सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सूक्त—३१            देवता—विश्वेदेव

शक्ति की प्रशंसा करते हैं. हम उससे वीर संतान पाकर प्रतिदिन उत्तम धन का उपभोग कर
सकें. (११)
सूक्त—३१            देवता—विश्वेदेव
अस्माकं मित्रावरुणावतं रथमादित्यै रुद्रैर्वसुभिः सचाभुवा.
प्र यद्द्यो न पप्तन्वस्मनस्परि श्रवस्यवो हृषीवन्तो वनर्षदः.. (१)
हे मित्र एवं वरुण! जब हमारा रथ अन्न के इच्छुक, हर्षयुक्त एवं वनवासी पक्षियों के
समान हमारे निवासस्थान से दूसरे स्थान को जाये, तब तुम आदित्यों, रुद्रों तथा वसुओं के
साथ मिलकर उस रथ की रक्षा करना. (१)
अध स्मा न उदवता सजोषसो रथं देवासो अभि विक्षु वाजयुम्.
यदाश्वः पद्भाभिस्तिष्ठतो रजः पृथिव्याः सानौ जङ्घनन्त पाणिभिः.. (२)
हे समान रूप से प्रसन्न देवो! इस समय जनपदों में अन्न की खोज में गए हुए हमारे रथ
को गतिशील बनाओ, क्योंकि इस रथ में जुड़े हुए घोड़े अपनी गतियों से मार्ग तय करते हैं एवं
उठी हुई धरती पर अपने खुरों से बहुत तेज चलते हैं. (२)
उत स्य न इन्द्रो विश्वचर्षणिर्दिवः शर्धेन मारुतेन सुक्रतुः.
अनु नु स्थात्यवृकाभिरूतिभी रथं महे सनये वाजसातये.. (३)
अथवा समस्त लोक को देखने वाले एवं मरुद्गण की शक्ति से उत्तम कर्म करने वाले
इंद्र हिंसारहित रक्षासाधनों के साथ स्वर्ग से आकर अधिक धन और अन्न को पाने के लिए
अनुकूल बनें. (३)
उत स्य देवो भुवनस्य सक्षणिस्त्वष्टा ग्नाभिः सजोषा जूजुवद्रथम्.
इळा भगो बृहद्दिवोत रोदसी पूषा पुरन्धिरश्विनावधा पती.. (४)
अथवा संपूर्ण विश्व के पूज्य त्वष्टा देव देवपत्नियों के साथ मिलकर प्रेमपूर्वक हमारे उक्त
रथ को आगे बढ़ावें. इड़ा, परम तेजस्वी भग, धरती आकाश, परमबुद्धियुक्त पूषा एवं सूर्या के
पति अश्विनीकुमार हमारा रथ चलाएं. (४)
उत त्ये देवी सुभगे मिथूदृषोषासानक्ता जगतामपीजुवा.
स्तुषे यद्वां पृथिवि नव्यसा वचः स्थात्तुश्च वयस्त्रिवया उपस्तिरे.. (५)
अथवा प्रसिद्ध देवियां, सुंदर, एक-दूसरे को देखने वाली एवं चलने वाले जीवों की प्रेरक
उषा और निशा हमारे रथ को चलावें. हे धरती और आकाश! मैं तुम्हारी नवीन वचनों से
स्तुति करता हूं एवं ओषधि, सोम तथा पशु तीन प्रकार के अन्नों के साथ स्थावर हव्य प्रदान
ebook converter DEMO Watermarks*

करता हूं. (५)
उत वः शंसमुशिजामिव श्मस्यहिर्बुध्न्यो३ज एकपादुत.
त्रित ऋभुक्षाः सविता चनो दधेऽपां नपादाशुहेमा धिया शमि.. (६)
हे देवो! हम तुम्हारी स्तुति करने के इच्छुक हैं. तुम हमारी स्तुति को पंसद करो.
