ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—१३ देवता—इंद्र
हे इंद्र! मुझे शोभन शक्ति, सुंदर घोड़े एवं अच्छी गाएं दो. मैंने ज्ञान पाने के लिए यज्ञ में
होता के समान पहले ही स्तुति की थी. (३३)
सूक्त—१३ देवता—इंद्र
इन्द्रः सुतेषु सोमेषु क्रतुं पुनीत उक्थ्यम्. विदे वृधस्य दक्षसो महान्हि षः.. (१)
इंद्र सोमरस निचूड़ जाने पर यज्ञ करने वाले एवं स्तोता को पवित्र करते हैं एवं बढ़े हुए
बल के लाभ के लिए महान् हुए हैं. (१)
स प्रथमे व्योमनि देवानां सदने वृधः. सुपारः सुश्रवस्तमः समप्सुजित्.. (२)
वे इंद्र विस्तृत व्योमरूप देवस्थान में देवों को बढ़ाते हैं. इंद्र यज्ञकर्म पूरा करने वाले,
शोभन यश वाले एवं जल पीने के लिए वृत्र के विजेता हैं. (२)
तमह्वे वाजसातय इन्द्रं भराय शुष्मिणम्. भवा नः सुम्ने अन्तमः सखा वृधे.. (३)
मैं अन्नप्राप्ति के हेतु होने वाले संग्राम में सहायता के लिए शक्तिशाली इंद्र को बुलाता हूं.
हे इंद्र! तुम हमारा इच्छित धन बढ़ाने के लिए हमारे मित्र बनो. (३)
इयं त इन्द्र गिर्वणो रातिः क्षरति सुन्वतः. मन्दानो अस्य बर्हिषो वि राजसि.. (४)
हे स्तुतियों द्वारा सेवा करने योग्य इंद्र! सोमरस निचोड़ने वाले यजमान की यह आहुति
तुम्हें प्राप्त होती है. तुम प्रसन्न होकर इस यज्ञ में विराजो. (४)
नूनं तदिन्द्र दद्धि नो यत्त्वा सुन्वन्त ईमहे. रयिं नश्चित्रामा भरा स्वर्विदम्.. (५)
हे इंद्र! सोमरस निचोड़ने वाले हम जिस धन की अभिलाषा करते हैं, वह हमें दो. तुम
हमें स्वर्ग देने वाला विचित्र धन दो. (५)
स्तोता यत्ते विचर्षणििरति प्रशर्धयद्गिरः. वया इवानु रोहते जुषन्त यत्.. (६)
हे इंद्र! विशेषरूप से देखने वाले स्तोता जिस समय तुम्हारे प्रति शत्रुओं को हराने में
समर्थ स्तुतियां करते हैं एवं उनके द्वारा तुम्हें प्रसन्न करते हैं, उस समय तुम में सभी गुण इस
प्रकार आ जाते हैं जैसे एक वृक्ष में बहुत सी शाखाएं होती हैं. (६)
प्रत्नवज्जनया गिरः शृणुधी जरितुह्र्वम्. मदेमदे ववक्षिथा सुकृत्वने.. (७)
हे इंद्र! तुम पहले के समान स्तोताओं द्वारा स्तुतियां उत्पन्न कराओ एवं स्तोताओं की
पुकार सुनो. तुम सोमरस द्वारा प्रसन्नता प्राप्त करके शोभन कर्म करने वाले यजमान को
मनचाहा फल देते हो. (७)
ebook converter DEMO Watermarks*
क्रीळन्त्यस्य सूनृता आपो न प्रवता यतीः. अया धिया य उच्यते पतिर्दिवः.. (८)
इंद्र की सच्ची बातें नीचे की ओर बहने वाली जलधारा के समान विहार करती हैं. हमारी
इस स्तुति द्वारा स्वर्ग के स्वामी की प्रशंसा होती है. (८)
उतो पतिर्य उच्यते कृष्टीनामेक इद्वशी. नमोवृधैरवस्युभिः सुते रण.. (९)
वश में करने वाले एकमात्र इंद्र ही मनुष्यों का पालन करने वाले कहे गए हैं. हे इंद्र! तुम
स्तुतियों द्वारा बढ़ने वालों एवं रक्षा के इच्छुक लोगों के साथ सोमरस पीकर प्रसन्न बनो. (९)
स्तुहि श्रुतं विपश्चितं हरी यस्य प्रसक्षिणा. गन्तारा दाशुषो गृहं नमस्विनः.. (१०)
हे स्तोता! विद्वान् एवं प्रसिद्ध इंद्र की स्तुति करो. उनके दोनों शत्रुविजयी घोड़े हव्यदाता
