ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२८- भगवान् श्रीकृष्णद्वारा अष्टावक्र (देवल)-के शवका संस्कार तथा उनके गूढ़ चरित्रका परिचय
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५६३
हैं, आप उन्हें बीज और फल दोनों प्रदान करती हैं, कोई भी आपका निर्वचन (निरूपण) नहीं कर सकता है, महामाये! आपको नमस्कार है। शिवे! आप शंकरसम्बन्धी सौभाग्यसे सम्पन्न हैं तथा सबको सौभाग्य देनेवाली हैं। देवि! श्रीहरि ही मेरे प्राणवल्लभ और सौभाग्य हैं; उन्हें मुझे दीजिये। आपको नमस्कार है। जो स्त्रियाँ व्रतकी समाप्तिके दिन इस स्तोत्रसे शिवादेवीकी स्तुति करके बड़ी भक्तिसे उन्हें मस्तक झुकाती हैं; वे साक्षात् श्रीहरिको पतिरूपमें प्राप्त करती हैं। इस लोकमें परात्पर परमेश्वरको पतिरूपमें पाकर कान्त-सुखका उपभोग करके अन्तमें दिव्य विमानपर आरूढ़ हो भगवान् श्रीकृष्णके समीप चली जाती हैं*।
समाप्तिके दिन गोपियोंसहित श्रीराधाने देवीकी वन्दना और स्तुति करके गौरी-व्रतको पूर्ण किया। एक ब्राह्मणको प्रसन्नतापूर्वक एक सहस्र गौएँ तथा सौ सुवर्णमुद्राएँ दक्षिणाके रूपमें देकर वे घर जानेको उद्यत हुईं। उन्होंने आदरपूर्वक एक हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराया, बाजे बजवाये और भिखमंगोंको धन बाँटा। इसी समय दुर्गतिनाशिनी दुर्गा वहाँ आकाशसे प्रकट हुईं, जो ब्रह्मतेजसे प्रकाशित हो रही थीं। उनके प्रसन्न मुखपर मन्द हास्यकी प्रभा फैल रही थी। वे सौ योगिनियोंके साथ थीं। सिंहसे जुते हुए रथपर बैठी तथा रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित थीं। उनके दस भुजाएँ थीं। उन्होंने रत्नसारमय उपकरणोंसे युक्त सुवर्णनिर्मित दिव्य रथसे उतरकर तुरंत ही श्रीराधाको हृदयसे लगा लिया। देवी दुर्गाको देखकर अन्य गोपकुमारियोंने भी प्रसन्नतापूर्वक प्रणाम किया। दुर्गाने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा—'तुम सबका मनोरथ सिद्ध होगा।' इस प्रकार गोपिकाओंको वर दे उनसे सादर सम्भाषण कर देवीने मुस्कराते हुए
* जानक्युवाच—
शक्तिस्वरूपे सर्वेषां सर्वाधारे गुणाश्रये। सदा शङ्करयुक्ते च पतिं देहि नमोऽस्तु ते॥
सृष्टिस्थित्यन्तरूपेण सृष्टिस्थित्यन्तरूपिणि। सृष्टिस्थित्यन्तबीजानां बीजरूपे नमोऽस्तु ते॥
हे गौरि पतिमर्मज्ञे पतिव्रतपरायणे। पतिव्रते पतिरते पतिं देहि नमोऽस्तु ते॥
सर्वमङ्गलमङ्गल्ये सर्वमङ्गलसंयुते। सर्वमङ्गलबीजे च नमस्ते सर्वमङ्गले॥
सर्वप्रिये सर्वबीजे सर्वाशुभविनाशिनि। सर्वेशे सर्वजनके नमस्ते शङ्करप्रिये॥
परमात्मस्वरूपे च नित्यरूपे सनातनि। साकारे च निराकारे सर्वरूपे नमोऽस्तु ते॥
क्षुत्तृष्णेच्छा दया श्रद्धा निद्रा तन्द्रा स्मृतिः क्षमा। एतास्तव कलाः सर्वा नारायणि नमोऽस्तु ते॥
लज्जा मेधा तुष्टिपुष्टिशान्तिसम्पत्तिवृद्धयः। एतास्तव कलाः सर्वाः सर्वरूपे नमोऽस्तु ते॥
