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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

इन्द्रापर्वता बृहता रथेन वामीरिष आ वहतं सुवीराः.

इन्द्रापर्वता बृहता रथेन वामीरिष आ वहतं सुवीराः.
वीतं हव्यान्यध्वरेषु देवा वर्धेथां गीर्भिरिळया मदन्ता.. (१)
हे इंद्र एवं पर्वत! तुम बड़े रथ द्वारा शोभन एवं पुत्र-सहित अन्न लाओ. हे देव! हमारे यज्ञ
में हव्य का भक्षण करो एवं उससे प्रसन्न होकर हमारे स्तुति वचनों द्वारा वृद्धि प्राप्त करो. (१)
तिष्ठा सु कं मघवन्मा परा गाः सोमस्य नु त्वा सुषुतस्य यक्षि.
पितुर्न पुत्रः सिचमा रभे त इन्द्र स्वादिष्ठया गिरा शचीवः.. (२)
हे मघवा! इस यज्ञ में तुम कुछ समय सुखपूर्वक रहो. यहां से जाओ मत. हम भली
प्रकार निचोड़े गए सोम से शीघ्र ही तुम्हारा यज्ञ करते हैं. हे शक्तिशाली इंद्र! पुत्र जिस प्रकार
पिता के वस्त्र का छोर पकड़ लेता है, उसी प्रकार हम मधुर स्तुतियां बोलते हुए तुम्हारा वस्त्र
पकड़ते हैं. (२)
शंसावाध्वर्यो प्रति मे गृणीहीन्द्राय वाहः कृणवाव जुष्टम्.
एदं बर्हिर्यजमानस्य सीदाथा च भूदूक्थमिन्द्राय शस्तम्.. (३)
हे अध्वर्यु! हम दोनों स्तुति करेंगे. तुम मुझे उत्तर दो. हम दोनों इंद्र के लिए प्रिय स्तुतियां
करेंगे. तुम यजमान के कुशों पर बैठो. हम दोनों द्वारा इंद्र के लिए किया गया उक्थ प्रशंसनीय
हो. (३)
जायेदस्तं मघवन्त्सेदु योनिसदित्त्वा युक्ता हरयो वहन्तु.
यदा कदा च सुनवाम सोममग्निष्ट्वा दूतो धन्वात्यच्छ.. (४)
हे मघवा! पत्नी ही घर है एवं वही पुरुष की योनि है. हरि नामक घोड़े तुम्हें उसी
पत्नीयुक्त घर में ले जावें. हम जब कभी सोमरस निचोड़ें, तब तुम्हारा दूत अग्नि तुम्हारे सामने
आ जाए. (४)
परा याहि मघवन्ना च याहीन्द्र भ्रातृभ्यत्रा ते अर्थम्.
यत्रा रथस्य बृहतो निधानं विमोचनं वाजिनो रासभस्य.. (५)
हे धन के स्वामी इंद्र! तुम या तो इस यज्ञ से अपने निवासस्थान पर जाओ अथवा इस
यज्ञ में आओ. हे भरणकर्त्ता इंद्र! दोनों स्थानों पर तुम्हारा प्रयोजन है. वहां जाने के लिए
अपने विशाल रथ पर बैठो तथा यहां रहने के लिए हिनहिनाते हुए घोड़ों को रथ से अलग कर
दो. (५)
अपाः सोममस्तमिन्द्र प्र याहि कल्याणीर्जाया सुरणं गृहे ते.
यत्रा रथस्य बृहतो निधानं विमोचनं वाजिनो दक्षिणावत्.. (६)
हे इंद्र! यहीं ठहर कर सोम पिओ और अपने घर जाओ. तुम्हारे घर में सुंदरी एवं
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कल्याणी पत्नी है. घर जाने के लिए तुम अपने विशाल रथ पर बैठो अथवा यहां ठहरने के
लिए घोड़ों को खोलकर खाने-पीने दो. (६)
इमे भोजा अङ्गिरसो विरूपा दिवस्पुत्रासो असुरस्य वीराः.
