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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

सूक्त—६३ देवता—पथ्या और स्वस्ति

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सावर्णेर्देवाः प्र तिरन्त्वायुर्यस्मिञ्श्रान्ता असनाम वाजम्.. (११)
हजारों गौएं देने वाले एवं मनुष्यों के नेता मनु को कोई हानि नहीं पहुंचा सकता. मनु की
दक्षिणा सूर्य के साथ तीन लोकों में प्रसिद्ध हो. देवगण सावर्णि मनु की आयु बढ़ावें. यज्ञकर्मों
में आलस्य न करने वाले हम मनु से अन्न प्राप्त करें. (११)
सूक्त—६३ देवता—पथ्या और स्वस्ति
परावतो ये दिधिषन्त आप्यं मनुप्रीतासो जनिमा विवस्वतः.
ययातेर्ये नहुष्यस्य बर्हिषि देवा आसते ते अधि ब्रुवन्तु नः.. (१)
जो देवगण दूर देश से आकर मनुष्यों के साथ मित्रता स्थापित करते हैं, मानवों द्वारा
प्रसन्न होकर जो देव वैवस्वत मनु से उत्पन्न मनुष्यों को धारण करते हैं एवं जो देव नहुषपुत्र
ययाति राजर्षि के यज्ञ में बैठते हैं, वे धन आदि देकर हमें पूजित करें. (१)
विश्वा हि वो नमस्यानि वन्द्या नामानि देवा उत यज्ञियानि वः.
ये स्थ जाता अदितेरद्भ्यस्परि ये पृथिव्यास्ते म इह श्रुता हवम्.. (२)
हे देवो! तुम्हारे सभी नाम नमस्कार के योग्य, वंदनीय एवं यज्ञ के योग्य हैं. जो देव
अदिति, जल एवं पृथ्वी से उत्पन्न हुए हैं, वे यहां हमारी पुकार को सुनें. (२)
येभ्यो माता मधुमत्पिन्वते पयः पीयूषं द्यौरदितिरद्रिबर्हाः.
उक्थशुष्मान् वृषभरान्त्स्वप्रसस्ताँ आदित्याँ अनु मदा स्वस्तये.. (३)
पृथ्वी माता जिन देवों के लिए मधुर दूध बहाती है और अदीन तथा बादलों से घिरा हुआ
आकाश जिनके लिए अमृत धारण करता है, उन प्रशंसनीय शक्ति वाले, वर्षा करने वाले,
शोभन कर्म वाले एवं अदितिपुत्र देवों के लिए स्तुति करो. (३)
नृचक्षसो अनिमिषन्तो अर्हणा बृहद्देवासो अमृतत्वमानशुः.
ज्योतीरथा अहिमाया अनागसो दिवो वर्म्माणं वसते स्वस्तये.. (४)
बिना पलक गिराए यज्ञकर्म के नेताओं को देखने वाले देवों ने लोक की रक्षा के लिए
विस्तृत अमृत प्राप्त किया था. तेजस्वी रथ वाले, विघ्नरहित यज्ञकर्मों वाले व पापरहित
देवगण लोगों के कल्याण के लिए स्वर्ग के उन्नत प्रदेश में रहते हैं. (४)
सम्राजो ये सुवृधो यज्ञमाययुरपरिह्वृता दधिरे दिवि क्षयम्.
ताँ आ विवास नमसा सुवृत्तिभिर्महो आदित्याँ अदितिं स्वस्तये.. (५)
अपने तेज से भली-भांति सुशोभित एवं भली प्रकार उन्नत जो देव यज्ञ में आते हैं एवं
किसी के द्वारा भी अहिंसित होकर स्वर्ग में रहते हैं, उन महान् देवों और अदिति की सेवा
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कल्याण के निमित्त नमस्कार एवं शोभन स्तुतियों द्वारा करो. (५)
को वः स्तोमं राधति यं जुजोषथ विश्वे देवासो मनुषो यति ष्ठन.
को वोऽध्वरं तुविजाता अरं करद्यो नः पर्षदत्यंहः स्वस्तये.. (६)
हे देवो! मेरे अतिरिक्त कौन तुम्हारी स्तुति कर सकता है, जिसकी तुम सेवा करो? हे
ज्ञाता देवो! तुम संतान वाले बनो. मेरे अतिरिक्त कौन यजमान स्तुतियों द्वारा तुम्हारा यज्ञ
अलंकृत करता है. यज्ञ हमें पाप से बचाकर हमारा कल्याण करता है. (६)
येभ्यो होत्रां प्रथमामायेजे मनुः समिद्धाग्निर्मनसा सप्त होतृभिः.
त आदित्या अभयं शर्म यच्छत सुगा नः कर्त सुपथा स्वस्तये.. (७)
सबसे पहले मनु श्रद्धायुक्त मन से सात होताओं के साथ अग्नि प्रज्वलित करके स्तुतियों
द्वारा जिन देवों का यजन करते हैं, वे देव हमें निर्भय करें, कल्याण दें एवं हमारी भलाई के
लिए सभी मार्गों को सुगम बनावें. (७)
य ईशिरे भुवनस्य प्रचेतसो विश्वस्य स्थातुर्जगतश्च मन्तवः.
