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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सूक्त—३१ देवता—इन्द्र

सूक्त—३१ देवता—इन्द्र
इन्द्रो रथाय प्रवतं कृणोति यमध्यस्थान्मघवा वाजयन्तम्.
यूथेव पश्वो व्युनोति गोपा अरिष्टो याति प्रथमः सिषासन्.. (१)
धन के स्वामी इंद्र, जिस अन्नाभिलाषी रथ पर बैठते हैं, उसे हांकते भी हैं. जैसे ग्वाला
पशुओं के समूह को हांकता है, उसी प्रकार इंद्र शत्रुओं को भगाते हैं. अपराजित एवं देवश्रेष्ठ
इंद्र शत्रुओं के धन को चाहते हुए चलते हैं. (१)
आ प्र द्रव हरिवो मा वि वेनः पिशङ्गराते अभि नः सचस्व.
नहि त्वदिन्द्र वस्यो अन्यदस्त्यमेनांश्चिज्जनिवतश्चकर्थ.. (२)
हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी इंद्र! तुम सबके सम्मुख भली प्रकार गमन करो. तुम
हमारे प्रति इच्छारहित मत होना. हे विविध धनों के स्वामी! तुम हमारी सेवा स्वीकार करो. हे
इंद्र! तुमसे श्रेष्ठ कोई नहीं है. तुम पत्नीरहितों को पत्नीयुक्त करते हो. (२)
उद्यत्सहः सहस आजनिष्ट देदिष्ट इन्द्र इन्द्रियाणि विश्वा.
प्राचोदयत्सुदुघा वव्रे अन्तर्वि ज्योतिषा संववृत्वत्तमोऽवः.. (३)
जब सूर्य का प्रकाश उषा के प्रकाश से उत्पन्न होकर श्रेष्ठ बनता है, तब इंद्र यजमानों
को सभी प्रकार का धन देते हैं. वे पर्वत के मध्य से दुधारू गायों को छुड़ाते हैं एवं अपने
प्रकाश से ढकने वाले अंधकार को नष्ट करते हैं. (३)
अनवस्ते रथमश्वाय तक्षन्त्वष्टा वज्रं पुरुहूत द्युमन्तम्.
ब्रह्माण इन्द्रं महयन्तो अर्कैरवर्धयन्नहये हन्तवा उ.. (४)
हे अनेक जनों द्वारा बुलाए गए इंद्र! ऋभुओं ने तुम्हारे रथ को घोड़ों से जुड़ने योग्य
बनाया था एवं त्वष्टा ने तुम्हारे वज्र को चमकाया था. अंगिरावंशीय ऋषियों ने अपने स्तोत्रों
द्वारा वृत्र को मारने के लिए तुम्हें उत्तेजित किया था. (४)
वृष्णे यत्ते वृषणो अर्कमर्चानिन्द्र ग्रावाणो अदितिः सजोषाः.
अनश्वासो ये पवयोऽरथा इन्द्रेषिता अभ्यवर्तन्त दस्यून्.. (५)
हे कामवर्षी इंद्र! जब वर्षा करने में समर्थ मरुतों ने तुम्हारी स्तुति की, तब सोम निचोड़ने
वाले पत्थर भी प्रसन्नतापूर्वक मिल गए थे. बिना रथ एवं बिना घोड़ों वाले मरुतों ने इंद्र की
प्रेरणा पाकर असुरों को पराजित किया था. (५)
प्र ते पूर्वाणि करणानि वोचं प्र नूतना मघव न्या चकर्थ.
शक्तीवो यद्विभरा रोदसी उभे जयन्नपो मनवे दानुचित्राः.. (६)

हे धन के स्वामी इंद्र! हम तुम्हारे पुराने और नए साहसपूर्ण कार्यों की स्तुति करते हैं.
