुई हैं।

तुम मनुष्योंके घरमें गृहलक्ष्मी, राजाओंके भवनोंमें राजलक्ष्मी, तपस्वियोंकी तपस्या और ब्राह्मणोंकी गायत्री हो। तुम सत्पुरुषोंके लिये सत्त्वस्वरूप और दुष्टोंके लिये कलहकी अङ्कुर हो। निर्गुणकी ज्योति और सगुणकी शक्ति तुम्हीं हो। तुम सूर्यमें प्रभा, अग्निमें दाहिका-शक्ति, जलमें शीतलता और चन्द्रमामें शोभा हो। भूमिमें गन्ध और आकाशमें शब्द तुम्हारा ही रूप है। तुम भूख-प्यास आदि तथा प्राणियोंकी समस्त शक्ति हो। संसारमें सबकी उत्पत्तिकी कारण, साररूपा, स्मृति, मेधा, बुद्धि अथवा विद्वानोंकी ज्ञानशक्ति तुम्हीं हो। श्रीकृष्णने शिवजीको कृपापूर्वक सम्पूर्ण ज्ञानकी प्रसविनी जो शुभ विद्या प्रदान की थी, वह तुम्हीं हो; उसीसे शिवजी मृत्युञ्जय हुए हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेशकी सृष्टि, पालन और संहार करनेवाली जो त्रिविध शक्तियाँ हैं, उनके रूपमें तुम्हीं विद्यमान हो; अतः तुम्हें नमस्कार है। जब मधु-कैटभके भयसे डरकर ब्रह्मा काँप उठे थे, उस समय जिनकी स्तुति करके वे भयमुक्त हुए थे; उन देवीको मैं सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ। मधु-कैटभके युद्धमें जगत्के रक्षक ये भगवान् विष्णु जिन परमेश्वरीका स्तवन करके शक्तिमान् हुए थे; उन दुर्गाको मैं नमस्कार करता हूँ। त्रिपुरके महायुद्धमें रथसहित शिवजीके गिर जानेपर सभी देवताओंने जिनकी स्तुति की थी; उन दुर्गाको मैं प्रणाम करता हूँ। जिनका स्तवन करके वृषरूपधारी विष्णुद्वारा उठाये गये स्वयं शम्भुने त्रिपुरका संहार किया था; उन दुर्गाको मैं अभिवादन करता हूँ। जिनकी आज्ञासे निरन्तर वायु बहती है, सूर्य तपते हैं, इन्द्र वर्षा करते हैं और अग्नि जलाती है; उन दुर्गाको मैं सिर झुकाता हूँ। जिनकी आज्ञासे काल सदा वेगपूर्वक चक्कर काटता रहता है और मृत्यु जीव-समुदायमें विचरती रहती है; उन दुर्गाको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनके आदेशसे सृष्टिकर्ता सृष्टिकी रचना करते हैं, पालनकर्ता रक्षा करते हैं और संहर्ता समय आनेपर संहार करते हैं; उन दुर्गाको मैं प्रणाम करता हूँ। जिनके बिना स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण, जो ज्योतिःस्वरूप एवं निर्गुण हैं, सृष्टि-रचना करनेमें समर्थ नहीं होते; उन देवीको मेरा नमस्कार है। जगज्जननी! रक्षा करो, रक्षा करो; मेरे अपराधको क्षमा कर दो। भला, कहीं बच्चेके अपराध करनेसे माता कुपित होती है।

इतना कहकर परशुराम उन्हें प्रणाम करके रोने लगे। तब दुर्गा प्रसन्न हो गयीं और शीघ्र ही उन्हें अभयका वरदान देती हुई बोलीं—'हे वत्स! तुम अमर हो जाओ। बेटा! अब शान्ति धारण करो। शिवजीकी कृपासे सदा सर्वत्र तुम्हारी विजय हो। सर्वान्तरात्मा भगवान् श्रीहरि सदा