यजमान के घर जाने वाले हैं. (१०)
तूतुजानो महेमतेऽश्वेभिः पृषितप्सुभिः. आ याहि यज्ञमाशुभिः शमिद्धि ते.. (११)
हे महाफल देने वाली बुद्धि से युक्त इंद्र! तुम शीघ्र चलने वाले एवं चिकने घोड़े के साथ
यज्ञ में आओ. उस यज्ञ में तुम्हें सुख मिलता है. (११)
इन्द्र शविष्ठ सत्पते रयिं गृणत्सु धारय. श्रवः सूरिभ्यो अमृतं वसुत्वनम्.. (१२)
हे शक्तिशालियों में श्रेष्ठ एवं सज्जनों के पालक इंद्र! हम स्तुति करने वालों को धन दो
एवं स्तोताओं को मरणरहित तथा व्यापक यश दो. (१२)
हवे त्वा सूर उदिते हवे मध्यन्दिने दिवः. जुषाण इन्द्र सप्तिभिर्न आ गहि.. (१३)
हे इंद्र! मैं तुम्हें सूर्य निकलने पर एवं दोपहर के समय बुलाता हूं. तुम प्रसन्न होकर अपने
तेज चलने वाले घोड़ों के द्वारा आओ. (१३)
आ तू गहि प्र तु द्रव मत्स्वा सुतस्य गोमतः. तन्तुं तनुष्व पूर्व्य यथा विदे.. (१४)
हे इंद्र! शीघ्र आओ एवं यज्ञ में जाओ. वहां गाय के दूध से मिले हुए सोमरस से प्रसन्न
बनो. तुम पूर्वजों द्वारा किए हुए यज्ञ को उसी प्रकार बढ़ाओ, जिस प्रकार मैं जानता हूं. (१४)
यच्छक्रासि परावति यदर्वावति वृत्रहन्. यद्वा समुद्रे अन्धसोऽवितेदसि.. (१५)
हे शक्तिशाली एवं वृत्रहंता इंद्र! तुम चाहे दूरवर्ती स्थान में होओ, चाहे समीपवर्ती स्थान
में होओ, चाहे सागर में होओ, सब स्थानों से आओ एवं सोमरस पीकर प्रसन्न बनो. (१५)
इन्द्रं वर्धन्तु नो गिर इन्द्रं सुतास इन्दवः. इन्द्रे हविष्मतीर्विशो अराणिषुः.. (१६)
हमारी स्तुतियां एवं निचोड़े हुए सोमरस इंद्र को बढ़ावें. हव्य धारण करने वाली प्रजाएं
ebook converter DEMO Watermarks*
इंद्र के प्रति श्रद्धा रखती हैं. (१६)
तमिद्धिप्रा अवस्यवः प्रवत्वतीभिरूतिभिः. इन्द्रं क्षोणीरवर्धयन्वया इव.. (१७)
बुद्धिमान् एवं रक्षा चाहने वाले स्तोता इंद्र को तृप्त करने वाली स्तुतियों द्वारा बढ़ाते हैं.
सब लोक वृक्ष की शाखाओं के समान इंद्र के अधीन होकर उन्हें बढ़ाते हैं. (१७)
त्रिकद्रुकेषु चेतनं देवासो यज्ञमतनत. तमिद्वर्धन्तु नो गिरः सदावृधम्.. (१८)
देवों ने त्रिकद्रुक नाम के यज्ञ में चैतन्य करने वाले इंद्र को यज्ञ के योग्य बनाया था. सदा
बढ़ने वाले इंद्र को हमारी स्तुतियां बढ़ावें. (१८)
स्तोता यत्ते अनुव्रत उक्थान्यृतुथा दधे. शुचिः पावक उच्यते सो अद्भुत:.. (१९)
हे इंद्र! तुम्हारा स्तोता प्रत्येक ऋतु के अनुसार अनुकूल कर्म करता हुआ उक्थों को
बोलता है. शुद्ध, पवित्र करने वाले एवं आश्चर्यजनक तुम स्तुति का विषय बनते हो. (१९)
तदिद्रुद्रस्य चेतति यह्वं प्रत्नेषु धामसु. मनो यत्रा वि तद्दधुर्विचेतसः.. (२०)
वे ही रुद्रपुत्र मरुत् अपने पुराने स्थानों में वर्तमान हैं, जिनकी स्तुति विशेष ज्ञान वाले
स्तोता करते हैं. (२०)
यदि मे सख्यामावर इमस्य पाह्यन्धसः. येन विश्वा अति द्विषो अतारिम.. (२१)
हे इंद्र! यदि तुम मुझे अपनी मित्रता दो एवं इस सोमरस को पिओ, मैं सभी शत्रुओं को
हरा सकता हूं. (२१)
कदा त इन्द्र गिर्वणः स्तोता भवाति शन्तमः. कदा नो गव्ये अश्व्ये वसौ दधः.. (२२)