तुमने वे कर्म किए थे. हे वज्रवाले इंद्र! तुम धरती-आकाश को वश में करते हुए मनुष्यों के
लिए विचित्र जलों को धारण करते हो. (६)
तदिन्नु ते करणं दस्म विप्राहिं यद्घन्नोजो अत्रामिमीथाः.
शुष्णस्य चित्परि माया अगृभ्णाः प्रपित्वंयन्नप दस्यूँरसेधः.. (७)
हे सुंदर एवं बुद्धिमान् इंद्र! तुमने वृत्र को मारकर जो अपनी शक्ति को सब पर प्रकट
किया है वह निश्चित रूप से तुम्हारा कर्म था. हे इंद्र! तुमने शुष्ण असुर की युवती पत्नी को
अपने अधिकार में किया एवं युद्ध में शत्रुओं को बाधा पहुंचाई. (७)
त्वमपो यदवे तुर्वशायारमयः सुदुघाः पार इन्द्र.
उग्रमयातमवहो ह कुत्सं सं ह यद्वामुशना्रन्त देवाः.. (८)
हे इंद्र! तुमने नदियों के किनारे खड़े होकर यदु और तुर्वश नामक राजाओं को ऐसा जल
प्रदान किया जो वनस्पतियों को बढ़ाने वाला था. हे इंद्र! तुम और कुत्स आक्रमणकारी शुष्ण
से लड़ने गए थे. भयानक शुष्ण को मारकर तुमने कुत्स को घर पहुंचाया. तब उशना कवि के
साथ सभी देवों ने तुम्हारा स्वागत किया था. (८)
इन्द्राकुत्सा वहमाना रथेना वामत्या अपि कर्णे वहन्तु.
निः षीम॒द्द्रयो धमथो निः षधस्थान्मघोनो हृदो वरथस्तमांसि.. (९)
हे इंद्र एवं कुत्स! एक रथ पर बैठे हुए तुम दोनों को घोड़े यजमान के पास ले जावें.
तुमने शुष्ण को जल से बाहर निकाला था एवं धनी यजमानों के हृदयों को ढकने वाला
अंधकार दूर किया था. (९)
वातस्य युक्तान्त्सुयुजश्चिद्वश्वान्कविश्चिद्देषो अजगन्नवस्युः.
विश्वे ते अत्र मरुतः सखाय इन्द्र ब्रह्माणि तविषीमवर्धन्.. (१०)
अवस्यु नामक विद्वान् ऋषि ने वायु की गति से चलने वाले एवं रथ में ठीक से जुड़े हुए
घोड़ों को प्राप्त किया था. हे इंद्र! अवस्यु के सभी मित्र स्तोताओं ने तुम्हारा बल अपनी
स्तुतियों द्वारा बढ़ाया. (१०)
सूरश्चिद्रथं परितक्म्यायां पूर्वं करदुपंर जूजुवांसम्.
भरच्चक्रमेतशः सं रिणाति पुरो दधत्सनष्यिति क्रतुं नः.. (११)
इंद्र ने संग्राम में एतश ऋषि के साथ लड़ने वाले सूर्य का तेज चलने वाला रथ गतिहीन
कर दिया था. एतश के कल्याण के लिए इंद्र ने पहले सूर्य के रथ का एक पहिया छीन लिया
था. उसीसे इंद्र असुरों का नाश करते हैं. (११)
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आयं जना अभिचक्षे जगामेन्द्रः सखाय सुतसोममिच्छन्.
वदन्ग्रावाव वेदिं भ्रियाते यस्य जीरमध्वर्यवश्चरन्ति.. (१२)
हे मनुष्यो! सोम निचोड़ने वाले अपने मित्र यजमानों की इच्छा करते हुए इंद्र तुम्हें धन
देने के लिए आते हैं. अध्वर्यु जिस सोमरस निचोड़ने के साधन पत्थर को चलाते हैं, वह शब्द
करता हुआ यज्ञवेदी पर पहुंचता है. (१२)
ये चाकनन्त चाकनन्त नू ते मर्ता अमृत मो ते अह आरन्.