गणपतिखण्ड ४१५

तुमपर प्रसन्न रहें। श्रीकृष्णमें तथा कल्याणदाता गुरुदेव शिवमें तुम्हारी सुदृढ़ भक्ति बनी रहे; क्योंकि जिसकी इष्टदेव तथा गुरुमें शाश्वती भक्ति होती है, उसपर यदि सभी देवता कुपित हो जायँ तो भी उसे मार नहीं सकते। तुम तो श्रीकृष्णके भक्त और शंकरके शिष्य हो तथा मुझ गुरूपत्नीकी स्तुति कर रहे हो; इसलिये किसकी शक्ति है जो तुम्हें मार सके। अहो! जो अन्यान्य देवताओंके भक्त हैं अथवा उनकी भक्ति न करके निरंकुश ही हैं, परंतु श्रीकृष्णके भक्त हैं तो उनका कहीं भी अमङ्गल नहीं होता। भार्गव! भला, जिन भाग्यवानोंपर बलवान् चन्द्रमा प्रसन्न हैं तो दुर्बल तारागण रुष्ट होकर उनका क्या बिगाड़ सकते हैं। सभामें महान् आत्मबलसे सम्पन्न सुखी नरेश जिसपर संतुष्ट है, उसका दुर्बल भृत्यवर्ग कुपित होकर क्या कर लेगा? यों कहकर पार्वती हर्षित हो परशुरामको शुभाशीर्वाद देकर अन्तःपुरमें चली गयीं। तब तुरंत हरि-नामका घोष गूँज उठा।

जो मनुष्य इस काण्वशाखोक्त स्तोत्रका पूजाके समय, यात्राके अवसरपर अथवा प्रातःकाल पाठ करता है, वह अवश्य ही अपनी अभीष्ट वस्तु प्राप्त कर लेता है। इसके पाठसे पुत्रार्थीको पुत्र, कन्यार्थीको कन्या, विद्यार्थीको विद्या, प्रजार्थीको प्रजा, राज्यभ्रष्टको राज्य और धनहीनको धनकी प्राप्ति होती है। जिसपर गुरु, देवता, राजा अथवा बन्धु-बान्धव क्रुद्ध हो गये हों, उसके लिये ये सभी इस स्तोत्रराजकी कृपासे प्रसन्न होकर वरदाता हो जाते हैं। जिसे चोर-डाकुओंने घेर लिया हो, साँपने डस लिया हो, जो भयानक शत्रुके चंगुलमें फँस गया हो अथवा व्याधिग्रस्त हो; वह इस स्तोत्रके स्मरणमात्रसे मुक्त हो जाता है। राजद्वारपर, श्मशानमें, कारागारमें और बन्धनमें पड़ा हुआ तथा अगाध जलराशिमें डूबता हुआ मनुष्य इस स्तोत्रके प्रभावसे मुक्त हो जाता है। स्वामिभेद, पुत्रभेद तथा भयंकर मित्रभेदके अवसरपर इस स्तोत्रके स्मरणमात्रसे निश्चय ही अभीष्टार्थकी प्राप्ति होती है। जो स्त्री वर्षपर्यन्त भक्तिपूर्वक दुर्गाका भलीभाँति पूजन करके हविष्यान्न खाकर इस स्तोत्रराजको सुनती है, वह महावन्ध्या हो तो भी प्रसववाली हो जाती है। उसे ज्ञानी एवं चिरजीवी दिव्य पुत्र प्राप्त होता है। छः महीनेतक इसका श्रवण करनेसे दुर्भगा सौभाग्यवती हो जाती है। जो काकवन्ध्या और मृतवत्सा नारी भक्तिपूर्वक नौ मासतक इस स्तोत्रराजको सुनती है, वह निश्चय ही पुत्र पाती है। जो कन्याकी माता तो है परंतु पुत्रसे हीन है, वह यदि पाँच महीनेतक कलशपर दुर्गाकी सम्यक् पूजा करके इस स्तोत्रको श्रवण करती है तो उसे अवश्य ही पुत्रकी प्राप्ति होती है।

(अध्याय ४५)


सबका स्तवन-पूजन और नमस्कार करके परशुरामका जानेके लिये उद्यत होना, गणेश-पूजामें तुलसी-निषेधके प्रसङ्गमें गणेश-तुलसीके संवादका वर्णन तथा गणपतिखण्डका श्रवण-माहात्म्य

