ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
About this granth
The Rigveda (ऋग्वेद) is the oldest of the four Vedas and the earliest surviving text of the Indian tradition. Its Samhita is arranged in ten mandalas containing more than a thousand hymns (suktas) addressed to Agni, Indra, Varuna, Mitra, Soma, Ushas, the Maruts, the Ribhus, the Vishvedevas and other deities, along with reflections on creation, generosity, marriage and society. Hymns such as the Nasadiya and the Purusha Sukta are often taken as the starting points of Indian philosophy.
This edition is by Dr. Ganga Sahay Sharma, a scholar with degrees in Hindi and Sanskrit and the title of Vyakaranacharya, published by Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, as part of a four-Veda set. Each hymn is headed by its number and deity, followed by the Sanskrit mantras and a simple Hindi rendering of their sense. A list of hymns, their subjects and the number of mantras is given at the front.
The Hindi is plain and close to everyday speech, which makes this edition a good first approach to the meaning of the mantras for readers not ready for a traditional commentary. The complete text, about 1,855 pages, can be read here page by page.
समु प्रिया अनूषत गावो मदाय घृष्वयः. सोमासः कृण्वते पथः पवमानास इन्दवः..
(८)
प्यारे एवं अत्यंत दीप्त स्तुतिवचन सोम की प्रशंसा करते हैं. शुद्ध होते हुए सोम अपने
छनने के लिए मार्ग बनाते हैं. (८)
य ओजिष्ठस्तमा भर पवमान श्रवाय्यम्. यः पञ्च चर्षणीरभि रयिं येन वनामहै.. (९)
हे सोम! तुम अपना परम ओजस्वी एवं प्रशंसनीय रस टपकाओ. पांच जनों के समीप
रहने वाले तुम्हारे रस द्वारा हम धन प्राप्त करें. (९)
सोमाः पवन्त इन्दवोऽस्मभ्यं गातुवित्तमाः.
मित्राः सुवाना अरेपसः स्वाध्यः स्वर्विदः.. (१०)
अत्यंत मार्गदर्शक, दीप्तिशाली, देवों के मित्र, पापरहित, उत्तम ध्यान वाले एवं सब कुछ
जानने वाले सोम निचुड़ते हुए हमारे पास आ रहे हैं. (१०)
सुष्वाणासो व्यद्रिभिश्चताना गोरधि त्वचि.
इषमस्मभ्यमभितः समस्वरन् वसुविदः.. (११)
गाय के चमड़े पर ज्ञात होते हुए, पत्थरों की सहायता से भली प्रकार निचोड़े गए एवं
धन प्राप्त कराने वाले सोम चारों ओर से भली-भांति शब्द कर रहे हैं. (११)
एते पूता विपश्चितः सोमासो दध्याशिरः.
सूर्यासो न दर्शतासो जिगत्नवो ध्रुवा घृते.. (१२)
दशापवित्र की सहायता से शुद्ध किए गए, मेधावी, दही से मिश्रित, जल में चलने वाले
एवं स्थिर सोम पात्रों में सूर्य के समान दिखाई देते हैं. (१२)
प्र सुन्वानस्यान्धसो मर्तो न वृत्त तद्वचः. अप श्वानमराधसं हता मखं न भृगवः.. (१३)
निचोड़े जाते हुए एवं उपभोग योग्य सोम का प्रसिद्ध शब्द यज्ञविघ्नकर्त्ता कुत्ते को दूर
करे. हे स्तोताओ! भृगुवंशी लोगों ने जैसे पहले भग को मारा था, उसी प्रकार तुम उस
यज्ञकर्म के बाधक कुत्ते को मारो. (१३)
आ जामिरत्के अव्यत भुजे न पुत्र ओण्योः.
सरज्जारो न योषणां वरो न योनिमासदम्.. (१४)
देवों के मित्र सोम दशापवित्र से इस प्रकार मिल जाते हैं, जिस प्रकार रक्षक माता-पिता
की भुजाओं में पुत्र आ जाता है. जार पुरुष जिस प्रकार स्त्री को पाने के लिए दौड़ता है, उसी
प्रकार सोम द्रोणकलश की ओर जाते हैं. (१४)
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स वीरो दक्षसाधनो वि यस्तस्तम्भ रोदसी.
हरिः पवित्रे अव्यत वेश न योनिमासदम्.. (१५)
शक्ति के साधन वे सोम वीर हैं एवं अपने तेज से द्यावा-पृथिवी को ढकते हैं. यज्ञ करने
वाला यजमान जिस प्रकार अपने घर में बैठता है, उसी प्रकार हरे रंग वाले सोम अपने कलश
में बैठते हैं. (१५)
अव्यो वारेभिः पवते सोमो गव्ये अधि त्वचि.
कनिक्रदद्वृषा हरिरिन्द्रस्याभ्येति निष्कृतम्.. (१६)
सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र से छनते हैं. अभिलाषापूरक एवं हरे रंग वाले सोम
शब्द करते हुए इंद्र के उत्तम स्थान को जाते हैं. (१६)
सूक्त—१०२ देवता—पवमान सोम
क्राणा शिशुर्म्हीनां हिन्वन्नृतस्य दीधितिम्. विश्वा परि प्रिया भुवदध द्विता.. (१)
यज्ञ करते हुए एवं महान् जलों के पुत्र सोम यज्ञ के प्रकाशक रस को बहाते हुए सभी
प्रिय हव्यों को व्याप्त करते हैं तथा द्यावा-पृथिवी में वर्तमान हैं. (१)
उप त्रितस्य पाष्यो३रभक्त यद् गुहा पदम्. यज्ञस्य सप्त धामभिरध प्रियम्.. (२)
मुझ त्रित के यज्ञ की गुफा में वर्तमान एवं पत्थर के समान दृढ़ रस निचोड़ने के तख्तों
पर पहुंचे ऋत्विज् यज्ञ धारण करने वाले गायत्री आदि सात छंदों द्वारा सोम की स्तुति करते
हैं. (२)
त्रीणि त्रितस्य धारया पृष्टेष्वेरया रयिम्. मिमीते अस्य योजना वि सुक्रतुः.. (३)
हे सोम! मुझ त्रित के तीनों सवनों में धारा के रूप में बही एवं सामगीत के गान के
समय धनदाता इंद्र को ले आओ. शोभन वृद्धि वाला स्तोता इंद्र को प्राप्त होने वाले स्तोत्र
बोलता है. (३)
जज्ञानं सप्त मातरो वेधामशासत श्रिये. अयं ध्रुवो रयीणां चिकेत यत्.. (४)
माता के समान सात गायत्री आदि छंद उत्पन्न एवं यज्ञधारक सोम की प्रशंसा यजमानों
के ऐश्वर्य के लिए करते हैं, क्योंकि सोम धन के निश्चित जानने वाले हैं. (४)
अस्य व्रते सजोषसो विश्वे देवासो अद्रुहः. स्पार्हा भवन्ति रन्तयो जुषन्त यत्.. (५)
सब देव शत्रुरहित होकर सोम के यज्ञ में मिलते हैं एवं अभिलाषा के योग्य बनते हैं.
