ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—३४ देवता—विश्वेदेव
उक्थभृतं सामभृतं बिभर्ति ग्रावाणं बिभ्रत्प्र वदात्यग्रे.
उपैनमाध्वं सुमनस्यमाना आ वो गच्छाति प्रतृदो वसिष्ठः.. (१४)
हे तृत्सुओ! वसिष्ठ तुम्हारे पास आ रहे हैं. तुम प्रसन्नचित होकर उनकी पूजा करना.
वसिष्ठ सबसे आगे रहकर मंत्रसमूह एवं सोम को धारण करते हैं. पत्थरों द्वारा सोम कूटने
वाले अध्वर्यु को धारण करते हैं एवं कर्त्तव्य बताते हैं. (१४)
सूक्त—३४ देवता—विश्वेदेव
प्र शुक्रैतु देवी मनीषा अस्मत्सुतष्टो रथो न वाजी.. (१)
दीप्त व सब अभिलाषाओं को देने वाली स्तुति वेगशाली एवं सुसंस्कृत रथ के समान
हमारे पास से देवों के पास जावे. (१)
विदुः पृथिव्या दिवो जनित्रं शृण्वन्त्यापो अध क्षरन्तीः.. (२)
बहने वाला जल स्वर्ग और धरती दोनों की उत्पत्ति जानता है एवं स्तुतियां सुनता है. (२)
आपश्चिदस्मै पिन्वन्त पृथ्वीर्वृत्रेषु शूरा मंसन्त उग्राः.. (३)
विस्तृत जल इन इंद्र को तृप्त करते हैं. शत्रुबाधा होने पर उग्र एवं शूर लोग इंद्र की स्तुति
करते हैं. (३)
आ धूर्ष्वस्मै दधाताश्वानिन्द्रो न वज्री हिरण्यबाहुः.. (४)
इंद्र के आगमन के लिए घोड़ों को रथ के आगे जोड़ो. इंद्र वज्रधारी एवं सोने के हाथों
वाले हैं. (४)
अभि प्र स्थाताहेव यज्ञं यातेव पत्मन्त्मना हिनोत.. (५)
हे मनुष्यो! यज्ञ के सामने जाओ एवं यात्री के समान यज्ञमार्ग पर स्वयं ही चलो. (५)
त्मना समत्सु हिनोत यज्ञं दधात केतुं जनाय वीरम्.. (६)
हे सेवको! युद्धों में अपने आप जाओ. लोगों को ज्ञान कराने वाले एवं पापनाशक यज्ञों
को धारण करो. (६)
उदस्य शुष्माद्भानुर्नार्त बिभर्ति भरं पृथिवी न भूम.. (७)
इस यज्ञ के बल के कारण ही सूर्य उदित होता है. धरती जिस प्रकार प्राणियों का भार
वहन करती है, उसी प्रकार यज्ञ भी करता है. (७)
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ह्वयामि देवाँ अयातुरग्ने साधन्नृतेन धियं दधामि.. (८)
हे अग्नि! मैं अहिंसादि नियमों से युक्त यज्ञ द्वारा अपनी अभिलाषाएं पूर्ण करता हुआ
देवों को बुलाता हूं एवं उनके निमित्त यज्ञकर्म करता हूं. (८)
अभि वो देवीं धियं दधिध्वं प्र वो देवत्रा वाचं कृणुध्वम्.. (९)
हे मनुष्यो! तुम भी देवों को लक्ष्य करके उज्ज्वल कर्म करो एवं देवों से संबंधित
स्तुतिवचन बोलो. (९)
आ चष्ट आसां पाथो नदीनां वरुण उग्रः सहस्रचक्षाः.. (१०)
उग्र एवं हजार आंखों वाले वरुण इन नदियों का जल देखते हैं. (१०)
राजा राष्ट्रानां पेशो नदीनामनुत्तमस्मै क्षत्रं विश्वायु.. (११)
वरुण राष्ट्रों के राजा एवं नदियों को रूप देने वाले हैं. इनका बल बाधारहित एवं सर्वत्र
जाने वाला है. (११)
अविष्टो अस्मान्विश्वासु विश्वधृं कृणोत शंसं निनित्सोः .. (१२)
हे देवो! समस्त प्रजाओं में हमारी रक्षा करो एवं हमारी निंदा के इच्छुक व्यक्ति को
तेजहीन बनाओ. (१२)
व्येतु दिद्युद् द्विषामशेवा युयोत विश्वग्रपस्तनूताम्.. (१३)
शत्रुओं के असुखकारी आयुध सब ओर हट जावें. हे देवो! शरीर का पाप हमसे दूर
करो. (१३)
अवीन्नो अग्निर्हव्यान्रमोभिः प्रेष्ठो अस्मा अधायि स्तोमः.. (१४)
हव्य भक्षण करने वाले अग्नि हमारे नमस्कारों से अधिक प्रसन्न होकर हमारी रक्षा करें.