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! इस प्रकार परशुरामने हर्षमग्न-चित्तसे दुर्गाकी स्तुति करके पुनः श्रीहरिद्वारा बतलाये गये स्तोत्रसे गणेशका स्तवन किया। तत्पश्चात् नाना प्रकारके नैवेद्यों, धूपों, दीपों, गन्धों और तुलसीके अतिरिक्त अन्य पुष्पोंसे भक्तिपूर्वक उनकी पूजा की। इस प्रकार परशुरामने भक्तिभावसहित भाई गणेशका भलीभाँति पूजन करके गुरूपत्नी पार्वती और गुरुदेव शिवको नमस्कार किया तथा शंकरकी आज्ञा ले वे वहाँसे जानेको उद्यत हुए।

४१६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


नारदजीने पूछा— प्रभो! परशुरामने जब विविध नैवेद्यों तथा पुष्पोंद्वारा भगवान् गणेशकी पूजा की थी, उस समय उन्होंने तुलसीको छोड़ क्यों दिया? मनोहारिणी तुलसी तो समस्त पुष्पोंमें मान्य एवं धन्यवादकी पात्र हैं; फिर गणेश उस सारभूत पूजाको क्यों नहीं ग्रहण करते?

श्रीनारायण बोले— नारद! ब्रह्मकल्पमें एक ऐसी घटना घटित हुई थी, जो परम गुह्य एवं मनोहारिणी है। उस प्राचीन इतिहासको मैं कहता हूँ, सुनो। एक समयकी बात है। नवयौवन-सम्पन्ना तुलसीदेवी नारायणपरायण हो तपस्याके निमित्तसे तीर्थोंमें भ्रमण करती हुई गङ्गा-तटपर जा पहुँचीं। वहाँ उन्होंने गणेशको देखा, जिनकी नयी जवानी थी; जो अत्यन्त सुन्दर, शुद्ध और पीताम्बर धारण किये हुए थे; जिनके सारे शरीरमें चन्दनकी खौर लगी थी; जो रत्नोंके आभूषणोंसे विभूषित थे; सुन्दरता जिनके मनका अपहरण नहीं कर सकती; जो कामनारहित, जितेन्द्रियोंमें सर्वश्रेष्ठ और योगीन्द्रोंके गुरु-के-गुरु हैं तथा मन्द-मन्द मुस्कराते हुए जन्म, मृत्यु और बुढ़ापाका नाश करनेवाले श्रीकृष्णके चरणकमलोंका ध्यान कर रहे थे; उन्हें देखते ही तुलसीका मन गणेशकी ओर आकर्षित हो गया। तब तुलसी उनसे लम्बोदर तथा गजमुख होनेका कारण पूछकर उनका उपहास करने लगी। ध्यान-भङ्ग होनेपर गणेशजीने पूछा—'वत्से! तुम कौन हो? किसकी कन्या हो? यहाँ तुम्हारे आनेका क्या कारण है? माता! यह मुझे बतलाओ; क्योंकि शुभे! तपस्वियोंका ध्यान भङ्ग करना सदा पापजनक तथा अमङ्गलकारी होता है। शुभे! श्रीकृष्ण कल्याण करें, कृपानिधि विघ्नका विनाश करें और मेरे ध्यान-भङ्गसे उत्पन्न हुआ दोष तुम्हारे लिये अमङ्गलकारक न हो।'

इसपर तुलसीने कहा— प्रभो! मैं धर्मात्मजकी नवयुवती कन्या हूँ और तपस्यामें संलग्न हूँ। मेरी यह तपस्या पति-प्राप्तिके लिये है; अतः आप मेरे स्वामी हो जाइये। तुलसीकी बात सुनकर अगाध बुद्धिसम्पन्न गणेश श्रीहरिका स्मरण करते हुए विदुषी तुलसीसे मधुरवाणीमें बोले।

