ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—१०१ देवता—पवमान सोम
सोम! तुम महत्त्व से युक्त होकर कवच धारण करते हो. (९)
सूक्त—१०१ देवता—पवमान सोम
पुरोजिती वो अन्धसः सुताय मादयित्नवे.
अप श्वानं श्रथिष्टन सखायो दीर्घजिह्व्यम्.. (१)
हे मित्र स्तोताओ! सामने स्थित एवं भक्षण करने योग्य सोम के निचुड़े हुए एवं अत्यंत
नशीले रस को पीने के लिए आए लंबी जीभ वाले कुत्तों को रोको. (१)
यो धारया पावकया परिप्रस्यन्दते सुतः. इन्दुरश्वो न कृत्व्यः.. (२)
निचुड़े हुए और यज्ञकर्म में श्रेष्ठ सोम अपनी पवित्र धारा से चारों ओर इसी प्रकार जाते
हैं, जिस प्रकार घोड़ा दौड़ता है. (२)
तं दुरोषमभी नरः सोमं विश्वाच्या धिया. यज्ञं हिन्वन्त्यद्रिभिः.. (३)
ऋत्विज् लोग इस अहिंसनीय एवं यज्ञयोग्य सोम को समस्त अभिलाषाओं से पूर्ण बुद्धि
के सहारे पत्थरों की सहायता से निचोड़ते हैं. (३)
सुतासो मधुमत्तमाः सोमा इन्द्राय मन्दिनः.
पवित्रवन्तो अक्षरन्द्देवान्गच्छन्तु वो मदाः.. (४)
अत्यंत नशीले, मधुर एवं निचुड़े हुए सोम दशापवित्र में वर्तमान होकर इंद्र के निमित्त
पात्रों में छनते हैं. हे सोम! तुम्हारा मादक रस देवों के पास जावे. (४)
इन्दुरिन्द्राय पवत इति देवासो अब्रुवन्.
वाचस्पतिर्मखस्यते विश्वस्येशान ओजसा.. (५)
देवों ने ऐसा कहा है कि सोम इंद्र के लिए टपकते हैं. स्तुतियों के पालक एवं शक्ति द्वारा
संसार के स्वामी सोम स्तुतियों द्वारा पूजा की इच्छा करते हैं. (५)
सहस्रधारः पवते समुद्रो वाचमीङ्खयः. सोमः पती रयीणां सखेन्द्रस्य दिवेदिवे.. (६)
रस के आधार, स्तुतियों की प्रेरणा देने वाले, धन के स्वामी एवं इंद्र के मित्र सोम हजारों
धाराओं वाले बनकर टपकते हैं. (६)
अयं पूषा रयिर्भर्गः सोमः पुनानो अर्षति. पतिर्विश्वस्य भूमनो व्यख्यद्रोदसी उभे.. (७)
सबके पोषक, सेवा करने योग्य व धन के कारण सोम शुद्ध होकर कलश में जाते हैं.
सब प्राणियों के स्वामी सोम अपने तेज से द्यावा-पृथिवी को प्रकाशित करते हैं. (७)
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समु प्रिया अनूषत गावो मदाय घृष्वयः. सोमासः कृण्वते पथः पवमानास इन्दवः..
(८)
प्यारे एवं अत्यंत दीप्त स्तुतिवचन सोम की प्रशंसा करते हैं. शुद्ध होते हुए सोम अपने
छनने के लिए मार्ग बनाते हैं. (८)
य ओजिष्ठस्तमा भर पवमान श्रवाय्यम्. यः पञ्च चर्षणीरभि रयिं येन वनामहै.. (९)
हे सोम! तुम अपना परम ओजस्वी एवं प्रशंसनीय रस टपकाओ. पांच जनों के समीप
रहने वाले तुम्हारे रस द्वारा हम धन प्राप्त करें. (९)
सोमाः पवन्त इन्दवोऽस्मभ्यं गातुवित्तमाः.