अहिर्बुध्न्य, अजएकपात, सविता, ऋभुक्षा एवं त्रित हमें अन्न दें. जल के नाती, शीघ्रगामी
अग्नि हमारे यज्ञकर्म से प्रसन्न हों. (६)
एता वो वश्म्युद्यता यजत्रा अतक्षन्नायवो नव्यसे सम्.
श्रवस्यवो वाजं चकानाः सप्तिर्न रथ्यो अह धीतिमश्याः.. (७)
हे यज्ञ के योग्य देवो! तुम स्तुतियोग्यों की अन्न और बल की इच्छा करने वाले हम स्तुति
करना चाहते हैं. रथ के घोड़े के समान तुम्हारा बल हमें प्राप्त हो. (७)
सूक्त—३२ देवता—द्यावा-पृथ्वी आदि
अस्य मे द्यावापृथिवी ऋतायतो भूतमवित्री वचसः सिषासतः.
ययोरायुः प्रतरं ते इदं पुर उपस्तुते वसूयुर्वां महो दधे.. (१)
हे द्यावापृथ्वी! यज्ञ करने के इच्छुक एवं तुम्हें प्रसन्न करने के लिए प्रयत्नशील मुझ
स्तोता की रक्षा करो. सबकी अपेक्षा उत्कृष्ट अन्न वाले एवं अनेक लोगों द्वारा प्रशंसित तुम्हारी
स्तुति मैं अन्नप्राप्ति की अभिलाषा से विशाल स्तोत्रों द्वारा करूंगा. (१)
मा नो गुह्या रिप आयोरहन्भन्मा न आभ्यो रीरधो दुच्छुनाभ्यः.
मा नो वि यौः सख्या विद्धि तस्य नः सुम्नायता मनसा तत्त्वेमहे.. (२)
हे इंद्र! शत्रुजनों की गुप्त माया हमें रात में अथवा दिन में कभी भी नष्ट न करे. हमें दुःख
देने वाली शत्रु सेनाओं के वश में मत होने देना. हमारी मित्रता अपने मन से अलग मत करना.
हम तुमसे यही कामना करते हैं कि अपने मन में हमारा सुख चाहते हुए हमारी मित्रता को
याद रखना. (२)
अहेळता मनसा श्रुष्टिमावह दुहानां धेनुं पिप्युषीमसश्चतम्.
पद्याभिराशुं वचसा च वाजिनं त्वां हिनोमि पुरुहूत विश्वहा.. (३)
हे इंद्र! क्रोधरहित मन से सुखकारी, दुधारू, मोटी एवं दृढ़ांग गाय लेकर आना. हे
बहुजनों द्वारा बुलाए गए शीघ्रगामी एवं जल्दी-जल्दी बोलने वाले इंद्र! मैं प्रतिदिन तुम्हारी
स्तुति करता हूं. (३)
राकामहं सुहवां सुष्टुती हुवे शृणोतु नः सुभगा बोधतु त्मना.
ebook converter DEMO Watermarks*

सीव्यत्वपः सूच्याच्छिद्यमानया ददातु वीरं शतदायमुक्थ्यम्.. (४)
मैं उत्तम स्तुतियों द्वारा आह्वान के योग्य राका देवी को बुलाता हूं. वह सुभगा हमारी
पुकार सुनें एवं हमारा अभिप्राय स्वयं जान लें. वह छेदरहित सूई से हमारे कर्मों को बुनती हुई
हमें वीर एवं बहुदानदाता पुत्र दें. (४)
यास्ते राके सुमतयः सुपेशसो याभिर्ददासि दाशुषे वसूनि.
ताभिर्नो अद्य सुमना उपागहि सहस्रपोषं सुभगे रराणा.. (५)
हे राका देवी! तुम्हारी जो शोभन रूप वाली उत्तम बुद्धियां हैं एवं जिनके द्वारा तुम
यजमान को धन देती हो, आज प्रसन्नचित्त होकर उसी बुद्धि के साथ पधारो. हे सुभगा राका!
तुम हजारों प्रकार से हमारा पोषण करती हो. (५)
सिनीवालि पृथुष्टुके या देवानामसि स्वसा.
