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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

२०- लक्ष्मी, सरस्वती और गङ्गाके कलह और शापका मुख्य कारण सुनकर भगवान् हरि (विष्णु)-का उनसे समयानुकूल बातें कहना

१२२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

लिखकर उसे सोनेकी डिब्बीमें रख गन्ध एवं चन्दन आदिसे सुपूजित करके लोग अपने गलेमें अथवा दाहिनी भुजामें धारण करेंगे। पूजाके पवित्र अवसरपर विद्वान् पुरुषोंके द्वारा तुम्हारा सम्यक् प्रकारसे स्तुति-पाठ होगा।

इस प्रकार कहकर सर्वपूजित भगवान् श्रीकृष्णने देवी सरस्वतीकी पूजा की। तत्पश्चात् ब्रह्मा, विष्णु, शिव, अनन्त, धर्म, मुनीश्वर, सनकगण, देवता, मुनि, राजा और मनुगण—इन सबने भगवती सरस्वतीकी आराधना की। तबसे ये सरस्वती सम्पूर्ण प्राणियोंद्वारा सदा पूजित होने लगीं।

नारदजी बोले—वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ प्रभो! आप भगवती सरस्वतीकी पूजाका विधान, स्तवन, ध्यान, अभीष्ट कवच, पूजनोपयोगी नैवेद्य, फूल तथा चन्दन आदिका परिचय देनेकी कृपा कीजिये। इसे सुननेके लिये मेरे हृदयमें बड़ा कौतूहल हो रहा है।

मुनिवर भगवान् नारायणने कहा—नारद! सुनो। कण्वशाखामें कही हुई पद्धति बतलाता हूँ। इसमें जगन्माता सरस्वतीके पूजनकी विधि वर्णित है। माघ शुक्ल पञ्चमी विद्यारम्भकी मुख्य तिथि है। उस दिन पूर्वाह्नकालमें ही प्रतिज्ञा करके संयमशील एवं पवित्र हो, स्नान और नित्य-क्रियाके पश्चात् भक्तिपूर्वक कलशस्थापन करे। फिर नैवेद्य आदिसे निम्नाङ्कित छः देवताओंका पूजन करे। पहले गणेशका, फिर सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव और पार्वतीका पूजन करनेके पश्चात् इष्टदेवता सरस्वतीका पूजन करना उचित है। फिर ध्यान करके देवीका आवाहन करे। तदनन्तर व्रती रहकर षोडशोपचारसे भगवतीकी पूजा करे। सौम्य! पूजाके लिये जो-जो उपयोगी नैवेद्य वेदमें कथित हैं, उन्हें बताता हूँ—ताजा मक्खन, दही, दूध, धानका लावा, तिलके लड्डू, सफेद गन्ना और उसका रस, उसे पकाकर बनाया हुआ गुड़, स्वस्तिक (एक प्रकारका पकवान), शक्कर या मिश्री, सफेद धानका चावल जो टूटा न हो (अक्षत), बिना उबाले हुए धानका चिउड़ा, सफेद लड्डू, घी और सेंधा नमक डालकर तैयार किये गये व्यञ्जनके साथ शास्त्रोक्त हविष्यान्न, जौ अथवा गेहूँके आटेसे घृतमें तले हुए पदार्थ, पके हुए स्वच्छ केलेका पिष्टक, उत्तम अन्नको घृतमें पकाकर उससे बना हुआ अमृतके समान मधुर मिष्टान्न, नारियल, उसका पानी, कसेरू, मूली, अदरख, पका हुआ केला, बढ़िया बेल, बेरका फल, देश और कालके अनुसार उपलब्ध ऋतुफल तथा अन्य भी पवित्र स्वच्छ वर्णके फल—ये सब नैवेद्यके समान हैं।

