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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सूक्त—७२ देवता—विश्वेदेव

है. तुम इसे पिओ, क्योंकि तुम इसके स्वामी हो. (८)
यं ते श्येनः पदाभरत्तिरो रजांस्यस्पृतम्. पिबेदस्य त्वमीशिषे.. (९)
हे इंद्र! बाज पक्षी का रूप धारण करने वाली गायत्री अंतरिक्ष के रक्षकों का तिरस्कार
करके शत्रुओं द्वारा न छुए गए जिस सोमरस को पैरों द्वारा लाई थी, उसे तुम पिओ, क्योंकि
तुम उसके स्वामी हो. (९)
सूक्त—७२ देवता—विश्वेदेव
देवानामिदवो महत्तदा वृणीमहे वयम्. वृष्णामस्मभ्यमूतये.. (१)
हे अभिलाषापूरक देवो! हम अपने यज्ञ के उद्देश्य से तुम्हारी विशाल रक्षा पाने के लिए
प्रार्थना करते हैं. (१)
ते नः सन्तु युजः सदा वरुणो मित्रो अर्यमा. वृधासश्च प्रचेतसः.. (२)
हे देवो! शोभन स्तुति वाले एवं हमारे धनवर्धक वरुण, मित्र एवं अर्यमा हमारे सहायक
हों. (२)
अति नो विष्विता पुरु नौभिरपो न पर्षथ. यूयमृतस्य रथ्यः.. (३)
हे यज्ञ के नेता देवो! जिस प्रकार नाव जल के पार ले जाती है, उसी प्रकार तुम हमें
विशाल शत्रुसेना के पार ले जाओ. (३)
वामं नो अस्त्वर्यमन्वामं वरुण शंस्यम्. वामं ह्यावृणीमहे.. (४)
हे अर्यमा देव! हमें अपनाने योग्य धन दो. हे वरुण! हमारे पास सबके द्वारा प्रशंसा
करने योग्य धन हो. हम तुमसे धन मांगते हैं. (४)
वामस्य हि प्रचेतस ईशानासो रिशादसः. नेमादित्या अघस्य यत्.. (५)
हे उत्तम ज्ञान वाले एवं शत्रुओं को भगाने वाले देवों! तुम उत्तम धन के स्वामी हो. हे
आदित्यो! वह धन हमारे पास न आए जो पाप द्वारा कमाया गया हो. (५)
वयमिद्वः सुदानवः क्षियन्तो यान्तो अध्वन्ना. देवा वृधाय हुमहे.. (६)
हे शोभनदान वाले देवो! हम चाहे अग्निहोत्र हेतु घर में रहते हों अथवा समिधाएं लाने
हेतु मार्ग में हों, हम तुम्हें हव्य द्वारा बढ़ने के लिए बुलाते हैं. (६)
अधि न इन्द्रैषां विष्णो सजात्यानाम्. इता मरुतो अश्विना.. (७)
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हे इंद्र! विष्णु, मरुद्गण एवं अश्विनीकुमारो! समान जाति वाले लोगों में तुम हमारे ही
पास आओ. (७)
प्र भ्रातृत्वं सुदानवोऽध द्विता समान्या. मातुर्गर्भे भरामहे.. (८)
हे शोभनदान वाले देवो! हम समानरूप से तुम्हारी माता के गर्भ से दो-दो के रूप में
उत्पन्न होना प्रकट करेंगे. इसके बाद आपकी बंधुता सिद्ध करेंगे. (८)
यूयं हि ष्ठा सुदानव इन्द्रज्येष्ठा अभिद्यवः. अधा चिद्ध उत ब्रुवे.. (९)
हे शोभनदान वाले एवं दीप्तिशाली देवो! इंद्र तुम में बड़े हैं. तुम मेरे यज्ञ में बैठो. मैं
