ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पूछनेपर श्रीकृष्णद्वारा अपना तथा राधाका रहस्योद्घाटन
| ७७८ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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अतः विलम्ब मत कीजिये।
श्रीकृष्णने कहा—मित्र! पहले तुम मुझपर प्रहार करो; तत्पश्चात् मैं युद्ध करूँगा। वत्स! मैं सारा रहस्य जानता हूँ; अतः अब तुम सुखपूर्वक वैकुण्ठको जाओ। तब शृगालने माधवपर दस बाणोंसे वार किया; किंतु वे कालरूपी बाण शीघ्र ही श्रीकृष्णको प्रणाम करके आकाशमें विलीन हो गये। फिर राजा शृगालने प्रलयकालीन अग्निकी शिखाके समान चमकीली गदा फेंकी, परंतु वह तत्काल ही श्रीकृष्णके अङ्गस्पर्शमात्रसे टूक-टूक हो गयी। तत्पश्चात् उसने परम दारुण कालरूपी खड्ग और धनुष चलाया, किंतु वह उसी क्षण श्रीकृष्णके अङ्गोंका स्पर्श होते ही छिन्न-भिन्न हो गया। इस प्रकार राजाको अस्त्रहीन देखकर कृपालु श्रीकृष्णने कहा—‘मित्र! घर जाकर खूब तीखा अस्त्र ले आओ।’
तब शृगाल बोला—प्रभो! आत्मारूपी आकाश अस्त्रद्वारा बेधा नहीं जा सकता। भला, आत्माके साथ युद्ध कैसा? पृथ्वीका उद्धार करनेमें कारणस्वरूप भगवन्! इस भवसागरसे मेरा उद्धार कीजिये। नाथ! भवसागर बड़ा भयंकर है और विषय-विषसे भी अधिक दारुण हैं; अतः मेरी स्वकर्मजनित माया-मोहरूपी साँकलको छिन्न-भिन्न कर दीजिये। आप कर्मोंके ईश्वर, ब्रह्माके भी विधाता, शुभ फलोंके दाता, समस्त सम्पत्तियोंके प्रदाता, प्राक्तन कर्मोंके कारण और उनके खण्डनमें समर्थ हैं। मैं अपने इस पाञ्चभौतिक प्राकृत नश्वर देहका त्याग करके आपके ही वैकुण्ठके सातवें द्वारपर जाऊँगा; क्योंकि वही मेरा घर है।
इस प्रकारका मित्रका स्तवन और अमृतोपम वचन सुनकर कृपानिधि श्रीकृष्ण कृपापरवश हो वहीं समरभूमिमें स्नेहवश रोने लगे। श्रीकृष्णके नेत्रोंसे गिरे हुए अश्रुबिन्दुओंसे वहाँ सहसा ‘बिन्दुसर’ नामक एक दिव्य सरोवर प्रकट हो गया; जो तीर्थोंमें परम श्रेष्ठ है। उसके जलके स्पर्शमात्रसे मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है और अपने सात जन्मोंके संचित पापोंसे छूट जाता है; इसमें जरा भी संदेह नहीं है।
इसके बाद श्रीभगवान्ने पूछा—मित्र! यदि तुम्हारा मन इतना निर्मल है तो फिर तुम्हारी ऐसी युद्ध-बुद्धि कैसे हुई और क्यों तुमने दूतके द्वारा ऐसा दारुण निष्ठुर संदेश कहलवाया?
