ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१२- वेदवतीकी कथा, इसी प्रसङ्गमें भगवान् रामके चरित्रका एक अंश-कथन, भगवती सीता तथा द्रौपदीके पूर्वजन्मका वृत्तान्त
प्रकृतिखण्ड
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जगदीश्वर भगवान् श्रीकृष्णसे कहा। उस समय श्रीराधाका विग्रह परम शान्त था। उनमें नम्रता आ गयी थी और उनके मुखपर मुस्कान छायी थी।
श्रीराधाने कहा—प्राणेश! आपके प्रसन्न मुखकमलको मुस्कराकर निहारनेवाली यह कल्याणी कौन है? इसके तिरछे नेत्र आपको लक्ष्य कर रहे हैं। इसके भीतर मिलनेच्छाका भाव जाग्रत् है। आपके मनोहर रूपने इसे अचेत कर दिया है। इसके सर्वाङ्ग पुलकित हो रहे हैं। वस्त्रसे मुख ढँककर बार-बार आपको देखा करना मानो इसका स्वभाव ही बन गया है। आप भी उसकी ओर दृष्टिपात करके मधुर-मधुर हँस रहे हैं। आप अनेक बार ऐसा करते हैं और कोमल-स्वभावकी स्त्री-जाति होनेके कारण प्रेमवश मैं क्षमा कर देती हूँ।
आपने 'विरजा' (रजोगुणरहिता देवी)-से प्रेम किया। फिर वह अपना शरीर त्यागकर महान् नदीके रूपमें परिणत हो गयी। आपकी सत्कीर्तिस्वरूपिणी वह देवी नदीरूपमें अब भी विराजमान है। आपके औरस पुत्रके रूपमें उससे समयानुसार सात समुद्र उत्पन्न हो गये। प्राणनाथ! आपने 'शोभा' से प्रेम किया। वह भी शरीर त्यागकर चन्द्रमण्डलमें चली गयी। तदनन्तर उसका शरीर परम स्निग्ध तेज बन गया। आपने उस तेजको टुकड़े-टुकड़े करके वितरण कर दिया। रत्न, सुवर्ण, श्रेष्ठ मणि, स्त्रियोंके मुखकमल, राजा, पुष्पोंकी कलियाँ, पके हुए फल, लहलहाती खेतियाँ, राजाओंके सजे-धजे महल, नवीन पात्र और दूध—ये सब आपके द्वारा उस शोभाके कुछ-कुछ भाग पा गये। मैंने आपको 'प्रभा' के साथ प्रेम करते देखा। वह भी शरीर त्यागकर सूर्यमण्डलमें प्रवेश कर गयी। उस समय उसका शरीर अत्यन्त तेजोमय बन गया था। उस तेजोमयी प्रभाको आपने विभाजन करके जगह-जगह बाँट दिया। श्रीकृष्ण! आपकी आँखोंसे दूर हुई प्रभा अग्नि, यक्ष, नरेश, देवता, वैष्णवजन, नाग, ब्राह्मण, मुनि, तपस्वी, सौभाग्यवती स्त्री तथा यशस्वी पुरुष—इन सबको थोड़े-थोड़े रूपोंमें प्राप्त हुई।
एक बार मैंने आपको 'शान्ति' नामक गोपीके साथ रासमण्डलमें प्रेम करते देखा था। प्रभो! वह शान्ति भी अपने उस शरीरको छोड़कर आपमें लीन हो गयी। उस समय उसका शरीर उत्तम गुणके रूपमें परिणत हो गया। तदनन्तर आपने उसको विभाजित करके विश्वमें बाँट दिया। प्रभो! उसका कुछ अंश मुझ (राधा)-में, कुछ इस निकुञ्जमें और कुछ ब्राह्मणमें प्राप्त हुआ। विभो! फिर आपने उसका कुछ भाग शुद्ध सत्त्वस्वरूपा लक्ष्मीको, कुछ अपने मन्त्रके उपासकोंको, कुछ वैष्णवोंको, कुछ तपस्वियोंको, कुछ धर्मको और कुछ धर्मात्मा पुरुषोंको सौंप दिया।
पूर्वसमयकी बात है, 'क्षमा' के साथ आप मुझे प्रेम करते दृष्टिगोचर हुए थे। उस समय क्षमा अपना वह शरीर त्यागकर पृथ्वीपर चली गयी। तदनन्तर उसका शरीर उत्तम गुणके रूपमें परिणत हो गया था। फिर उसके शरीरका आपने विभाजन किया और उसमेंसे कुछ-कुछ अंश विष्णुको, वैष्णवोंको, धार्मिक पुरुषोंको, धर्मको, दुर्बलोंको, तपस्वियोंको, देवताओं और पण्डितोंको दे दिया। प्रभो! इतनी सब बातें तो मैं सुना चुकी। आपके ऐसे-ऐसे बहुत-से गुण हैं। आप सदा ही उच्च सुन्दरी देवियोंसे प्रेम किया करते हैं।
इस प्रकार रक्त कमलके समान नेत्रोंवाली राधाने भगवान् श्रीकृष्णसे कहकर साध्वी गङ्गासे कुछ कहना चाहा। गङ्गा योगमें परमप्रवीण थीं। योगके प्रभावसे राधाका मनोभाव उन्हें ज्ञात हो गया। अतः बीच सभामें ही अन्तर्धान होकर वे अपने जलमें प्रविष्ट हो गयीं। तब सिद्धयोगिनी