विश्वामित्राय ददतो मघानि सहस्रसावे प्र तिरन्त आयुः.. (७)
हे इंद्र! यज्ञ करने वाले ये सुदासवंशी भोज नामक क्षत्रिय, उनके याजक अनेक
अंगिरागोत्रीय ऋषि एवं देवों से बलवान् रुद्र के पुत्र मरुत् इस अश्वमेध यज्ञ में गुरु विश्वामित्र
को महान् धन देते हुए मेरे धन को बढ़ावें. (७)
रूपंरूपं मघवा बोभवीति मायाः कृण्वानस्तन्वं१ परि स्वाम्.
त्रिय॑द्दिवः परि मुहूर्तमागात्स्वैर्मन्त्रैरनृतुपा ऋतावा.. (८)
इंद्र इच्छानुसार रूप बदल लेते हैं. माया करते हुए इंद्र अपने शरीर को नाना प्रकार का
बनाते हैं. सत्ययुक्त होकर भी बिना ऋतु के सोमपान करने वाले इंद्र अपने स्तुति-मंत्रों से
बुलाए जाने पर एक मुहूर्त में स्वर्गलोक से तीनों सवनों के यज्ञों में पहुंच जाते हैं. (८)
महाँ ऋषिर्देवजा देवजूतोऽस्तभ्नात्सिन्धुमर्णवं नृचक्षाः.
विश्वामित्रो यदवहत्सुदाससप्रियायत कुशिकेभिरिन्द्रः.. (९)
महान्, इंद्रियों से परवर्ती अर्थ देखने वाले, उज्ज्वल तेज उत्पन्न करने वाले, तेजों द्वारा
आकृष्ट व मनुष्यों के उपदेशक विश्वामित्र ने जलपूर्ण सरिता को रोक दिया था. जब विश्वामित्र
ने सुदास का यज्ञ कराया, तब इंद्र ने कुशिकगोत्रीय ऋषियों के साथ प्रेम का आचरण किया.
(९)
हंसाइव कृणुथ श्लोकमद्रिभिर्मदन्तो गीर्भिरध्वरे सुते सचा.
देवेभिर्विप्रा ऋषयो नृचक्षसो वि पिबध्वं कुशिकाः सोम्यं मधु.. (१०)
हे विप्रो, ऋषियों व नेताओं को उपदेश देने वालो एवं कुशिक गोत्र में उत्पन्न पुत्रो! यज्ञ
में पत्थरों द्वारा सोम निचोड़े जाने पर तुम स्तुतियों द्वारा देवों को प्रसन्न करते हुए हंसों के
समान मंत्रों का उच्चारण करो तथा देवों के साथ सोम पिओ. (१०)
उप प्रेत कुशिकाश्चेतयध्वमश्वं राये प्र मुञ्चता सुदासः.
राजा वृत्रं जङ्घनत्प्रागपागुदगथा यजाते वर आ पृथिव्याः.. (११)
हे कुशिकगोत्रीय पुत्रो! अश्व के पास जाओ एवं सावधान रहो. राजा सुदास का अश्व
दिग्विजय द्वारा धन पाने के लिए छोड़ दो. राजा इंद्र ने वृत्र को पूर्व, पश्चिम एवं उत्तर दिशाओं
में मारा था. राजा सुदास पृथ्वी के उत्तम भाग में यज्ञ करें. (११)
य इमे रोदसी उभे अहमिन्द्रमतुष्टवम्. विश्वामित्रस्य रक्षति ब्रह्मेदं भारतं जनम्.. (१२)

हे पुत्रो! मैं विश्वामित्र धरती और आकाश द्वारा इंद्र की स्तुति कराता हूं. यह स्तोत्र
भरतवंशीय लोगों की रक्षा करे. (१२)
विश्वामित्रा अरासत ब्रह्मेन्द्राय वज्रिणे. करदिन्नः सुराधसः.. (१३)
हम विश्वामित्र के पुत्रों ने वज्रधारी इंद्र का स्तोत्र किया. इंद्र हमें शोभन धन वाला करें.