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रमणशील देव सोम का सेवन करते हैं. (५)
यमी गर्भमृतावृधो दृशे चारुमजीजनन्. कविं मंहिष्ठमध्वरे पुरुस्पृहम्.. (६)
यज्ञवर्धक जल ने गर्भ के समान सोम को यज्ञ में देखने के लिए पैदा किया है. सोम
सबके कल्याणकारक, कवि, परमपूज्य एवं बहुतों के द्वारा अभिलषित हैं. (६)
समीचीने अभि त्मना यह्वी ऋतस्य मातरा. तन्वाना यज्ञमानुषग्यदञ्जते.. (७)
सोम परस्पर मिली हुई, विशाल व यज्ञ की माता के समान द्यावा-पृथिवी के पास अपने
आप जाते हैं. यज्ञ का विस्तार करने वाले अध्वर्यु सोम को जल में मिलाते हैं. (७)
क्रत्वा शुक्रेभिरक्षभिर्ऋणोरप व्रजं दिवः. हिन्वन्नृतस्य दीधितिं प्राध्वरे.. (८)
हे सोम! तुम अपने ज्ञान व दीप्तिवाली इंद्रियों के द्वारा अंतरिक्ष का अंधकार नष्ट करो
एवं हिंसारहित यज्ञ में धारक रस को प्रेरित करो. (८)
सूक्त—१०३ देवता—पवमान सोम
प्र पुनानाय वेधसे सोमाय वच उद्यतम्. भृतिं न भरा मतिभिर्जुजोषते.. (१)
हे त्रित ऋषि! तुम दशापवित्र द्वारा शुद्ध होते हुए, यज्ञविधाता एवं स्तुतियों द्वारा प्रसन्न
सोम के प्रति उसी प्रकार तत्परता से वचन कहो, जिस प्रकार नौकर अपना वेतन मांगता है.
(१)
परि वाराण्यव्यया गोभिरञ्जानो अर्षति. त्री षधस्था पुनानः कृणुते हरिः.. (२)
गाय के दूध में मिले हुए सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर जाते हैं. हरे रंग वाले
सोम शुद्ध होकर तीन स्थानों को अपना बनाते हैं. (२)
परि कोशं मधुश्रुतमव्यये वारे अर्षति. अभि वाणीर्ऋषीणां सप्त नूषत.. (३)
सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र द्वारा अपना रस द्रोणकलश में भेजते हैं. ऋषियों
के सात छंद सोम की स्तुति करते हैं. (३)
परि णेता मतीनां विश्वदेवो अदाभ्यः. सोमः पुनानश्चम्वोर्विशद्धरिः.. (४)
स्तुतियों के नेता, सबके देव, अहिंसित एवं हरे रंग के सोम रस निचोड़ने वाले तख्तों पर
बैठते हैं. (४)
परि दैवीरनु स्वधा इन्द्रेण याहि सरथम्. पुनानो वाघद्वाघद्भिरमर्त्यः.. (५)
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सूक्त—१०४ देवता—पवमान सोम
हे सोम! तुम इंद्र के साथ एक ही रथ पर बैठकर देवों की सेना के पास जाओ. शुद्ध
होते हुए, मरणरहित एवं ऋत्विजों द्वारा ढोये जाते हुए सोम स्तोताओं को धन देते हैं. (५)
परि सप्तिर्न वाजयुर्देवो देवेभ्यः सुतः. व्यानशिः पवमानो वि धावति.. (६)
घोड़े के समान युद्ध के इच्छुक, दीप्तिशाली, देवों के लिए निचोड़े गए, पात्रों में फैले हुए
एवं दशापवित्र द्वारा शुद्ध होते हुए सोम चारों ओर दौड़ते हैं. (६)
सूक्त—१०४ देवता—पवमान सोम
सखाय आ नि षीदत पुनानाय प्र गायत. शिशुं न यज्ञैः परि भूषत श्रिये.. (१)
हे मित्र स्तोताओ! बैठो और शुद्ध होते हुए सोम के लिए स्तुतियां गाओ. जैसे मां-बाप
बच्चें को आभूषण आदि से सजाते हैं, उसी प्रकार यज्ञयोग्य हव्यों से सोम को सजाओ. (१)
समी वत्सं न मातृभिः सृजता गयसाधनम्. देवाव्यं१ मदमभि द्विशवसम्.. (२)
हे ऋत्विजो! घर देने वाले, देवों के रक्षक, नशा करने वाले एवं परम शक्तिशाली सोम
को मातारूप जल से इस प्रकार मिलाओ, जैसे बछड़े को गाय के पास ले जाते हैं. (२)
पुनाता दक्षसाधनं यथा शर्धाय वीतये. यथा मित्राय वरुणाय शंतमः.. (३)
हे ऋत्विजो! शक्ति देने वाले सोम को दशापवित्र द्वारा शुद्ध करो. सोम वेग, देवों के
रसपान और मित्रावरुण की सुखप्राप्ति के साधन हैं. (३)
अस्मभ्यं त्वा वसुविदमभि वाणीरनूषत. गोभिष्टे वर्णमभि वासयामसि.. (४)
हे धनदाता सोम! हमारी वाणी इसलिए तुम्हारी स्तुति करती है कि तुम हमें धन दो. हम
तुम्हारे फेलने वाले रस को गाय के दूध के साथ मिलाते हैं. (४)
स नो मदानां पत इन्दो देवप्सरा असि. सखेव सख्ये गातुवित्तमो भव.. (५)
हे मदस्वामी सोम! तुम्हारा रूप दीप्त है. जैसे एक मित्र दूसरे मित्र को सच्चा मार्ग
बताता है, उसी प्रकार तुम हमें मार्ग बताने वाले बनो. (५)
सनेमि कृध्य१स्मदा रक्षसं कं चिदत्रिणम्. अपादेवं द्वयुमंहो युयोधि नः.. (६)
हे सोम! तुम हमारे साथ पुरानी मित्रता निभाओ. तुम अधिक खाने वाले, नम्रतारहित
एवं बाहरी-भीतरी माया वाले राक्षस को मारो और हमारे पापों से युद्ध करो. (६)
सूक्त—१०५ देवता—पवमान सोम
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तं वः सखायो मदाय पुनानमभि गायत. शिशुं न यज्ञैः स्वदयन्त गूर्तिभिः.. (१)
हे ऋत्विज् मित्रो! देवों के नशे के लिए शुद्ध होने वाले सोम की स्तुति करो. बच्चे को
जिस प्रकार गहनों से सजाते हैं, उसी प्रकार यज्ञसाध्य हव्यों और स्तुतियों से सोम को
सुशोभित करो. (१)
सं वत्सइव मातृभिरिन्दुहि॑न्वानो अज्यते. देवावीर्मदो मतिभिः परिष्कृतः.. (२)
देवों के रक्षक, नशीले, स्तुतियों द्वारा सुशोभित एवं प्रेरित सोम जल के साथ उसी
प्रकार मिलाए जाते हैं, जिस प्रकार माता गाय अपने बछड़े को अपने थन से मिलाती है. (२)
अयं दक्षाय साधनोऽयं शर्धाय वीतये. अयं देवेभ्यो मधुमत्तमः सुतः.. (३)
ये सोम देवों के बल के साधन, वेगजनक और भक्ष्य बनते हैं एवं इंद्रादि देवों को मधुरता
प्रदान करते हैं. (३)
गोमन्न इन्दो अश्ववत्सुतः सुदक्ष धन्व. शु
संग्राम के लिए सहारा लेने योग्य एवं निचुड़े हुए सोम इंद्र के लिए पात्रों में टपकते हैं.