तुम्हारी बार-बार स्तुति करता हूं. (९)
सूक्त—७३ देवता—अग्नि
प्रेष्ठं वो अतिथिं स्तुषे मित्रमिव प्रियम्. अग्निं रथं न वेद्यम्.. (१)
हे यजमानो! मैं तुम्हारे प्रियतम, अतिथि तथा रथ के समान धनवाहक अग्नि की स्तुति
करता हूं. (१)
कविमिव प्रचेतसं यं देवासो अध द्विता. नि मर्त्येष्वादधुः.. (२)
इंद्र आदि देवों ने मनुष्यों में जिस अग्नि को दो रूप से स्थापित किया है एवं जो प्रकृष्ट
ज्ञानी पुरुष के समान हैं, उन अग्नि की मैं स्तुति करता हूं. (२)
त्वं यविष्ठ दाशुषो नँः पाहि शृणुधी गिरः. रक्षा तोकमुत त्मना.. (३)
हे अतिशय युवा अग्नि! तुम हव्य देने वाले यजमानों का पालन करो. हमारी स्तुतियां
सुनो और स्वयं ही हमारी संतान की रक्षा करो. (३)
कया ते अग्ने अङ्गिर ऊर्जो नपादुपस्तुतिम्. वराय देव मन्यवे.. (४)
हे सर्वत्र गतिशील एवं शक्ति के पुत्र अग्नि! तुम सबके वरण करने योग्य एवं शत्रुओं का
अपमान करने वाले हो. मैं किस स्तोत्र द्वारा तुम्हारी स्तुति करूं. (४)
दाशेम कस्य मनसा यज्ञस्य सहसो यहो. कदु वोच इदं नमः.. (५)
हे बल के पुत्र अग्नि! हम किस प्रकार यजमान के मन के अनुकूल हव्य तुम्हें दें? मैं यह
नमस्कार कब बोलूं? (५)
अधा त्वं हि नस्करो विश्वा अस्मभ्यं सुक्षितीः. वाजद्रविणसो गिरः.. (६)
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हे अग्नि! तुम ही हमारी स्तुतियां सुनकर हमें उत्तम धन, घर एवं अन्न प्रदान करो. (६)
कस्य नूनं परीणसो धियो जिन्वसि दम्पते. गोषाता यस्य ते गिरः.. (७)
हे गार्हपत्य अग्नि! तुम इस समय किसके विचित्र यज्ञकर्मों से प्रसन्न होते हो? तुम्हारी
स्तुतियां गायों का लाभ कराने वाली होती हैं. (७)
तं मर्जयन्त सुक्रतुं पुरोयावानमाजिषु. स्वेषु क्षयेषु वाजिनम्.. (८)
यजमान अपनी यज्ञशालाओं में शोभन बुद्धि वाले, युद्धों में आगे चलने वाले एवं
शक्तिशाली अग्नि की पूजा करते हैं. (८)
क्षेति क्षेमेभिः साधुभिर्नकिर्यं घ्नन्ति हन्ति यः. अग्ने सुवीर एधते.. (९)
हे अग्नि! जो व्यक्ति उत्तम रक्षासाधनों के साथ अपने घर में रहता है, उसे कोई नहीं
मारता. जो अपने शत्रुओं को स्वयं मारता है, वह शोभन संतान के साथ बढ़ता है. (९)
सूक्त—७४ देवता—अश्विनीकुमार
आ मे हवं नासत्याश्विना गच्छतं युवम्. मध्वः सोमस्य पीतये.. (१)
सत्यस्वरूप अश्विनीकुमारो! तुम मेरी पुकार सुनकर मधुर सोमरस पीने के लिए मेरे यज्ञ
में आओ. (१)
इमं मे स्तोममश्विनेमं मे शृणुतं हवम्. मध्वः सोमस्य पीतये.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! मधुर सोमरस पीने के लिए मेरी इन स्तुतियों एवं पुकार को सुनो.