मुने! सुगन्धित सफेद पुष्प, सफेद स्वच्छ चन्दन तथा नवीन श्वेत वस्त्र और सुन्दर शङ्ख देवी सरस्वतीको अर्पण करना चाहिये। श्वेत पुष्पोंकी माला और श्वेत भूषण भी भगवतीको चढ़ावे। महाभाग मुने! भगवती सरस्वतीका श्रेष्ठ ध्यान परम सुखदायी है तथा भ्रमका उच्छेद करनेवाला है। वह ध्यान यह है—

‘सरस्वतीका श्रीविग्रह शुक्लवर्ण है। ये परम सुन्दरी देवी सदा मुस्कराती रहती हैं। इनके परिपुष्ट विग्रहके सामने करोड़ों चन्द्रमाकी प्रभा भी तुच्छ है। ये विशुद्ध चिन्मय वस्त्र पहने हैं। इनके एक हाथमें वीणा है और दूसरेमें पुस्तक। सर्वोत्तम रत्नोंसे बने हुए आभूषण इन्हें सुशोभित कर रहे हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शिव प्रभृति प्रधान देवताओं तथा सुरगणोंसे ये सुपूजित हैं। श्रेष्ठ मुनि, मनु तथा मानव इनके चरणोंमें मस्तक झुकाते हैं। ऐसी भगवती सरस्वतीको मैं भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूँ।’

इस प्रकार ध्यान करके विद्वान् पुरुष पूजनके समग्र पदार्थ मूलमन्त्रसे विधिवत् सरस्वतीको अर्पण कर दे। फिर कवचका पाठ करनेके पश्चात् दण्डकी भाँति भूमिपर पड़कर देवीको साष्टाङ्ग प्रणाम करे। मुने! जो पुरुष भगवती सरस्वतीको अपनी इष्ट देवी मानते हैं, उनके लिये यह

प्रकृतिखण्ड

नित्यक्रिया है। बालकोंके विद्यारम्भके अवसरपर वर्षके अन्तमें माघ शुक्ला पञ्चमीके दिन सभीको इन सरस्वतीदेवीकी पूजा करनी चाहिये। 'श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा' यह वैदिक अष्टाक्षर मूलमन्त्र परम श्रेष्ठ एवं सबके लिये उपयोगी है अथवा जिनको जिस मन्त्रके द्वारा उपदेश प्राप्त हुआ है, उनके लिये वही मूल-मन्त्र है। 'सरस्वती' इस शब्दके साथ चतुर्थी विभक्ति जोड़कर अन्तमें 'स्वाहा' शब्द लगा लेना चाहिये। इसके आदिमें लक्ष्मीका बीज ('श्रीं') और मायाबीज ('ह्रीं') लगावे। यह ('श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा') मन्त्र साधकके लिये कल्पवृक्षरूप है। प्राचीनकालमें कृपाके समुद्र भगवान् नारायणने वाल्मीकि मुनिको इसीका उपदेश किया था। भारतवर्षमें गङ्गाके पावन तटपर यह कार्य सम्पन्न हुआ था। फिर सूर्यग्रहणके अवसरपर पुष्करक्षेत्रमें भृगुजीने शुक्रको इसका उपदेश किया था। मरीचिनन्दन कश्यपने चन्द्रग्रहणके समय प्रसन्न होकर बृहस्पतिको इसे बताया था। बदरी-आश्रममें परम प्रसन्न ब्रह्माने भृगुको इसका उपदेश दिया था। जरत्कारुमुनि क्षीरसागरके पास विराजमान थे। उन्होंने आस्तीकको यह मन्त्र पढ़ाया। बुद्धिमान् ऋष्यशृङ्गने मेरुपर्वतपर विभाण्डक मुनिसे इसकी शिक्षा प्राप्त की थी। शिवने आनन्दमें आकर गौतम तथा कणाद मुनिको इसका उपदेश किया था। याज्ञवल्क्य और कात्यायनने सूर्यकी दयासे इसे पाया था। महाभाग शेष पातालमें बलिके सभाभवनपर विराजमान थे। वहीं उन्होंने पाणिनि, बुद्धिमान् भारद्वाज और शाकटायनको इसका अभ्यास कराया था। चार लाख जप करनेपर मनुष्यके लिये यह मन्त्र सिद्ध हो सकता है। इस मन्त्रके सिद्ध हो जानेपर अवश्य ही मनुष्यमें बृहस्पतिके समान योग्यता प्राप्त हो सकती है।