जैसे इंद्र सारे संसार को जानते हैं, वैसे ही सोम जयशील इंद्र को जानते हैं. (२)
अस्येदिन्द्रो मदेष्वा ग्राभं गृभ्णीत सानसिम्. वज्रं च वृषणं भरत्समप्सुजित्.. (३)
सोम से उत्पन्न नशा चढ़ने पर इंद्र सबके आश्रययोग्य एवं गृहीतव्य धनुष को धारण
करते हैं. जल के लिए वृत्र राक्षस को जीतने वाले इंद्र वर्षाकारक वज्र को धारण करते हैं. (३)
प्र धन्वा सोम जागृविरिन्द्रायेन्दो परि स्रव. द्युमन्तं शुष्ममा भरा स्वर्विदम्.. (४)
हे जागने वाले सोम! तुम टपको. हे सोम! तुम इंद्र के लिए रस नीचे गिराओ तथा
दीप्तिशाली एवं सबको जानने वाला बल हमें दो. (४)
इन्द्राय वृषणं मदं पवस्व विश्वदर्शतः. सहस्रयामा पथिकृद्विचक्षणः.. (५)
हे सबके दर्शनीय, हजारों मार्गों वाले, यजमानों को मार्ग दिखाने वाले एवं विशेष द्रष्टा
सोम! तुम इंद्र के लिए अपना वर्षाकारक एवं नशीला रस टपकाओ. (५)
अस्मभ्यं गातुवित्तमो देवेभ्यो मधुमत्तमः. सहस्रं याहि पथिभिः कनिक्रदत्.. (६)
हे देवों के लिए परम स्वादिष्ट एवं शब्द करते हुए सोम! तुम हमारे लिए मार्ग बताने वाले
हो. तुम अनेक मार्गों से कलश में आओ. (६)
पवस्व देववीतय इन्दो धाराभिरोजसा. आ कलशं मधुमान्त्सोम नः सदः.. (७)
हे सोम! तुम देवों के उपभोग के लिए धाराओं के रूप में शक्ति के साथ नीचे गिरो. हे
नशीले रस वाले सोम! तुम कलश में बैठो. (७)
तव द्रप्सा उदप्रुत इन्द्रं मदाय वावृधुः. त्वां देवासो अमृताय कं पपुः.. (८)
हे सोम! जल की ओर बहने वाला तुम्हारा रस इंद्र को नशा करने के लिए बढ़ता है.
देवगण मरणरहित बनने के लिए तुम्हारे सुखकर रस पीते हैं. (८)
आ नः सुतास इन्दवः पुनाना धावता रयिम्. वृष्टिद्यावो रीत्यापः स्वर्विदः.. (९)
हे निचुड़ते हुए एवं जल बनाने वाले सोम! तुम शुद्ध होते हुए हमारे लिए धन लाओ. तुम
वर्षाकारक अंतरिक्ष के बनाने वाले तथा सर्वज्ञ हो. (९)
सोमः पुनान ऊर्मिणाव्यो वारं वि धावति. अग्रे वाचः पवमानः कनिक्रदत्.. (१०)
छनते हुए सोम अपनी धारा के रूप में भेड़ के बालों से बने दशापवित्र की ओर जाते हैं
एवं स्तोता के सामने भांति-भांति का शब्द करते हैं. (१०)
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धीभिर्हिन्वन्ति वाजिनं वने क्रीळन्तमत्यविम्. अभि त्रिपृष्ठं मतयः समस्वरन्.. (११)
स्तोतागण शक्तिशाली, जल में क्रीड़ा करने वाले एवं भेड़ के बालों से बने दशापवित्र को
पार करने वाले सोम को स्तुतियों द्वारा बढ़ाते हैं. स्तुतियां सवनों वाले सोम की प्रशंसा करती
हैं. (११)
असर्जि कलशाँ अभि मीळ्हे सप्तिर्न वाजयुः. पुनानो वाचं जनयन्नसिष्यदत्.. (१२)
जिस प्रकार घोड़ा युद्ध के लिए तैयार किया जाता है, उसी प्रकार यजमान के लिए अन्न
चाहने वाले सोम कलश में तैयार किए जाते हैं. छनते हुए सोम शब्द करते हैं एवं पात्रों में
टपकते हैं. (१२)
पवते हर्यतो हरिरति ह्ररांसि रंह्या. अभ्यर्षन्त्स्तोतृभ्यो वीरवद्यशः.. (१३)
अभिलाषायोग्य एवं हरे रंग वाले सोम वेग के साथ टेढ़े-मेढ़े दशापवित्र पर छनते हैं एवं
स्तोताओं को संतानयुक्त धन देते हैं. (१३)
अया पवस्व देवयुर्मधोर्धारा असृक्षत. रेभन्पवित्रं पर्येषि विश्वतः.. (१४)
हे देवाभिलाषी सोम! तुम अपनी धारा के रूप में नीचे गिरो. तुम्हारे मधुर रस की धाराएं
बनाई जाती हैं. तुम शब्द करते हुए सब ओर से दशापवित्र पर जाते हो. (१४)
सूक्त—१०७ देवता—पवमान सोम
परीतो षिञ्चता सुतं सोमो य उत्तमं हविः.
दधन्वाँ यो नर्यो अप्स्व१न्तरा सुषाव सोममद्रिभिः.. (१)
हे ऋत्विजो! जो सोम देवों के उत्तम हवि हैं, मानवहितैषी हैं एवं अंतरिक्ष में जाते हैं
तथा जिन्हें अध्वर्युजनों ने पत्थरों की सहायता से कुचला है, तुम यज्ञकर्म के बाद उन सोम
को जल से सींचो. (१)
नूनं पुनानोऽविभिः परि स्रवादब्धः सुरभिन्तरः.
सुते चित्त्वाप्सु मदामो अन्धसा श्रीणन्तो गोभिरुत्तरम्.. (२)
हे अहिंसनीय, अत्यंत सुगंधि वाले एवं छनते हुए सोम! तुम भेड़ के बालों से बने
दशापवित्र में होकर नीचे टपको. तुम्हारे निचोड़ जाने पर हम तुम्हें सत्तुओं और गाय के दूध-
दही से मिलाते हैं एवं जल में स्थित तुम्हारी सेवा करते हैं. (२)
परि सुवानश्चक्षसे देवमादनः क्रतुरिन्दुुर्विचक्षणः.. (३)
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देवों को मस्त करने वाले, यज्ञकर्ता, दीप्तिशाली एवं विशेषदृष्टि वाले सोम निचुड़ते हुए
सबके दर्शन के लिए टपकते हैं. (३)
पुनानः सोम धारयापो वसानो अर्षसि.
आ रत्नधा योनिमृतस्य सीदस्युत्सो देव हिरण्ययः.. (४)
हे सोम! तुम छनते समय जल में निवास करते हुए धारा के रूप में दशापवित्र में जाते
हो. हे रत्नदाता सोम! तुम यज्ञस्थल में बैठते हो. हे दीप्तिशाली सोम! तुम बहने वाले एवं
स्वर्णमय हो. (४)
दुहान ऊर्धर्दिव्यं मधु प्रियं प्रत्नं सधस्थमासदत्.
आपृच्छ्यं धरुणं वाज्यार्षति नृभिर्धूतो विचक्षणः.. (५)
सोम मदकारक एवं दिव्य लता को दुहते हुए अपने प्राचीन स्थान अर्थात् अंतरिक्ष में
बैठते हैं. इसके बाद ऋत्विजों द्वारा शोधित एवं सबके द्रष्टा सोम जल्दी से यज्ञ में पूछने योग्य
एवं यज्ञ के आधार यजमान को अन्न देने के लिए जाते हैं. (५)
पुनानः सोम जागृविरव्यो वारे परि प्रियः.