जुषस्व हव्यमाहुतं प्रजां देवि दिदिड्ढि नः.. (६)
हे मोटी जंघाओं वाली सिनीवाली! तुम देवों की बहिन हो. हमारा दिया हुआ हव्य
स्वीकार करो एवं संतान दो. (६)
या सुबाहुः स्वङ्गुरिः सुषूमा बहुसूवरी.
तस्यै विशपत््न्यै हविः सिनीवाल्यै जुहोतन.. (७)
जो सिनीवाली सुंदर बाहुओं एवं सुंदर उंगलियों वाली, शोभन पुत्रों वाली तथा अनेक
की जन्मदात्री है, उसी विश्वरक्षिका देवी के उद्देश्य से हव्य प्रदान करो. (७)
या गुङ्गूर्या सिनीवाली या राका या सरस्वती.
इन्द्राणीमह्व ऊतये वरुणानीं स्वस्तये.. (८)
मैं अपनी रक्षा एवं सुख के लिए कई सिनीवाली, राका, सरस्वती, इंद्राणी और वरुणानी
को बुलाता हूं. (८)
सूक्त—३३ देवता—रुद्र
आ ते पितर्मरुतां सुम्नमेतु मा नः सूर्यस्य सन्दृशो युयोथाः.
अभि नो वीरा अर्वति क्षमेत प्र जायेमहि रुद्र प्रजाभिः.. (१)
हे मरुतों के पिता रुद्र! तुम्हारा दिया हुआ सुख हमें मिले. हमें सूर्य के दर्शन से अलग
मत करना. हमारे शक्तिशाली पुत्र युद्ध में शत्रुओं को हरावें. हे रुद्र! हम पुत्र-पौत्र आदि से
बहुत बनें. (१)
ebook converter DEMO Watermarks*

त्वादत्तेभी रुद्र शन्तमेभिः शतं हिमा अशीय भेषजेभिः.
व्य१स्मद्द्वेषो वितरं व्यंहो व्यमीवाश्चातयस्वा विषूचीः.. (२)
हे रुद्र! हम तुम्हारी दी हुई सुखकारी ओषधियों की सहायता से सौ वर्ष तक जीवित रहें.
हमारे शत्रुओं का विनाश करो, हमारे पाप को दूर करो एवं हमारे शरीर में फैली बीमारियों को
मिटाओ. (२)
श्रेष्ठो जातस्य रुद्र श्रियासि तवस्तमस्तवसां वज्रबाहो.
पर्षि णः पारमंहसः स्वस्ति विश्वा अभीती रपसो युयोधि.. (३)
हे रुद्र! तुम ऐश्वर्य से सब प्राणियों की अपेक्षा श्रेष्ठ हो. हे वज्रबाहु! तुम बढ़े हुए लोगों में
अतिशय उन्नत हो. हमें कुशलता के साथ पाप के उस पार ले जाओ एवं सभी पापों को हमसे
दूर ले जाओ. (३)
मा त्वा रुद्र चुक्रुधामा नमोभिर्मा दुष्टुती वृषभ मा सहूती.
उन्नो वीराँ अर्पय भेषजेभिर्भिषक्तमं त्वा भिषजां शृणोमि.. (४)
हे अभिलाषापूरक रुद्रो! हम विधिविरुद्ध नमस्कारों, अशोभन स्तुतियों एवं अन्य देवों के
साथ आह्वान द्वारा तुम्हें क्रोधित न करें. हमारे पुत्रों को अपनी ओषधियों द्वारा उत्तम बनाओ.
हमने सुना है कि तुम वैद्यों में सबसे श्रेष्ठ हो. (४)
हवीमभिर्हवते यो हविर्भिरेव स्तोमेभी रुद्रं दिषीय.