विप्रेन्द्र! सरस्वतीका कवच विश्वपर विजय प्राप्त करानेवाला है। जगत्स्रष्टा ब्रह्माने गन्धमादन पर्वतपर भृगुके आग्रहसे इसे इन्हें बताया था, वही मैं तुमसे कहता हूँ, सुनो।

भृगुने कहा—ब्रह्मन्! आप ब्रह्मज्ञानीजनोंमें प्रमुख, पूर्ण ब्रह्मज्ञानसम्पन्न, सर्वज्ञ, सबके पिता, सबके स्वामी एवं सबके परम आराध्य हैं। प्रभो! आप मुझे सरस्वतीका 'विश्वजय' नामक कवच बतानेकी कृपा कीजिये। यह कवच मायाके प्रभावसे रहित, मन्त्रोंका समूह एवं परम पवित्र है।

ब्रह्माजी बोले—वत्स! मैं सम्पूर्ण कामना पूर्ण करनेवाला कवच कहता हूँ, सुनो। यह श्रुतियोंका सार, कानके लिये सुखप्रद, वेदोंमें प्रतिपादित एवं उनसे अनुमोदित है। रासेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण गोलोकमें विराजमान थे। वहीं वृन्दावनमें रासमण्डल था। रासके अवसरपर उन प्रभुने मुझे यह कवच सुनाया था। कल्पवृक्षकी तुलना करनेवाला यह कवच परम गोपनीय है। जिन्हें किसीने नहीं सुना है, वे अद्भुत मन्त्र इसमें सम्मिलित हैं। इसे धारण करनेके प्रभावसे ही भगवान् शुक्राचार्य सम्पूर्ण दैत्योंके पूज्य बन सके। ब्रह्मन्! बृहस्पतिमें इतनी बुद्धिका समावेश इस कवचकी महिमासे ही हुआ है। वाल्मीकि मुनि सदा इसका पाठ और सरस्वतीका ध्यान करते थे। अतः उन्हें कवीन्द्र कहलानेका सौभाग्य प्राप्त हो गया। वे भाषण करनेमें परम चतुर हो गये। इसे धारण करके स्वायम्भुव मनुने सबसे पूजा प्राप्त की। कणाद, गौतम, कण्व, पाणिनि, शाकटायन, दक्ष और कात्यायन—इस कवचको धारण करके ही ग्रन्थोंकी रचनामें सफल हुए। इसे धारण करके स्वयं कृष्णद्वैपायन व्यासदेवने वेदोंका विभागकर खेल-ही-खेलमें अखिल पुराणोंका प्रणयन किया। शातातप, संवर्त, वसिष्ठ, पराशर, याज्ञवल्क्य, ऋष्यशृङ्ग, भारद्वाज, आस्तीक, देवल, जैगीषव्य और जाबालिने इस कवचको धारण करके सबमें पूजित हो ग्रन्थोंकी रचना की थी।

विप्रेन्द्र! इस कवचके ऋषि प्रजापति हैं।

१२४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

स्वयं बृहती छन्द है। माता शारदा अधिष्ठात्री देवी हैं। अखिल तत्त्वपरिज्ञानपूर्वक सम्पूर्ण अर्थके साधन तथा समस्त कविताओंके प्रणयन एवं विवेचनमें इसका प्रयोग किया जाता है।

