ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
वृत्रं हनति वृत्रहा शतक्रतुर्वज्रेण शतपर्वणा.. (३)
प्र व इन्द्राय बृहते मरुतो ब्रह्मार्चत.
वृत्रं हनति वृत्रहा शतक्रतुर्वज्रेण शतपर्वणा.. (३)
हे मरुतो! महान् इंद्र के लिए स्तोत्र बोलो. शतक्रतु एवं वृत्रहंता इंद्र ने सौ धारों वाले वज्र
से वृत्र असुर का नाश किया. (३)
अभि प्र भर धृषता धृषन्मनः श्रवश्चित्ते असद् बृहत्.
अर्शन्त्वापो जवसा वि मातरो हनो वृत्रं जया स्वः.. (४)
हे शत्रुओं को हराने के लिए दृढ़ निश्चय इंद्र! तुम्हारा अन्न महान् है. दृढ़ हृदय द्वारा वह
धन तुम हमें दो. हमारी माता के समान जल तेजी के साथ भूमियों पर जावे. तुम जल रोकने
वाले वृत्र असुर का नाश करो तथा अपने आपको जीतो. (४)
यज्जायथा अपूर्व्य मघवन्वृत्रहत्याय.
तत्पृथिवीमप्रथयस्तदस्तब्ना उत द्याम्.. (५)
हे अभूतपूर्व एवं धनस्वामी इंद्र! जब वृत्र की हत्या करने के लिए तुमने धरती को दृढ़
एवं द्युलोक को विरुद्ध किया. (५)
तत्ते यज्ञो अजायत तदर्क उत हस्कृतिः.
तद्विश्वमभिभूरसि यज्जातं यच्च जन्त्वम्.. (६)
हे इंद्र! उस समय तुम्हारे लिए यश एवं प्रसन्नतादायक मंत्र उत्पन्न हुए. उस समय तुमने
उत्पन्न एवं भविष्य में जन्म लेने वाले संसार को पराजित किया. (६)
आमासु पक्वमैरय आ सूर्यं रोहयो दिवि.
घर्मं न सामन्तपता सुवृक्तिभिर्जुष्टं गिर्वाणसे बृहत्.. (७)
हे इंद्र! उस समय तुमने कच्ची उम्र वाली गायों को दुधारू बनाया एवं सूर्य को द्युलोक में
चढ़ाया. हे स्तोताओ! साममंत्रों द्वारा जिस प्रकार सोमरस को बढ़ाया जाता है, उसी प्रकार
स्तुतियों द्वारा इंद्र को बढ़ाओ. स्तुति के योग्य इंद्र के लिए विस्तृत एवं प्रीतिकर साममंत्र
गाओ. (७)
सूक्त—७९ देवता—इंद्र
आ नो विश्वासु हव्य इन्द्रः समत्सु भूषतु.
उप ब्रह्माणि सवनानि वृत्रहा परमज्या ऋचीषमः.. (१)
सभी युद्धों में बुलाने योग्य इंद्र हमारी स्तुतियों का अनुभव करें. इंद्र वृत्रनाशक, विशाल
ज्या वाले एवं स्तुतियों द्वारा अभिमुख करने योग्य हैं. (१)
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त्वं दाता प्रथमो राधसामस्यसि सत्य ईशानकृत्.
तुविद्युम्नस्य युज्या वृणीमहे पुत्रस्य शवसो महः.. (२)
हे इंद्र! तुम सबसे मुख्य, धनदाता एवं सत्य हो. तुम स्तोताओं को ऐश्वर्य वाला बनाओ.
हे बहुत धन वाले, बल के पुत्र एवं महान् इंद्र! हम तुम्हारे योग्य धन को वरण करते हैं. (२)
ब्रह्मा त इन्द्र गिर्वणः क्रियन्ते अनतिद्भूता.
इमा जुषस्व हर्यश्व योजनेन्द्र या ते अमन्महि.. (३)
हे स्तुति योग्य एवं हरि नामक अश्वों वाले इंद्र! हम तुम्हारे गुणों से पूर्ण स्तुतियां करते हैं.
वे तुमसे मिलने योग्य हैं. उन्हें तुम स्वीकार करो. हम तुम्हारे लिए जितनी स्तुतियां कर रहे हैं,
उन्हें स्वीकार करो. (३)
त्वं हि सत्यो मघवन्नानतो वृत्रा भूरि न्युब्जसे.