वावन्धि यज्यूँरुत तेषु धेह्योजो जनेषु येषु ते स्याम.. (१३)
हे मरणरहित इंद्र! धन-प्राप्ति के लिए जो लोग बार-बार तुम्हारी अभिलाषा करते हैं,
उस मरणशील व्यक्ति के पास कोई पाप नहीं जाता. तुम यजमानों पर कृपा करो. जिन लोगों
के बीच हम स्तुति कर रहे हैं, उन्हें तुम अपना बनाओ एवं बल दो. (१३)
सूक्त—३२ देवता—इंद्र
अदर्दरुत्समसृजो वि खानि त्वमर्णवान्बद्धधानाँ अरम्णाः.
महान्तमिन्द्र पर्वतं वि यद्वः सृजो वि धारा अव दानवं हन्.. (१)
हे इंद्र! तुमने मेघ को विदीर्ण किया एवं जल निकलने का मार्ग खोल दिया. इस प्रकार
बाधक मेघों को विसर्जित किया है. तुमने विशाल मेघ को उन्मुक्त करके पानी बरसाया एवं
वृत्र दानव को मारा. (१)
त्वमृतुसाँ ऋतुभिर्बद्धधानाँ अरंह ऊधः पर्वतस्य वज्रिन्.
अहिं चिदुग्र प्रयुतं शयानं जघन्वाँ इन्द्र तविषीमधत्थाः.. (२)
हे वज्र के स्वामी इंद्र! तुम वर्षा ऋतु में बंधे हुए मेघों को मुक्त करो एवं पर्वत को
शक्तिसंपन्न बनाओ. हे शक्तिशाली इंद्र! तुमने जल में सोए हुए वृत्र को मारा एवं अपनी शक्ति
को प्रसिद्ध बनाया. (२)
त्यस्य चिन्महतो निर्मृगस्य वधर्जघान तविषीभिरिन्द्रः.
य एक इदप्रतिमर्न्यमान आदस्मादन्यो अजनिष्ट तव्यान्.. (३)
अद्वितीय इंद्र ने अकेले ही हिरन के समान तेज चलने वाले वृत्र के आयुधों को अपनी
शक्ति द्वारा नष्ट किया. उस समय वृत्र के शरीर से दूसरा बलवान् राक्षस उत्पन्न हुआ. (३)
त्यं चिदेषां स्वधया मदन्तं मिहो नपातं सुवृधं तमोग़ाम्.
वृषप्रभर्मा दानवस्य भामं वज्रेण वज्री नि जघान शुष्णम्.. (४)
बरसने वाले मेघ को वज्र से मारने वाले वज्रधारी इंद्र ने शुष्ण असुर को मारा. वह असुर

प्राणियों का अन्न खाकर प्रसन्न था, वर्षा करने वाले मेघ का रक्षक था एवं तमोगुणारूपी
अंधकार के प्रति गतिशील था. (४)
त्यं चिदस्य क्रतुभिर्निषत्तममर्मणो विददिदस्य मर्म.
यदीं सुक्षत्र प्रभृता मदस्य युयुत्सन्तं तमसि हर्म्ये धाः.. (५)
हे शक्तिशाली इंद्र! तुमने नशीले सोमरस को पीकर युद्ध की अभिलाषा करने वाले वृत्र
को डराकर अंधेरे में छिपने पर विवश किया था. तुमने अपने आपको दुर्बलतारहित समझने
वाले वृत्र का मर्म उसके कार्यों से जान लिया था. (५)
त्यं चिदित्था कत्पयं शयानमसूर्ये तमसि वावृधानम्.