(१३)
किं ते कृण्वन्ति कीकटेषु गावो नाशीरं दुहे न तपन्ति घर्मम्.
आ नो भर प्रमगन्दस्य वेदो नैचाशाखं मघवन्धया नः.. (१४)
हे इंद्र! अनार्य लोगों के जनपदों में गाएं तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं करेंगी. न वे सोमरस
में मिलाने के लिए दूध देती हैं और न यज्ञपात्र को अपने दूध से दीप्त कर सकती हैं. हे
मघवा! वे गाएं हमारे पास ले आओ और प्रमगंद का धन भी हमें दो. तुम नीच वंश वाले लोगों
का धन हमें प्रदान करो. (१४)
ससर्परीरमतिं बाधमाना बृहन्मिमाय जमदग्निदत्ता.
आ सूर्यस्य दुहिता ततान श्रवो देवेष्वमृतमजुर्यम्.. (१५)
अग्नि प्रज्वलित करने वाले ऋषियों द्वारा हमें दी गई, अज्ञान को रोकने वाली एवं शब्द
के रूप में सब जगह फैलने वाली वाणी बृहद् रूप धारण करती है. सूर्य की पुत्री वाणी-देवता
इंद्र आदि देवों के समीप क्षयरहित एवं अमृतरूप अन्न का विचार करती है. (१५)
ससर्परीरभरत्तूयमेभ्योऽधि श्रवः पाञ्चजन्यासु कृष्टिषु.
सा पक्ष्या३ नव्यमायुर्दधाना यां मे पलस्तिजमदग्नयो ददुः.. (१६)
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र एवं निषादों के धन से अधिक धन गद्यपद्य रूप में विस्तृत
वाग्देवता हमें शीघ्र प्रदान करें. दीर्घायु वाले जमदग्नि आदि ऋषियों ने जो वाणी मुझे दी, वह
सूर्यरूपी वाणी मुझे नवीन अन्न वाला बनावे. (१६)
स्थिरौ गावौ भवतां वीळुरक्षो मेषा वि वर्हि मा युगं वि शारि.
इन्द्रः पातले ददतां शरीतोररिष्टनेमे अभि नः सचस्व.. (१७)
गतिशील अश्व स्थिर हो. रथ का धुरा दृढ़ हो. दंड एवं जुआ न टूटे. गिरने वाली कीलों
को टूटने से पहले ही इंद्र धारण करें. हे नष्ट न होने वाले नेमियुक्त रथ! हमारे सामने आओ.
(१७)
बलं धेहि तनूषु नो बलमिन्द्रानळुत्सु नः.
बलं तोकाय तनयाय जीवसे त्वं हि बलदा असि.. (१८)
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हे इंद्र! हमारे शरीरों में बल दो एवं हमारे बैलों को बलवान् करो. हे बल देने वाले इंद्र!
हमारे पुत्र एवं पौत्रों को चिरजीवी होने के लिए बल दो. (१८)
अभि व्ययस्व खदिरस्य सारमोजो धेहि स्पन्दने शिंशपायाम्.
अक्ष वीळो वीळित वीळयस्व मा यामादस्मादव जीहिपो नः.. (१९)
हे इंद्र! हमारे रथ के सार रूप खदिर तथा शीशम के काठ को दृढ़ करो. हे जुए! हमने
तुम्हें दृढ़ बनाया है. तुम दृढ़ बनो. इस चलते हुए रथ से हमें गिरा नहीं देना. (१९)
अयमस्मान्वनस्पतिर्मा च हा मा च रीरिषत्.
स्वस्त्या गृहेभ्य आवसा आ विमोचनात्.. (२०)
वनस्पतियों से बना हुआ यह रथ हमें न छोड़े और न विनष्ट करे. हम लोग जब तक घर
न पहुंचें, जब तक हमारा रथ चले और जब तक हम रथ से घोड़े अलग न कर दें, तब तक
हमारा कल्याण हो. (२०)
इन्द्रोतिभिर्बहुलाभिनों अद्य याच्छ्रेष्ठाभिर्मघवञ्छूर जिन्व.