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संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
राधाने योगद्वारा इस रहस्यको जानकर सर्वत्र विद्यमान उन जलस्वरूपिणी गङ्गाको अञ्जलिसे उठाकर पीना आरम्भ कर दिया। ऐसी स्थितिमें राधाका अभिप्राय पूर्ण योगसिद्धा गङ्गासे छिपा नहीं रह सका। अतः वे भगवान् श्रीकृष्णकी शरणमें जाकर उनके चरणकमलोंमें लीन हो गयीं।
तब राधाने गोलोक, वैकुण्ठलोक तथा ब्रह्मलोक आदि सम्पूर्ण स्थानोंमें गङ्गाको खोजा; परंतु कहीं भी वह दिखायी नहीं दीं। उस समय सर्वत्र जलका नितान्त अभाव हो गया था। कीचड़तक सूख गया था। जलचर जन्तुओंके मृत शरीरसे ब्रह्माण्डका कोई भी भाग खाली नहीं रहा था। फिर तो ब्रह्मा, विष्णु, शंकर, अनन्त, धर्म, इन्द्र, चन्द्रमा, सूर्य, मनुगण, मुनि-समाज, देवता, सिद्ध और तपस्वी—सभी गोलोकमें आये। उस समय उनके कण्ठ, ओठ और तालू सूख गये थे। प्रकृतिसे परे सर्वेश भगवान् श्रीकृष्णको सबने प्रणाम किया; क्योंकि ये श्रीकृष्ण सबके परम पूज्य हैं। वर देना इन सर्वोत्तम प्रभुका स्वाभाविक गुण है। इन्हें वरका प्रवर्तक ही माना जाता है। ये परमप्रभु सम्पूर्ण गोप और गोपियोंके समाजमें प्रमुख हैं। इन्हें निरीह, निराकार, निर्लिप्त, निराश्रय, निर्गुण, निरुत्साह, निर्विकार और निरञ्जन कहा गया है। भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये अपनी इच्छासे ये साकार रूपमें प्रकट हो जाते हैं। ये सत्त्वस्वरूप, सत्येश, साक्षीरूप और सनातनपुरुष हैं। इनसे बढ़कर जगत्में दूसरा कोई शासक नहीं है। अतएव इन पूर्णब्रह्म परमेश्वर भगवान् श्रीकृष्णको उन ब्रह्मादि समस्त उपस्थित देवताओंने प्रणाम करके स्तवन आरम्भ कर दिया। भक्तिके कारण उनके कंधे झुक गये थे। उनकी वाणी गद्गद हो गयी थी। आँखोंमें आँसू भर आये थे। उनके सभी अङ्गोंमें पुलकावली छायी थी। सबने उन परात्पर ब्रह्म भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति की। इन सर्वेश प्रभुका विग्रह ज्योतिर्मय है। सम्पूर्ण कारणोंके भी ये कारण हैं। ये उस समय अमूल्य रत्नोंसे निर्मित दिव्य सिंहासनपर विराजमान थे। गोपाल इनकी सेवामें संलग्न होकर श्वेत चँवर डुला रहे थे। गोपियोंके नृत्यको देखकर प्रसन्नताके कारण इनका मुखमण्डल मुस्कानसे भरा था। प्राणोंसे भी अधिक प्रिय श्रीराधा इनके वक्षःस्थलपर शोभा पा रही थीं। उनके दिये हुए सुवासित पान ये चबा रहे थे। ऐसे ये देवाधिदेव परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्ण रासमण्डलमें विराजमान थे।
वहीं मुनियों, मनुष्यों, सिद्धों और तपस्वियोंने तपके प्रभावसे इनके दिव्य दर्शन प्राप्त किये। दिव्य दर्शनसे सबके मनमें अपार हर्ष हुआ। साथ ही आश्चर्यकी सीमा भी न रही। सभी परस्पर एक-दूसरेको देखने लगे। तत्पश्चात् उन समस्त सज्जनोंने अपना अभीष्ट अभिप्राय जगत्प्रभु चतुरानन ब्रह्मासे निवेदन किया। ब्रह्माजी उनकी प्रार्थना सुनकर विष्णुको दाहिने और महादेवको बायें करके भगवान् श्रीकृष्णके निकट पहुँचे। उस समय परम आनन्दस्वरूप श्रीकृष्ण और परम आनन्दस्वरूपिणी श्रीराधा साथ विराजमान थीं। उसी समय ब्रह्माने रासमण्डलको केवल श्रीकृष्णमय देखा। सबकी वेश-भूषा एक समान थी। सभी एक-जैसे आसनोंपर बैठे थे। द्विभुज श्रीकृष्णके रूपमें परिणत सभीने हाथोंमें मुरली ले रखी थी। वनमाला सबकी छवि बढ़ा रही थी। सबके मुकुटमें मोरके पंख थे। कौस्तुभमणिसे वे सभी परम सुशोभित थे। गुण, भूषण, रूप, तेज, अवस्था और प्रभासे सम्पन्न उन सबका अत्यन्त कमनीय विग्रह परम शान्त था। सभी परिपूर्णतम थे और सबमें सभी शक्तियाँ संनिहित थीं। उन्हें देखकर कौन सेवक हैं और कौन सेव्य—इस बातका निर्णय करनेमें ब्रह्मा सफल नहीं हो सके।