ऋदूदरः सुहवो मा नो अस्यै बभ्रुः सुशिप्रो रीरधन्मनायै.. (५)
जो रुद्र हव्य के साथ-साथ आह्वानाें से बुलाए जाते हैं, उनका क्रोध मैं स्तोत्रों द्वारा मिटा
दूंगा. कोमल उदर वाले, शोभन आह्वान से युक्त, पीले रंग वाले एवं सुंदर नाक वाले रुद्र मेरे
प्रति हिंसा बुद्धि न रखें. (५)
उन्मा ममन्द वृषभो मरुत्वान्त्वक्षीयसा वयसा नाधमानम्.
घृणीव च्छायामरपा अशीया विवासेयं रुद्रस्य सुम्नम्.. (६)
मैं कामवर्षक एवं मरुतों से युक्त रुद्र से प्रार्थना करता हूं कि वे मुझे उत्तम अन्न से तृप्त
करें. धूप से व्याकुल व्यक्ति जिस प्रकार छाया में प्रवेश करता है, उसी प्रकार पापरहित होकर
रुद्र द्वारा दिए हुए सुख को भोगने के लिए मैं उनकी सेवा करूंगा. (६)
क्व१स्य ते रुद्र मृळयाकुर्हस्तो यो अस्ति भेषजो जलाषः.
अपभर्ता रपसो दैव्यस्याभी नु मा वृषभ चक्षमथाः.. (७)
हे रुद्र! तुम्हारा वह सुखदाता हाथ कहां है, जो सबको सुख पहुंचाने वाली दवाएं बनाता
है? हे कामवर्षक रुद्र! तुम देवकृत पाप का विनाश करते हुए मुझे जल्दी क्षमा करो. (७)
ebook converter DEMO Watermarks*

प्र बभ्रवे वृषभाय श्वितीचे महो महीं सुष्टुतिमीरयामि.
नमस्या कल्मलीकिनं नमोभिर्गृणीमसि त्वेषं रुद्रस्य नाम.. (८)
मैं पीले रंग वाले, कामवर्षी एवं श्वेत आभायुक्त रुद्र के प्रति परम महान् स्तुतियां बार-
बार बोलता हूं. हे स्तोता! नमस्कार द्वारा तेजस्वी रुद्र की पूजा करो. मैं रुद्र का उज्ज्वल नाम
संकीर्तन करता हूं. (८)
स्थिरेभिरङ्गैः पुरुरूप उग्रो बभ्रुः शुक्रेभिः पिपिशे हिरण्यैः.
ईशानादस्य भुवनस्य भूरेर्न वा उ योषद्रुद्रादसुर्यम्.. (९)
दृढ़ अंग वाले, बहुरूप, तेजस्वी एवं पीले रंग वाले रुद्र चमकीले तथा सोने के बने
आभूषणों से सुशोभित हैं. संपूर्ण भुवनों के स्वामी एवं भर्ता रुद्र का बल कभी अलग नहीं
होता. (९)
अर्हन्बिभर्षि सायकानि धन्वार्हन्निष्कं यजतं विश्वरूपम्.
अर्हन्निदं दयसे विश्वमभ्यं न वा ओजीयो रुद्र त्वदस्ति.. (१०)
हे पूज्य रुद्र! तुम बाण और धनुष धारण करते हो. हे पूजा योग्य! तुमने पूजनीय एवं
बहुरूप वाले हार को धारण किया है. तुम इस विस्तृत संसार की रक्षा करते हो. तुम्हारी
अपेक्षा अधिक शक्तिशाली कोई नहीं है. (१०)
स्तुहि श्रुतं गर्तसदं युवानं मृगं न भीममुपहत्नुमुग्रम्.
मृळा जरित्रे रुद्र स्तवानोऽन्यं ते अस्मन्नि वपन्तु सेनाः.. (११)
हे स्तोता! प्रसिद्ध, रथ पर बैठे हुए, युवा, पशु के समान भयानक, शत्रुनाशक तथा उग्र
रुद्र की स्तुति करो. हे रुद्र! हम स्तुतिकर्त्ताओं की रक्षा करो. तुम्हारी सेना हमारे अतिरिक्त
अन्य लोगों का संहार करे. (११)
कुमारश्चित्पितरं वन्दमानं प्रति नानाम् रुद्रोपयन्तम्.
