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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सूक्त—१३० देवता—प्रजापति

यह विशेष सृष्टि जिससे उत्पन्न हुई है, पता नहीं वह इसे धारण करता है अथवा नहीं.
विस्तृत आकाश में जो इस सृष्टि का अध्यक्ष है, पता नहीं वह उसे जानता है या नहीं जानता.
(७)
सूक्त—१३० देवता—प्रजापति
यो यज्ञो विश्वतस्तन्तुभिस्तत एकशतं देवकर्मेभिरायतः.
इमे वयन्ति पितरो य आययुः प्र वयाप वयेत्यासते तते.. (१)
आकाश आदि तंतुओं द्वारा जो सर्गरूप यज्ञ सब ओर विस्तृत है, वह सौ देव संबंधी
कर्मों से व्याप्त है. प्रजापति के पालक देव जो सारी सृष्टि में व्याप्त हैं, वे इस प्रपंच का
निर्माण करते हैं. वे ही इस विस्तृत विश्व के प्राण हैं. (१)
पुमाँ एनं तनुत उत्कृणत्ति पुमान्वि तत्ने अधि नाके अस्मिन्.
इमे मयूखा उप सेदुरू सदः सामानि चक्रुस्तसराण्योतवे.. (२)
प्रजापति इस सृष्टिरूपी यज्ञ को विस्तृत करता है एवं वही इसे संकुचित करता है. वही
धरती एवं स्वर्ग में इस सृष्टिरूपी यज्ञ का विस्तार करता है. प्रजापति की किरण के समान ये
देव यज्ञस्थान में बैठे थे. इन्होंने यज्ञरूपी वस्त्र को बुनने के लिए तिरछे धागे के रूप में
साममंत्रों का निर्माण किया. (२)
कासीत्प्रमा प्रतिमा किं निदानमाज्यं किमासीत्परिधिः क आसीत्.
छन्दः किमासीत्प्रउगं किमुक्थं यद्देवा देवमयजन्त विश्वे.. (३)
जिस समय सभी देवों ने प्रजापति का यज्ञ किया, उस समय क्या प्रमाण था? उस
समय देवमूर्ति क्या थी? उस यज्ञ का फल, घृत, समिधाएं, छंद और उक्थमंत्र क्या थे? (३)
अग्नेर्गायत्र्यभवत्सायुग्वोष्णिहया सविता सं बभूव.
अनुष्टुभा सोम उक्थैर्महस्वान्बृहस्पतेर्बृहती वाचमावत्.. (४)
गायत्री छंद अग्नि का तथा उष्णिक छंद सविता का सहायक हुआ. सोम अनुष्टुप् छंद से
तथा तेजस्वी सूर्य उक्थ छंद से युक्त हुए. बृहती छंद ने बृहस्पति के वचनों का सहारा लिया.
(४)
विराण्मित्रावरुणयोरभिश्रीरिन्द्रस्य त्रिष्टुबिह भागो अह्नः.
विश्वान्देवाञ्जगत्या विवेश तेन चाक्लृप्र ऋषयो मनुष्याः.. (५)
विराट् छंद मित्र और वरुण का आश्रित हुआ. त्रिष्टुप् छंद एवं माध्यंदिन का सोमरस इंद्र
के भाग में पड़ा. जगती छंद ने सभी देवों का आश्रय लिया. इन छंदों द्वारा ऋषियों और
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मनुष्यों ने यज्ञ की कल्पना की. (५)
चाक्लृप्रे तेन ऋषयो मनुष्या यज्ञे जाते पितरो नः पुराणे.
पश्यन्मन्ये मनसा चक्षसा तान् य इमं यज्ञमयजन्त पूर्वे.. (६)
यज्ञ के उत्पन्न होने पर हमारे प्राचीन पितरों अर्थात् ऋषियों और मनुष्यों ने उक्त छंदों
की सहायता से यज्ञ पूर्ण किया. जिन पूर्व पुरुषों ने इस यज्ञ को पूर्ण किया था, उन्हें मैं मन की
आंखों से देख रहा हूं. मैं ऐसा मानता हूं. (६)
सहस्तोमाः सहछन्दस आवृतः सहप्रमा ऋषयः सप्त दैव्याः.