दृष्टादृष्टस्वरूपे च तयोर्बीजफलप्रदे। सर्वानिर्वचनीये च महामाये नमोऽस्तु ते॥
शिवे शङ्करसौभाग्ययुक्ते सौभाग्यदायिनि। हरिं कान्तं च सौभाग्यं देहि देवि नमोऽस्तु ते॥
स्तोत्रेणानेन याः स्तुत्वा समाप्तिदिवसे शिवाम्। नमन्ति परया भक्त्या ता लभन्ति हरिं पतिम्॥
इह कान्तसुखं भुक्त्वा पतिं प्राप्य परात्परम्। दिव्यं स्यन्दनमारुह्य यान्त्यन्ते कृष्णसंनिधिम्॥
(२७।१७३—१८४)
| ५६४ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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मुखारविन्दसे राधिकाको सम्बोधित करके कहा।
**पार्वती बोलीं—**राधे! तुम सर्वेश्वर श्रीकृष्णको प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हो। जगदम्बिके! तुम्हारा यह व्रत लोकशिक्षाके लिये है। तुम मायासे मानवरूपमें प्रकट हुई हो। सुन्दरि! क्या तुम गोलोकनाथ, गोलोक, श्रीशैल, विरजाके तटप्रान्त, श्रीरासमण्डल तथा दिव्य मनोहर वृन्दावनको कुछ याद करती हो? क्या तुम्हें प्रेमशास्त्रके विद्वान् तथा रतिचोर श्यामसुन्दरके उस चरित्रका किञ्चित् भी स्मरण होता है, जो नारियोंके चित्तको बरबस अपनी ओर खींच लेता है? तुम श्रीकृष्णके अर्द्धाङ्गसे प्रकट हुई हो; अतः उन्हींके समान तेजस्विनी हो। समस्त देवाङ्गनाएँ तुम्हारी अंशकलासे प्रकट हुई हैं; फिर तुम मानवी कैसे हो? तुम श्रीहरिके लिये प्राणस्वरूपा हो और स्वयं श्रीहरि तुम्हारे प्राण हैं। वेदमें तुम दोनोंका भेद नहीं बताया गया है; फिर तुम मानवी कैसे हो? पूर्वकालमें ब्रह्माजी साठ हजार वर्षोंतक तप करके भी तुम्हारे चरणकमलोंका दर्शन न पा सके; फिर तुम मानुषी कैसे हो? तुम तो साक्षात् देवी हो। श्रीकृष्णकी आज्ञासे गोपीका रूप धारण करके पृथ्वीपर पधारी हो; शान्ते! तुम मानवी स्त्री कैसे हो? मनुवंशमें उत्पन्न नृपश्रेष्ठ सुयज्ञ तुम्हारी ही कृपासे गोलोकमें गये थे; फिर तुम मानुषी कैसे हो? तुम्हारे मन्त्र और कवचके प्रभावसे ही भृगुवंशी परशुरामजीने इस पृथ्वीको इक्कीस बार क्षत्रिय-नरेशोंसे शून्य कर दिया था। ऐसी दशामें तुम्हें मानवी स्त्री कैसे कहा जा सकता है? परशुरामजीने भगवान् शंकरसे तुम्हारे मन्त्रको प्राप्त कर पुष्करतीर्थमें उसे सिद्ध किया और उसीके प्रभावसे वे कार्तवीर्य अर्जुनका संहार कर सके; फिर तुम मानुषी कैसे हो? उन्होंने अभिमानपूर्वक महात्मा गणेशका एक दाँत तोड़ दिया। वे केवल तुमसे ही भय मानते थे; फिर तुम मानवी स्त्री कैसे हो? जब मैं क्रोधसे उन्हें भस्म करनेको उद्यत हुई, तब हे ईश्वरि! मेरी प्रसन्नताके लिये तुमने स्वयं आकर उनकी रक्षा की; फिर तुम मानुषी कैसे हो? श्रीकृष्ण प्रत्येक कल्पमें तथा जन्म-जन्ममें तुम्हारे पति हैं। जगन्मातः! तुमने लोकहितके लिये ही यह व्रत किया है। अहो! श्रीदामके शापसे और भूमिका भार उतारनेके लिये पृथ्वीपर तुम्हारा निवास हुआ है; फिर तुम मानवी स्त्री कैसे हो? तुम