मित्राः सुवाना अरेपसः स्वाध्यः स्वर्विदः.. (१०)
अत्यंत मार्गदर्शक, दीप्तिशाली, देवों के मित्र, पापरहित, उत्तम ध्यान वाले एवं सब कुछ
जानने वाले सोम निचुड़ते हुए हमारे पास आ रहे हैं. (१०)
सुष्वाणासो व्यद्रिभिश्चताना गोरधि त्वचि.
इषमस्मभ्यमभितः समस्वरन् वसुविदः.. (११)
गाय के चमड़े पर ज्ञात होते हुए, पत्थरों की सहायता से भली प्रकार निचोड़े गए एवं
धन प्राप्त कराने वाले सोम चारों ओर से भली-भांति शब्द कर रहे हैं. (११)
एते पूता विपश्चितः सोमासो दध्याशिरः.
सूर्यासो न दर्शतासो जिगत्नवो ध्रुवा घृते.. (१२)
दशापवित्र की सहायता से शुद्ध किए गए, मेधावी, दही से मिश्रित, जल में चलने वाले
एवं स्थिर सोम पात्रों में सूर्य के समान दिखाई देते हैं. (१२)
प्र सुन्वानस्यान्धसो मर्तो न वृत्त तद्वचः. अप श्वानमराधसं हता मखं न भृगवः.. (१३)
निचोड़े जाते हुए एवं उपभोग योग्य सोम का प्रसिद्ध शब्द यज्ञविघ्नकर्त्ता कुत्ते को दूर
करे. हे स्तोताओ! भृगुवंशी लोगों ने जैसे पहले भग को मारा था, उसी प्रकार तुम उस
यज्ञकर्म के बाधक कुत्ते को मारो. (१३)
आ जामिरत्के अव्यत भुजे न पुत्र ओण्योः.
सरज्जारो न योषणां वरो न योनिमासदम्.. (१४)
देवों के मित्र सोम दशापवित्र से इस प्रकार मिल जाते हैं, जिस प्रकार रक्षक माता-पिता
की भुजाओं में पुत्र आ जाता है. जार पुरुष जिस प्रकार स्त्री को पाने के लिए दौड़ता है, उसी
प्रकार सोम द्रोणकलश की ओर जाते हैं. (१४)
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स वीरो दक्षसाधनो वि यस्तस्तम्भ रोदसी.
हरिः पवित्रे अव्यत वेश न योनिमासदम्.. (१५)
शक्ति के साधन वे सोम वीर हैं एवं अपने तेज से द्यावा-पृथिवी को ढकते हैं. यज्ञ करने
वाला यजमान जिस प्रकार अपने घर में बैठता है, उसी प्रकार हरे रंग वाले सोम अपने कलश
में बैठते हैं. (१५)
अव्यो वारेभिः पवते सोमो गव्ये अधि त्वचि.
कनिक्रदद्वृषा हरिरिन्द्रस्याभ्येति निष्कृतम्.. (१६)
सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र से छनते हैं. अभिलाषापूरक एवं हरे रंग वाले सोम
शब्द करते हुए इंद्र के उत्तम स्थान को जाते हैं. (१६)
सूक्त—१०२ देवता—पवमान सोम
क्राणा शिशुर्म्हीनां हिन्वन्नृतस्य दीधितिम्. विश्वा परि प्रिया भुवदध द्विता.. (१)
यज्ञ करते हुए एवं महान् जलों के पुत्र सोम यज्ञ के प्रकाशक रस को बहाते हुए सभी
प्रिय हव्यों को व्याप्त करते हैं तथा द्यावा-पृथिवी में वर्तमान हैं. (१)
उप त्रितस्य पाष्यो३रभक्त यद् गुहा पदम्. यज्ञस्य सप्त धामभिरध प्रियम्.. (२)
मुझ त्रित के यज्ञ की गुफा में वर्तमान एवं पत्थर के समान दृढ़ रस निचोड़ने के तख्तों
पर पहुंचे ऋत्विज् यज्ञ धारण करने वाले गायत्री आदि सात छंदों द्वारा सोम की स्तुति करते
हैं. (२)
त्रीणि त्रितस्य धारया पृष्टेष्वेरया रयिम्. मिमीते अस्य योजना वि सुक्रतुः.. (३)
हे सोम! मुझ त्रित के तीनों सवनों में धारा के रूप में बही एवं सामगीत के गान के
समय धनदाता इंद्र को ले आओ. शोभन वृद्धि वाला स्तोता इंद्र को प्राप्त होने वाले स्तोत्र
बोलता है. (३)
जज्ञानं सप्त मातरो वेधामशासत श्रिये. अयं ध्रुवो रयीणां चिकेत यत्.. (४)
माता के समान सात गायत्री आदि छंद उत्पन्न एवं यज्ञधारक सोम की प्रशंसा यजमानों
के ऐश्वर्य के लिए करते हैं, क्योंकि सोम धन के निश्चित जानने वाले हैं. (४)
अस्य व्रते सजोषसो विश्वे देवासो अद्रुहः. स्पार्हा भवन्ति रन्तयो जुषन्त यत्.. (५)
सब देव शत्रुरहित होकर सोम के यज्ञ में मिलते हैं एवं अभिलाषा के योग्य बनते हैं.