गणेशने कहा— हे माता! विवाह करना बड़ा भयंकर होता है; अतः इस विषयमें मेरी बिलकुल इच्छा नहीं है; क्योंकि विवाह दुःखका कारण होता है, उससे सुख कभी नहीं मिलता। यह हरि-भक्तिका व्यवधान, तपस्याके नाशका कारण, मोक्षद्वारका किवाड़, भव-बन्धनकी रस्सी, गर्भवासकारक, सदा तत्त्वज्ञानका छेदक और संशयोंका उद्गमस्थान है। इसलिये महाभागे! मेरी ओरसे मन लौटा लो और किसी अन्य पतिकी तलाश करो। गणेशके ऐसे वचन सुनकर तुलसीको क्रोध आ गया। तब वह साध्वी गणेशको शाप देते हुए बोली—'तुम्हारा विवाह होगा।' यह सुनकर शिव-तनय सुरश्रेष्ठ गणेशने भी तुलसीको शाप दिया—'देवि! तुम निस्संदेह असुरद्वारा ग्रस्त होओगी। तत्पश्चात् महापुरुषोंके शापसे तुम वृक्ष हो जाओगी।' नारद! महातपस्वी गणेश इतना कहकर चुप हो गये। उस शापको सुनकर तुलसीने फिर उस सुरश्रेष्ठ गणेशकी स्तुति की। तब प्रसन्न होकर गणेशने तुलसीसे कहा।

गणेश बोले— मनोरमे! तुम पुष्पोंकी सारभूता होओगी और कलांशसे स्वयं नारायणकी प्रिया बनोगी। महाभागे! यों तो सभी देवता तुमसे प्रेम करेंगे, परंतु श्रीकृष्णके लिये तुम विशेष प्रिय होओगी। तुम्हारे द्वारा की गयी पूजा मनुष्योंके लिये मुक्तिदायिनी होगी और मेरे लिये तुम सर्वदा त्याज्य रहोगी। तुलसीसे यों कहकर सुरश्रेष्ठ गणेश पुनः तप करने चले गये। वे श्रीहरिकी आराधनामें व्यग्र होकर बदरीनाथके संनिकट गये। इधर तुलसीदेवी दुःखित हृदयसे पुष्करमें जा पहुँची

गणपतिखण्ड
४१७

और निराहार रहकर वहाँ दीर्घकालिक तपस्यामें संलग्न हो गयी। नारद! तत्पश्चात् मुनिवरके तथा गणेशके शापसे वह चिरकालतक शङ्खचूडकी प्रिय पत्नी बनी रही। मुने! तदनन्तर असुरराज शङ्खचूड शंकरजीके त्रिशूलसे मृत्युको प्राप्त हो गया, तब नारायणप्रिया तुलसी कलांशसे वृक्षभावको प्राप्त हो गयी। यह इतिहास, जिसका मैंने तुमसे वर्णन किया है, पूर्वकालमें धर्मके मुखसे सुना था। इसका वर्णन अन्य पुराणोंमें नहीं मिलता। यह तत्त्वरूप तथा मोक्ष प्रदान करनेवाला है। तदनन्तर महाभाग परशुराम गणेशका पूजन करके तथा शंकर और पार्वतीको नमस्कार कर तपस्याके लिये वनको चले गये। इधर गणेश समस्त सुरश्रेष्ठों तथा मुनिवरोंसे वन्दित एवं पूजित होकर शिव-पार्वतीके निकट स्थित हुए।

जो मनुष्य इस गणपतिखण्डको दत्तचित्त होकर सुनता है, उसे निश्चय ही राजसूययज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। पुत्रहीन मनुष्य श्रीगणेशकी कृपासे धीर, वीर, धनी, गुणी, चिरजीवी, यशस्वी, पुत्रवान्, विद्वान्, श्रेष्ठ कवि, जितेन्द्रियोंमें श्रेष्ठ, समस्त सम्पदाओंका दाता, परम पवित्र, सदाचारी, प्रशंसनीय, विष्णुभक्त, अहिंसक, दयालु और तत्त्वज्ञानविशारद पुत्र पाता है। महावन्ध्या स्त्री वस्त्र, अलंकार और चन्दनद्वारा भक्तिपूर्वक गणेशकी पूजा करके और इस गणपतिखण्डको सुनकर पुत्रको जन्म देती है। जो मनुष्य नियमपरायण हो मनमें किसी कामनाको लेकर इसे सुनता है, सुरश्रेष्ठ गणेश उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण कर देते हैं। विघ्ननाशके लिये यत्नपूर्वक इस गणपतिखण्डको सुनकर वाचकको सोनेका यज्ञोपवीत, श्वेत छत्र, श्वेत अश्व, श्वेतपुष्पोंकी माला, स्वस्तिक मिष्टान्न, तिलके लड्डू और देशकालोद्भव पके हुए फल प्रदान करना चाहिये।