जन्म, मृत्यु और जराका नाश करनेवाली देवी हो। कलावतीकी अयोनिजा पुत्री एवं पुण्यमयी हो; फिर तुम्हें साधारण मानुषी कैसे माना जा सकता है? तीन मास व्यतीत होनेपर जब मनोहर मधुमास (चैत्र) उपस्थित होगा, तब रात्रिके समय निर्जन, निर्मल एवं सुन्दर रासमण्डलमें वृन्दावनके भीतर श्रीहरिके साथ समस्त गोपिकाओंसहित तुम्हारी रासक्रीड़ा सानन्द सम्पन्न होगी। सती राधे! प्रत्येक कल्पमें भूतलपर श्रीहरिके साथ तुम्हारी रसमय लीला होगी, यह विधाताने ही लिख दिया है। इसे कौन रोक सकता है? सुन्दरी! श्रीहरिप्रिये! जैसे मैं महादेवजीकी सौभाग्यवती पत्नी हूँ, उसी प्रकार तुम श्रीकृष्णकी सौभाग्यशालिनी वल्लभा हो। जैसे दूधमें धवलता, अग्निमें दाहिका शक्ति, भूमिमें गन्ध और जलमें शीतलता है; उसी प्रकार श्रीकृष्णमें तुम्हारी स्थिति है। देवाङ्गना, मानवकन्या, गन्धर्वजातिकी स्त्री तथा राक्षसी—इनमेंसे कोई भी तुमसे बढ़कर सौभाग्यशालिनी न तो हुई है और न होगी ही। मेरे वरसे ब्रह्मा आदिके भी वन्दनीय, परात्पर एवं गुणातीत भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं तुम्हारे अधीन होंगे। पतिव्रते! ब्रह्मा, शेषनाग तथा शिव भी जिनकी आराधना करते हैं, जो ध्यानसे भी वशमें होनेवाले नहीं हैं तथा जिन्हें आराधनाद्वारा रिझा लेना समस्त योगियोंके लिये भी अत्यन्त कठिन है; वे ही भगवान् तुम्हारे अधीन रहेंगे। राधे! स्त्रीजातिमें तुम विशेष सौभाग्यशालिनी हो। तुमसे बढ़कर दूसरी कोई
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
५६५
स्त्री नहीं है। तुम दीर्घकालतक यहाँ रहनेके पश्चात् श्रीकृष्णके साथ ही गोलोकमें चली जाओगी।
मुने! ऐसा कहकर पार्वतीदेवी तत्काल वहीं अन्तर्हित हो गयीं। फिर गोपकुमारियोंके साथ श्रीराधिका भी घर जानेको उद्यत हुईं। इतनेमें ही श्रीकृष्ण राधिकाके सामने उपस्थित हो गये। राधाने किशोर-अवस्थावाले श्यामसुन्दर श्रीकृष्णको देखा। उनके श्रीअङ्गोंपर पीताम्बर शोभा पा रहा था। वे नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित थे। घुटनोंतक लटकती हुई मालती-माला एवं वनमाला उनकी शोभा बढ़ा रही थी। उनका प्रसन्न मुख मन्द हास्यसे शोभायमान था। वे भक्तजनोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर जान पड़ते थे। उनके सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे चर्चित थे। नेत्र शरद्-ऋतुके प्रफुल्ल कमलोंको लज्जित कर रहे थे। मुख शरद्-ऋतुकी पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति मनोहर था, मस्तकपर श्रेष्ठ रत्नमय मुकुट अपनी उज्ज्वल आभा बिखेर रहा था। दाँत पके हुए अनारके दाने-जैसे स्वच्छ दिखायी देते थे। आकृति बड़ी मनोहर थी। उन्होंने विनोदके लिये एक हाथमें मुरली और दूसरे हाथमें लीलाकमल ले रखा था। वे करोड़ों कन्दर्पोंकी लावण्य-लीलाके मनोहर धाम थे। उन गुणातीत परमेश्वरकी ब्रह्मा, शेषनाग और शिव आदि निरन्तर स्तुति करते हैं। वे ब्रह्मस्वरूप तथा ब्राह्मणहितैषी हैं। श्रुतियोंने उनके ब्रह्मरूपका निरूपण किया है। वे अव्यक्त और व्यक्त हैं। अविनाशी एवं सनातन ज्योतिः-स्वरूप हैं। मङ्गलकारी, मङ्गलके आधार, मङ्गलमय तथा मङ्गलदाता हैं।