पूर्वेषां पन्थामनुदृश्य धीरा अन्वालेभिरे रथ्यो३ न रश्मीन्.. (७)
सात दिव्य ऋषियों ने यज्ञ के मंत्र, छंद एवं नियम एक साथ जानकर यज्ञ का अनुष्ठान
किया. जिस प्रकार सारथि घोड़ों की लगाम पकड़ता है, उसी प्रकार धीर ऋषियों ने प्राचीन
लोगों के मार्ग का अनुसरण किया. (७)
सूक्त—१३१ देवता—अश्विनीकुमार व इंद्र
अप प्राच इन्द्र विश्वाँ अमित्रानपाचो अभिभूते नुदस्व.
अपोदीचो अप शूराधराच उरौ यथा तव शर्मन्मदेम.. (१)
हे शत्रुपराभवकारी इंद्र! हमारे सामने, पीछे, उत्तर और दक्षिण में जो शत्रु हैं, उन्हें
समाप्त करो. हे शूर इंद्र! तुम्हारे पास विशेष सुख पाकर हम प्रसन्न हों. (१)
कुविद्वङ्ग यवमन्तो यवं चिद्यथा दान्त्यनुपूर्वं वियूय.
इहेहैषां कृणुहि भोजनानि ये बर्हिषो नमोवृक्तिं न जग्मुः.. (२)
हे इंद्र! जौ के खेत के मालिक जिस प्रकार उसे क्रमशः अनेक बार में काटते हैं, उसी
प्रकार उन लोगों की भोजन सामग्री नष्ट करो जो ‘नमः’ शब्द का उच्चारण नहीं करते एवं यज्ञ
का अनुष्ठान नहीं करते. (२)
नहि स्थूर्युतुथा यातमस्ति नोत श्रवो विवदे सङ्गमेषु.
गव्यन्त इन्द्रं सख्याय विप्रा अश्वायन्तो वृषणं वाजयन्तः.. (३)
एक पहिए वाली गाड़ी उचित समय पर कहीं नहीं पहुंच सकती. उससे युद्ध के समय
भी अन्न नहीं मिल सकता. गौ, अश्व एवं अन्न की अभिलाषा करने वाले लोग इंद्र की मित्रता
चाहते हैं. (३)
युवं सुराममश्विना नमुचावासुरे सचा. विपिपाना शुभस्पती इन्द्रं कर्मस्वावतम्.. (४)
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हे उदक के स्वामी अश्विनीकुमारो! तुमने नमुचि असुर के साथ इंद्र के युद्ध के अवसर
पर सोमरस पीकर इंद्र के कार्य में सहायता दी थी. (४)
पुत्रमिव पितरावश्विनोभेन्द्रावथुः काव्यैर्दंसनाभिः.
यत्सुरामं व्यपिबः शचीभिः सरस्वती त्वा मघवन्नभिष्णक्.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार माता-पिता पुत्र की रक्षा करते हैं, उसी प्रकार तुमने
सोमरस पीकर अपने प्रशंसनीय कर्मों एवं शक्तियों के साथ इंद्र की रक्षा की थी. हे इंद्र!
सरस्वती तुम्हारे समीप थीं. (५)
इन्द्रः सुत्रामा स्ववाँ अवोभिः सुमृळीको भवतु विश्ववेदाः.
बाधतां द्वेषो अभयं कृणोतु सुवीर्यस्य पतयः स्याम.. (६)
उत्तम रक्षक, धनवान् एवं सर्वज्ञ इंद्र अपने रक्षासाधनों द्वारा सुख पहुंचाने वाले बनें. वे
शत्रुओं को बाधा पहुंचावें एवं हमें भयरहित बनावें. हम उत्तम बल के स्वामी बनें. (६)
तस्य वयं सुमतौ यज्ञियस्यापि भद्रे सौमनसे स्याम.