स त्वं शविष्ठ वज्रहस्त दाशुषेऽर्वाञ्चं रयिमा कृधि.. (४)
हे सत्यशील, धनस्वामी एवं किसी से न दबने वाले इंद्र! तुम अनेक राक्षसों का नाश
करते हो. हे हाथ में वज्र धारण करने वाले एवं अतिशय शक्तिशाली इंद्र! तुम हव्यदाता
यजमान को सामने जाने वाला धन दो. (४)
त्वमिन्द्र यशा अस्यूजीषी शवसस्पते.
त्वं वृत्राणि हंस्यप्रतीन्येक इदनुत्ता चर्षणीधृता.. (५)
हे शक्ति के स्वामी एवं ऋषीज के अधिकारी इंद्र! तुम यशस्वी बनो. तुमने अकेले ही
शत्रुओं की हिंसा करने वाले वज्र द्वारा ऐसे राक्षसों को मारा जिन पर न कोई आक्रमण कर
सकता था और न जिन्हें कोई जीत सकता था. (५)
तमु त्वा नूनमसुर प्रचेतसं राधो भागमिवेमहे.
महीव कृत्तिः शरणा त इन्द्र प्र ते सुम्ना नो अश्नवन्.. (६)
हे शक्तिशाली एवं उत्तमज्ञान वाले इंद्र! हम तुमसे पैतृक संपत्ति के समान धन मांगते हैं.
तुम्हारा घर तुम्हारे यश के समान विशालरूप से अंतरिक्ष में स्थित है. तुम्हारे सुख हमें प्राप्त
करें. (६)
सूक्त—८० देवता—इंद्र
कन्या३ वारवायती सोममपि सुताविदत्.
अस्तं भरन्त्यब्रवीदिन्द्राय सुनवै त्वा शक्राय सुनवै त्वा.. (१)
जल की ओर स्नान हेतु जाती हुई कन्या अपाला ने मार्ग में सोमलता प्राप्त की. उसने
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सोमलता को घर लाते समय कहा—"मैं शक्तिशाली इंद्र के लिए तुम्हारा रस निचोड़ती हूं."
(१)
असौ य एषि वीरको गृहंगृहं विचाकशत्.
इमं जम्भसुतं पिब धानावन्तं करम्भिणमपूपवन्तमुक्थिनम्.. (२)
हे वीर एवं दीप्तिशाली इंद्र! तुम सोमरस पीने के लिए सभी घरों में जाते हो. भुने हुए
जौ (सत्तू), पुरोडाश एवं उक्थ मंत्रों से युक्त सोमरस को पिओ जो मैंने अपने दांतों से निचोड़ा
है. (२)
आ चन त्वा चिकित्सामोऽधि चन त्वा नेमसि.
शनैरिव शनकैरिवेन्द्रायेन्दो परि स्रव.. (३)
हे इंद्र! मैं तुम्हें जानना चाहती हूं. इस समय मैं तुम्हें प्राप्त नहीं करती हूं. हे सोम! मेरे
दांतों से दबकर तुम पहले धीरे-धीरे एवं बाद में जोर से बहो. (३)
कुविच्छकत्कुवित्करत्कुविन्नो वस्यसस्करत्.
कुवित्पतिद्विषो यतीरिन्द्रेण सङ्गमामहै.. (४)
वे इंद्र मुझ अपाला को अनेक बार समर्थ करें एवं बहुत बार धनसंपन्न बनावें. त्वचारोग
के कारण पति द्वारा छोड़ी हुई मैं इंद्र से मिलती हूं. (४)
इमानि त्रीणि विष्टपा तानीन्द्र वि रोहय. शिरस्ततस्योर्वरामादिदं म उपोदरे.. (५)
हे इंद्र! मेरे पिता के केशरहित शीश, खेत और मेरे उदर के नीचे वाले स्थान इन तीनों
को उपजाऊ बनाओ. (५)
असौ च या न उर्वरादिमां तन्वं१ मम.
अथो ततस्य यच्छिरः सर्वा ता रोमशा कृधि.. (६)
हे इंद्र! मेरे पिता का जो ऊसर खेत है, मेरे शरीर का जो त्वचादोष के कारण लोमरहित
गोपनीय स्थान है एवं मेरे पिता का जो सिर है, इन में खेत को उपजाऊ एवं शेष दो को बालों
से युक्त बनाओ. (६)
खे रथस्य खेऽनसः खे युगस्य शतक्रतो.
अपालामिन्द्र त्रिष्पूत्वकृणोः सूर्यत्वचम्.. (७)
हे सौ यज्ञों वाले इंद्र! तुमने रथ के बड़े छेद, गाड़ी के मंझोले छेद एवं जुए के छेद से
निकाल कर अपाला की त्वचा को सूर्य के समान प्रभावयुक्त किया. (७)
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