(२)
अयं वां कृष्णो अश्विना हवते वाजिनीवसू. मध्वः सोमस्य पीतये.. (३)
हे अन्नयुक्त धन के स्वामी अश्विनीकुमारो! यह कृष्ण नामक ऋषि मधुर सोमरस पीने के
लिए तुम्हें बुलाता है. (३)
शृणुतं जरितुर्हवं कृष्णस्य स्तुवतो नरा. मध्वः सोमस्य पीतये.. (४)
हे नेता अश्विनीकुमारो! स्तुति करने वाले कृष्ण ऋषि की पुकार सुनो और मधुर सोमरस
पीने के लिए आओ. (४)
छर्दैर्यन्तमदाभ्यं विप्राय स्तुवते नरा. मध्वः सोमस्य पीतये.. (५)
हे नेता अश्विनीकुमारो! स्तुति करने वाले ब्राह्मण कृष्ण के लिए शत्रुओं की हिंसा से
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रहित घर दो एवं सोमरस पीने के लिए आओ. (५)
गच्छतं दाशुषो गृहमित्था स्तुवतो अश्विना. मध्वः सोमस्य पीतये.. (६)
हे अश्विनीकुमारो! इस प्रकार स्तुति करते हुए स्तोता के घर तुम मधुर सोमरस पीने के
लिए जाओ. (६)
युञ्जाथां रासभं रथे वीळ्वङ्गे वृषण्वसू. मध्वः सोमस्य पीतये.. (७)
हे अभिलाषापूरक धन वाले अश्विनीकुमारो! मधुर सोमरस पीने के लिए दृढ़ अंगों वाले
अपने रथ में गधों को जोड़ो. (७)
त्रिवन्धुरेण त्रिवृता रथेना यातमश्विना. मध्वः सोमस्य पीतये.. (८)
हे अश्विनीकुमारो! मधुर सोमरस पीने के लिए तीन वंधुराओं तथा तीन कोनों वाले रथ
की सहायता से आओ. (८)
नू मे गिरो नासत्याश्विना प्रावतं युवम्. मध्वः सोमस्य पीतये.. (९)
हे सत्यस्वरूप अश्विनीकुमारो! तुम मधुर सोमरस पीने के लिए मेरे स्तुतिवचनों की ओर
जल्दी आओ. (९)
सूक्त—७५ देवता—अश्विनीकुमार
उभा हि दस्रा भिषजा मयोभुवोभा दक्षस्य वचसो बभूवथुः.
ता वां विश्वको हवते तनूकृथे मा नो वि यौष्टं सख्या मुमोचतम्.. (१)
हे दर्शनीय देवों के वैद्य एवं सुख देने वाले अश्विनीकुमारो! तुम लोग दक्ष द्वारा की गई
उपस्थिति के समय उपस्थित थे. मैं विश्वक नामक ऋषि तुम्हें संतानप्राप्ति के उद्देश्य से
बुलाता हूं. हम ऋषियों और स्तोताओं की मित्रता मत तोड़ना. तुम अपने घोड़े यहां आकर
रथ से अलग करो. (१)
कथा नूनं वां विमना उ स्तवद्युवं धियं ददथुर्वस्य इष्टये.
ता वां विश्वको हवते तनूकृथे मा नो वि यौष्टंसख्या मुमोचतम्.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! विमना नामक ऋषि ने किस प्रकार तुम्हारी स्तुति की थी, कि तुमने
उसे धन देने के लिए अपने मन में निश्चय किया? उसी प्रकार मैं विश्वक ऋषि तुम्हें बुलाता हूं.
हमारी मित्रता न छूटे. यहां आकर तुम अपने घोड़ों की लगाम अलग करो. (२)
युवं हि ष्मा पुरुभुजेममेधतुं विष्णाप्वे ददथुर्वस्य इष्टये.
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ता वां विश्वको हवते तनूकृथे मा नो वि यौष्टं सख्या मुमोचतम्.. (३)
हे बहुतों का पालन करने वाले अश्विनीकुमारो! मेरे पुत्र विष्णापु को धन देने की इच्छा
से तुमने धन दिया था. मैं अश्वक ऋषि संतान पाने के उद्देश्य से तुम्हें बुलाता हूं. हमारी मित्रता
नष्ट मत करना. तुम यहां आकर अपने घोड़ों की लगाम अलग करो. (३)
उत त्यं वीरं धनसामृजीषिणं दूरे चित्सन्तमवसे हवामहे.
यस्य स्वादिष्ठा सुमतिः पितुर्यथा मा नो वि यौष्टं सख्या मुमोचतम्.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! हम वीर, धन का उपभोग करने वाले, ऋजीश युक्त एवं दूरस्थित
विष्णापु को बुलाते हैं. उसकी स्तुति भी मुझ पिता के समान ही सरस है. हमारी मित्रता को
अलग मत करो. तुम यहां आकर अपने घोड़ों की लगाम अलग करो. (४)
ऋतेन देवः सविता शमायत ऋतस्य शृङ्गमूर्विया वि पप्रथे.