भूरेर्दातारं सत्पतिं गृणीषे स्तुतस्त्वं भेषजा रास्यस्मे.. (१२)
हे रुद्र! जिस प्रकार पुत्र आशीर्वाद देने वाले पिता को नमस्कार करता है, उसी प्रकार
आते हुए तुमको हम नमस्कार करें. हम अधिक दान करने वाले एवं सज्जन के बालक
तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम हमें ओषधि दो. (१२)
या वो भेषजा मरुतः शुचीनि या शन्तमा वृषणो या मयोभु.
यानि मनुरवृणीता पिता नस्ता शं च योश्च रुद्रस्य वश्मि.. (१३)
हे अभीष्टवर्षक मरुद्गण! तुम्हारी जो ओषधियां शुद्ध एवं अत्यधिक सुख देने वाली हैं,
जिन्हें हमारे पिता मनु ने पसंद किया था, रुद्र की उन्हीं सुखदायक व भयनाशक ओषधियों
ebook converter DEMO Watermarks*

की हम इच्छा करते हैं. (१३)
परि णो हेती रुद्रस्य वृज्याः परि त्वेषस्य दुर्मतिर्मही गात्.
अव स्थिरा मघवद्भ्यस्तनुष्व मीढ्वस्तोकाय तनयाय मृळ.. (१४)
रुद्र का आयुध हमारा त्याग कर दे. रुद्र की दुःखकारिणी विशाल भावना भी हमसे दूर
रहे. हे अभिलाषापूरक रुद्र! अपने धनुष की कठोर डोरी यजमान के प्रति ढीली करो एवं
हमारे पुत्र-पौत्रों को सुख दो. (१४)
एवा बभ्रो वृषभ चेकितान यथा देव न हृणीषे न हंसि.
हवनश्रुन्नो रुद्रेह बोधि बृहद्वदेम विदथे सुवीराः. (१५)
हे पीले रंग वाले, कामवर्षक, सर्वज्ञ, तेजस्वी एवं पुकार सुनने वाले रुद्रदेव! इस यज्ञ में
ऐसा विचार बनाओ कि तुम हमारे प्रति न कभी क्रोध करो और न हमें मारो. हम उत्तम पुत्र-
पौत्र पाकर इस यज्ञ में बहुत सी स्तुतियां बोलेंगे. (१५)
सूक्त—३४ देवता—मरुद्गण
धारावरा मरुतो धृष्णवोजसो मृगा न भीमास्तविषीभिरर्चिनः.
अग्नयो न शुशुचाना ऋजीषिणो भूमिं धमन्तो अप गा अवृण्वत.. (१)
स्थिर वृक्ष आदि को चंचल करने वाले, अपनी शक्ति से सबको पराजित करने वाले, पशु
के समान भयानक, अपने बल द्वारा समस्त संसार को व्याप्त करने वाले, अग्नि के समान
दीप्त एवं जल से युक्त मरुद्गण घूमने वाले बादलों को छिन्न-भिन्न करके जल बरसाते हैं. (१)
द्यावो न स्तृभिश्चित्यन्त खादिनो व्य१ भ्रिया न द्युतयन्त वृष्टयः.
रुद्रो यद्वो मरुतो रुक्मवक्षसो वृषाजनि पृश्न्याः शुक्र ऊधनि.. (२)
हे सीने पर दीप्त आभरणों वाले मरुद्गण! कामवर्षक रुद्र ने तुम्हें पृश्नि के निर्मल उदर
से पैदा किया है. तुम अपने आभूषणों से उसी प्रकार शोभा पाते हो, जिस प्रकार आकाश
तारागण से शोभित होता है. शत्रुक्षक एवं जलवर्षक मरुद्गण बादलों में बिजली के समान
प्रकाशित होते हैं. (२)
उक्षन्ते अश्वाँ अत्याँ इवाजिषु नदस्य कर्णैस्तुरयन्त आशुभिः.
