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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1550 of 1855

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Page 1550

नाश करते हैं, जिस प्रकार सूर्य अपनी किरणों के द्वारा अंधकार को मिटाते हैं. सोम की धारा
प्रकाशित होती है. शुद्ध होते हुए हरित वर्ण सोम प्रकाशित होते हैं. सोम सात छंदों वाली
स्तुतियों एवं रसहरण करने वाले तेजों के द्वारा सभी नक्षत्रों को व्याप्त करते हैं. (१)
त्वं त्यत्पणीनां विदो वसु सं मातृभिर्मर्जयसि स्व आ दम ऋतस्य धीतिभिर्दमे.
परावतो न साम तद्यत्रा रणन्ति धीतयः.
त्रिधातुभिरुषीभिर्वयो दधे रोचमानो वयो दधे.. (२)
हे सोम! तुमने पणियों द्वारा चुराया हुआ गोधन प्राप्त किया था. तुम यज्ञस्थल में यज्ञ के
धारण करने वाले जलों से अच्छी तरह शुद्ध होते हो. तुम्हारा शब्द दूर पर गाए जाने वाले
साम मंत्रों के समान सुनाई देता है. तुम्हारा शब्द सुनकर यजमान प्रसन्न होते हैं. उज्ज्वल सोम
तीनों लोकों को धारण करने वाले जलों की दीप्तियों के द्वारा स्तोताओं को अन्न देते हैं. (२)
पूर्वामनु प्रदिशं याति चेकितत्सं रश्मिभिर्यतते दर्शतो रथो दैव्यो दर्शतो रथः.
अग्मन्नुक्थानि पौंस्येन्द्रं जैत्राय हर्षयन्.
वज्रश्च यद्द्रवथो अनपच्युता समत्स्वनपच्युता.. (३)
सबको जानने वाले सोम पूर्व दिशा की ओर जाते हैं. हे सोम! तुम्हारा दर्शनीय एवं दिव्य
रथ सूर्य की किरणों के साथ मिलता है. मनुष्यों द्वारा की हुई स्तुतियां इंद्र के पास जाती हैं एवं
इंद्र को विजय पाने के लिए हर्षित करती हैं. वज्र भी इंद्र के पास जाता है. हे सोम! तुम व इंद्र
शत्रुओं से अपराजित रहकर स्तुतियां सुनते हो. (३)
सूक्त—११२ देवता—पवमान सोम
नानानं वा उ नो धियो वि व्रतानि जनानाम्.
तक्षा रिष्टं रुतं भिषग्ब्रह्मा सुन्वन्तमिच्छतीन्द्रायेन्दो परि स्रव.. (१)
हे सोम! हमारे तथा अन्य लोगों के कर्म विविध प्रकार के होते हैं. बढ़ई लकड़ी काटना
चाहता है, वैद्य रोग की चिकित्सा करना चाहता है एवं ब्राह्मण सोमरस निचोड़ने वाले
यजमान को चाहता है. हे सोम! तुम इंद्र के लिए रस बहाओ. (१)
जरतीभिरोषधीभिः पर्णेभिः शकुनानाम्.
कार्मारो अश्मभिर्धुभिर्हिरण्यवन्तमिच्छतीन्द्रायेन्दो परि स्रव.. (२)
पुरानी लकड़ियों एवं पक्षियों के पंखों को शिलाओं द्वारा घिसकर बाण बनाए जाते हैं.
कारीगर बाण बेचने के लिए धनी लोगों को खोजते हैं. हे सोम! तुम इंद्र के लिए अपना रस
नीचे गिराओ. (२)
कारुरहं ततो भिषगुपलप्रक्षिणी नना.
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