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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1533 of 1855

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Page 1533

स वीरो दक्षसाधनो वि यस्तस्तम्भ रोदसी.
हरिः पवित्रे अव्यत वेश न योनिमासदम्.. (१५)
शक्ति के साधन वे सोम वीर हैं एवं अपने तेज से द्यावा-पृथिवी को ढकते हैं. यज्ञ करने
वाला यजमान जिस प्रकार अपने घर में बैठता है, उसी प्रकार हरे रंग वाले सोम अपने कलश
में बैठते हैं. (१५)
अव्यो वारेभिः पवते सोमो गव्ये अधि त्वचि.
कनिक्रदद्वृषा हरिरिन्द्रस्याभ्येति निष्कृतम्.. (१६)
सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र से छनते हैं. अभिलाषापूरक एवं हरे रंग वाले सोम
शब्द करते हुए इंद्र के उत्तम स्थान को जाते हैं. (१६)
सूक्त—१०२ देवता—पवमान सोम
क्राणा शिशुर्म्हीनां हिन्वन्नृतस्य दीधितिम्. विश्वा परि प्रिया भुवदध द्विता.. (१)
यज्ञ करते हुए एवं महान् जलों के पुत्र सोम यज्ञ के प्रकाशक रस को बहाते हुए सभी
प्रिय हव्यों को व्याप्त करते हैं तथा द्यावा-पृथिवी में वर्तमान हैं. (१)
उप त्रितस्य पाष्यो३रभक्त यद् गुहा पदम्. यज्ञस्य सप्त धामभिरध प्रियम्.. (२)
मुझ त्रित के यज्ञ की गुफा में वर्तमान एवं पत्थर के समान दृढ़ रस निचोड़ने के तख्तों
पर पहुंचे ऋत्विज् यज्ञ धारण करने वाले गायत्री आदि सात छंदों द्वारा सोम की स्तुति करते
हैं. (२)
त्रीणि त्रितस्य धारया पृष्टेष्वेरया रयिम्. मिमीते अस्य योजना वि सुक्रतुः.. (३)
हे सोम! मुझ त्रित के तीनों सवनों में धारा के रूप में बही एवं सामगीत के गान के
समय धनदाता इंद्र को ले आओ. शोभन वृद्धि वाला स्तोता इंद्र को प्राप्त होने वाले स्तोत्र
बोलता है. (३)
जज्ञानं सप्त मातरो वेधामशासत श्रिये. अयं ध्रुवो रयीणां चिकेत यत्.. (४)
माता के समान सात गायत्री आदि छंद उत्पन्न एवं यज्ञधारक सोम की प्रशंसा यजमानों
के ऐश्वर्य के लिए करते हैं, क्योंकि सोम धन के निश्चित जानने वाले हैं. (४)
अस्य व्रते सजोषसो विश्वे देवासो अद्रुहः. स्पार्हा भवन्ति रन्तयो जुषन्त यत्.. (५)
सब देव शत्रुरहित होकर सोम के यज्ञ में मिलते हैं एवं अभिलाषा के योग्य बनते हैं.
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