स सुत्रामा स्ववाँ इन्द्रो अस्मे आराच्चिद् द्वेषः सनुतर्युयोतु.. (७)
हम यज्ञ का भाग ग्रहण करने वाले इंद्र की कल्याणकारिणी कृपादृष्टि में रहें. वे शोभन
रक्षक एवं धनी इंद्र हमारे समीपवर्ती एवं दूरवर्ती शत्रु को हमसे अलग करें. (७)
सूक्त—१३२ देवता—मित्र व वरुण
ईजानमिद् द्यौर्गूर्तावसुरीजानं भूमिरभि प्रभूषणि.
ईजानं देवावश्विनावभि सुम्नैरवर्धताम्.. (१)
स्वर्ग यज्ञकर्त्ता के लिए ही धन धारण करता है. भूमि उसीको संपत्ति वाला बनाती है.
अश्विनीकुमार देवयज्ञकर्त्ता को ही नाना सुखसामग्री द्वारा बढ़ाते हैं. (१)
ता वां मित्रावरुणा धारयत्क्षिती सुषुम्नेषितत्वता यजामसि.
युवोः क्राणाय सख्यैरभि ष्याम रक्षसः.. (२)
हे धरती को धारण करने वाले मित्र व वरुण! हम सुख के उत्तम साधन पाने के लिए
तुम्हारी पूजा करते हैं. यज्ञकर्त्ता के प्रति तुम दोनों का जो मित्रता का भाव है, उसी के द्वारा
हम राक्षसों को जीतें. (२)
अधा चिन्नु यदिद्विषामहे वामभि प्रियं रेक्णः पत्यमानाः.
दद्वाँ वा यत्पुष्यति रेक्णः सम्बारन्नकिरस्य मघानि.. (३)

हे मित्रवरुण! जिस समय हम तुम्हारे लिए हव्य धारण करने की इच्छा करते हैं, उसी
समय हम प्रिय धन के पास पहुंच जाते हैं. तुम्हें हव्य देने वाला जो धन प्राप्त करता है, उसको
कोई भी नष्ट नहीं कर सकता. (३)
असावन्यो असुर सूयत द्यौस्त्वं विश्वेषां वरुणासि राजा.
मूर्धा रथस्य चाकन्नैतावतैनासान्तकध्रुक्.. (४)
हे शक्तिशाली मित्र! स्वर्ग जिसे उत्पन्न करता है, वह सूर्य तुमसे भिन्न है. हे वरुण! तुम
सबके राजा हो. तुम्हारे रथ का ऊपरी भाग इधर ही आ रहा है. यह यज्ञ राक्षसों को नष्ट करने
वाला है. इसे पाप नहीं छू पाता. (४)
अस्मिन्त्स्वे३ तच्छकपूत एनो हिते मित्रे निगतान्हन्ति वीरान्.
अवोर्वा यद्द्वात्तनूष्ववः प्रियासु यज्ञियास्वर्वा.. (५)
मित्र देव के हितैषी बन जाने के कारण मुझ शकपूत ऋषि में स्थित पाप नीच शत्रुओं
को नष्ट करता है. मित्र देव आकर हमारे शरीरों की रक्षा करें तथा यज्ञों की प्रिय सामग्री को
सुरक्षित करें. (५)
युवोर्हि मातादितिर्विचेतसा द्यौर्न भूमिः पयसा पुपूतनि.
अव प्रिया दिदिष्टन सूरो निनिक्त रश्मिभिः.. (६)
हे विशिष्ट ज्ञान वाले मित्र एवं वरुण! अदिति तुम्हारी माता है. तुम धरती और आकाश
को जल से भर दो. तुम नीचे वाले लोक में प्रिय वस्तुएं दो एवं सूर्य की किरणों द्वारा सारे
संसार को पवित्र बनाओ. (६)
युवं ह्यप्रराजावसीदतं तिष्ठद्रथं न धूर्षदं वनर्षदम्.
ता नः कणूकयन्तीर्नृमेधस्तत्रे अंहसः सुमेधस्तत्रे अंहसः.. (७)
हे मित्र व वरुण! तुम अपने-अपने कर्मों से दीप्तिशाली बनकर अपने स्थानों पर ठहरो.