तं चिन्मन्दानो वृषभः सुतस्योच्चैरिन्द्रो अपगूर्या जघान.. (६)
निचोड़े हुए सोमरस को पीने से प्रसन्न हुए कामवर्षी इंद्र ने अंतरिक्ष में सुखकारी जल के
बीच सोने वाले एवं घने अंधकार में बढ़ते हुए वृत्र को वज्र ऊंचा उठाकर मारा था. (६)
उद्यद्दिन्द्रो महते दानवाय वधैर्यमिष्ट सहो अप्रतीतम्.
यदीं वज्रस्य प्रभृतौ ददाभ विश्वस्य जन्तोरधमं चकार.. (७)
इंद्र ने जब उस महान् दानव वृत्र को मारने के लिए बाधाहीन वज्र उठाया था एवं वज्र
का प्रहार करके उसे मारा था, तब वृत्र को विश्व के सभी प्राणियों से नीचे बना दिया था. (७)
त्यं चिदर्णं मधुपं शयानमसिन्वं वव्रं मह्याददुग्रः.
अपादमत्रं महता वधेन नि दुर्योण आवृणङ्मृध्रवाचम्.. (८)
अति बली इंद्र ने बादलों को रोककर सोने वाले, जल के रक्षक, शत्रुओं का नाश करने
वाले एवं सबको आच्छादन करने वाले वृत्र को पकड़ा. इसके बाद इंद्र ने चरणरहित,
परिमाणहीन एवं विनष्ट-वाणी वाले वृत्र को अपने शक्तिशाली वज्र द्वारा मार डाला. (८)
को अस्य शुष्मं तविषीं वरात एको धना भरते अप्रतीतः.
इमे चिदस्य ज्रयसो नु देवी इन्द्रस्यौजसो भियसा जिहाते.. (९)
इंद्र के शोषण करने वाले बल को कौन रोक सकता है? अप्रतीत इंद्र अकेले ही शत्रुओं
की संपत्तियां छीन लेते हैं. शक्तिशाली धरती-आकाश वेगयुक्त इंद्र के बल के कारण भयभीत
होकर शीघ्र चलने लगे. (९)
न्यस्मै देवी स्वधितिर्जिहीत इन्द्राय गातुरुशतीव येमे.
सं यदोजो युवते विश्वमाभिरनु स्वधाव्ने क्षितयो नमन्त.. (१०)
दीप्तिशाली एवं स्वयं रुका हुआ स्वर्ग इंद्र के सामने नीचा हो जाता है. धरती कामनापूर्ण
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नारी के समान इंद्र को आत्मसमर्पण करती है. इंद्र जब अपनी शक्ति को सभी प्रजाओं में
मिला देते हैं, तब लोग बलशाली इंद्र के सामने क्रमपूर्वक झुकते हैं. (१०)
एकं नु त्वा सत्पतिं पाञ्चजन्यं जातं शृणोमि यशसं जनेषु.
तं मे जगृभ्र आशसो नविष्ठं दोषा वस्तोर्हवमानास इन्दम्.. (११)
हे इंद्र! हमने ऋषियों से तुम्हें मानवों में प्रमुख, सज्जनों का पालनकर्त्ता, पंचजनों के
कल्याण के लिए उत्पन्न एवं यशस्वी सुना है. रात-दिन स्तुति करने वाले एवं अभिलाषाओं का
वर्णन करने वाले हमारे पुत्र-पौत्र अतिशय स्तुतिपात्र इंद्र को प्राप्त करें. (११)
एवा हि त्वामृतुथा यातयन्तं मघा विप्रेभ्यो ददतं शृणोमि.
किं ते ब्रह्माणो गृहते सखायो ये त्वाया निदधुः काममिन्द्र.. (१२)
हे इंद्र! तुम समय-समय पर प्राणियों को प्रेरित करते हो एवं स्तुति करने वाले को धन
देते हो, हमने ऐसा सुना है. जो स्तोता अपनी इच्छा तुम में स्थित कर देते हैं, तुम्हारे मित्र वे
तुमसे क्या प्राप्त करते हैं? (१२)
सूक्त—३३ देवता—इंद्र
महि महे तवसे दीध्ये नृनिन्द्रायेत्था तवसे अतव्यान्.