इसपर शृगालने कहा—नाथ! मैंने तुम्हारे प्रति ऐसे निष्ठुर वाक्योंका प्रयोग किया, तभी तो तुम क्रोधपूर्वक यहाँ आये। नहीं तो, स्वप्नमें भी तुम्हारे दर्शन दुर्लभ हैं। यों कहते-कहते उसने योगावलम्बन करके प्राकृत पाञ्चभौतिक शरीरका त्याग कर दिया और वह श्रीकृष्णके देखते-देखते ही विमानपर सवार होकर दिव्य धामको चला गया। उस समय शृगालके शरीरसे सात ताड़-जितनी लंबी एक महान् ज्योति निकली और वह ब्रह्माजी तथा लक्ष्मीजीके द्वारा पूजित श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें प्रणाम करके चली गयी।
तब अपने साथियोंके सहित श्रीमान् कृष्ण इस अद्भुत चरित्रको देखकर प्रफुल्लमुख हो द्वारकाकी ओर चल दिये। द्वारका पहुँचकर उन्होंने पहले माता-पिताको प्रणाम किया। तदनन्तर रुक्मिणीके महलमें जाकर पुष्पशय्यापर शयन किया।
(अध्याय १२१)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७७९
गणेशके अग्रपूज्यत्व-वर्णनके प्रसङ्गमें राधाद्वारा गणेशकी अग्रपूजाका कथन
नारदजीने पूछा— मुने! पुराणोंमें जो गणेश-पूजनका दुर्लभ आख्यान वर्णित है, उसे मैंने सामान्यतया ब्रह्माके मुखसे संक्षेपमें सुना है। अब आपसे समस्त पूजनीयोंमें प्रधान गणपतिकी महिमा विस्तारपूर्वक सुननेकी मेरी अभिलाषा है; क्योंकि आप योगीन्द्रोंके गुरुके भी गुरु हैं। पूर्वकालमें स्वर्गवासियोंने सिद्धाश्रममें राधा-माधवकी महापूजा की थी; उसी राधाने सौ वर्षके बीतनेपर जब श्रीदामाका शाप निवृत्त हुआ; तब ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि सुरेन्द्रों, नागराज शेष और अन्यान्य बड़े-बड़े नागों, भूतलपर बहुत-से बलशाली नरेशों और असुरों, अन्यान्य महाबली गन्धर्वों तथा राक्षसोंके रहते हुए सर्वप्रथम गणेशकी पूजा कैसे की? महाभाग! यह वृत्तान्त मुझसे विस्तारपूर्वक वर्णन करनेकी कृपा करें।
श्रीनारायण बोले— नारद! तीनों लोकोंमें पुण्यवती होनेके कारण पृथ्वी धन्य एवं मान्य है। उस पृथ्वीपर भारतवर्ष कर्मोंका शुभ फल देनेवाला है। उस पुण्यक्षेत्र भारतमें सिद्धाश्रम नामक एक महान् पुण्यमय शुभ क्षेत्र है; जो धन्य, यशस्य, पूज्य और मोक्ष-प्रदाता है। भगवान् सनत्कुमार वहीं सिद्ध हुए थे। स्वयं ब्रह्माने भी वहीं तपस्या करके सिद्धि प्राप्त की थी। योगीन्द्र, मुनीन्द्र, कपिल आदि सिद्धेन्द्र और शतक्रतु महेन्द्र वहीं तप करके सिद्धिके भागी हुए हैं। इसी कारण उसे सिद्धाश्रम कहते हैं। वह सभीके लिये दुर्लभ है। मुने! वहाँ गणेश नित्य निवास करते हैं। वहाँ गणेशकी अमूल्य रत्नोंकी बनी हुई एक सुन्दर प्रतिमा है; जिसकी वैशाखी पूर्णिमाके दिन सभी देवता, नाग, मनुष्य, दैत्य, गन्धर्व, राक्षस, सिद्धेन्द्र, मुनीन्द्र, योगीन्द्र और सनकादि महर्षि पूजा करते हैं। उस अवसरपर वहाँ पार्वतीके साथ कल्याणकारी शम्भु, गणोंसहित कार्तिकेय और स्वयं प्रजापति ब्रह्मा पधारे। प्रधान-प्रधान नागोंके साथ शेषनाग भी तुरंत ही वहाँ आ पहुँचे। फिर सभी देवता, मनु और मुनिगण भी वहाँ आये। सभी नरेश प्रसन्नमनसे गणेशकी पूजा करनेके लिये वहाँ उपस्थित हुए। द्वारकावासियोंके साथ भगवान् श्रीकृष्णका भी वहाँ शुभागमन हुआ तथा गोकुलवासियोंके साथ नन्द भी पधारे। तदनन्तर सुरसिका, रासेश्वरी और श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधिदेवता सुन्दरी राधा भी सौ वर्ष व्यतीत हो जानेपर गोलोकवासिनी गोपी-सखियोंके साथ पधारीं। वहाँ सुन्दर दाँतोंवाली राधाने भलीभाँति स्नान करके शुद्ध हो धुली हुई साड़ी और कंचुकी धारण की। फिर भुवनपावनी कान्ता राधाने अपने चरणकमलोंका अच्छी तरह प्रक्षालन किया। तत्पश्चात् वे निराहार रहकर इन्द्रियोंको काबूमें करके मणिमण्डपमें गयीं। वहाँ उन्होंने श्रीकृष्ण-प्राप्तिकी कामनासे उत्तम संकल्पका विधान करके भक्तिपूर्वक गङ्गाजलसे गणेशको स्नान कराया। इसके बाद जो चारों वेदों, वसु और लोकोंकी माता, ज्ञानियोंकी परा जननी एवं बुद्धिरूपा हैं; वे भगवती राधा श्वेत पुष्प लेकर सामवेदोक्त प्रकारसे अपने पुत्रभूत गणेशका यों ध्यान करने लगीं।