श्यामसुन्दरके उस अद्भुत रूपको देखकर राधाने वेगपूर्वक आगे बढ़कर उन्हें प्रणाम किया। उन्हें अच्छी तरह देखकर प्रेमके वशीभूत हो वे सुध-बुध खो बैठीं। प्रियतमके मुखारविन्दकी बाँकी चितवनसे देखते-देखते उनके अधरोंपर मुस्कराहट दौड़ गयी और उन्होंने लज्जावश अञ्चलसे अपना मुख ढँक लिया। उनकी बारंबार ऐसी अवस्था हुई। श्रीराधाको देखकर श्यामसुन्दरके मुख और नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे। समस्त गोपिकाओंके सामने खड़े हुए वे भगवान् श्रीराधासे बोले।
**श्रीकृष्णने कहा—**प्राणाधिके राधिके! तुम मनोवाञ्छित वर माँगो। हे गोपकिशोरियो! तुम सब लोग भी अपनी इच्छाके अनुसार वर माँगो।
श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर श्रीराधिका तथा अन्य सब गोपकन्याओंने बड़े हर्षके साथ उन भक्तवाञ्छाकल्पतरु प्रभुसे वर माँगा।
**राधिका बोलीं—**प्रभो! मेरा चित्तरूपी चञ्चरीक आपके चरणकमलोंमें सदा रमता रहे। जैसे मधुप कमलमें स्थित हो उसके मकरन्दका पान करता है; उसी प्रकार मेरा मनरूपी भ्रमर भी आपके चरणारविन्दोंमें स्थित हो भक्तिरसका निरन्तर आस्वादन करता रहे। आप जन्म-जन्ममें मेरे प्राणनाथ हों और अपने चरणकमलोंकी परम दुर्लभ भक्ति मुझे दें। मेरा चित्त सोते-जागते, दिन-रात आपके स्वरूप तथा गुणोंके चिन्तनमें सतत निमग्न रहे। यही मेरी मनोवाञ्छा है।
**गोपियाँ बोलीं—**प्राणबन्धो! आप जन्म-जन्ममें हमारे प्राणनाथ हों और श्रीराधाकी ही भाँति हम सबको भी सदा अपने साथ रखें।
गोपियोंका यह वचन सुनकर प्रसन्नमुखवाले श्रीमान् यशोदानन्दनने कहा—'तथास्तु' (ऐसा ही हो)। तत्पश्चात् उन जगदीश्वरने श्रीराधिकाको प्रेमपूर्वक सहस्रदलोंसे युक्त क्रीडाकमल तथा मालतीकी मनोहर माला दी। साथ ही अन्य गोपियोंको भी उन गोपीवल्लभने हँसकर प्रसादस्वरूप पुष्प तथा मालाएँ भेंट कीं। तदनन्तर वे बड़े प्रेमसे बोले।
**श्रीकृष्णने कहा—**व्रजदेवियो! तीन मास व्यतीत होनेपर वृन्दावनके सुरम्य रासमण्डलमें तुम सब लोग मेरे साथ रासक्रीड़ा करोगी। जैसा
५६६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
मैं हूँ, वैसी ही तुम हो। हममें तुममें भेद नहीं है।
मैं तुम्हारे प्राण हूँ और तुम भी मेरे लिये
प्राणस्वरूपा हो। प्यारी गोपियो ! तुमलोगोंका यह
व्रत लोकरक्षाके लिये है, स्वार्थसिद्धिके लिये
नहीं; क्योंकि तुमलोग गोलोकसे मेरे साथ आयी
हो और फिर मेरे साथ ही तुम्हें वहाँ चलना है।
(तुम मेरी नित्यसिद्धा प्रेयसी हो। तुमने साधन
करके मुझे पाया है, ऐसी बात नहीं है।) अब
शीघ्र अपने घर जाओ। मैं जन्म-जन्ममें तुम्हारा