(अध्याय ४६)


॥ गणपतिखण्ड सम्पूर्ण ॥

४१८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

नारदजीके प्रश्न तथा मुनिवर नारायणद्वारा भगवान् विष्णु एवं वैष्णवके माहात्म्यका वर्णन, श्रीराधा और श्रीकृष्णके गोकुलमें अवतार लेनेका एक कारण श्रीदाम और राधाका परस्पर शाप

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत्॥

भगवान् नारायण, नरश्रेष्ठ नर तथा देवी सरस्वतीको नमस्कार करके जय (इतिहास-पुराण आदि)-का पाठ करना चाहिये।

**नारदजीने कहा—**ब्रह्मन्! मैंने सबसे पहले पूज्यपाद पिता ब्रह्माजीके मुखारविन्दसे ब्रह्मखण्डकी मनोहर कथा सुनी है, जो अत्यन्त अद्भुत है। तदनन्तर उन्हींकी आज्ञासे मैं तुरंत आपके निकट चला आया और यहाँ अमृतखण्डसे भी अधिक मधुर प्रकृतिखण्ड सुननेको मिला। तत्पश्चात् मैंने गणपतिखण्ड श्रवण किया, जो अखण्ड जन्मोंका खण्डन करनेवाला है। परंतु मेरा लोलुप मन अभी तृप्त नहीं हुआ। यह और भी विशिष्ट प्रसङ्गको सुनना चाहता है। अतः अब श्रीकृष्णजन्मखण्डका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये, जो मनुष्योंके जन्म-मरण आदिका खण्डन करनेवाला है। वह समस्त तत्त्वोंका प्रकाशक, कर्मबन्धनका नाशक, हरिभक्ति प्रदान करनेवाला, तत्काल वैराग्यजनक, संसारविषयक आसक्तिका निवारक, मुक्तिबीजका कारण तथा भवसागरसे पार उतारनेवाला उत्तम साधन है। वह कर्मभोगरूपी रोगोंका नाश करनेके लिये रसायनका काम देता है। श्रीकृष्णचरणारविन्दोंकी प्राप्तिके लिये सोपानका निर्माण करता है। वैष्णवोंका तो वह जीवन ही है। तीनों लोकोंको परम पवित्र करनेवाला है। मैं आपका शरणागत भक्त एवं शिष्य हूँ। अतः आप मुझे श्रीकृष्णजन्मखण्डकी कथाको विस्तारपूर्वक सुनाइये। किसकी प्रार्थनासे एकमात्र परिपूर्णतम परमेश्वर श्रीकृष्ण अपने सम्पूर्ण अंशोंसे इस भूतलपर अवतीर्ण हुए? किस युगमें, किस हेतुसे और कहाँ उनका आविर्भाव हुआ? उनके पिता वसुदेव कौन थे अथवा माता देवकी भी कौन थीं? बताइये। किसके कुलमें भगवान्ने मायाद्वारा जन्म-ग्रहणकी लीला की? श्रीहरिने किस रूपसे यहाँ आकर क्या किया? मुने! सुना जाता है कि श्रीकृष्ण कंसके भयसे सूतिकागृहसे गोकुलको चले गये थे। जो स्वयं भयके स्वामी हैं, उन्हें कीटतुल्य कंससे क्यों भय हुआ? उन श्रीहरिने गोप-वेष धारण करके गोकुलमें कौन-सी लीला की? वे तो जगदीश्वर हैं। फिर उन्होंने गोपाङ्गनाओंके साथ क्यों विहार किया? गोपाङ्गनाएँ कौन थीं? अथवा वे ग्वाल-बाल भी कौन थे? यशोदा कौन थीं? नन्दरायजी कौन थे? उन्होंने कौन-सा पुण्य किया था? श्रीहरिकी प्रेयसी गोलोकवासिनी पुण्यवती देवी श्रीराधा क्यों व्रजमें व्रजकन्या होकर प्रकट हुईं? गोपियोंने किस प्रकार दुराराध्य परमेश्वरको प्राप्त किया? श्रीहरि उन सबको छोड़कर मथुरा क्यों चले गये? महाभाग! पृथ्वीका भार उतारकर कौन-सी लीला करनेके पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण पुनः परमधामको पधारे? आप उनकी लीला-कथा सुनाइये; क्योंकि उसका श्रवण और कीर्तन पुण्यदायक है। श्रीहरिकी कथा अत्यन्त दुर्लभ है। वह भवसागरसे पार उतारनेके लिये नौकाके तुल्य है। प्रारब्धभोगरूपी बेड़ी तथा क्लेशोंका उच्छेद करनेके लिये कटार है। पापरूपी ईंधन-राशिका दाह करनेके लिये प्रज्वलित अग्नि-शिखाके समान है। इसे सुननेवाले पुरुषोंके करोड़ों जन्मोंकी पापराशिका यह नाश