त्वं विप्रो अभवोऽङ्गिरस्तमो मध्वा यज्ञं मिमिक्ष नः.. (६)
हे जागरणशील एवं प्रिय सोम! तुम छनते समय भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर
टपकते हो. तुम मेधावी एवं पितरों के नेता हो. तुम हमारे यज्ञ को अपने मीठे रस से भर दो.
(६)
सोमो मीढ्वान्पवते गातुवित्तम ऋषिर्विप्रो विचक्षणः.
त्वं कविरभवो देववीतम आ सूर्यं रोहयो दिवि.. (७)
अभिलाषापूरक, मार्गदर्शकों में श्रेष्ठ, सबको दिखाने वाले, मेधावी एवं विशेष द्रष्टा सोम
टपकते हैं. हे बुद्धिमान् एवं देवाभिलाषियों में उत्तम सोम! तुम सूर्य को अंतरिक्ष में प्रकट
करते हो. (७)
सोम उ षुवाणः सोतृभिरधि ष्णुभिरवीनाम्.
अश्व्येव हरिता याति धारया मन्द्रया याति धारया.. (८)
निचोड़ने वाले ऋत्विजों द्वारा निचुड़े हुए सोम ऊंचे एवं भेड़ के बालों से बने दशापवित्र
पर जाते हैं. सोम अपनी नशीली एवं हरे रंग की धारा के द्वारा द्रोणकलश में जाते हैं. (८)
अनूपे गोमान्गोभिरक्षाः सोमो दुग्धाभिरक्षाः.
समुद्रं न संवरणान्यग्मन्मन्दी मदाय तोशते.. (९)
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गाय के दूध से मिले हुए सोम टपकते हैं. सोम अपने को मिलाने के लिए दूध के साथ
छनते हैं. जल जिस प्रकार सागर में जाता है, उसी प्रकार सोम का रस द्रोणकलश में जाता है.
नशीला सोम नशा करने के लिए निचोड़ा जाता है. (९)
आ सोम सुवानो अद्रिभिस्तिरो वाराण्यव्यया.
जनो न पुरि चम्वोर्विशद्धरिः सदो वनेषु दधिषे.. (१०)
हे पत्थरों की सहायता से निचुड़े हुए सोम! तुम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र को पार
करके छनते हो. हरे रंग के सोम चमू नामक पात्रों में इस प्रकार प्रवेश करते हैं, जिस प्रकार
मनुष्य नगर में प्रवेश करता है. हे सोम! तुम द्रोणकलश में स्थान बनाते हो. (१०)
स मामृजे तिरो अण्वानि मेष्यो मीळ्हे सप्तिर्न वाजयूः.
अनुमाद्यः पवमानो मनीषिभिः सोमो विप्रेभिर्ऋक्वभिः.. (११)
विजयाभिलाषी लोग जिस प्रकार युद्ध में जाने वाले घोड़े को सजाते हैं, उसी प्रकार
भेड़ के बालों से बने दशापवित्र को पार करने वाले एवं अन्नाभिलाषी सोम सजाए जाते हैं.
(११)
प्र सोम देववीतये सिन्धुर्न पिप्ये अर्णसा.
अंशोः पयसा मदिरो न जागृविरच्छा कोशं मधुश्रुतम्.. (१२)
हे सोम! सागर को जिस प्रकार जल से भरते हैं, उसी प्रकार तुम्हें भी देवों के पीने के
लिए जल से पूर्ण किया जाता है. हे शराब के समान नशीले एवं जागरणशील सोम! तुम
सोमलता के रस के साथ रस एकत्र करने वाले द्रोणकलश में जाते हो. (१२)
आ हर्यतो अर्जुने अत्के अव्यत प्रियः सूनुर्न मर्ग्यः.
तमीं हिन्वन्त्यपसो यथा रथं नदीष्वा गभस्त्योः.. (१३)
अभिलाषा करने योग्य, सबको प्रसन्न करने वाले एवं पुत्र के समान शुद्ध बनाने योग्य
सोम सफेद रंग के दशापवित्र पर जाते हैं. वेग वाले लोग रथ को जिस प्रकार तेजी से संग्राम
की ओर दौड़ाते हैं, उसी प्रकार दोनों हाथों की उंगलियां सोम को जल में मसलती हैं. (१३)
अभि सोमास आयवः पवन्ते मद्यं मदम्.
समुद्रस्याधि विष्टपि मनीषिणो मत्सरासः स्वर्विदः.. (१४)
गमनशील सोम अपने नशीले रस को चारों ओर बहाते हैं. मनीषी, नशीले एवं सबको
जानने वाले सोम द्रोणकलश के ऊपर दशापवित्र के ऊंचे भाग पर रस गिराते हैं. (१४)
तरत्समुद्रं पवमान ऊर्मिणा राजा देव ऋतं बृहत्.
अर्षन्मित्रस्य वरुणस्य धर्मणा प्र हिन्वान ऋतं बृहत्.. (१५)
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शुद्ध होते हुए दीप्तिशाली, अत्यंत सत्य रूप एवं राजा सोम द्रोणकलश में धारा के रूप
में गिरते हैं. प्रेरित एवं अत्यंत सत्य सोम मित्र और वरुण की रक्षा के लिए बहते हैं. (१५)
नृभिर्येमानो हर्यतो विचक्षणो राजा देवः समुद्रियः.. (१६)
ऋत्विजों द्वारा नियमित, अभिलाषा करने योग्य, विशेष द्रष्टा, दीप्तिशाली एवं राजा
सोम अंतरिक्ष में उत्पन्न होकर इंद्र के लिए टपकते हैं. (१६)
इन्द्राय पवते मदः सोमो मरुत्वते सुतः.
सहस्रधारो अत्यव्यमर्षति तमी मृजन्त्यायवः.. (१७)
नशीले एवं निचुड़े हुए सोम मरुतों सहित इंद्र के लिए छनते हैं. हजार धाराओं वाले
सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र को पार करते हैं. (१७)
पुनानश्चमूर् जनयन्मतिं कविः सोमो देवेषु रण्यति.
अपो वसानः परि गोभिरुत्तरः सीदन्वनेष्वव्यत.. (१८)
चमू नामक पात्रों में निचोड़े जाते हुए, स्तुति उत्पन्न करते हुए एवं मेधावी सोम देवों के
समीप जाते हैं. जलों को ढकते हुए एवं काठ से बने द्रोण कलश में बैठे हुए सोम गाय के
दूध-दही द्वारा ढके जाते हैं. (१८)
तवाहं सोम रारण सख्य इन्दो दिवेदिवे.
पुरूणि बभ्रो नि चरन्ति मामव परिधीँरति ताँ इहि.. (१९)
हे दीप्तिशाली सोम! मैं तुम्हारी मित्रता में प्रतिदिन प्रसन्न रहता हूं. हे पीले रंग वाले
सोम! तुम्हारे मित्र को बहुत से राक्षस बाधा पहुंचाते हैं. तुम उन्हें मारो. (१९)
उताहं नक्तमुत सोम ते दिवा सख्याय बभ्र ऊधनि.
घृणा तपन्तमति सूर्यं परः शकुना इव पत्तिम.. (२०)
हे पीले रंग वाले सोम! मैं रात-दिन तुम्हारी मित्रता में आनंदित रहता हूं. हम दीप्ति से
प्रज्वलित एवं परम स्थान में स्थित तुम्हारे समीप उसी प्रकार जाते हैं, जिस प्रकार पक्षी सूर्य
का अतिक्रमण करते हैं. (२०)
मृज्यमानः सुहस्त्य समुद्रे वाचमिन्वसि.