हिरण्यशिप्रा मरुतो दविध्वतः पृक्षं याथ पृषतीभिः समन्यवः. (३)
जिस प्रकार घोड़े युद्ध में पसीने से धरती सींच देते हैं, उसी प्रकार संसार को सींचने
वाले मरुद्गण घोड़े पर चढ़कर गर्जन करते हुए बादल के कान के पास से जल्दी से निकल
जाते हैं. सोने के टोप वाले, समान क्रोध वाले एवं वृक्ष कंपित करने वाले मरुतो! तुम काली
ebook converter DEMO Watermarks*

बूंदों वाली हिरनियों पर चढ़कर हव्य वाले यजमान के पास आते हो. (३)
पृक्षे ता विश्वा भुवना ववक्षिरे मित्राय वा सदमा जीरदानवः.
पृषदश्वासो अनवभ्रराधस ऋजिप्यासोन वयुनेषु धूर्षदः.. (४)
मरुद्गण हव्यधारक यजमान के लिए मित्र के समान सारा जल ढोकर लाते हैं.
मरुद्गण शीघ्र दान करने वाले, श्वेत बिंदुयुक्त अश्वों वाले, भ्रंशरहित धन वाले एवं सीधे चलने
वाले घोड़ों की तरह पथिकों के सम्मुख जाते हैं. (४)
इन्धन्वभिर्धेनुभी रप्शदूधभिरध्वस्मभिः पथिभिर्भ्राजदृष्टयः.
आ हंसासो न स्वसराणि गन्तन मधोर्मदाय मरुतः समन्यवः.. (५)
हे समान क्रोध वाले एवं दीप्तियुक्त आयुधों वाले मरुद्गण! हंस जिस प्रकार अपने
निवासस्थान पर उतरते हैं, उसी प्रकार तुम दुधारू गायों एवं गरजते हुए मेघों के साथ
विघ्नरहित पथ से मधुर सोमरस द्वारा प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए आओ. (५)
आ नो ब्रह्माणि मरुतः समन्यवो नरां न शंसः सवनानि गन्तन.
अश्वामिव पिप्यत धेनुमूधनि कर्ता धियं जरित्रे वाजपेशसम्.. (६)
हे समान क्रोध वाले मरुतो! तुम जिस प्रकार हमारी स्तुतियां सुनने आते हो, उसी प्रकार
हमारे हव्य अन्न के प्रति आओ. तुम गाय को घोड़ों के समान पुष्ट अंग वाली तथा यजमान का
यज्ञ अन्नयुक्त करो. (६)
तं नो दात मरुतो वाजिनं रथ आपानं ब्रह्म चितयद्द्रिवेद्रिवे.
इषं स्तोतृभ्यो वृजनेषु कारवे सनिं मेधामरिष्टं दुष्टरं सहः.. (७)
हे मरुद्गण! हमें अन्न के साथ-साथ ऐसा पुत्र भी प्रदान करो जो तुम्हारे आने के समय
प्रतिदिन तुम्हारा गुणगान करे. अपने स्तुतिकर्त्ता को तुम अन्न दो. जो लोग युद्ध में तुम्हारी
स्तुति करते हैं, उन्हें युद्ध ज्ञान, धन देने की शक्ति एवं शत्रुओं द्वारा अधृष्य एवं असहनीय बल
दो. (७)
यद्युञ्जते मरुतो रुक्मवक्षसोऽश्वान्रथेषु भग आ सुदानवः.
धेनुर्न शिश्वे स्वसरेषु पिन्वते जनाय रातहविषे महीमिषम्.. (८)
सीने पर चमकीले गहने पहनने वाले एवं शोभन दानयुक्त मरुद्गण रथ पर सवार होते
ही यजमान के घर जाकर उसी प्रकार यथेष्ट अन्न देते हैं, जिस प्रकार गाय अपने बछड़े को
दूध पिलाती है. (८)
यो नो मरुतो वृकताति मर्त्यो रिपुर्दधे वसवो रक्षता रिषः.