यो नो द्वेष्ट्यधरः सस्पदीष्ट यमु द्विष्मस्तमु प्राणो जहातु.. (२१)
हे शूर एवं धनस्वामी इंद्र! हम शत्रुविनाशकारियों को श्रेष्ठ एवं विविध रक्षा उपायों द्वारा
प्रसन्न करो. जो हमसे द्वेष करे, वे नीचे गिरे तथा हम जिससे द्वेष करें उसे आप त्याग दें.
(२१)
परशुं चिद्धि तपति शिम्बलं चिद्धि वृश्चति.
उखा चिदिन्द्र येषन्ती प्रयस्ता फेनमस्यति.. (२२)
हे इंद्र! हमारे शत्रु कुल्हाड़ी को देखकर वृक्ष के समान संतप्त हों, सेमल के फूल के
समान अनायास ही उनके अंग गिर पड़ें एवं हमारे मंत्रबल से वे भोजन पकाने वाली हांडी के
समान मुंह से फेन गिरावें. (२२)
न सायकस्य चिकिते जनासो लोधं नयन्ति पशु मन्यमानाः.
नावाजिनं वाजिना हासयन्ति न गर्दभं पुरो अश्वान्नयन्ति.. (२३)
हे मनुष्यो! तुम विश्वामित्र के मंत्रों की शक्ति नहीं जानते हो. तपस्या नष्ट होने के लोभ से
चुप बैठे हुए मुझे तुम पशु के समान बांधकर ले जा रहे हो. सर्वज्ञ मूर्ख की हंसी नहीं उड़ाता
और न गधे को घोड़े के सामने लाया जाता है. (२३)
इम इन्द्र भरतस्य पुत्रा अपपित्वं चिकितुर्न प्रपित्वम्.
हिन्वन्त्यश्वमरणं न नित्यं ज्यावाजं परि णयन्त्याजौ.. (२४)
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हे इंद्र! भरतवंशी-क्षत्रिय वशिष्ठ दूर होना जानते हैं, मिलना नहीं जानते. वे संग्राम में
वशिष्ठगोत्रीय जनों के प्रति सच्चे शत्रु के समान घोड़े दौड़ाते हैं एवं धनुष उठाते हैं. (२४)
सूक्त—५४ देवता—विश्वेदेव
इमं महे विदथ्याय शूषं शश्वत्कृत्व ईड्याय प्र जभुः.
शृणोतु नो दम्येभिरनीकैः शृणोत्वग्निर्दिव्यैरजस्रः.. (१)
सब लोग महान् यज्ञ में मंथन द्वारा उत्पन्न एवं सबके द्वारा स्तुति योग्य अग्नि को लक्ष्य
करके यह सुखकर स्तोत्र बार-बार बोलते हैं. अग्नि शत्रुओं का दमन करने में कुशल, तेज से
युक्त एवं दिव्यतेज से निरंतर मिलित होकर हमारे इस स्तोत्र को सुने. (१)
महि महे दिवे अर्चा पृथिव्यै कामो म इच्छञ्चरति प्रजानन्.
ययोर्ह स्तोमे विदथेषु देवाः सपर्यवो मादयन्ते सचायोः.. (२)
हे स्तोता! तुम महान् आकाश एवं महती पृथ्वी के महत्त्व को जानते हुए उनकी स्तुति
करो. मेरा मनोरथ सभी भोगों की अभिलाषा करता है. मानवों के यज्ञों में धरती-आकाश की
सेवा के इच्छुक देवगण मिलकर स्तुति करने में प्रसन्न होते हैं. (२)
युवोर्ऋतं रोदसी सत्यमस्तु महे षु णः सुविताय प्र भूतम्.