श्रीं-ह्रीं-स्वरूपिणी भगवती सरस्वतीके लिये श्रद्धाकी आहुति दी जाती है, वे सब ओरसे मेरे सिरकी रक्षा करें। ॐ श्रीं वाग्देवताके लिये श्रद्धाकी आहुति दी जाती है, वे सदा मेरे ललाटकी रक्षा करें। ॐ ह्रीं भगवती सरस्वतीके लिये श्रद्धाकी आहुति दी जाती है, वे निरन्तर कानोंकी रक्षा करें। ॐ श्रीं-ह्रीं भारतीके लिये श्रद्धाकी आहुति दी जाती है, वे सदा दोनों नेत्रोंकी रक्षा करें। ऐं-ह्रीं-स्वरूपिणी वाग्वादिनीके लिये श्रद्धाकी आहुति दी जाती है, वे सब ओरसे मेरी नासिकाकी रक्षा करें। ॐ ह्रीं विद्याकी अधिष्ठात्री देवीके लिये श्रद्धाकी आहुति दी जाती है, वे होठकी रक्षा करें। ॐ श्रीं-ह्रीं भगवती ब्राह्मीके लिये श्रद्धाकी आहुति दी जाती है, वे दन्त-पङ्क्तिकी निरन्तर रक्षा करें। 'ऐं' यह देवी सरस्वतीका एकाक्षर-मन्त्र मेरे कण्ठकी सदा रक्षा करे। ॐ श्रीं ह्रीं मेरे गलेकी तथा श्रीं मेरे कंधोंकी सदा रक्षा करे। ॐ श्रीं विद्याकी अधिष्ठात्री देवीके लिये श्रद्धाकी आहुति दी जाती है, वे सदा वक्षःस्थलकी रक्षा करें। ॐ ह्रीं विद्यास्वरूपा देवीके लिये श्रद्धाकी आहुति दी जाती है, वे मेरी नाभिकी रक्षा करें। ॐ ह्रीं-क्लीं-स्वरूपिणी देवी वाणीके लिये श्रद्धाकी आहुति दी जाती है, वे सदा मेरे हाथोंकी रक्षा करें। ॐ-स्वरूपिणी भगवती सर्ववर्णात्मिकाके लिये श्रद्धाकी आहुति दी जाती है, वे दोनों पैरोंको सुरक्षित रखें। ॐ वाग्की अधिष्ठात्री देवीके लिये श्रद्धाकी आहुति दी जाती है, वे मेरे सर्वस्वकी रक्षा करें। सबके कण्ठमें निवास करनेवाली ॐस्वरूपा देवीके लिये श्रद्धाकी आहुति दी जाती है, वे पूर्व दिशामें सदा मेरी रक्षा करें। जीभके अग्रभागपर विराजनेवाली ॐह्रीं-स्वरूपिणी देवीके लिये श्रद्धाकी आहुति दी जाती है, वे अग्निकोणमें रक्षा करें।

'ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सरस्वत्यै बुधजनन्यै स्वाहा।'

इसको मन्त्रराज कहते हैं। यह इसी रूपमें सदा विराजमान रहता है। यह निरन्तर मेरे दक्षिण भागकी रक्षा करे। 'ऐं ह्रीं श्रीं'—यह त्र्यक्षरमन्त्र नैर्ऋत्यकोणमें सदा मेरी रक्षा करे। कविकी जिह्वाके अग्रभागपर रहनेवाली ॐ-स्वरूपिणी देवीके लिये श्रद्धाकी आहुति दी जाती है, वे पश्चिम दिशामें मेरी रक्षा करें। ॐ-स्वरूपिणी भगवती सर्वाम्बिकाके लिये श्रद्धाकी आहुति दी जाती है, वे वायव्यकोणमें सदा मेरी रक्षा करें। गद्य-पद्यमें निवास करनेवाली ॐऐं श्रीमयी देवीके लिये श्रद्धाकी आहुति दी जाती है, वे उत्तर दिशामें मेरी रक्षा करें। सम्पूर्ण शास्त्रोंमें विराजनेवाली ऐं-स्वरूपिणी देवीके लिये श्रद्धाकी आहुति दी जाती है, वे ईशानकोणमें सदा मेरी रक्षा करें। ॐ ह्रीं-स्वरूपिणी सर्वपूजिता देवीके लिये श्रद्धाकी आहुति दी जाती है, वे ऊपरसे मेरी रक्षा करें। पुस्तकमें निवास करनेवाली ऐं-ह्रीं-स्वरूपिणी देवीके लिये श्रद्धाकी आहुति दी जाती है, वे मेरे निम्नभागकी रक्षा करें। ॐ-स्वरूपिणी ग्रन्थबीजस्वरूपा देवीके लिये श्रद्धाकी आहुति दी जाती है, वे सब ओरसे मेरी रक्षा करें।