ऋतं सासाह महि चित्पृतन्यतो मा नो वि यौष्टं सख्या मुमोचतम्.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! सत्य के द्वारा सूर्य अपनी किरणें शांत करते हैं. उसके बाद वे सत्य
के सींग के समान अपनी किरणों का विस्तार करते हैं. सूर्य युद्ध करने वाले शत्रुओं को
वास्तव में पराजित करते हैं. हमारी मित्रता अलग न हो. तुम यहां आकर अपने घोड़ो की
लगाम अलग करो. (५)
सूक्त—७६ देवता—अश्विनीकुमार
द्युम्नी वां स्तोमो अश्विना क्रिविर्न सेक आ गतम्.
मध्वः सुतस्य स दिवि प्रियो नरा पातं गौराविवेरिणे.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! द्युम्नीक तुम्हारा स्तोता है. वर्षा ऋतु में जिस प्रकार कुएं का पानी
पास आ जाता है, उसी प्रकार तुम आओ. हे नेताओ! यह स्तोता दीप्तिशाली यज्ञ में नशीले
सोमरस को प्रिय समझता है. गौर मृग जिस प्रकार तालाब में पानी पीता है, उसी प्रकार तुम
सोमरस पिओ. (१)
पिबतं घर्मं मधुमन्तमश्विना बर्हिः सीदतं नरा.
ता मन्दसाना मनुषो दुरोण आ नि पातं वेदसा वयः.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! मधुर एवं पात्रों में टपकने वाले सोमरस को पिओ. हे नेताओ! यज्ञ
के कुशों पर बैठो. तुम यजमान की यज्ञशाला में प्रसन्न होकर पुरोडाश आदि के साथ सोमरस
पिओ. (२)
आ वां विश्वाभिरूतिभिः प्रियमैधा अहूषत.
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ता वर्तयातमुप वृक्तबर्हिषो जुष्टं यज्ञं दिविष्टुषु.. (३)
हे अश्विनीकुमारो! यज्ञ को प्रेम करने वाला यजमान तुम्हें समस्त रक्षासाधनों के साथ
बुलाता है. कुश बिछाने वाले यजमान का जो हव्य सब देव स्वीकार करते हैं, उसे स्वीकार
करने के लिए तुम प्रातःकाल आओ. (३)
पिबतं सोमं मधुमन्तमश्विना बर्हिः सीदतं सुमत्.
ता वावृधाना उप सुष्टुतिं दिवो गन्तं गौराविवेरिणम्.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! मधुर सोमरस पिओ एवं शोभन कुशों पर बैठो. गौर मृग जिस प्रकार
पानी पीने के लिए तालाब पर आते हैं, उसी प्रकार तुम बढ़कर हमारी स्तुति की ओर आओ.
(४)
आ नूनं यातमश्विनाश्वेभिः प्रुषितप्सुभिः.
दस्रा हिरण्यवर्तनी शुभस्पती पातं सोममृतावृधा.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! तुम दीप्तिशाली रूपवाले घोड़ों के साथ यहां आओ. हे दर्शनीय सोने
के रथ वाले, जल के स्वामी एवं यज्ञ की वृद्धि करने वाले अश्विनीकुमारो! सोमरस पिओ. (५)
वयं हि वां हवामहे विपन्यवा विप्रासो वाजसातये.
ता वल्गू दस्रा पुरुदंससा धियाश्विना श्नुष्ट्या गतं.. (६)
हम स्तोता एवं ब्राह्मण लोग अन्न पाने के लिए तुम्हें बुलाते हैं. हे दर्शनीय एवं विविध
कर्मों वाले अश्विनीकुमारो! तुम हमारी स्तुति सुनकर शीघ्र आओ. (६)
सूक्त—७७ देवता—इंद्र
तं वो दस्ममृतीषहं वसोर्मन्दानमन्धसः.