इदं दिवे नमो अग्ने पृथिव्यै सपर्यामि प्रयसा यामि रत्नम्.. (३)
हे धरती-आकाश! तुम्हारी स्तुति वास्तविक बने. तुम हमारे यज्ञों की समाप्ति एवं हमें
महान् अभ्युदय देने में समर्थ बनो. हे अग्नि! धरती एवं आकाश को नमस्कार है. मैं हवि से
उनकी सेवा करता हूं एवं उनसे धन मांगता हूं. (३)
उतो हि वां पूर्व्या आविविद्र ऋतावरी सत्यवाचः.
नरश्चिद्वां समिथे शूरसातौ ववन्दिरे पृथिवि वेविदानाः.. (४)
हे सत्यधारक धरती और आकाश! पुरातन सत्यवादी ऋषियों ने तुमसे वांछित वस्तुएं
प्राप्त की थीं. हे पृथ्वी! युद्ध में जाने वाले लोग भी तुम्हारा महत्त्व जानते हुए तुम्हारी वंदना
करते हैं. (४)
को अद्धा वेद क इह प्र वोचद्देवाँ अच्छा पथ्या३का समेति.
ददृश्र एषामवमा सदांसि परेषु या गुह्येषु व्रतेषु.. (५)
उस सत्य बात को कौन जानता है? उसे कौन करता है? देवों के सामने कौन सा मार्ग
भली-भांति जाता है? स्वर्ग में स्थित देवस्थानों से नीचे जो स्थान दिखाई देते हैं एवं जो उत्तम
तथा कष्टसाध्य व्रतों द्वारा प्राप्त होते हैं, उन स्थानों को कौन सा मार्ग जाता है? (५)
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कविर्नृचक्षा अभि षीमचष्ट ऋतस्य योना विधृते मदन्ती.
नाना चक्राते सदनं यथा वेः समानेन क्रतुना संविदाने.. (६)
कवि एवं मानवों को देखने वाले सूर्य इस धरती-आकाश को सभी जगह देखते हैं.
प्रसन्न, जल एवं ओषधियों को धारण करने वाले तथा समान कर्मों द्वारा एकता को प्राप्त
धरती-आकाश जल के उत्पत्ति स्थल अंतरिक्ष में इस प्रकार अलग-अलग स्थानों में रहते हैं,
जैसे पक्षी अपने घोंसले अलग-अलग बनाते हैं. (६)
सामान्या वियुते दूरेअन्ते ध्रुवे पदे तस्थतुर्जगरूके.
उत स्वसारा युवती भवन्ती आदु ब्रुवाते मिथुनानि नाम.. (७)
एक-दूसरे से एकता को प्राप्त, पृथक्पृथक् स्थित एवं विनाशरहित धरती-आकाश
जागरूक होकर स्थिर अंतरिक्ष में इस प्रकार स्थित हैं, जैसे दो जवान बहिनें हों. वे दोनों
मिलकर जोड़े का नाम प्राप्त करती हैं. (७)
विश्वेदेते जनिमा सं विविक्तो महो देवान्बिभ्रती न व्यथेते.
एजद्ध्रुवं पत्यते विश्वमेकं चरत्पतत्रि विषुणां वि जातम्.. (८)
ये धरती-आकाश समस्त वस्तुओं का विभाग करते हैं एवं महान् देवों को धारण करके
भी दुःखी नहीं होते. जंगम एवं स्थावर विश्व एकमात्र धरती को प्राप्त करता है. चंचल पक्षी
नाना रूप धारण करके इनके बीच में स्थित होते हैं. (८)
सना पुराणमध्येष्यारान्महः पितुर्ज नितुर्जा मि तन्नः.
देवासो यत्र पनिता॑र एवैरुरो पथि व्युते तस्थुरन्तः.. (९)
महान्, सबके पालक एवं जननकर्त्ता आकाश का सनातनत्व, प्राचीनता एवं एक ही
स्थान से अपना तथा उसका जन्म मैं जानता हूं. इसलिए मैं उसे अपनी बहिन स्वीकार करता
हूं. उस आकाश के विस्तीर्ण मार्ग में भिन्न-भिन्न देव अपने-अपने वाहनों सहित स्तुति करते
हुए स्थित हैं. (९)
इमं स्तोमं रोदसी प्र ब्रवीम्यूदूदराः शृणवन्नग्निजिह्वः.