विप्र! यह सरस्वती-कवच तुम्हें सुना दिया। असंख्य ब्रह्ममन्त्रोंका यह मूर्तिमान् विग्रह है। ब्रह्मस्वरूप इस कवचको 'विश्वजय' कहते हैं। प्राचीन समयकी बात है—गन्धमादन पर्वतपर पिता धर्मदेवके मुखसे मुझे इसे सुननेका सुअवसर प्राप्त हुआ था। तुम मेरे परम प्रिय हो। अतएव तुमसे मैंने कहा है। तुम्हें अन्य किसीके सामने इसकी चर्चा नहीं करनी चाहिये। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वस्त्र, चन्दन और अलंकार आदि सामानोंसे विधिपूर्वक गुरुकी पूजा करके दण्डकी

प्रकृतिखण्ड १२५


भाँति जमीनपर पड़कर उन्हें प्रणाम करे। तत्पश्चात् उनसे इस कवचका अध्ययन करके इसे हृदयमें धारण करे। पाँच लाख जप करनेके पश्चात् यह कवच सिद्ध हो जाता है। इस कवचके सिद्ध हो जानेपर पुरुषको बृहस्पतिके समान पूर्ण योग्यता प्राप्त हो सकती है। इस कवचके प्रसादसे

पुरुष भाषण करनेमें परम चतुर, कवियोंका सम्राट् और त्रैलोक्यविजयी हो सकता है। वह सबको जीतनेमें समर्थ होता है।* मुने! यह कवच कण्व-शाखाके अन्तर्गत है। अब स्तोत्र, ध्यान, वन्दन और पूजाका विधान बताता हूँ, सुनो।
(अध्याय ४)


