ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२- परब्रह्म श्रीकृष्ण और श्रीराधासे प्रकट चिन्मय देवी और देवताओंके चरित्र
| १०४ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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कलासे ही संसारकी सारी स्त्रियाँ प्रकट हुई हैं। प्रकृति ही माया है, जिसने सबको मोहमें डाल रखा है। वह सनातनी परमा प्रकृति नारायणी कही गयी है; क्योंकि वह परमपुरुष नारायणकी शक्ति है। सर्वात्मा ईश्वर भी उसीके द्वारा शक्तिमान् होते हैं। उस शक्तिके बिना वे सृष्टि करनेमें सदा असमर्थ ही हैं। वत्स! तुम इस समय जाकर विवाह करो। मैं तुम्हें पिताके आदेशका पालन करनेकी आज्ञा देता हूँ। जो गुरुकी आज्ञाका पालन करनेवाला है, वह सदा सर्वत्र पूजनीय तथा विजयी होता है। जो पुरुष वस्त्र, अलंकार और चन्दनसे अपनी पत्नीका सत्कार करता है, उसपर प्रकृतिदेवी संतुष्ट होती हैं। ठीक उसी तरह जैसे ब्राह्मणकी पूजा-अर्चा करनेपर भगवान् श्रीकृष्ण संतुष्ट होते हैं। प्रकृति ही सम्पूर्ण लोकोंमें अपनी मायासे स्त्रियोंके रूपमें प्रकट हुई हैं। अतः महिलाओंके अपमानसे वे प्रकृतिदेवी ही अपमानित होती हैं। जिसने पति-पुत्रसे युक्त सती-साध्वी दिव्य नारीका पूजन किया है, उसके द्वारा सर्वमङ्गलदायिनी प्रकृतिदेवीका ही पूजन सम्पन्न हुआ है। मूल प्रकृति एक ही है। वह पूर्ण ब्रह्मस्वरूपिणी है। उसीको सनातनी विष्णुमाया कहा गया है। सृष्टिकालमें वह पाँच रूपोंमें प्रकट होती है। जो परमात्मा श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी है तथा समस्त प्रकृतियोंमें उन्हें सबसे अधिक प्यारी है, उस मुख्या प्रकृतिका नाम 'राधा' है। दूसरी प्रकृति नारायणप्रिया लक्ष्मी हैं, जो सर्वसम्पत्स्वरूपिणी हैं। तीसरी प्रकृति वाणीकी अधिष्ठात्री देवी सरस्वती हैं, जो सदा सबके द्वारा पूजनीया हैं। चौथी प्रकृति वेदमाता सावित्री हैं। वे ब्रह्माजीकी प्यारी पत्नी और सबकी पूजनीया हैं। पाँचवीं प्रकृतिका नाम दुर्गा है, जो भगवान् शंकरकी प्यारी पत्नी हैं। उन्हींके पुत्र गणेश हैं। (अध्याय ३०)
ब्रह्मखण्ड सम्पूर्ण
प्रकृतिखण्ड
पञ्चदेवीरूपा प्रकृतिका तथा उनके अंश, कला एवं कलांशका विशद वर्णन
भगवान् नारायण कहते हैं— नारद ! गणेशजननी दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, सावित्री और राधा—ये पाँच देवियाँ प्रकृति कहलाती हैं। इन्हींपर सृष्टि निर्भर है।
नारदजीने पूछा— ज्ञानियोंमें प्रमुख स्थान प्राप्त करनेवाले साधो ! वह प्रकृति कहाँसे प्रकट हुई है, उसका कैसा स्वरूप है, कैसे लक्षण हैं तथा क्यों वह पाँच प्रकारकी हो गयी ? उन समस्त देवियोंके चरित्र, उनके पूजाके विधान, उनके गुण और वे किसके यहाँ कैसे प्रकट हुईं—ये सभी प्रसङ्ग आप मुझे बतानेकी कृपा करें।