मित्रः सम्राजो वरुणो युवान आदित्यासः कवयः पप्रथानाः.. (१०)
हे धरती-आकाश! हम तुम्हारे इस स्तोत्र को बोलते हैं. सोमरस पेट में रखने वाले, अग्नि
रूपी जिह्वा से युक्त, भली-भांति दीप्त, नित्य तरुण, क्रांतदर्शी एवं अपने-अपने कर्मों का
विस्तार करने वाले मित्र, वरुण एवं आदित्य इस स्तोत्र को सुनें. (१०)
हिरण्यपाणिः सविता सुजिह्वस्त्रिरा दिवो विदथे पत्यमानः.
देवेषु च सवितः श्लोकमश्रेरादस्मभ्यमा सुव सर्वतातिम्.. (११)
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देने के निमित्त हाथ में सोना लिए हुए एवं शोभन वचनों वाले सविता देव यज्ञ के तीनों
सवनों में आकाश से आते हैं. हे सविता! स्तोताओं का स्तोत्र प्राप्त करो एवं हमारे लिए
समस्त अभिलषित फल प्रदान करो. (११)
सुकृत्सुपाणिः स्ववाँ ऋतावा देवस्त्वष्टावसे तानि नो धातु.
पूषण्वन्त ऋभवो मादयध्वमूर्ध्वग्रावाणो अध्वरमतष्ट.. (१२)
शोभन जगत् के कर्त्ता, सुंदर हाथ वाले, धनयुक्त एवं सत्य संकल्प त्वष्टा देव रक्षा के
लिए हमें अभिलषित फल दें. हे ऋभुआे! तुम पूषा के साथ मिलकर हमें प्रसन्न करो, क्योंकि
सोम निचोड़ने के लिए पत्थर उठाने वाले ऋत्विजों ने यह यज्ञ किया है. (१२)
विद्युद्रथा मरुत ऋष्टिमन्तो दिवो मर्या ऋतजाता अयासः.
सरस्वती शृणवन्द्यज्ञियासो धाता रयिं सहवीरं तुरासः.. (१३)
तेजस्वी रथों वाले, ऋष्टि नामक आयुध युक्त, द्योतमान, शत्रुओं को मारने वाले, यज्ञ से
उत्पन्न, नित्य गतिशील एवं यज्ञ के योग्य मरुद्गण तथा सरस्वती हमारे स्तोत्र को सुनें. हे
शीघ्रता करने वाले मरुतो! हमें पुत्रों सहित धन दो. (१३)
विष्णुं स्तोमासः पुरुदस्ममर्का भगस्येव कारिणो यामनि ग्मन्.
उरुक्रमः ककुहो यस्य पूर्वीर्न मर्घन्ति युवतयो जनित्रीः.. (१४)
हमारा यह धनमूलक स्तोत्र तथा पूज्य मंत्र नित्य विस्तृत इस यज्ञ में बहुकर्मा विष्णु को
प्राप्त हो. सबको जन्म देने वाली एवं परस्पर दूर स्थित दिशाएं उनकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं
करतीं. विष्णु का पादविक्षेप महान् है. (१४)
इन्द्रो विश्वैर्वीर्यै३ः पत्यमान उभे आ पप्रौ रोदसी महित्वा.
पुरन्दरो वृत्रहा धृष्णुषेणः सङ्गभ्या न आ भरा भूरि पश्वः.. (१५)
समस्त सामर्थ्यो से युक्त इंद्र ने अपनी महिमा से धरती और आकाश दोनों को पूर्ण कर
दिया है. शत्रु नगरों का ध्वंस करने वाले, वृत्रविनाशक एवं शत्रुपराभवकारिणी सेना के स्वामी
इंद्र! तुम पशुओं को एकत्र करके अधिक मात्रा में हमें दो. (१५)
नासत्या मे पितरा बन्धुपृच्छा सजात्यमश्विनोश्चारु नाम.