अभि वत्सं न स्वसरेषु धेनव इन्द्रं गीर्भिर्नवामहे.. (१)
हम दर्शनीय, शत्रुओं को पराजित करने वाले, निवासस्थान देने वाले एवं सोमरस पीकर
प्रसन्न बने हुए इंद्र को स्तुतियों द्वारा इस प्रकार बुलाते हैं, जिस प्रकार गाएं गोशाला में इंद्र को
बुलाती हैं. (१)
द्युक्षं सुदानुं तविषीभिरावृतं गिरिं न पुरुभोजसम्.
क्षुमन्तं वाजं शतिनं सहस्रिणं मक्षू गोमन्तममीमहे.. (२)
हम दीप्तिशाली, शोभन-दान वाले, बलों से युक्त तथा पर्वत के समान अनेक लोगों का
पालन करने वाले, इंद्र से बोलने वाले पुत्र-पौत्र, हजारों एवं सैकड़ों धनों से युक्त गाएं एवं अन्न
शीघ्र मांगते हैं. (२)
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न त्वा बृहन्तो अद्रयो वरन्त इन्द्र वीळवः.
यदित्ससि स्तुवते मावते वसु नकिष्टदा मिनाति ते.. (३)
हे इंद्र! विशाल एवं दृढ़ पर्वत भी तुम्हें नहीं रोक पाते. मुझ जैसे स्तोता को तुम जो धन
देना चाहते हो, तुम्हें उससे कोई नहीं रोक सकता. (३)
योद्धासि क्रत्वा शवसोत दंसना विश्वा जाताभि मज्मना.
आ त्वायमर्क ऊतये ववर्त्तति यं गोतमा अजीजनन्.. (४)
हे इंद्र! ज्ञान एवं बल के द्वारा तुम शत्रु का संहार करते हो. तुम अपने कर्म एवं बल से
सभी प्राणियों को हराते हो. तुम्हारी पूजा करने वाला यह स्तोता अपनी रक्षा के निमित्त
तुम्हारी सेवा में लगता है. गौतम वंश के ऋषियों ने तुम्हें अपने यज्ञ में प्रकट किया है. (४)
प्र हि रिरिक्ष ओजसा दिवो अन्तेभ्यस्परि.
न त्वा विव्याच रज इन्द्र पार्थिवमनु स्वधां ववक्षिथ.. (५)
हे इंद्र! तुम अपने बल द्वारा द्युलोक से भी महान् बनते हो. मृत्युलोक तुम्हें व्याप्त नहीं
कर पाता. तुम हमारा हव्य-अन्न वहन करने की इच्छा करो. (५)
नकिः परिष्टिर्मघवन्मघस्य ते यद्दाशुषे दशस्यसि.
अस्माकं बोध्युचथस्य चोदिता मंहिष्ठो वाजसातये.. (६)
हे धनस्वामी इंद्र! तुम हव्यदाता यजमान को जो धन देते हो, उससे तुम्हें कोई नहीं रोक
पाता. तुम अतिशय दानशील एवं धन के प्रेरक बनकर मुझ उचथ्य ऋषि का स्तोत्र सुनो. (६)
सूक्त—७८ देवता—इंद्र
बृहदिन्द्राय गायत मरुतो वृत्रहन्तमम्.
येन ज्योतिरजनयन्नृतावृधो देवं देवाय जागृवि.. (१)
हे मरुतो! इंद्र के लिए पाप नष्ट करने वाले एवं विशाल साममंत्रों का गायन करो.
यज्ञवर्धक देवों ने सामगान के द्वारा इंद्र के लिए दीप्तियुक्त एवं जागरणशील ज्योति के रूप में
सूर्य को बनाया. (१)
अपाधमदभिशस्तीरशस्तिहाथेन्द्रो द्युम्न्याभवत्.
देवास्त इन्द्र सख्याय येमिरे बृहद्दानो मरुद्गण.. (२)
स्तोत्र न करने वाले लोगों को मारने वाले इंद्र ने शत्रुओं द्वारा होने वाली हिंसा दूर की.
इसके पश्चात् इंद्र यशस्वी बने. हे विशाल दीप्तियुक्त एवं मरुतों सहित इंद्र! सभी देवों ने तुम्हें
अपनी मित्रता के लिए पाया. (२)
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