यो अस्मै सुमतिं वाजसातौ स्तुतो जने समर्यश्चिकेत.. (१)
मैं परम दुर्बल संवरण ऋषि परम शक्तिशाली इंद्र के लिए उत्तम स्तुति बोलता हूं. उससे
मेरे समान लोग शक्तिशाली बनेंगे. संग्राम में अन्नलाभ करने के उद्देश्य से स्तुति सुनकर इंद्र
मुझ संवरण के स्तोताओं पर कृपा करें. (१)
स त्वं न इन्द्र धियसानो अर्कैर्हरीणां वृषन्योक्त्रमश्रेः.
या इत्था मघवन्ननु जोषं वक्षो अभि प्रार्यः सक्षि जनान्.. (२)
हे कामवर्षी एवं धनस्वामी इंद्र! तुम हमारा ध्यान करते हुए एवं प्रसन्नता उत्पन्न करने
वाले स्तोत्रों के कारण रथ में जुते हुए घोड़ों की लगाम पकड़ते हुए अपने शत्रुओं को पराजित
करो. (२)
न ते त इन्द्राभ्य१स्मदृष्वायुक्तासो अब्रह्मता यदसन्.
तिष्ठा रथमधि तं वज्रहस्ता रश्मिं देव यमसे स्वश्वः.. (३)
हे महान् इंद्र! जो हम लोगों अर्थात् तुम्हारे भक्तों से भिन्न हैं, तुमसे जो संयुक्त नहीं हैं
एवं यज्ञकर्म अर्थात् यज्ञ नहीं करते हैं, वे तुम्हारे मनुष्य नहीं हैं. हे हाथ में वज्र लेने वाले इंद्र!
हमारे यज्ञ में आने के लिए तुम रथ को स्वयं हांकते हो. (३)
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पुरू यत्त इन्द्र सन्त्युक्था गवे चकर्थोर्वरासु युध्यन्.
ततक्षे सूर्याय चिदोकसि स्वे वृषा समत्सु दासस्य नाम चित्.. (४)
हे इंद्र! तुम्हारे निजी स्तोत्र बहुत से हैं. तुम उपजाऊ धरती पर वर्षा के जल के निमित्त
जल प्रतिबंधकों का नाश करते हो. कामवर्षी इंद्र! तुम सूर्य के स्थान अंतरिक्ष में वर्षा रोकने
वाले राक्षसों के साथ युद्ध करके उनका नाम तक मिटा देते हो. (४)
वयं ते त इन्द्र ये च नरः शर्धो जज्ञाना याताश्च रथाः.
आस्माज्जगम्यादहिशुष्म सत्वा भगो न हव्यः प्रभृथेषु चारुः.. (५)
हे इंद्र! हम तुम्हारे सेवक ऋत्विज् और यजमान-यज्ञ करके तुम्हारा बल बढ़ाते हैं एवं
हवन करने के लिए तुम्हारे समीप जाते हैं. हे व्यापक बलशाली इंद्र! तुम्हारी कृपा से युद्ध में
हमारे पास प्रशंसनीय योद्धा उसी प्रकार आवें, जिस प्रकार भग के समीप गए थे. (५)
पपृक्षेण्यमिन्द्र त्वे ह्योजो नृम्णानि च नृतमानो अमर्त्तः.
स न एनीं वसव्हानो रयिं दाः प्रार्यः स्तुषे तुविमघस्य दानम्.. (६)
हे पूजनीय शक्ति वाले, सर्वव्यापक एवं मरणरहित इंद्र! तुम अपने तेज से जगत् को
ढककर हमें उज्ज्वल वर्ण का धन पर्याप्त मात्रा में दो. हम अधिक धन वाले इंद्र के दान की
प्रशंसा करते हैं. (६)
एवा न इन्द्रोतिभिरव पाहि गृणतः शूर कारून्.