हे स्तुतियां स्वीकार करने वाले इंद्र! तुम्हारा स्तोता कब अतिशय सुखी होगा? तुम हमें
कब गायों एवं अश्वों वाले घर में रखोगे. (२२)
उत ते सुष्टुता हरी वृषणा वहतो रथम्. अजुर्यस्य मदिन्तमं यमीमहे.. (२३)
हे जरारहित इंद्र! तुम्हारे भली प्रकार स्तुत एवं अभिलाषापूरक घोड़े तुम्हारे रथ को यहां
लावें. हे अतिशय प्रसन्न इंद्र! हम तुमसे याचना करते हैं. (२३)
तमीमहे पुरुष्टुतं यह्वं प्रत्नाभिरूतिभिः. नि बर्हिषि प्रिये सददध द्विता.. (२४)
महान् एवं बहुतों द्वारा स्तुत इंद्र से हम प्राचीन सोमाहुतियों द्वारा याचना करते हैं. वे
प्रिय कुश पर बैठें एवं दो प्रकार का हव्य स्वीकार करें. (२४)
वर्धस्वा सु पुरुष्टुत ऋषिष्टुताभिरूतिभिः. धुक्षस्व पिप्युषीमिषमवा च नः.. (२५)
ebook converter DEMO Watermarks*
हे बहुतों द्वारा स्तुत इंद्र! तुम ऋषियों द्वारा प्रशंसित अपने रक्षासाधनों द्वारा हमें बढ़ाओ
एवं हमें उन्नतिशील अन्न दो. (२५)
इन्द्र त्वमवितेदसीत्था स्तुवतो अद्रिवः. ऋतादियर्मि ते धियं मनोयुजम्.. (२६)
हे वज्रधारणकर्त्ता इंद्र! तुम सब प्रकार स्तोता की रक्षा करते हो. तुम्हारे सच्चे स्तोत्र के
द्वारा मैं तुम्हारी दया प्राप्त करता हूं. (२६)
इह त्या सधमाद्या युजानः सोमपीतये. हरी इन्द्र प्रतद्वसू अभि स्वर.. (२७)
हे इंद्र! तुम अपने प्रसिद्ध, सम्मिलित रूप से प्रसन्न एवं विस्तृत धन वाले घोड़ों को रथ
में जोड़ कर इस यज्ञ में सोमरस पीने के लिए आओ. (२७)
अभि स्वरन्तु ये तव रुद्रासः सक्षत श्रियम्. उतो मरुत्वतीर्विशो अभि प्रयः..(२८)
हे इंद्र! तुम्हारे अनुचर रुद्रपुत्र मरुद्गण इस आश्रययोग्य यज्ञ में प्राप्त हों एवं मरुतों से
युक्त प्रजाएं भी हमारे हव्य को प्राप्त करें. (२८)
इमा अस्य प्रतूर्तयः पदं जुषन्त यद्दिवि. नाभा यज्ञस्य सं दधुर्यथा विदे.. (२९)
इंद्र की ये मरुत्रूपी प्रजाएं शत्रुओं का नाश करती हुई अपने आश्रयस्थल स्वर्गलोक
की सेवा करती हैं एवं यज्ञ की नाभिरूपिणी उत्तरवेदी पर इस प्रकार स्थित रहती हैं कि हम
धन पा सकें. (२९)
अयं दीर्घाय चक्षसे प्राचि प्रयत्यध्वरे. मिमीते यज्ञमानुषग्विचक्ष्य.. (३०)
इंद्र प्राचीन यज्ञशाला में यज्ञ आरंभ होने पर उसे पूर्वापररूप से देखकर इस प्रकार पूर्ण
करते हैं, जिससे देखने योग्य फल मिल सके. (३०)
वृषायमिन्द्र ते रथ उतो ते वृषणा हरी. वृषा त्वं शतक्रतो वृषा हवः.. (३१)
हे इंद्र! तुम्हारा यह रथ अभिलाषापूरक है तथा तुम्हारे घोड़े की कामना पूरी करने वाले
हैं. हे शतक्रतु इंद्र! तुम एवं तुम्हारे आह्वान दोनों ही अभिलाषापूरक हों. (३१)
वृषा ग्रावा वृषा मदो वृषा सोमो अयं सुतः. वृषा यज्ञो यमिन्वसि वृषा हवः.. (३२)
हे इंद्र! सोमलता कूटने वाले पत्थर, सोमरस का नशा व निचोड़ा हुआ सोम
अभिलाषापूरक हैं. जिस यज्ञ में तुम प्राप्त होते हो, वह कामना पूरी करने वाला है. तुम्हारा
आह्वान इच्छापूरक है. (३२)
वृषा त्वा वृषणं हुवे वज्रिञ्चित्राभिरूतिभिः. वावन्थ हि प्रतिष्टुतिं वृषा हवः.. (३३)