हम अग्नि की स्तुतियां करते हैं. (१४)
सजूर्देवेभिरपां नपातं सखायं कृध्वं शिवो नो अस्तु.. (१५)
हे स्तोताओ! जल के पुत्र अग्नि को देवों के साथ अपना मित्र बनाओ. वे हमारे लिए
कल्याणकारी हों. (१५)
अब्जामुक्थैरहिं गृणीषे बुध्ने नदीनां रजःसु षीदन्.. (१६)
जल से उत्पन्न, नदियों के जल में स्थित और जल के पुत्र अग्नि की स्तुति मंत्रों द्वारा की
जाती है. (१६)
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मा नोऽहर्बुध्न्यो रिषे धान्मा यज्ञो अस्य स्रिधदृतायोः.. (१७)
अग्नि हमें हिंसक के हाथ में न सौंपे. यज्ञ की कामना करने वाले का यज्ञ क्षीण न हो.
(१७)
उत न एषु नृषु श्रवो धुः प्र राये यन्तु शर्धन्तो अर्यः.. (१८)
देवगण हमारे मनुष्यों के लिए अन्नधारण करें एवं धन के लिए उत्साहित शत्रु मर जावें.
(१८)
तपन्ति शत्रुं स्वर्णि भूमा महासेनासो अमेभिरेषाम्.. (१९)
जैसे सूर्य धरती को तप्त करता है, उसी प्रकार विशाल सेना वाले राजा देवों के बल से
अपने शत्रु को बाधा पहुंचाते हैं. (१९)
आ यन्नः पत्नीर्गमन्त्यच्छा त्वष्टा सुपाणिर्दधातु वीरान्.. (२०)
जब देवपत्नियां हमारे सामने आती हैं, तब शोभनहाथ वाले त्वष्टा हमें पुत्र दें. (२०)
प्रति नः स्तोमं त्वष्टा जुषेत स्यादस्मे अरमतिर्वसूह्युः.. (२१)
त्वष्टा हमारे स्तोत्रों को स्वीकार करें. पर्याप्त बुद्धि वाले त्वष्टा हमें धन देने के इच्छुक हों.
(२१)
ता नो रासन्नातिषाचो वसून्या रोदसी वरुणानी शृणोतु.
वरूत्रीभिः सुशरणो नो अस्तु त्वष्टा सुदत्रो वि दधातु रायः.. (२२)
दान देने में कुशल देवपत्नियां हमें धन दें. द्यावा-पृथिवी और वरुणपत्नी हमारा स्तोत्र
सुनें. कल्याण देने वाले त्वष्टा उपद्रवों का निवारण करने वाली देवपत्नियों के साथ हमारे लिए
शरण बनें एवं हमें धन दें. (२२)
तन्नो रायः पर्वतास्तन्न आपस्तद्रातिषाच ओषधीरुत द्यौः.
वनस्पतिभिः पृथिवी सजोषा उभे रोदसी परि पासतो नः.. (२३)
पर्वत समूह, समस्त जल, दानकुशल देवपत्नियां, ओषधियां एवं स्वर्ग हमारे उस धन का
पालन करें. द्यावा-पृथिवी हमारी रक्षा करें. (२३)
अनु तदुर्वी रोदसी जिहातामनु द्युक्षो वरुण इन्द्रसखा.
अनु विश्वे मरुतो ये सहासो रायः स्याम धरुणं धियध्यै.. (२४)
हम धारण करने योग्य धन के पात्र हों. विस्तृत द्यावा-पृथिवी दीप्ति के निवास इंद्र, इंद्र
के मित्र वरुण एवं शत्रु का पराभव करने वाले मरुद्गण हमारा अनुगमन करें. (२४)
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