भगवान् नारायणने कहा— वत्स ! 'प्र' का अर्थ है 'प्रकृष्ट' और 'कृति' से सृष्टिके अर्थका बोध होता है, अतः सृष्टि करनेमें जो प्रकृष्ट (परम प्रवीण) है, उसे देवी 'प्रकृति' कहते हैं। सर्वोत्तम सत्त्वगुणके अर्थमें 'प्र' शब्द, मध्यम रजोगुणके अर्थमें 'कृ' शब्द और तमोगुणके अर्थमें 'ति' शब्द है। जो त्रिगुणात्मकस्वरूपा है, वही सर्वशक्तिसे सम्पन्न होकर सृष्टिविषयक कार्यमें प्रधान है, इसलिये 'प्रधान' या 'प्रकृति' कहलाती है। 'प्र' प्रथम अर्थमें और 'कृति' सृष्टि-अर्थमें है। अतः जो देवी सृष्टिकी आदिकारणरूपा है, उसे प्रकृति कहते हैं। सृष्टिके अवसरपर परब्रह्म परमात्मा स्वयं दो रूपोंमें प्रकट हुए—प्रकृति और पुरुष। उनका आधा दाहिना अङ्ग 'पुरुष' और आधा बायाँ अङ्ग 'प्रकृति' हुआ। वही प्रकृति ब्रह्मस्वरूपा, नित्या और सनातनी माया है। जैसे परमात्मा हैं, वैसी उनकी शक्तिस्वरूपा प्रकृति है अर्थात् परब्रह्म परमात्माके सभी अनुरूप गुण इन प्रकृतिमें निहित हैं, जैसे अग्निमें दाहिका शक्ति सदा रहती है। इसीसे परम योगी पुरुष स्त्री और पुरुषमें भेद नहीं मानते हैं। नारद ! वे सबको ब्रह्ममय देखते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण स्वेच्छामय, सर्वतन्त्र-स्वतन्त्र परम पुरुष हैं। उनके मनमें सृष्टिकी इच्छा उत्पन्न होते ही सहसा 'मूल प्रकृति' परमेश्वरी प्रकट हो गयीं। तदनन्तर परमेश्वरकी आज्ञाके अनुसार सृष्टि-रचनाके लिये इनके पाँच रूप हो गये। भगवती प्रकृति भक्तोंके अनुरोधसे अथवा उनपर कृपा करनेके लिये विविध रूप धारण करती हैं।
जो गणेशकी माता 'भगवती दुर्गा' हैं, उन्हें 'शिवस्वरूपा' कहा जाता है। ये भगवान् शंकरकी प्रेयसी भार्या हैं। नारायणी, विष्णुमाया और पूर्ण ब्रह्मस्वरूपिणी नामसे ये प्रसिद्ध हैं। ब्रह्मादि देवता, मुनिगण तथा मनु प्रभृति—सभी इनकी पूजा करते हैं। ये सबकी अधिष्ठात्री देवी हैं, सनातन ब्रह्मस्वरूपा हैं। यश, मङ्गल, धर्म, श्री, सुख, मोक्ष और हर्ष प्रदान करना इनका स्वाभाविक गुण है। दुःख, शोक और उद्वेगको ये दूर कर देती हैं। शरणमें आये हुए दीनों एवं पीड़ितोंकी रक्षामें सदा संलग्न रहती हैं। ये तेजःस्वरूपा हैं। इनका विग्रह परम तेजस्वी है। इन्हें तेजकी अधिष्ठात्री देवी कहा जाता है। ये सर्वशक्तिस्वरूपा हैं और भगवान् शंकरको निरन्तर शक्तिशाली बनाये रखती हैं। सिद्धेश्वरी, सिद्धिरूपा, सिद्धिदा, सिद्धिदाताओंकी ईश्वरी, बुद्धि, निद्रा, क्षुधा, पिपासा, छाया, तन्द्रा, दया, स्मृति, जाति, क्षान्ति, शान्ति, कान्ति, भ्रान्ति, चेतना, तुष्टि, पुष्टि, लक्ष्मी, वृत्ति और माता—ये सब इनके नाम हैं। श्रीकृष्ण परब्रह्म परमात्मा हैं। उनके समीप सर्वशक्तिरूपसे ये विराजती हैं। श्रुतिमें इनके सुविख्यात गुणका अत्यन्त संक्षेपमें वर्णन किया गया है, जैसा कि आगमोंमें उपलब्ध होता है। ये अनन्ता हैं। अतएव इनमें गुण भी
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अनन्त हैं। अब इनके दूसरे रूपका वर्णन करता हूँ, सुनो।
जो परम शुद्ध सत्त्वस्वरूपा हैं, उन्हें ‘भगवती लक्ष्मी’ कहा जाता है। परम प्रभु श्रीहरिकी वे शक्ति कहलाती हैं। अखिल जगत्की सारी सम्पत्तियाँ उनके स्वरूप हैं। उन्हें सम्पत्तिकी अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। वे परम सुन्दरी, अनुपम संयमरूपा, शान्तस्वरूपा, श्रेष्ठ स्वभावसे सम्पन्न तथा समस्त मङ्गलोंकी प्रतिमा हैं। लोभ, मोह, काम, क्रोध, मद और अहंकार आदि दुर्गुणोंसे वे सहज ही रहित