ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextतुम इंद्र के पीने के लिए अपना रस बहाओ. (१५)
इन्द्रस्य हार्दि सोमधानमा विश समुद्रमिव सिन्धवः.
जुष्टो मित्राय वरुणाय वायवे दिवो विष्टम्भ उत्तमः.. (१६)
हे मित्र, वरुण और वायु के लिए पर्याप्त, स्वर्ग के धारणकर्त्ता, उत्तम एवं इंद्र के प्रिय
सोम! नदियां जिस प्रकार सागर में प्रवेश करती हैं, उसी प्रकार तुम द्रोणकलश में प्रवेश करो.
(१६)
सूक्त—१०९ देवता—पवमान सोम
परि प्र धन्वेन्द्राय सोम स्वादुर्मित्राय पूष्णे भगाय.. (१)
हे स्वादिष्ट सोम! तुम इंद्र, मित्र, वरुण, पूषा और भग नामक देवों के लिए पात्रों में
टपको. (१)
इन्द्रस्ते सोम सुतस्य पेयाः क्रत्वे दक्षाय विश्वे च देवाः.. (२)
हे निचोड़े हुए सोम! इंद्र ज्ञान और बल पाने के लिए तुम्हारा रस पिएं. सारे देव तुम्हारा
रस पिएं. (२)
एवामृताय महे क्षयाय स शुक्रो अर्ष दिव्यः पीयूषः.. (३)
हे दीप्तिशाली, दिव्य एवं देवों के पीने योग्य सोम! तुम हमें अमर बनाने एवं विशाल घर
देने के लिए छनो. (३)
पवस्व सोम महान्त्समुद्रः पिता देवानां विश्वाभि धाम.. (४)
हे महान्, रस बहाने वाले एवं सबके पालक सोम! तुम देवों के सभी शरीरों को लक्ष्य
करके शुद्ध बनो. (४)
शुक्रः पवस्व देवेभ्यः सोम दिवे पृथिव्यै शं च प्रजायै.. (५)
हे सोम! तुम दीप्तिशाली बनकर देवों के लिए छनो तथा द्यावा-पृथिवी और प्रजा को
सुख दो. (५)
दिवो धर्तासि शुक्रः पीयूषः सत्ये विधर्मन्वाजी पवस्व.. (६)
हे दीप्तिशाली, पीने योग्य, स्वर्गलोक के धारणकर्त्ता एवं शक्तिशाली सोम! तुम इस
सच्चे यज्ञ में टपको. (६)
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