वन में घूमने वाला तुम्हारा रथ घोड़ों के मार्ग में स्थित है. तुम दोनों जोर से चिल्लाते हुए
शत्रुओं को हराने के लिए रथ में बैठते हो. बुद्धिमान् ऋषि नृमेध से छूट चुके हैं. (७)
सूक्त—१३३ देवता—इंद्र
प्रो ष्वस्मै पुरोरथमिन्द्राय शूषमर्चत.
अभीके चिदु लोककृत्सङ्गे समत्सु वृत्रहास्माकं बोधि चोदिता नभन्तामन्यकेषां
ज्याका अधि धन्वसु.. (१)
हे स्तोताओ! इंद्र के रथ के आगे चलने वाली सेना की भली-भांति पूजा करो. इंद्र
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शत्रुसेनाओं के समीप आ जाने पर भी भागते नहीं. वे शत्रुओं का वध करते हैं. वे हमारे कार्यों
को जानें. शत्रुओं के धनुषों पर चढ़ी हुई डोरियां नष्ट हों. (१)
त्वं सिन्धूँरवासृजोऽधराचो अहन्नहिम.
अशत्रुरिन्द्र जज्ञिषे विश्वं पुष्यसि वार्यं तं त्वा परि ष्वजामहे.
नभन्तामन्यकेषां ज्याका अधि धन्वसु.. (२)
हे इंद्र! नीचे बहने वाली नदियों को तुम्हीं ने मुक्त किया है. तुम्हीं ने मेघ का नाश किया
है. हे इंद्र! तुम शत्रुरहित बनकर जन्म लेते हो एवं विश्व का पालन करते हो. तुम्हें सर्वोत्तम
जानकर हम तुम्हें स्तुतियों से वश में करते हैं. शत्रुओं के धनुषों की डोरियां नष्ट हों. (२)
वि षु विश्वा अरातयोऽर्यो नशन्त नो धियः.
अस्तासि शत्रवे वधं यो न इन्द्र जिघांसति या ते रातिर्ददिर्वसु नभन्तामन्यकेषां ज्याका
अधि धन्वसु.. (३)
हे इंद्र! सभी दानरहित शत्रु नष्ट हों और तुम्हारी स्तुतियां प्रारंभ हों. जो हमें मारना
चाहता है. उस शत्रु को तुम मारो. तुम्हारी दानशीलता हमें धन दे तथा शत्रुओं के धनुषों की
डोरियां नष्ट हों. (३)
यो न इन्द्राभितो जनो वृकायुरादिदेशति.
अधस्पदं तमीं कृधि विबाधो असि सासहिनर्भन्तामन्यकेषां ज्याका अधि धन्वसु.. (४)
हे इंद्र! जो आयुध लिए हमारे चारों ओर भेड़ियों के समान घूमते हैं, उन्हें तुम धराशायी
करो. तुम शत्रुओं के बाधक एवं पराभवकारी हो. शत्रुओं के धनुषों की डोरियां नष्ट हों. (४)
यो न इन्द्राभिदासति सनाभिर्यश्च निष्ट्यः.
अव तस्य बलं तिर महीव द्यौरध त्मना नभन्तामन्यकेषां ज्याका अधि धन्वसु.. (५)
हे इंद्र! हमारे समान जन्म वाला जो नीच शत्रु हमें नष्ट करना चाहता है, उसकी शक्ति
को इस प्रकार नीचा दिखाओ, जिस प्रकार आकाश धरती को अपने से नीचा रखता है. हमारे
शत्रुओं के धनुषों की डोरियां नष्ट हों. (५)
वयमिन्द्र त्वायवः सखित्वमा रभामहे.
ऋतस्य नः पथा नयाति विश्वानि दुरिता नभन्तामन्यकेषां ज्याका अधि धन्वसु.. (६)
हे इंद्र! हम तुम्हारी मित्रता की इच्छा करते हैं एवं तुम्हारी मित्रता के अनुकूल कार्य करते
हैं. तुम हमें पुण्य कर्मों वाले मार्ग से आगे ले चलो. हम सभी पापों से पार हों. हमारे शत्रुओं के
धनुष की डोरियां नष्ट हों. (६)
अस्मभ्यं सु त्वमिन्द्र तां शिक्ष या दोहते प्रति वरं जरित्रे.
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