‘जो खर्व (छोटे कदवाले), लम्बोदर (तोंदवाले), स्थूलकाय, ब्रह्मतेजसे उद्भासित, हाथीके-से मुखवाले, अग्निसरीखे कान्तिमान्, एकदन्त और असीम हैं; जो सिद्धों, योगियों और ज्ञानियोंके गुरु-के-गुरु हैं; ब्रह्मा, शिव और शेष आदि देवेन्द्र, मुनीन्द्र, सिद्धेन्द्र, मुनिगण तथा संतलोग जिनका ध्यान करते हैं; जो ऐश्वर्यशाली, सनातन, ब्रह्मस्वरूप, परम मङ्गल, मङ्गलके स्थान, सम्पूर्ण विघ्नोंको हरनेवाले, शान्त, सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके दाता, कर्मयोगियोंके लिये भवसागरमें मायारूपी जहाजके कर्णधारस्वरूप शरणागत-दीन-दुःखीकी रक्षामें तत्पर, ध्यानरूप साधना
| ७८० | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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करनेयोग्य, भक्तोंके स्वामी और भक्तवत्सल हैं; उन गणेशका ध्यान करना चाहिये।'
इस प्रकार ध्यान करके सती राधाने उस पुष्पको अपने मस्तकपर रखकर पुनः सर्वाङ्गोंको शुद्ध करनेवाला वेदोक्त न्यास किया। तत्पश्चात् उसी शुभदायक ध्यानद्वारा पुनः ध्यान करके राधाने उन लम्बोदरके चरणकमलमें पुष्पाञ्जलि समर्पित की। फिर गोलोकवासिनी स्वयं श्रीराधिकाजीने सुगन्धित सुशीतल तीर्थजल, दूर्वा, चावल, श्वेत पुष्प, सुगन्धित चन्दनयुक्त अर्घ्य, पारिजात-पुष्पोंकी माला, कस्तूरी-केसरयुक्त चन्दन, सुगन्धित शुक्ल पुष्प, सुगन्धयुक्त उत्तम धूप,घृत-दीपक, सुस्वादु रमणीय नैवेद्य, चतुर्विध अन्न, सुपक्व, फल, भाँति-भाँतिके लड्डू, रमणीय सुस्वादु पिष्टक, विविध प्रकारके व्यञ्जन, अमूल्य रत्ननिर्मित सिंहासन, सुन्दर दो वस्त्र, मधुपर्क, सुवासित सुशीतल पवित्र तीर्थजल, ताम्बूल, अमूल्य श्वेत चँवर, मणि-मुक्ता-हीरासे सुसज्जित सुन्दर सूक्ष्मवस्त्रद्वारा सुशोभित शय्या, सवत्सा कामधेनु गौ और पुष्पाञ्जलि अर्पण करके अत्यन्त श्रद्धाके साथ षोडशोपचार समर्पित किया। फिर कालिन्दीकुलवासिनी राधाने 'ॐ गं गौं गणपतये विघ्नविनाशिने स्वाहा' गणेशके इस षोडशाक्षर-मन्त्रका, जो श्रेष्ठ कल्पतरुके समान है, एक हजार जप किया। इसके बाद वे भक्तिवश कंधा नीचा करके नेत्रोंमें आँसू भरकर पुलकित शरीरसे परम भक्तिके साथ इस स्तोत्रद्वारा स्तवन करने लगीं।
श्रीराधिकाने कहा—जो परम धाम, परब्रह्म, परेश, परमेश्वर, विघ्नोंके विनाशक, शान्त, पुष्ट, मनोहर और अनन्त हैं; प्रधान-प्रधान सुर और असुर जिनका स्तवन करते हैं; जो देवरूपी कमलके लिये सूर्य और मङ्गलोंके आश्रय-स्थान हैं; उन परात्पर गणेशकी मैं स्तुति करती हूँ। यह उत्तम स्तोत्र महान् पुण्यमय तथा विघ्न और शोकको हरनेवाला है। जो प्रातःकाल उठकर इसका पाठ करता है, वह सम्पूर्ण विघ्नोंसे विमुक्त हो जाता है। (अध्याय १२२)
गणेशकृत राधा-प्रशंसा, पार्वती-राधा-सम्भाषण, पार्वतीके आदेशसे सखियोंद्वारा राधाका श्रृङ्गार और उनकी विचित्र झाँकी; ब्रह्मा, शिव, अनन्त आदिके द्वारा राधाकी स्तुति
श्रीनारायण कहते हैं—नारद! सती राधाने गणेशकी विधिपूर्वक भलीभाँति पूजा करके स्तुति की और सर्वाङ्गोंमें पहनने योग्य बहुमूल्य रत्नोंके बने हुए आभूषण प्रदान किये। राधाद्वारा किये गये पूजन और पूजा-सामग्रीको देखकर तथा स्तवन सुनकर शान्तस्वरूप गणेश शान्तस्वभाववाली त्रिलोकजननी राधासे मधुर वचन बोले।
श्रीगणेशने कहा—जगन्मातः! तुम्हारी यह