रयिं पिशङ्गं बहुलं पुरुस्पृहं पवमानाभ्यर्षसि.. (२१)
हे शोभन उंगलियों वाले एवं मसले जाते हुए सोम! तुम अंतरिक्ष में अपना शब्द भेजते
हो. हे पवमान सोम! तुम स्तोताओं को पीले रंग का, अधिक एवं बहुतों द्वारा चाहने योग्य धन
देते हो. (२१)
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मृजानो वारे पवमानो अव्यये वृषाव चक्रदो वने.
देवानां सोम पवमान निष्कृतं गोभिरञ्जानो अर्षसि.. (२२)
हे वर्षकारक सोम, मसले जाते हुए एवं भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर छनते हुए
सोम! तुम द्रोणकलश में शब्द करते हो. हे पवमान सोम! तुम गाय के दूध, दही के साथ
मिलकर देवों के स्वच्छ स्थान को जाते हो. (२२)
पवस्व वाजसातयेऽभि विश्वानि काव्या.
त्वं समुद्रं प्रथमो वि धारयो देवेभ्यः सोम मत्सरः.. (२३)
हे सोम! सारी स्तुतियों को ध्यान में रखकर तुम अन्न लाभ के लिए टपको. हे देवों के
मदकारक एवं सब देवों में प्रमुख सोम! तुम समुद्र को विशेषरूप से धारण करते हो. (२३)
स तू पवस्व परि पार्थिवं रजो दिव्या च सोम धर्मभिः.
त्वां विप्रासो मतिभिर्विचक्षण शुभ्रं हिन्वन्ति धीतिभिः.. (२४)
हे सोम! तुम धारण करने वालों के साथ पार्थिव एवं दिव्य लोकों में रस टपकाओ. हे
विशेष द्रष्टा एवं श्वेत वर्ण सोम! बुद्धिमान् लोग स्तुतियों और उंगलियों द्वारा तुम्हें रस बहाने के
लिए प्रेरित करते हैं. (२४)
पवमाना असृक्षत पवित्रमति धारया.
मरुत्वन्तो मत्सरा इन्द्रिया इया मेधामभि प्रयांसि च.. (२५)
शुद्ध होते हुए, मरुतों से युक्त, नशीले, इंद्र द्वारा सेवित व स्तोताओं की स्तुतियों एवं
हव्यों को लक्ष्य करके चले जाने वाले सोम दशापवित्र को पार करके अपनी धारा के रूप में
बनते हैं. (२५)
अपो वसानः परि कोशमर्षतीन्दुहिर्यानः सोतृभिः.
जनयञ्ज्योतिर्मन्दना अवीवशद्गाः कृण्वानो न निर्णिजम्.. (२६)
जल में निवास करने वाले व निचोड़ने वालों द्वारा प्रेरित सोम द्रोणकलश में जाते हैं.
सोम दीप्ति उत्पन्न करते हुए एवं गाय के दूध आदि को अपने रूप में मिलाते हुए इस समय
स्तुतियों की अभिलाषा करते हैं. (२६)
सूक्त—१०८ देवता—पवमान सोम
पवस्व मधुमत्तम इन्द्राय सोम क्रतुवित्तमो मदः. महि द्युक्षतमो मदः.. (१)
हे अतिशय मधुर, अतिशय बुद्धिदाता, महान्, अत्यंत दीप्त एवं मदकारक सोम! तुम
इंद्र के हेतु नशीले बनकर टपको. (१)
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यस्य ते पीत्वा वृषभो वृषायतेऽस्य पीता स्वर्विदः.
स सुप्रकेतो अभ्यक्रमीदिषोऽच्छा वाजं नैतशः.. (२)
हे सोम! अभिलाषापूरक इंद्र तुम्हें पीकर बैल के समान आचरण करते हैं. तुझ सर्वद्रष्टा
सोम को पीकर इंद्र शोभनज्ञान वाले बनते हैं तथा शत्रुओं के अन्न पर उसी प्रकार आक्रमण
करते हैं, जिस प्रकार घोड़ा युद्धस्थल की ओर जाता है. (२)
त्वं ह्य१ङ्ग दैव्या पवमान जनिमानि द्युमत्तमः. अमृतत्वाय घोषयः.. (३)
हे शुद्ध होते हुए सोम! तुम अत्यंत दीप्तिशाली बनकर देवों को मरणरहित बनाने के
लिए उन्हें लक्ष्य करके शीघ्र शब्द करते हो. (३)
येना नवग्वो दध्यङ्ङपोर्णुते येन विप्रास आपिरे.
देवानां सुम्ने अमृतस्य चारुणो येन श्रवांस्यानशुः.. (४)
नई शैली से यज्ञ करने वाले अंगिरा ऋषि ने जिस सोम को पीकर पणियों द्वारा चुराई
हुई गायों का द्वार खोला था, जिसे पीकर ब्राह्मणों ने चोरी गई हुई गाएं पाई थीं एवं जिस सोम
की सहायता से यजमान ने यज्ञ आरंभ होने पर कल्याणकारक अमृत जल से संबंधित अन्न
पाए थे, वे सोम देवों को अमर बनाने के लिए शब्द करते हैं. (४)
एष स्य धारया सुतोऽव्यो वारेभिः पवते मदिन्तमः. क्रीळन्नूर्मिरपामिव.. (५)
अत्यंत मादक, जलसमूह के समान खेल खेलने वाले निचुड़े हुए सोम भेड़ के बालों से
बने दशापवित्र से अपनी धाराएं कलश में गिराते हैं. (५)
य उस्रिया अप्या अन्तरश्मनो निर्गा अकृन्तदोजसा.
अभि व्रजं तन्विषे गव्यमश्व्यं वर्मीव धृष्णवा रुज.. (६)
जिन सोम ने गतिशील अंतरिक्ष में स्थित मेघ से अपनी शक्ति द्वारा वर्षा कराई थी, वे ही
सोम गायों और घोड़ों के समूह को सब जगह फैलाते हैं. हे शत्रुपराभवकारी सोम! तुम
कवचधारी योद्धा के समान असुरों को मारो. (६)
आ सोता परि षिञ्चताश्वं न स्तोममप्तुरं रजस्तुरम्. वनक्रक्षममुदप्रतम्.. (७)
हे ऋत्विजो! अश्व के समान वेगशाली, स्तुतियोग्य, जलों एवं तेज के प्रेरक, जल खींचने
वाले एवं जल में डूबे हुए सोम को निचोड़ो एवं जल से सींचो. (७)
सहस्रधारं वृषभं पयोवृधं प्रियं देवाय जन्मने.
ऋतेन य ऋतजातो विवावृधे राजा देव ऋतं बृहत्.. (८)
हे ऋत्विजो! हजार धाराओं वाले, अभिलाषापूरक, जल बढ़ाने वाले एवं प्रिय सोम को
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देवों के निमित्त निचोड़ो. जल में उत्पन्न दीप्तिशाली, सच्चे, महान् एवं राजा सोम जल से
बढ़ते हैं. (८)
अभि द्युम्नं बृहद्यश इषस्पते दिदीहि देव देवयुः. वि कोशं मध्यमं युव.. (९)
हे अन्न के स्वामी एवं स्तुतियोग्य सोम! तुम देवाभिलाषी बनकर हमारे लिए दिव्य अन्न
अधिक मात्रा में दो. (९)
आ वच्यस्व सुदक्ष चम्वोः सुतो विशां वह्निर्न विश्पतिः.