** श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४१९
कर देती है। भगवान्‌की कथा शोक-सागरका
नाश करनेवाली मुक्ति है। वह कानोंमें अमृतके
समान मधुर प्रतीत होती है। कृपानिधे ! मैं आपका
भक्त एवं शिष्य हूँ। आप मुझे श्रीहरिकथाका ज्ञान
प्रदान कीजिये। तप, जप, बड़े-बड़े दान, पृथ्वीके
तीथोंके दर्शन, श्रुतिपाठ, अनशन, व्रत, देवार्चन
तथा सम्पूर्ण यज्ञोंमें दीक्षा ग्रहण करनेसे मनुष्यको
जो फल मिलता है, वह सब ज्ञानदानकी सोलहवीं
कलाके बराबर भी नहीं है। पिताजीने मुझे आपके
पास ज्ञान प्राप्त करनेके लिये भेजा है। सुधा-
समुद्रके पास पहुँचकर कौन दूसरी वस्तु (जल
आदि) पीनेकी इच्छा करेगा ?
भगवान् नारायण बोले-कुलको पवित्र
करनेवाले नारद! मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ।
तुम धन्य हो। पुण्यकी मूर्तिमती राशि हो।
लोकोंको पवित्र करनेके लिये ही तुम इनमें भ्रमण
करते हो। वाणीसे मनुष्योंके हृदयकी तत्काल
पहचान हो जाती है। शिष्य, कलत्र, कन्या,
दौहित्र, बन्धु-बान्धव, पुत्र-पौत्र, प्रवचन, प्रताप,
यश, श्री, बुद्धि, वैरी और विद्या-इनके विषयमें
मनुष्योंके हार्दिक अभिप्रायका पता चल जाता है।
तुम जीवन्मुक्त और पवित्र हो। भगवान् गदाधरके
शुद्ध भक्त हो। अपने चरणोंकी धूलसे सबकी
आधारभूता वसुधाको पवित्र करते फिरते हो।
समस्त लोकोंको अपने स्वरूपका दर्शन देकर
पवित्र बनाते हो। भगवान् श्रीहरिकी कथा परम
मङ्गलमयी है, इसीलिये तुम उसे सुनना चाहते
हो। जहाँ श्रीकृष्णकी कथाएँ होती हैं, वहीं सब
देवता निवास करते हैं। ऋषि, मुनि और सम्पूर्ण
तीर्थ भी वहीं रहते हैं। वे कथा सुनकर अन्तमें
अपने निरापद स्थानको जाते हैं। जिन स्थानोंमें
श्रीकृष्णकी शुभ कथाएँ होती हैं, वे तीर्थ बन
जाते हैं। सैकड़ों जन्मोंतक तपस्या करके जो
पवित्र हो गया है, वही इस भारतवर्षमें जन्म
पाता है। वह यदि श्रीहरिकी अमृतमयी कथाका
श्रवण करे, तभी अपने जन्मको सफल कर
सकता है। भगवान्‌की पूजा, वन्दना, मन्त्र-जप,
सेवा, स्मरण, कीर्तन, निरन्तर उनके गुणोंका
श्रवण, उनके प्रति आत्मनिवेदन तथा उनका
दास्यभाव-ये भक्तिके नौ लक्षण हैं*। नारद !
इन सबका अनुष्ठान करके मनुष्य अपने जन्मको
सफल बनाता है। उसके मार्गमें विघ्न नहीं आता
और उसकी पूरी आयु नष्ट नहीं होती। उसके
सामने काल उसी तरह नहीं जाता है, जैसे
गरुड़के सामने सर्प। भगवान् श्रीहरि उस भक्तका
सामीप्य एक क्षणके लिये भी नहीं छोड़ते हैं।
अणिमा आदि सिद्धियाँ तुरंत उसकी सेवामें
उपस्थित हो जाती हैं। भगवान् श्रीकृष्णकी
आज्ञासे उसकी रक्षाके लिये सुदर्शन चक्र दिन-
रात उसके पास घूमता रहता है। फिर कौन
उसका क्या कर सकता है? यमराजके दूत
स्वप्नमें भी उसके निकट वैसे ही नहीं जाते
हैं, जैसे शलभ जलती हुई आगको देखकर उससे
दूर भागते हैं। उसके ऊपर ऋषि, मुनि, सिद्ध
तथा सम्पूर्ण देवता संतुष्ट रहते हैं। वह भगवान्
श्रीकृष्णकी कृपासे सर्वत्र सुखी एवं निःशंक
रहता है। श्रीकृष्णकी कथामें सदा तुम्हारा आत्यन्तिक
अनुराग है। क्यों न हो ? पिताका स्वभाव पुत्रमें
अवश्य ही प्रकट होता है। विप्रवर ! तुम्हारी यह
प्रशंसा क्या है ? तुम्हारा जन्म ब्रह्माजीके मानससे
हुआ है। जिसका जिस कुलमें जन्म होता है,
उसकी बुद्धि उसके अनुसार ही होती है। तुम्हारे
पिता श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंकी सेवासे ही
विधाताके पदपर प्रतिष्ठित हैं। वे नित्य-निरन्तर
नवधा भक्तिका पालन करते हैं।
जिसका श्रीकृष्णकी कथामें अनुराग हो,