हैं। भक्तोंपर अनुग्रह करना तथा अपने स्वामी श्रीहरिसे प्रेम करना उनका स्वभाव है। वे सबकी आदिकारणरूपा और पतिव्रता हैं। श्रीहरि प्राणके समान जानकर उनसे अत्यन्त प्रेम करते हैं। वे सदा प्रिय वचन ही बोलती हैं; कभी अप्रिय बात नहीं कहतीं; धान्य आदि सभी शस्य तथा सबके जीवन-रक्षाके उपाय उनके रूप हैं। प्राणियोंका जीवन स्थिर रहे—एतदर्थ उन्होंने यह रूप धारण कर रखा है। वे परम साध्वी देवी ‘महालक्ष्मी’ नामसे विख्यात होकर वैकुण्ठमें अपने स्वामीकी सेवामें सदा संलग्न रहती हैं। स्वर्गमें ‘स्वर्गलक्ष्मी’, राजाओंके यहाँ ‘राजलक्ष्मी’ तथा मर्त्यलोकवासी गृहस्थोंके घर ‘गृहलक्ष्मी’ के रूपमें वे विराजमान हैं। समस्त प्राणियों तथा द्रव्योंमें सर्वोत्कृष्ट शोभा उन्हींका स्वरूप है। वे परम मनोहर हैं। पुण्यात्माओंकी कीर्ति उन्हींकी प्रतिमा है। वे राजाओंकी प्रभा हैं। व्यापारियोंके यहाँ वे वाणिज्यरूपसे विराजती हैं। पापीजन जो कलह आदि अशिष्ट व्यवहार करते हैं, उनमें भी इन्हींकी शक्ति है। वे दयामयी हैं, भक्तोंकी माता हैं और उन भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये सदा व्याकुल रहती हैं। इस प्रकार दूसरी शक्ति (या प्रकृति)-का परिचय दिया गया। उनका वेदोंमें वर्णन है तथा सबने उनका सम्मान किया है। सब लोग उनकी आराधना और वन्दना करते हैं।
नारद! अब मैं अन्य प्रकृतिदेवीका परिचय देता हूँ, सुनो। परब्रह्म परमात्मासे सम्बन्ध रखनेवाली वाणी, बुद्धि, विद्या और ज्ञानकी जो अधिष्ठात्री देवी हैं, उन्हें ‘सरस्वती’ कहा जाता है। सम्पूर्ण विद्याएँ उन्हींके स्वरूप हैं। मनुष्योंको बुद्धि, कविता, मेधा, प्रतिभा और स्मरण-शक्ति उन्हींकी कृपासे प्राप्त होती हैं। अनेक प्रकारके सिद्धान्तभेदों और अर्थोंकी कल्पनाशक्ति वे ही देती हैं। वे व्याख्या और बोधस्वरूपा हैं। उनकी कृपासे समस्त संदेह नष्ट हो जाते हैं। उन्हें विचारकारिणी और ग्रन्थकारिणी कहा जाता है। वे शक्तिस्वरूपा हैं। सम्पूर्ण संगीतकी सन्धि और तालका कारण उन्हींका रूप है। प्रत्येक विश्वमें जीवोंके लिये विषय, ज्ञान और वाणीरूपा वे ही हैं। उनका एक हाथ व्याख्या (अथवा उपदेश)-की मुद्रामें सदा उठा रहता है। वे शान्तस्वरूपा हैं तथा हाथमें वीणा और पुस्तक लिये रहती हैं। उनका विग्रह शुद्धसत्त्वमय है। वे सदाचारपरायण तथा भगवान् श्रीहरिकी प्रिया हैं। हिम, चन्दन, कुन्द, चन्द्रमा, कुमुद और कमलके समान उनकी कान्ति है। वे रत्न (स्फटिकमणि)-की माला फेरती हुई भगवान् श्रीकृष्णके नामोंका जप करती हैं। उनकी मूर्ति तपोमयी है। तपस्वीजनोंको उनके तपका फल प्रदान करनेमें वे सदा तत्पर रहती हैं। सिद्धि-विद्या उनका स्वरूप है। वे सदा सम्पूर्ण सिद्धि प्रदान करती हैं। इस प्रकार तृतीया देवी (प्रकृति) श्रीजगदम्बा सरस्वतीका शास्त्रके अनुसार किञ्चित् वर्णन किया गया। अब चौथी प्रकृतिका परिचय सुनो।
नारद! वे चारों वेदोंकी माता हैं। छन्द और वेदाङ्ग भी उन्हींसे उत्पन्न हुए हैं। संध्या-वन्दनके मन्त्र और तन्त्रोंकी जननी भी वे ही हैं। द्विजातिवर्णोंके लिये उन्होंने अपना यह रूप धारण किया है। वे जगद्रूपा, तपस्विनी, ब्रह्मतेजसे