वृष्टिं दिवः पवस्व रीतिमपां जिन्वा गविष्टये धियः.. (१०)
हे शोभन बल वाले सोम! तुम चमू नामक पात्रों पर निचुड़ कर एवं राजा के समान
प्रजाओं के भारवहनकर्त्ता बनकर पधारो, अंतरिक्ष से जल की गति नीचे करो एवं गाय की
अभिलाषा रखने वाले यजमान का यज्ञकर्म पूरा करो. (१०)
एतमु त्यं मदच्युतं सहस्रधारं वृषभं दिवो दुहुः. विश्वा वसूनि बिभ्रतम्.. (११)
ऋत्विज् मादकता टपकाने वाले, हजार धाराओं से युक्त, अभिलाषापूरक एवं सभी धन
धारण करने वाले सोम का दोहन करते हैं. (११)
वृषा वि जज्ञे जनयन्नमर्त्यः प्रतपञ्ज्योतिषा तमः.
स सुष्टुतः कविभिर्निर्णिजं दधे त्रिधात्वस्य दंससा.. (१२)
शब्द उत्पन्न करते हुए व अपनी ज्योति से अंधकार का नाश करते हुए अभिलाषापूरक
एवं मरणरहित सोम जाने जाते हैं. बुद्धिमानों द्वारा प्रशंसित सोम गाय के दूध-दही में मिलाए
जाते हैं. यज्ञकर्म को तीनों सवनों में सोम ही धारण करते हैं. (१२)
स सुन्वे यो वसूनां यो रायामानेता य इळानाम्. सोमो यः सुक्षितीनाम्.. (१३)
जो सोम धनों, गायों, अन्नों एवं शोभनगृहों के लाने वाले हैं, वे ऋत्विजों द्वारा निचोड़े
जाते हैं. (१३)
यस्य न इन्द्रः पिबाद्यस्य मरुतो यस्य वार्यमणा भगः.
आ येन मित्रावरुणा करामह एन्द्रमवसे महे.. (१४)
हमारे जिस सोम को इंद्र, मरुत्, अर्यमा एवं भग पीते हैं एवं जिसके द्वारा हम मित्र,
वरुण और इंद्र को अपनी रक्षा के लिए अभिमुख करते हैं, वे ही सोम निचोड़े जाते हैं. (१४)
इन्द्राय सोम पातवे नृभिर्यतः स्वायुधो मदिन्तमः. पवस्व मधुमत्तमः.. (१५)
हे ऋत्विजों द्वारा संयत, शोभन आयुधों वाले, अत्यंत मादक तथा अधिक मधुर सोम!
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तुम इंद्र के पीने के लिए अपना रस बहाओ. (१५)
इन्द्रस्य हार्दि सोमधानमा विश समुद्रमिव सिन्धवः.
जुष्टो मित्राय वरुणाय वायवे दिवो विष्टम्भ उत्तमः.. (१६)
हे मित्र, वरुण और वायु के लिए पर्याप्त, स्वर्ग के धारणकर्त्ता, उत्तम एवं इंद्र के प्रिय
सोम! नदियां जिस प्रकार सागर में प्रवेश करती हैं, उसी प्रकार तुम द्रोणकलश में प्रवेश करो.
(१६)
सूक्त—१०९ देवता—पवमान सोम
परि प्र धन्वेन्द्राय सोम स्वादुर्मित्राय पूष्णे भगाय.. (१)
हे स्वादिष्ट सोम! तुम इंद्र, मित्र, वरुण, पूषा और भग नामक देवों के लिए पात्रों में
टपको. (१)
इन्द्रस्ते सोम सुतस्य पेयाः क्रत्वे दक्षाय विश्वे च देवाः.. (२)
हे निचोड़े हुए सोम! इंद्र ज्ञान और बल पाने के लिए तुम्हारा रस पिएं. सारे देव तुम्हारा
रस पिएं. (२)
एवामृताय महे क्षयाय स शुक्रो अर्ष दिव्यः पीयूषः.. (३)
हे दीप्तिशाली, दिव्य एवं देवों के पीने योग्य सोम! तुम हमें अमर बनाने एवं विशाल घर
देने के लिए छनो. (३)
पवस्व सोम महान्त्समुद्रः पिता देवानां विश्वाभि धाम.. (४)
हे महान्, रस बहाने वाले एवं सबके पालक सोम! तुम देवों के सभी शरीरों को लक्ष्य
करके शुद्ध बनो. (४)
शुक्रः पवस्व देवेभ्यः सोम दिवे पृथिव्यै शं च प्रजायै.. (५)
हे सोम! तुम दीप्तिशाली बनकर देवों के लिए छनो तथा द्यावा-पृथिवी और प्रजा को
सुख दो. (५)
दिवो धर्तासि शुक्रः पीयूषः सत्ये विधर्मन्वाजी पवस्व.. (६)
हे दीप्तिशाली, पीने योग्य, स्वर्गलोक के धारणकर्त्ता एवं शक्तिशाली सोम! तुम इस
सच्चे यज्ञ में टपको. (६)
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पवस्व सोम द्युम्नी सुधारो महामवीनामनु पूर्व्यः.. (७)
हे यशस्वी, शोभनधाराओं वाले एवं प्राचीन सोम! तुम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र
के छिद्रों से होकर बहो. (७)
नृभिर्येमानो जज्ञानः पूतः क्षरद्विश्वानि मन्द्रः स्वर्वित्.. (८)
ऋत्विजों द्वारा संयमित, उत्पन्न, पवित्र, मोदयुक्त एवं सबको जानने वाले सोम हमें सब
धन दें. (८)
इन्दुः पुनानः प्रजामुराणः करद्विश्वानि द्रविणानि नः.. (९)
देवों को बढ़ाने वाले एवं शुद्ध होते हुए सोम हमें संतान एवं सभी धन दें. (९)
पवस्व सोम क्रत्वे दक्षायश्वो न निक्तो वाजी धनाय.. (१०)
हे अश्व के समान जल से धोए गए एवं वेगशाली सोम! तुम हमें ज्ञान, बल और धन देने
के लिए टपको. (१०)
तं ते सोतारो रसं मदाय पुनन्ति सोमं महे द्युम्नाय.. (११)
हे सोम! रस निचोड़ने वाले लोग नया एवं महान् अन्न पाने के लिए तुम्हारा रस शुद्ध
करते हैं. (११)
शिशुं जज्ञानं हरिं मृजन्ति पवित्रे सोमं देवेभ्य इन्दुम्.. (१२)
ऋत्विज् जल के पुत्र, जन्म लेने वाले, हरितवर्ण एवं दीप्तिशाली सोम को देवों के लिए
दशापवित्र पर छानते हैं. (१२)
इन्दुः पविष्ट चारुर्मदायापामुपस्थे कविर्भगाय.. (१३)
कल्याणकारक एवं बुद्धिमान् सोम जलों के समान अंतरिक्ष में मद एवं धन के लिए शुद्ध
होते हैं. (१३)
बिभर्ति चार्विन्द्रस्य नाम येन विश्वानि वृत्रा जघान.. (१४)
सोम इंद्र के कल्याणकारी शरीर का पोषण करते हैं, उसी शरीर से इंद्र ने सब राक्षसों
को मारा. (१४)
पिबन्त्यस्य विश्वे देवासो गोभिः श्रीतस्य नृभिः सुतस्य.. (१५)
गायों के दूध-दही से मिले हुए एवं ऋत्विजों द्वारा निचोड़े हुए सोम को सभी देव पीते हैं.