  • अर्चनं वन्दनं मन्त्रजपं सेवनमेव च। स्मरणं कीर्तनं शश्वद् गुणश्रवणमीप्सितम् ॥
    निवेदनं तस्य दास्यं नवधा भक्तिलक्षणम्। (श्रीकृष्णजन्मखण्ड १।३३-३४)

४२० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


कथा सुनकर जिसके नेत्रोंमें आँसू छलक आते हों और शरीरमें रोमाञ्च छा जाता हो तथा मन उसीमें डूब जाता हो; उसीको विद्वान् पुरुषोंने सच्चा भक्त कहा है। जो मन, वाणी और शरीरसे स्त्री-पुत्र आदि सबको श्रीहरिका ही स्वरूप समझता है, उसे विद्वानोंने भक्त कहा है। जिसकी सब जीवोंपर दया है तथा जो सम्पूर्ण जगत्‌को श्रीकृष्ण जानता है, वह महाज्ञानी पुरुष ही वैष्णव भक्त माना गया है। जो निर्जन स्थानमें अथवा तीर्थोंके सम्पर्कमें रहकर आसक्तिशून्य हो बड़े आनन्दके साथ श्रीहरिके चरणारविन्दका चिन्तन करते हैं, वे वैष्णव माने गये हैं। जो सदा भगवान्‌के नाम और गुणका गान करते, मन्त्र जपते तथा कथा-वार्ता कहते-सुनते हैं, वे अत्यन्त वैष्णव हैं। मीठी वस्तुएँ पाकर श्रीहरिको प्रसन्नतापूर्वक भोग लगानेके लिये जिसका मन हर्षसे खिल उठता है, वह ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ भक्त है। जिसका मन सोते, जागते, दिन-रात श्रीहरिके चरणारविन्दमें ही लगा रहता है और जो बाह्य शरीरसे पूर्व कर्मोंका फल भोगता है, वह वैष्णव है। तीर्थ सदा वैष्णवोंके दर्शन और स्पर्शकी अभिलाषा करते हैं; क्योंकि उनके सङ्गसे उन तीर्थोंके वे सारे पाप नष्ट हो जाते हैं, जो उन्हें पापियोंके संसर्गसे मिले होते हैं। जितनी देरमें गाय दुही जाती है, उतनी देर भी जहाँ वैष्णव पुरुष ठहर जाता है, वहाँकी धरतीपर उतने समयके लिये सम्पूर्ण तीर्थ निवास करते हैं। वहाँ मरा हुआ पापी मनुष्य निश्चय ही पापमुक्त हो श्रीहरिके धाममें वैसे ही चला जाता है, जैसे अन्तकालमें श्रीकृष्णकी स्मृति होनेपर अथवा ज्ञानगङ्गामें अवगाहन करनेपर मनुष्य परम पदको प्राप्त हो जाता है। तथा जैसे