वर्तयत तपुषा चक्रियाभि तमव रुद्रा अशसो हन्तना वधः.. (९)
ebook converter DEMO Watermarks*

हे मरुद्गण एवं वसुओ! जो मनुष्य भेड़िए के समान हमसे शत्रुता रखता है, उस हिंसा
करने वाले से हमारी रक्षा करो. हे रुद्रपुत्रो! हमारे शत्रु को दुःख देकर सृष्टि से दूर भगाओ एवं
उसके सभी आयुध दूर फेंक दो. (९)
चित्रं तद्द्बो मरुतो याम चेकिते पृश्न्या यदूधरप्यापयो दुहुः.
यद्वा निदे नवमानस्य रुद्रियास्त्रितं जराय जुरातामदाभ्याः.. (१०)
हे मरुतो! तुम्हारा वह विचित्र कर्म सब जानते हैं कि तुमने पृश्निमाता के स्तनों से दूध
पिया था एवं स्तोता की निंदा करने वाले को मारा था. हे अहिंसनीय रुद्रपुत्रो! तुमने त्रित ऋषि
के शत्रुओं को नष्ट किया. (१०)
तान्वो महो मरुत एवयाव्नो विष्णोरेषस्य प्रभृथे हवामहे.
हिरण्यवर्णान्ककुहान्यतस्रुचो ब्रह्मण्यन्तः शंस्यं राध ईमहे.. (११)
हे यज्ञस्थल में जाने वाले महानुभाव मरुतो! हम सर्वव्यापक एवं प्रार्थनीय सोमरस के
तैयार होने पर तुम्हें बुलाते हैं एवं सर्वोत्तम व सुनहरे रंग के स्रुच को उठाकर सर्वोत्तम स्तुतियों
द्वारा तुमसे उत्तम धन मांगते हैं. (११)
ते दशग्वाः प्रथमा यज्ञमूहिरे ते नो हिन्वन्तूषसो व्युष्टिषु.
उषा न रामीररुणैरपोर्णुते महो ज्योतिषा शुचता गोअर्णसा.. (१२)
दस मास तक यज्ञ करके सिद्धि प्राप्त करने वाले अंगिराओं के रूप में मरुतों ने पहली
बार यज्ञ को धारण किया था. वे उषाओं के आने पर हमें यज्ञकार्य में लगावें. उषा जिस प्रकार
अपनी लाल किरणों से काली रात को हटाती है, उसी प्रकार मरुद्गण महान्, दीप्तियुक्त एवं
जल टपकाने वाली ज्योति से अंधकार मिटाते हैं. (१२)
ते क्षोणीभिररुणेभिर्नाञ्जिभी रुद्रा ऋतस्य सदनेषु वावृधुः.
निमेघमाना अत्येन पाजसा सुश्चन्द्रं वर्णं दधिरे सुपेशसम्.. (१३)
रुद्रपुत्र मरुद्गण शब्द करने वाली वीणाओं एवं लाल रंग के आभूषणों से युक्त होकर
जल के निवासस्थान बादलों में बढ़े हैं. वे शीघ्रगामी एवं सर्वव्यापी बल से बादलों से अधिक
मात्रा में जल बरसाते हुए प्रसन्नतापूर्वक उत्तम रूप धारण करते हैं. (१३)
ताँ इयानो महि वरूथमूतय उप घेदेना नमसा गृणीमसि.
त्रितो न यान्यञ्च होतॄनभिष्य आववर्तदवराञ्चक्रियावसे.. (१४)
हम वरुणों से विस्तृत धन की याचना करते हुए अपनी रक्षा के निमित्त स्तोत्रों द्वारा
प्रार्थना करते हैं. त्रित ऋषि ने अपनी इच्छापूर्ति के लिए नाभिचक्र द्वारा प्राण, अपान, समान,
व्यान और उदान पांच होताओं को लौटा लिया. (१४)
ebook converter DEMO Watermarks*