ही हूँ। तुम मेरे लिये प्राणोंसे भी बढ़कर हो;
इसमें संशय नहीं है।
ऐसा कहकर श्रीहरि वहीं यमुनाजीके किनारे
बैठ गये। फिर सारी गोपियाँ भी बारंबार उन्हें
निहारती हुई बैठ गयीं। उन सबके मुखपर
प्रसन्नता छा रही थी; मन्द मुस्कानकी प्रभा फैल
रही थी। वे प्रेमपूर्वक बाँकी चितवनसे देखती हुई
अपने नेत्र-चकोरोंद्वारा श्रीहरिके मुखचन्द्रकी सुधाका
पान कर रही थीं। तत्पश्चात् वे बारंबार जय
बोलकर शीघ्र ही अपने-अपने घर गयीं और
श्रीकृष्ण भी ग्वाल-बालोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक
अपने घरको लौटे। इस प्रकार मैंने श्रीहरिका यह
सारा मङ्गलमय चरित्र कह सुनाया, गोपीचीर-
हरणकी यह लीला सब लोगोंके लिये सुखदायिनी
है। (अध्याय २७)
श्रीकृष्णके रास-विलासका वर्णन
नारदजीने पूछा- भगवन् ! तीन मास व्यतीत
होनेपर उन गोपाङ्गनाओंका श्रीहरिके साथ किस
प्रकार मिलन हुआ ? वृन्दावन कैसा है? रासमण्डलका
क्या स्वरूप है? श्रीकृष्ण तो एक थे और गोपियाँ
बहुत । ऐसी दशामें किस तरह वह क्रीड़ा सम्भव
हुई? मेरे मनमें इस नयी-नयी लीलाको सुननेके
लिये बड़ी उत्सुकता हो रही है। महाभाग ! आपके
नाम और यशका श्रवण एवं कीर्तन बड़ा पवित्र
है। कृपया आप उस रासक्रीड़ाका वर्णन कीजिये।
अहो ! श्रीहरिकी रासयात्रा, पुराणोंके सारकी भी
सारभूता कथा है। इस भूतलपर उनके द्वारा की
गयी सारी लीलाएँ ही सुननेमें अत्यन्त मनोहर
जान पड़ती हैं।
सूतजी कहते हैं - शौनक ! नारदजीकी यह
बात सुनकर साक्षात् नारायण ऋषि हँसे और
प्रसन्न मुखसे उन्होंने कथा सुनाना आरम्भ किया।
श्रीनारायण बोले- मुने ! एक दिन श्रीकृष्ण
चैत्रमासके शुक्लपक्षकी त्रयोदशी तिथिको चन्द्रोदय
होनेके पश्चात् वृन्दावनमें गये। उस समय जूही,
मालती, कुन्द और माधवीके पुष्पोंका स्पर्श करके
बहनेवाली शीतल, मन्द एवं सुगन्धित मलयवायुसे
सारा वनप्रान्त सुवासित हो रहा था। भ्रमरोंके
मधुर गुञ्जारवसे उसकी मनोहरता बढ़ गयी थी।
वृक्षोंमें नये-नये पल्लव निकल आये थे और
कोकिलकी कुहू-कुहू-ध्वनिसे वह वन मुखरित
हो रहा था। नौ लाख रासगृहोंसे संयुक्त वह
वृन्दावन बड़ा ही मनोहर जान पड़ता था। चन्दन,
अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमकी सुगन्ध सब ओर
फैल रही थी। कर्पूरयुक्त ताम्बूल तथा भोग-द्रव्य
सजाकर रखे गये थे। कस्तूरी और चन्दनयुक्त
चम्पाके फूलोंसे रचित नाना प्रकारकी शय्याएँ
उस स्थानकी शोभा बढ़ा रही थीं। रत्नमय
प्रदीपोंका प्रकाश सब ओर फैला था। धूपकी
सुगन्धसे वह वनप्रान्त महमह महक रहा था।
वहीं सब ओरसे गोलाकार रासमण्डल बनाया
गया था, जो नाना प्रकारके फूलों और मालाओंसे
सुसज्जित था। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और केसरसे
वहाँकी भूमिका संस्कार किया गया था। रासमण्डलके
चारों ओर फूलोंसे भरे उद्यान तथा क्रीड़ासरोवर
थे। उन सरोवरोंमें हंस, कारण्डव तथा जलकुकुट