युवं हि स्थो रयिदौ नो रयीणां दात्रं रक्षेथे अकवैरदब्धा.. (१६)
हे बंधुओं की अभिलाषा जानने के इच्छुक अश्विनीकुमारो! तुम हमारे पालनकर्त्ता बनो.
तुम दोनों का मिलन अत्यंत सुंदर है. तुम दोनों हमारे लिए महान् धन देने वाले बनो. तुम्हारा
कोई तिरस्कार नहीं कर सकता. हवि देने वाले हमें उत्तम कर्मों से रक्षित करो. (१६)
महत्तद्वः कवयश्चारु नाम यद्ध देवा भवथ विश्व इन्द्रे.
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सख ऋभुभिः पुरुहूत प्रियेभिरिमां धियं सातये तक्षता नः.. (१७)
हे मेधावी देवो! जिस कर्म से तुमने इंद्रलोक में देवत्व प्राप्त किया है, तुम्हारे वे कर्म
महान् हैं. हे बहुतों द्वारा बुलाए गए एवं ऋभुओं के साथी इंद्र! हमारी यह स्तुति धन प्राप्त
करने के लिए स्वीकार करो. (१७)
अर्यमा णो अदितैर्यज्ञियासोऽदब्धानि वरुणस्य व्रतानि.
युयोत नो अनपत्यानि गन्तोः प्रजावान्नः पशुमाँ अस्तु गातुः.. (१८)
सूर्य, अदिति, यज्ञ के योग्य देवगण एवं हिंसारहित कर्म वाले वरुण हमारी रक्षा करें. तुम
सब हमारे मार्ग के पतनकारक कर्मों को दूर करो. हमारा घर पशु तथा संतान से पूर्ण हो.
(१८)
देवानां दूतः पुरुध प्रसूतोऽनागान्नो वोचतु सर्वताता.
शृणोतु नः पृथिवी द्यौरुतापः सूर्यो नक्षत्रैरुर्व१न्तरिक्षम्.. (१९)
अनेक स्थानों में देवों के दूत रूप में प्रसिद्ध अग्नि हमें सभी जगह निरपराध घोषित
करें. धरती, आकाश, जल, सूर्य एवं नक्षत्रों से भरा हुआ विशाल आकाश हमारी स्तुति सुने.
(१९)
शृण्वन्तु नो वृषणः पर्वतासो ध्रुवक्षेमास इळया मदन्तः.
आदित्यैर्नो अदितिः शृणोतु यच्छन्तु नो मरुतः शर्म भद्रम्.. (२०)
अभिलषित फल देने वाले मरुद्गण एवं याचकों की अभिलाषा पूरी करने वाले स्थिर
पर्वत हव्य से प्रसन्न होते हुए हमारी स्तुति सुनें. अदिति अपने पुत्रों के साथ हमारी स्तुति सुनें
एवं मरुद्गण हमें कल्याणकारी सुख दें. (२०)
सदा सुगः पितुमाँ अस्तु पन्था मध्वा देवा ओषधीः सं पिपृक्त.
भगो मे अग्ने सख्ये न मृध्या उद्गायो अश्यां सदनं पुरुक्षोः.. (२१)
हे अग्नि! हमारा मार्ग सुगम एवं अन्न से पूर्ण हो. हे देवगण! मधुर जल से ओषधियों को
सींचो. हे अग्नि! तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हमारा धन नष्ट न हो. हम धन एवं प्रभूत अन्न का
स्थान प्राप्त करें. (२१)
स्वदस्व हव्या समिषो दिदीह्यस्मद्र्य१क्सं मिमीहि श्रवांसि.
विश्वाँ अग्ने पृत्सु ताञ्जेषि शत्रूनहा विश्वा सुमना दीदिही नः.. (२२)
हे अग्नि! हव्य का स्वाद लो, हमारे अन्न को भली प्रकार प्रकाशित करो एवं उन दीप्ति
अन्नों को हमारे सामने लाओ. संग्राम में उन समस्त शत्रुओं को जीतो एवं प्रसन्न मन से हमारे
सभी दिनों को प्रकाशित बनाओ. (२२)
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