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रमणशील देव सोम का सेवन करते हैं. (५)
यमी गर्भमृतावृधो दृशे चारुमजीजनन्. कविं मंहिष्ठमध्वरे पुरुस्पृहम्.. (६)
यज्ञवर्धक जल ने गर्भ के समान सोम को यज्ञ में देखने के लिए पैदा किया है. सोम
सबके कल्याणकारक, कवि, परमपूज्य एवं बहुतों के द्वारा अभिलषित हैं. (६)
समीचीने अभि त्मना यह्वी ऋतस्य मातरा. तन्वाना यज्ञमानुषग्यदञ्जते.. (७)
सोम परस्पर मिली हुई, विशाल व यज्ञ की माता के समान द्यावा-पृथिवी के पास अपने
आप जाते हैं. यज्ञ का विस्तार करने वाले अध्वर्यु सोम को जल में मिलाते हैं. (७)
क्रत्वा शुक्रेभिरक्षभिर्ऋणोरप व्रजं दिवः. हिन्वन्नृतस्य दीधितिं प्राध्वरे.. (८)
हे सोम! तुम अपने ज्ञान व दीप्तिवाली इंद्रियों के द्वारा अंतरिक्ष का अंधकार नष्ट करो
एवं हिंसारहित यज्ञ में धारक रस को प्रेरित करो. (८)
सूक्त—१०३ देवता—पवमान सोम
प्र पुनानाय वेधसे सोमाय वच उद्यतम्. भृतिं न भरा मतिभिर्जुजोषते.. (१)
हे त्रित ऋषि! तुम दशापवित्र द्वारा शुद्ध होते हुए, यज्ञविधाता एवं स्तुतियों द्वारा प्रसन्न
सोम के प्रति उसी प्रकार तत्परता से वचन कहो, जिस प्रकार नौकर अपना वेतन मांगता है.
(१)
परि वाराण्यव्यया गोभिरञ्जानो अर्षति. त्री षधस्था पुनानः कृणुते हरिः.. (२)
गाय के दूध में मिले हुए सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर जाते हैं. हरे रंग वाले
सोम शुद्ध होकर तीन स्थानों को अपना बनाते हैं. (२)
परि कोशं मधुश्रुतमव्यये वारे अर्षति. अभि वाणीर्ऋषीणां सप्त नूषत.. (३)
सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र द्वारा अपना रस द्रोणकलश में भेजते हैं. ऋषियों
के सात छंद सोम की स्तुति करते हैं. (३)
परि णेता मतीनां विश्वदेवो अदाभ्यः. सोमः पुनानश्चम्वोर्विशद्धरिः.. (४)
स्तुतियों के नेता, सबके देव, अहिंसित एवं हरे रंग के सोम रस निचोड़ने वाले तख्तों पर
बैठते हैं. (४)
परि दैवीरनु स्वधा इन्द्रेण याहि सरथम्. पुनानो वाघद्वाघद्भिरमर्त्यः.. (५)
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