उत त्वचं ददतो वाजसातौ पिप्रीहि मध्वः सुषुतस्य चारोः.. (७)
हे शूर इंद्र! स्तुतिकर्त्ता एवं ऋत्विज् हम लोगों की तुम रक्षा करो. तुम युद्ध में आच्छादक
रूप धारण करके हमारे द्वारा निचोड़ा हुआ सोम पीकर प्रसन्न बनो. (७)
उत त्ये मा पौरुकुत्स्यस्य सूरेस्त्रसदस्योर्हिरणिनो रराणाः.
वहन्तु मा दश श्येतासो अस्य गैरीक्षितस्य ऋतुभिर्नु सश्चे.. (८)
गिरिक्षित गोत्र में उत्पन्न पुरुकुत्स के पुत्र, स्वर्ण के स्वामी एवं प्रेरक त्रसदस्यु द्वारा दिए
गए सफेद रंग के दस घोड़े हमारा रथ खींचें. रथ में घोड़े जोड़ने का काम हम शीघ्र कर लेंगे.
(८)
उत त्ये मा मारुताश्वस्य शोणाः क्रत्वामघासो विदथस्य रातौ.
सहस्रा मे च्यवतानो ददान आनूकमर्यो वपुषे नार्चत्.. (९)
मरुताश्व के पुत्र विद्ध के द्वारा दिए गए लाल रंग के घोड़े शीघ्र गति से हमें ढोवें. मुझ
पूज्य को उन्होंने हजारों संख्या में धन एवं शरीर के गहने दिए हैं. (९)
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उत त्ये मा ध्वन्यस्य जुष्टा लक्ष्मण्यस्य सुरुचो यतानाः.
मह्ना रायः संवरणस्य ऋषेर्व्रजं न गावः प्रयता अपि ग्मन्.. (१०)
लक्ष्मण के पुत्र ध्वन्यक द्वारा दिए हुए दीप्तिशाली एवं वहन करने में समर्थ घोड़े हमें
ढोवें? गाएं जिस प्रकार गोचर भूमि में जाती हैं, उसी प्रकार ध्वन्यक द्वारा दिया हुआ धन मुझ
संवरण ऋषि के घर में आवे. (१०)
सूक्त—३४ देवता—इंद्र
अजातशत्रुमजरा स्वर्वत्यनु स्वधामिता दस्ममीयते.
सुनोतन पचत ब्रह्मवाहसे पुरुष्टुताय प्रतरं दधातन.. (१)
हे ऋत्विजो! अजातशत्रु, शत्रुहंता एवं अक्षीण, स्वर्गदाता तथा अधिक हव्य प्राप्त करने
वाले इंद्र के निमित्त पुरोडाश पकाओ तथा सोमरस निचोड़ो. वे इंद्र स्तोत्र धारण करने वाले
एवं बहुतों द्वारा स्तुत हैं. (१)
आ यः सोमेन जठरमपिप्रातामन्दत मधवा मध्वो अन्धसः.
यदीं मृगाय हन्तवे महावधः सहस्रभृष्टिमुशना वधं यमत्.. (२)
इंद्र ने सोमरस से अपना पूरा पेट भर लिया था एवं वे मधुर सोमरस पीकर प्रसन्न हुए थे.
इंद्र ने मृग असुर को मारने के लिए अपने असीमित तेज वाले महान् वज्र को उठाया था. (२)
यो अस्मै घ्रंस उत वा य ऊधनि सोमं सुनोति भवति द्युमाँ अह.
अपाप शक्रस्ततनुष्टिमूहति तनूशुभ्रं मघवा यः कवासखः.. (३)
जो यजमान महान् इंद्र के लिए रात-दिन सोमरस निचोड़ते हैं, वे दीप्तिशाली बनते हैं.