  • ब्रह्मोवाच

शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि कवचं सर्वकामदम्। श्रुतिसारं श्रुतिसुखं श्रुत्युक्तं श्रुतिपूजितम्॥
उक्तं कृष्णेन गोलोके मह्यं वृन्दावने वने। रासेश्वरेण विभुना रासे वै रासमण्डले॥
अतीव गोपनीयं च कल्पवृक्षसमं परम्। अश्रुताद्भुतमन्त्राणां समूहैश्च समन्वितम्॥
यद् धृत्वा पठनाद् ब्रह्मन् बुद्धिमांश्च बृहस्पतिः। यद् धृत्वा भगवाञ्छुकः सर्वदैत्येषु पूजितः॥
पठनाद्धारणाद्वाग्मी कवीन्द्रो वाल्मिको मुनिः। स्वायम्भुवो मनुश्चैव यद् धृत्वा सर्वपूजितः॥
कणादो गौतमः कण्वः पाणिनिः शाकटायनः। ग्रन्थं चकार यद् धृत्वा दक्षः कात्यायनः स्वयम्॥
धृत्वा वेदविभागं च पुराणान्यखिलानि च। चकार लीलामात्रेण कृष्णद्वैपायनः स्वयम्॥
शातातपश्च संवर्तो वसिष्ठश्च पराशरः। यद् धृत्वा पठनाद् ग्रन्थं याज्ञवल्क्यश्चकार सः॥
ऋष्यशृङ्गो भरद्वाजश्चास्तीको देवलस्तथा। जैगीषव्योऽथ जाबालिर्यद् धृत्वा सर्वपूजिता॥
कवचस्यास्य विप्रेन्द्र ऋषिरैव प्रजापतिः। स्वयं छन्दश्च बृहती देवता शारदाम्बिका॥
सर्वतत्त्वपरिज्ञाने सर्वार्थसाधनेषु च। कवितासु च सर्वासु विनियोगः प्रकीर्तितः॥
श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा शिरो मे पातु सर्वतः। श्रीं वाग्देवतायै स्वाहा भालं मे सर्वदावतु॥
ॐ सरस्वत्यै स्वाहेति श्रोत्रे पातु निरन्तरम्। ॐ श्रीं ह्रीं भारत्यै स्वाहा नेत्रयुग्मं सदावतु॥
ऐं ह्रीं वाग्वादिन्यै स्वाहा नासां मे सर्वतोऽवतु। ॐ ह्रीं विद्याधिष्ठातृदेव्यै स्वाहा ओष्ठं सदावतु॥
ॐ श्रीं ह्रीं ब्राह्म्यै स्वाहेति दन्तपङ्क्तिं सदावतु। ऐमित्येकाक्षरो मन्त्रो मम कण्ठं सदावतु॥
ॐ श्रीं ह्रीं पातु मे ग्रीवां स्कन्धौ मे श्रीं सदावतु। ॐ श्रीं विद्याधिष्ठातृदेव्यै स्वाहा वक्षः सदावतु॥
ॐ ह्रीं विद्यास्वरूपायै स्वाहा मे पातु नाभिकाम्। ॐ ह्रीं क्लीं वाण्यै स्वाहेति मम हस्तौ सदावतु॥
ॐ सर्ववर्णात्मिकायै पादयुग्मं सदावतु। ॐ वागधिष्ठातृदेव्यै स्वाहा सर्वं सदावतु॥
ॐ सर्वकण्ठवासिन्यै स्वाहा प्राच्यां सदावतु। ॐ ह्रीं जिह्वाग्रवासिन्यै स्वाहाग्निदिशि रक्षतु॥
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सरस्वत्यै बुधजनन्यै स्वाहा। सततं मन्त्रराजोऽयं दक्षिणे मां सदावतु॥
ऐं ह्रीं श्रीं त्र्यक्षरो मन्त्रो नैर्ऋत्यां मे सदावतु। कविजिह्वाग्रवासिन्यै स्वाहा मां वारुणेऽवतु॥
ॐ सर्वाम्बिकायै स्वाहा वायव्ये मां सदावतु। ॐ ऐं श्रीं गद्यपद्यवासिन्यै स्वाहा मामुत्तरेऽवतु॥
ऐं सर्वशास्त्रवासिन्यै स्वाहैशान्यं सदावतु। ॐ ह्रीं सर्वपूजितायै स्वाहा चोर्ध्वं सदावतु॥
ऐं ह्रीं पुस्तकवासिन्यै स्वाहाधो मां सदावतु। ॐ ग्रन्थबीजरूपायै स्वाहा मां सर्वतोऽवतु॥
इति ते कथितं विप्र ब्रह्ममन्त्रौघविग्रहम्। इदं विश्वजयं नाम कवचं ब्रह्मरूपकम्॥
पुरा श्रुतं धर्मवक्त्रात् पर्वते गन्धमादने। तव स्नेहान्मयाऽऽख्यातं प्रवक्तव्यं न कस्यचित्॥
गुरुमभ्यर्च्य विधिवद्वस्त्रालंकारचन्दनैः। प्रणम्य दण्डवद्भूमौ कवचं धारयेत् सुधीः॥
पञ्चलक्षजपेनैव सिद्धं तु कवचं भवेत्। यदि स्यात् सिद्धकवचो बृहस्पतिसमो भवेत्॥
महावाग्मी कवीन्द्रश्च त्रैलोक्यविजयी भवेत्। शक्नोति सर्वं जेतुं च कवचस्य प्रसादतः॥
(प्रकृतिखण्ड ४। ६२–९०)