(१५)
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प्र सुवानो अक्षाः सहस्रधारस्तिरः पवित्रं वि वारमव्यम्.. (१६)
छाने जाते हुए एवं हजार धाराओं वाले सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र को पार
करके अनेक प्रकार से बहते हैं. (१६)
स वाज्यक्षाः सहस्ररेता अद्भिर्मृजानो गोभिः श्रीणानः.. (१७)
शक्तिशाली, अधिक जल वाले व जलों में मसले जाते हुए सोम सभी ओर बहते हैं.
(१७)
प्र सोम याहीन्द्रस्य कुक्षा नृभिर्येमानो अद्रिभिः सुतः.. (१८)
हे ऋत्विजों द्वारा संयमित एवं पत्थरों की सहायता से निचोड़े गए सोम! तुम इंद्र के पेट
में जाओ. (१८)
असर्जि वाजी तिरः पवित्रमिन्द्राय सोमः सहस्रधारः.. (१९)
शक्तिशाली एवं हजार धाराओं वाले सोम दशापवित्र के द्वारा छान कर इंद्र के लिए
तैयार किए जाते हैं. (१९)
अञ्जन्त्येनं मध्वो रसेनेन्द्राय वृष्ण इन्दुं मदाय.. (२०)
ऋत्विज् अभिलाषापूरक इंद्र के नशे के लिए गाय के मीठे दूध के साथ सोम को मिलाते
हैं. (२०)
देवेभ्यस्त्वा वृथा पाजसेऽपो वसानं हरिं मृजन्ति.. (२१)
हे जल में रहने वाले हरितवर्ण सोम! ऋत्विज् तुम्हें बिना श्रम के देवों के पीने एवं उन्हें
शक्ति देने के लिए शुद्ध करते हैं. (२१)
इन्दुरिन्द्राय तोशते नि तोशते श्रीणन्नुग्रो रिणन्नपः.. (२२)
जल एवं दूध के साथ मिले हुए, शक्तिदाता एवं जलों के प्रेरक सोम इंद्र के लिए निचोड़े
जाते हैं. (२२)
सूक्त—११० देवता—पवमान सोम
पर्यूषु प्र धन्व वाजसातये परि वृत्राणि सक्षणिः.
द्विषस्तरध्या ऋणया न ईयसे.. (१)
हे सोम! तुम अन्न पाने के लिए युद्ध में जाओ. हे सहनशील सोम! तुम शत्रुओं के पास
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जाओ. तुम हमारे अंगों के विनाशक बनकर शत्रुओं को मारने के लिए जाओ. (१)
अनु हि त्वा सुतं सोम मदामसि महे समर्यराज्ये.
वाजाँ अभि पवमान प्र गाहसे.. (२)
हे निचुड़े हुए सोम! हमारे ऋत्विज् तुम्हारी स्तुति करते हैं. हे शुद्ध होते हुए सोम! तुम
अपने महान् राज्य में मनुष्यों का पालन करने के लिए शत्रुओं की सेना की ओर जाते हो. (२)
अजीजनो हि पवमान सूर्यं विधारे शक्मना पयः.
गोजीरया रंहमाणः पुरन्ध्या.. (३)
हे शुद्ध होते हुए सोम! तुमने जलधारण करने वाले अंतरिक्ष में अपने बल से सूर्य को
उत्पन्न किया है. तुम स्तोताओं को गाएं देने वाले, ज्ञानों से युक्त एवं वेगशाली हो. (३)
अजीजनो अमृत मर्त्येष्वॉ ऋतस्य धर्मन्नमृतस्य चारुणः.
सदासरो वाजमच्छा सनिष्यदत्.. (४)
हे मरणरहित सोम! तुमने सच्चे एवं कल्याणकारी जल को धारण करने वाले अंतरिक्ष
में सूर्य को इसलिए उत्पन्न किया था कि वह मनुष्यों के सामने जा सके. तुम सबकी सेवा
करते हुए सदा संग्राम की ओर जाते हो. (४)
अभ्यभि हि श्रवसा ततर्दिथोत्सं न कं चिज्जनपानमक्षितम्.
शर्याभिर्न भरमाणो गभस्त्योः.. (५)
हे सोम! जिस प्रकार कोई मनुष्य दूसरे लोगों के पानी पीने के लिए नित्यजल वाला
तालाब खोदता है अथवा कोई भुजाओं की दसों उंगलियों से अंजलि बना कर जल भरता है,
उसी प्रकार तुम अन्नप्राप्ति के लिए दशापवित्र को पार करके जाते हो. (५)
आदीं के चित्पश्यमानास आप्यं वसुरुचो दिव्या अभ्यनूषत.
वारं न देवः सविता व्यूर्णते.. (६)
दीप्तिशाली सूर्य तब तक अंधकार भी नहीं हटा पाए थे कि तभी सूर्य को देखने वाले
एवं दिव्य वसुरुच नामक लोगों ने अपने मित्र सोम की स्तुति आरंभ कर दी थी. (६)
त्वे सोम प्रथमा वृक्तबर्हिषो महे वाजाय श्रवसे धियं दधुः.
स त्वं नो वीर वीर्याय चोदय.. (७)
हे सोम! प्राचीन एवं यज्ञ के निमित्त कुश तोड़ने वाले यजमानों ने महान् बल और अन्न
पाने के लिए तुम में अपनी बुद्धि को धारण किया था. हे वीर सोम! तुम संग्राम में बल प्रदर्शन
के लिए हमें भी भेजो. (७)
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दिवः पीयूषं पूर्व्यं यदुक्थ्यं महो गाहाद्दिव आ निरधुक्षत.
इन्द्रमभि जायमानं समस्वरन्.. (८)
लोग स्वर्ग से पीने योग्य, प्राचीन व प्रशंसनीय सोम को महान् तथा गहन अंतरिक्ष के
अभिमुख होकर दुहते हैं. स्तोता इंद्र को लक्ष्य करके उत्पन्न सोम की स्तुति करते हैं. (८)
अध यदिमे पवमान रोदसी इमा च विश्वा भुवनाभि मज्मना.
यूथे न निःष्ठा वृषभो वि तिष्ठसे.. (९)
हे शुद्ध होते हुए सोम! तुम इस द्यावा-पृथिवी, लोकों एवं सभी प्राणियों पर अपने बल
से इस प्रकार अधिकार कर लेते हो, जिस प्रकार कोई बैल गायों के झुंड का अधिकारी बन
जाता है. (९)
सोमः पुनानो अव्यये वारे शिशुर्न क्रीळन्पवमानो अक्षाः.
सहस्रधारः शतवाज इन्दुः.. (१०)
हजारों धाराओं वाले, सैकड़ों शक्तियों से युक्त, दीप्तिशाली एवं छनते हुए सोम भेड़ के
बालों से बने दशापवित्र पर बच्चे के समान खेल करते हैं. (१०)
एष पुनानो मधुमाँ ऋतावेन्द्रायेन्दुः पवते स्वादूरूर्मिः.
वाजसनिर्वरिवोविद्वयोधाः.. (११)
शुद्ध होते हुए, मधुरता युक्त, यज्ञ वाले, दीप्तिशाली, निचुड़ने वाले, स्वादिष्ट रस धारा के
समूहरूप, अन्न के दाता, धन लाभ कराने वाले एवं आयु देने वाले सोम इंद्र के लिए छनते हैं.
(११)
स पवस्व सहमानः पृतन्यून्त्सेधन्न्रक्षांस्यप दुर्गहाणि.
स्वायुधः सासह्वान्त्सोम शत्रून्.. (१२)
हे सोम! तुम युद्धाभिलाषी शत्रुओं को हराते हुए, दुर्गम राक्षसों को दूर भगाते हुए एवं
शोभन आयुध धारा करके शत्रुओं को दुःखी करते हुए शुद्ध बनो. (१२)
सूक्त—१११ देवता—पवमान सोम
अया रुचा हरिण्या पुनानो विश्वा द्वेषांसि तरति स्वयुग्वभिः सूरो न स्वयुग्वभिः.