जो लोग धर्मकार्य करना चाहते हैं, शोभन अलंकार आदि धारण करते हैं, किंतु धनवान् होकर
भी बुरे लोगों को अपना मित्र बनाते हैं, शक्तिशाली इंद्र ऐसे लोगों का त्याग कर देते हैं. (३)
यस्यानधीत्पितरं यस्य मातरं यस्य शक्रो भ्रातरं नात ईषते.
वेतीद्वस्य प्रयता यतङ्करो न किल्बिषादीषते वस्व आकरः.. (४)
इंद्र ने जिस अयज्ञकर्त्ता के पिता, माता एवं भ्राता का वध किया था, उसके समीप से भी
वे दूर नहीं जाते, अपितु उसके द्वारा दिए गए हव्य की कामना करते हैं. शासनकर्त्ता एवं
धनस्वामी इंद्र पाप से दूर नहीं भागते. (४)
न पञ्चभिर्दशभिर्वष्ट्यारभं नासुन्वता सचते पुष्यता चन.
जिनाति वेदमयुा हन्ति वा धुनिरा देवयुं भजति गोमति व्रजे.. (५)
इंद्र शत्रुओं का नाश करने के लिए पांच या दस सहायकों की इच्छा नहीं करते. सोम न
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निचोड़ने वाले एवं अपने बांधवों का पोषण न करने वाले के साथ इंद्र नहीं मिलते, ऐसे लोगों
को वे कष्ट देते हैं अथवा मार डालते हैं एवं अपने भक्त को गायों से पूर्ण गोशाला का
अधिकारी बनाते हैं. (५)
वित्वक्षणः समृत्तौ चक्रमासजोऽसुन्वतो विषुणः सुन्वतो वृधः.
इन्द्रो विश्वस्य दमिता विभीषणो यथावशं नयति दासमार्यः.. (६)
इंद्र संग्राम में शत्रुओं को नष्ट करने के लिए अपने रथ के पहिए को तेज चलाते हैं. वे
सोम न निचोड़ने वाले से दूर रहते हैं एवं सोम निचोड़ने वाले की वृद्धि करते हैं. विश्व के
शिक्षक, डराने वाले एवं स्वामी इंद्र दासकर्म करने वालों को वश में रखते हैं. (६)
समीं पणेरजति भोजनं मुषे वि दाशुषे भजति सूनरं वसु.
दुर्गे चन ध्रियते विश्व आ पुरु जनो यो अस्य तविषीमचुक्रुधत्.. (७)
इंद्र दान न करने वाले का धन चुराने के लिए लोभी बनियों के समान जाते हैं एवं
मानवशोभा बढ़ाने वाले उस धन को हव्यदाता यजमान को देते हैं. जो व्यक्ति इंद्र के बल को
उत्तेजित करता है वह विपत्ति में पड़ता है. (७)
सं यज्जनौ सुधनौ विश्वशर्धसाववेदिन्द्रो मघवा गोषु शुभ्रिषु.
युजं ह्य१न्यमकृत प्रवेपन्युदीं गव्यं सृजते सत्वभिर्धुनिः.. (८)
धनवान् इंद्र जब शोभन धन वाले एवं सर्वसाधनसंपन्न दो लोगों को उत्तम गायों के लिए
झगड़ता देखते हैं तो यज्ञ करने वाले की सहायता करते हैं. बादलों को कंपित करने वाले इंद्र
यज्ञकर्त्ता को गाएं देते हैं. (८)
सहस्रसामाग्निवेशिं गृणीषे शत्रिमन उपमां केतुमर्यः.