क्षणभरमें ही भगवान् श्रीकृष्ण तेजःस्वरूप हो जाते और तुरंत आसनपर बैठे हुए भी दिखायी
प्रकृतिखण्ड
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पड़ने लगते। एक ही क्षणमें उनके दो रूप निराकार और साकार ब्रह्माको दृष्टिगोचर हुए। फिर एक ही क्षणमें ब्रह्माजीने देखा कि भगवान् श्रीकृष्ण अकेले हैं। इसके बाद तुरंत ही झट उन्हें राधा और कृष्ण प्रत्येक आसनपर बैठे दीख पड़े। फिर क्या देखते हैं कि भगवान् श्रीकृष्णने राधाका रूप धारण कर लिया है और राधाने श्रीकृष्णका। कौन स्त्रीके वेषमें है और कौन पुरुषके वेषमें—विधाता इस रहस्यको समझ न सके। तब ब्रह्माजीने अपने हृदयरूपी कमलपर विराजमान भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान किया। ध्यान-चक्षुसे भगवान् दीख गये। अतः अनेक प्रकारसे परिहार करते हुए भक्तिपूर्वक उनकी स्तुति की। तत्पश्चात् भगवान्की आज्ञासे उन्होंने अपनी आँखें मूँद लीं। फिर देखा तो श्रीराधाको वक्षःस्थलपर बैठाये हुए भगवान् श्रीकृष्ण आसनपर अकेले ही विराजमान हैं। इन्हें पार्षदोंने घेर रखा है। झुंड-की-झुंड गोपियाँ इनकी शोभा बढ़ा रही हैं। फिर उन ब्रह्मा प्रभृति प्रधान देवताओंने परम प्रभु भगवान्का दर्शन करके प्रणाम किया और स्तुति भी की। तब जो सबके आत्मा, सब कुछ जाननेमें कुशल, सबके शासक तथा सर्वभावन हैं, उन लक्ष्मीपति परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्णने उपस्थित देवताओंका अभिप्राय समझकर उनसे कहा।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—ब्रह्मन्! आपकी कुशल हो, यहाँ आइये। मैं समझ गया, आप सभी महानुभाव गङ्गाको ले जानेके लिये यहाँ पधारे हैं; परंतु इस समय यह गङ्गा शरणार्थी बनकर मेरे चरणकमलोंमें छिपी है। कारण, वह मेरे पास बैठी थी। राधाजी उसे देखकर पी जानेके लिये उद्यत हो गयीं। तब वह चरणोंमें आकर ठहर गयी। मैं आपलोगोंको उसे सहर्ष दे दूँगा; परंतु आप पहले उसको निर्भय बनानेका पूर्ण प्रयत्न करें।
नारद! भगवान् श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर कमलोद्भव ब्रह्माका मुख मुस्कानसे भर गया। फिर तो वे सम्पूर्ण देवता, जो सबकी आराध्या तथा भगवान् श्रीकृष्णसे भी सुपूजिता हैं, उन भगवती राधाकी स्तुति करनेमें संलग्न हो गये! भक्तिके कारण अत्यन्त विनीत होकर ब्रह्माजीने अपने चारों मुखोंसे राधाजीकी स्तुति की। चारों वेदोंके प्रणेता चतुरानन ब्रह्माने भगवती राधाका इस प्रकार स्तवन किया।
ब्रह्माजी बोले—देवी! यह गङ्गा आपके तथा भगवान् श्रीकृष्णके श्रीअङ्गसे समुत्पन्न है। आप दोनों महानुभाव रासमण्डलमें पधारे थे। शंकरके संगीतने आपको मुग्ध कर दिया था। उसी अवसरपर यह द्रवरूपमें प्रकट हो गयी। अतः आप तथा श्रीकृष्णके अङ्गसे समुत्पन्न होनेके कारण यह आपकी प्रिय पुत्रीके समान शोभा पानेवाली गङ्गा आपके मन्त्रोंका अभ्यास करके उपासना करे। इसके द्वारा आपकी आराधना होनी चाहिये। फलस्वरूप वैकुण्ठाधिपति चतुर्भुज भगवान् श्रीहरि इसके पति हो जायँगे। साथ ही अपनी एक कलासे यह भूमण्डलपर भी पधारेगी और वहाँ भगवान्के अंश क्षारसमुद्रको इसका पति बननेका सुअवसर प्राप्त होगा। माता! यह गङ्गा जैसे गोलोकमें है, वैसे ही इसे सर्वत्र रहना