तुलसीवनमें, गोशालामें, श्रीकृष्ण-मन्दिरमें, वृन्दावनमें, हरिद्वारमें एवं अन्य तीर्थोंमें भी मृत्यु होनेपर मनुष्यको परम धामकी प्राप्ति होती है। तीर्थोंमें स्नान करने या गोता लगानेसे पापियोंके पाप धुल जाते हैं। फिर उन तीर्थोंके पाप वैष्णवोंको छूकर बहनेवाली वायुके स्पर्शसे नष्ट होते हैं। जो भगवान् हृषीकेशकी और उनके पुण्यात्मा भक्तकी निन्दा करते हैं, उनके सौ जन्मोंका पुण्य निश्चय ही नष्ट हो जाता है। वैष्णवोंके स्पर्शमात्रसे पातकी मनुष्य पातकसे मुक्त हो जाता है। पातकीके स्पर्शसे उस भक्तमें जो पाप आता है, उसका नाश उसके अन्तः-करणमें बैठे हुए भगवान् मधुसूदन अवश्य कर देते हैं। ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने भगवान् विष्णु और वैष्णव भक्तके गुणोंका वर्णन किया है। अब मैं तुम्हें श्रीहरिके जन्मका प्रसङ्ग सुनाता हूँ, सुनो।

श्रीनारायणने कहा— एक बार गोलोकमें श्रीकृष्ण विरजादेवीके समीप थे। श्रीराधाको यह ठीक नहीं लगा। श्रीराधा सखियोंसहित वहाँ जाने लगीं। तब श्रीदामने उन्हें रोका। इसपर श्रीराधाने श्रीदामको शाप दे दिया कि ‘तुम असुरयोनिको प्राप्त हो जाओ।’ तब श्रीदामने भी श्रीराधाको यह शाप दिया कि ‘आप भी मानवी-योनिमें जायँ। वहाँ गोकुलमें श्रीहरिके ही अंश महायोगी रायाण नामक एक वैश्य होंगे। आपका छायारूप उनके साथ रहेगा। अतएव भूतलपर मूढ़ लोग आपको रायाणकी पत्नी समझेंगे, श्रीहरिके साथ कुछ समय आपका विछोह रहेगा।’

इससे श्रीदाम और श्रीराधा दोनोंको ही क्षोभ हुआ। तब श्रीकृष्णने श्रीदामको सान्त्वना देकर कहा कि ‘तुम त्रिभुवनविजेता सर्वश्रेष्ठ शङ्खचूड़ नामक असुर होओगे और अन्तमें श्रीशंकरके त्रिशूलसे भिन्न-देह होकर यहाँ मेरे पास लौट आओगे।’

श्रीराधाको बड़े ही प्रेमके साथ हृदयसे लगाकर भगवान्‌ने कहा—‘वाराहकल्पमें मैं पृथ्वीपर जाऊँगा और व्रजमें जाकर वहाँके पवित्र काननोंमें तुम्हारे साथ विहार करूँगा। मेरे रहते तुमको क्या भय है?’

उधर विरजादेवी नदी हो गयीं और उनके