तस्मा आपः संयतः पीपयन्त तस्मिन्क्षत्रममवत्त्वेषमस्तु.. (९)
हे अग्नि रूप इंद्र! हम अपरिमित धन दान करने वाले अत्रि ऋषि की स्तुति करते हैं जो
अग्निवेश के पुत्र एवं उपमा के रूप में प्रसिद्ध हैं. उन्हें जल भली प्रकार संतुष्ट करें एवं उनका
धन बल और दीप्ति वाला हो. (९)
सूक्त—३५ देवता—इंद्र
यस्ते साधिष्ठोऽवस इन्द्र क्रतुष्टमा भर.
अस्मभ्यं चर्षणीसहं सस्निं वाजेषु दुष्टरम्.. (१)
हे इंद्र! तुम्हारा अतिशय साधक यज्ञकर्म हमारी रक्षा करे. वह कर्म सबको पराजित
करने वाला एवं शुद्ध है. युद्ध में दूसरे उसे नहीं हरा सकते. (१)

यदिन्द्र ते चतस्रो यच्छूर सन्ति तिस्रः.
यद्वा पञ्च क्षितीनामवस्तस्तु नु आ भर.. (२)
हे शूर इंद्र! चार वर्षों, तीन लोकों एवं पांच जनों से संबंधित जो तुम्हारी रक्षा है, वह हमें
प्रदान करो. (२)
आ तेऽवो वरेण्यं वृषन्तमस्य हूमहे.
वृषजूतिर्हि जज्ञिष आभूभिरिन्द्र तुर्वणिः.. (३)
हे कामपूरकों में श्रेष्ठ, वर्षा करने वाले एवं शत्रुओं को शीघ्र मारने वाले इंद्र! तुम्हारा
रक्षाकार्य उत्तम है. हम उसे पुकारते हैं. तुम सर्वव्यापक मरुतों के साथ हमारी रक्षा करो. (३)
वृषा ह्यसि राधसे जज्ञिषे वृष्णि ते शवः.
स्वक्षत्रं ते धृषन्मनः सत्राहामिन्द्र पौंस्यम्.. (४)
हे इंद्र! तुम कामवर्षी हो, यजमानों को धन देने हेतु उत्पन्न हुए हो एवं तुम्हारा बल
अभिलाषापूरक है. तुम्हारा मन शक्तिशाली एवं विरोधियों को हराने वाला है. तुम्हारा पौरुष
समूह नष्ट करने वाला है. (४)
त्वं तमिन्द्र मर्त्यममित्रयन्तमद्रिवः.
सर्वरथा शतक्रतो नि याहि शवसस्पते.. (५)
हे वज्रधारी, शतक्रतु एवं शक्ति के स्वामी इंद्र! तुम शत्रुता का आचरण करने वाले के
प्रति अपने सर्वत्रगामी रथ द्वारा चलते हो. (५)
त्वामिद्वृत्रहन्तम जनासो वृक्तबर्हिषः.
उग्रं पूर्वीषु पूर्व्यं हवन्ते वाजसातये.. (६)
हे शत्रुओं को मारने वाले इंद्र! यज्ञ में कुश बिछाने वाले यजमान युद्ध में सहायता के
लिए वज्र उठाए हुए एवं प्रजाओं के मध्य प्राचीन तुझ इंद्र को ही पुकारते हैं. (६)
अस्माकमिन्द्र दुष्टरं पुरोयावानमाजिषु.
सयावानं धनेधने वाजयन्तमवा रथम्.. (७)
हे इंद्र! तुम हमारे दुस्तर, युद्धों में आगे चलने वाले, अनुचरों सहित व युद्ध में सभी
प्रकार के धनों की इच्छा करने वाले रथ की रक्षा करो. (७)
अस्माकमिन्द्रेहि नो रथमवा पुरन्ध्या.
वयं शविष्ठ वार्यं दिवि श्रवो दधीमहि दिवि स्तोमं मनामहे.. (८)
हे इंद्र! तुम हमारे पास आत्मीय बनकर आओ एवं अपनी उत्तम बुद्धि द्वारा हमारे रथ
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