धारा सुतस्य रोचते पुनानो अरुषो हरिः.
विश्वा यद्रूपा परियात्यृक्वभिः सप्तास्येभिर्ऋक्वभिः.. (१)
शुद्ध होते हुए सोम अपने हरे रंग वाली एवं सुंदर धारा से इसी प्रकार सब राक्षसों का
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नाश करते हैं, जिस प्रकार सूर्य अपनी किरणों के द्वारा अंधकार को मिटाते हैं. सोम की धारा
प्रकाशित होती है. शुद्ध होते हुए हरित वर्ण सोम प्रकाशित होते हैं. सोम सात छंदों वाली
स्तुतियों एवं रसहरण करने वाले तेजों के द्वारा सभी नक्षत्रों को व्याप्त करते हैं. (१)
त्वं त्यत्पणीनां विदो वसु सं मातृभिर्मर्जयसि स्व आ दम ऋतस्य धीतिभिर्दमे.
परावतो न साम तद्यत्रा रणन्ति धीतयः.
त्रिधातुभिरुषीभिर्वयो दधे रोचमानो वयो दधे.. (२)
हे सोम! तुमने पणियों द्वारा चुराया हुआ गोधन प्राप्त किया था. तुम यज्ञस्थल में यज्ञ के
धारण करने वाले जलों से अच्छी तरह शुद्ध होते हो. तुम्हारा शब्द दूर पर गाए जाने वाले
साम मंत्रों के समान सुनाई देता है. तुम्हारा शब्द सुनकर यजमान प्रसन्न होते हैं. उज्ज्वल सोम
तीनों लोकों को धारण करने वाले जलों की दीप्तियों के द्वारा स्तोताओं को अन्न देते हैं. (२)
पूर्वामनु प्रदिशं याति चेकितत्सं रश्मिभिर्यतते दर्शतो रथो दैव्यो दर्शतो रथः.
अग्मन्नुक्थानि पौंस्येन्द्रं जैत्राय हर्षयन्.
वज्रश्च यद्द्रवथो अनपच्युता समत्स्वनपच्युता.. (३)
सबको जानने वाले सोम पूर्व दिशा की ओर जाते हैं. हे सोम! तुम्हारा दर्शनीय एवं दिव्य
रथ सूर्य की किरणों के साथ मिलता है. मनुष्यों द्वारा की हुई स्तुतियां इंद्र के पास जाती हैं एवं
इंद्र को विजय पाने के लिए हर्षित करती हैं. वज्र भी इंद्र के पास जाता है. हे सोम! तुम व इंद्र
शत्रुओं से अपराजित रहकर स्तुतियां सुनते हो. (३)
सूक्त—११२ देवता—पवमान सोम
नानानं वा उ नो धियो वि व्रतानि जनानाम्.
तक्षा रिष्टं रुतं भिषग्ब्रह्मा सुन्वन्तमिच्छतीन्द्रायेन्दो परि स्रव.. (१)
हे सोम! हमारे तथा अन्य लोगों के कर्म विविध प्रकार के होते हैं. बढ़ई लकड़ी काटना
चाहता है, वैद्य रोग की चिकित्सा करना चाहता है एवं ब्राह्मण सोमरस निचोड़ने वाले
यजमान को चाहता है. हे सोम! तुम इंद्र के लिए रस बहाओ. (१)
जरतीभिरोषधीभिः पर्णेभिः शकुनानाम्.
कार्मारो अश्मभिर्धुभिर्हिरण्यवन्तमिच्छतीन्द्रायेन्दो परि स्रव.. (२)
पुरानी लकड़ियों एवं पक्षियों के पंखों को शिलाओं द्वारा घिसकर बाण बनाए जाते हैं.
कारीगर बाण बेचने के लिए धनी लोगों को खोजते हैं. हे सोम! तुम इंद्र के लिए अपना रस
नीचे गिराओ. (२)
कारुरहं ततो भिषगुपलप्रक्षिणी नना.
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नानाधियो वसूयवोऽनु गा इव तस्थिमेन्द्रायेन्दो परि स्रव.. (३)
मैं स्तोता हूं, मेरा पुत्र वैद्य है और मेरी पुत्री कंडों पर जौ भूनने वाली है. जिस प्रकार
गाएं गोशाला में अलग-अलग घूमती हैं, उसी प्रकार हम सब धन की इच्छा से अलग-अलग
काम करते हैं. हे सोम! तुम इंद्र के लिए रस गिराओ. (३)
अश्वो वोळहा सुखं रथं हसनामुपमन्त्रिणः.
शेपो रोमण्वन्तौ भेदौ वारिन्मण्डूक इच्छतीन्द्रायेन्दो परि स्रव.. (४)
मंजिल पर पहुंचने वाला कल्याणकारी घोड़ा एवं दरबारी लोग हंसी-मजाक की इच्छा
करते हैं. पुरुष जननेंद्रिय जिस प्रकार रोम वाला छेद चाहती है एवं मेंढक जल चाहता है,
उसी प्रकार मैं सोम की इच्छा करता हूं. हे सोम! तुम इंद्र के लिए अपना रस बरसाओ. (४)
सूक्त—११३ देवता—पवमान सोम
शर्यणावति सोममिन्द्रः पिबतु वृत्रहा.
बलं दधान आत्मनि करिष्यन्वीर्यं महदिन्द्रायेन्दो परि स्रव.. (१)
शत्रुनाशक इंद्र शर्यणावत नामक तालाब में सोम को पिएं एवं आत्मविश्वासी व महान्
शक्तिशाली बनें. हे सोम! तुम इंद्र के लिए रस टपकाओ. (१)
आ पवस्व दिशां पत आर्जीकात्सोम मीढ्वः.
ऋतवाकेन सत्येन श्रद्धया तपसा सुत इन्द्रायेन्दो परि स्रव.. (२)
हे दिशाओं के स्वामी एवं अभिलाषापूरक सोम! तुम ऋजीक देश से आकर रस
बरसाओ. तुम्हें शुद्ध एवं सच्चे स्तुतिवचनों व श्रद्धा तथा तप के द्वारा निचोड़ा जाता है. हे
सोम! तुम इंद्र के लिए रस बरसाओ. (२)
पर्जन्यवृद्धं महिषं तं सूर्यस्य दुहिताभरत्.
तं गन्धर्वाः प्रत्यगृह्णन्तं सोमे रसमादधुरिन्द्रायेन्दो परि स्रव.. (३)
श्रद्धा नामक सूर्यपुत्री मेघ के समान समृद्ध और महान् सोम को स्वर्ग से लाई थी. गंधर्वों
ने उस सोम को पकड़कर उस में रस डाला. हे सोम! तुम इंद्र के लिए रस टपकाओ. (३)
ऋतं वदन्नृतद्युम्न सत्यं वदन्सत्यकर्मन्.
श्रद्धां वदन्त्सोम राजन्धात्रा सोम परिष्कृत इन्द्रायेन्दो परि स्रव.. (४)
हे सच्चे यश वाले, यथार्थ कर्म करने वाले, निचुड़ते हुए व सबके स्वामी सोम! तुम यज्ञ,
सत्य और श्रद्धा का उच्चारण करते हुए देवपोषक यजमान के द्वारा अलंकृत होकर इंद्र के
लिए रस नीचे गिराते हो. (४)
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