ते नः कृतादकृतादेनसस्पर्रद्यद्या देवासः पिपृता स्वस्तये.. (८)
उत्तम ज्ञान वाले एवं सर्वज्ञ देव समस्त जंगम लोक के स्वामी हैं. हे देवो! तुम हमें कृत
अथवा अकृत पाप से बचाकर आज हमारे कल्याण को बढ़ाओ. (८)
भरेष्विन्द्रं सुहवं हवामहेंऽहोमुचं सुकृतं दैव्यं जनम्.
अग्निं मित्रं वरुणं सातये भगं द्यावापृथिवी मरुतः स्वस्तये.. (९)
हम पाप से छुड़ाने वाले, शोभन-आह्वान वाले एवं शोभन कर्म वाले देवों के संबंधी इंद्र
को सब यज्ञों में बुलाते हैं. हम अन्नलाभ और अविनाशी बनने के लिए अग्नि, मित्र, वरुण,
भग, द्यावा-पृथिवी और मरुतों को बुलाते हैं. (९)
सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम्.
दैवीं नावं स्वरित्रामनागसमस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये.. (१०)
हम भली प्रकार रक्षा करने वाली, विस्तृत, पापरहित, शोभन, सुखयुक्त, क्षयरहित,
सुदृढ़ गठन वाली, शोभन आचरण युक्त, निष्पाप एवं विनाशरहित द्युलोकरूपी नाव पर
कल्याण के लिए चढ़ें. (१०)
विश्वे यजत्रा अधि वोचतोतये त्रायध्वं नो दुरेवाया अभिद्रुतः.
सत्यया वो देवहूत्या हुवेम शृण्वतो देवा अवसे स्वस्तये.. (११)
हे यज्ञ के पात्र देवो! तुम रक्षा के निमित्त हमसे कहो एवं विनाश करने वाली दुर्गति से
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हमें बचाओ. हम सत्यरूप यज्ञ द्वारा तुम्हें बुलाते हैं. रक्षा और कल्याण के लिए तुम हमारी
पुकार सुनो. (११)
अपामीवामप विश्वामनाहुतिमपारातिं दुर्विदत्रामघायतः.
आरे देवा द्वेषो अस्मद्युयोतनोरु णः शर्म यच्छता स्वस्तये.. (१२)
हे देवो! हमारे रोगों और देवों का आह्वान न करने वाली दुर्बुद्धि को हमसे दूर करो. तुम
लोभमय बुद्धि को हमसे अलग करो. तुम दुष्ट की पापमय बुद्धि हमसे दूर करो. तुम शत्रुओं
को हमसे दूर कर दो. तुम हमें विशेष सुख और कल्याण प्रदान करो. (१२)
अरिष्टः स मर्तो विश्व एधते प्र प्रजाभिर्जायते धर्मणस्परि.
यमादित्यासो नयथा सुनीतिभिरति विश्वानि दुरिता स्वस्तये.. (१३)
हे अदितिपुत्र देवो! जिन्हें तुम शोभन-मार्गों से ले जाते हो एवं सभी पापों से दूर करके
कल्याण प्रदान करते हो, वे सब लोग सभी अनिष्टों से सुरक्षित रहकर वृद्धि प्राप्त करते हैं एवं
धर्मकार्यों के पश्चात् संतान की उन्नति पाते हैं. (१३)
यं देवासोऽवथ वाजसातौ यं शूरसाता मरुतो हिते धने.
प्रातर्यावाणं रथमिन्द्र सानसिमरिष्यन्तमा रुहेमा स्वस्तये.. (१४)
हे देवो! अन्नलाभ के लिए तुम जिसकी रक्षा करते हो, हे मरुतो! युद्ध में संचित धन पाने
के लिए तुम जिस रथ की रक्षा करते हो, हे इंद्र! उसी प्रातःकाल युद्ध में जाने वाले, सेवन
करने योग्य एवं ध्वस्त न होने वाले रथ पर हम कल्याण के लिए चढ़ें. (१४)
स्वस्ति नः पथ्यासु धन्वसु स्वस्त्य१प्सु वृजने स्वर्वति.
स्वस्ति नः पुत्रकृथेषु योनिषु स्वस्ति राये मरुतो दधातन.. (१५)
हे मरुतो! शोभन-पथ वाले देश एवं मरुस्थल दोनों में हमारा कल्याण हो. जल एवं
आयुधों से युक्त युद्ध में हमारा कल्याण करो. पुत्रों को उत्पन्न करने वाली नारियों में हमारा
कल्याण हो. तुम धनलाभ के लिए हमारा कल्याण करो. (१५)
स्वस्तिरिद्धि प्रपथे श्रेष्ठा रेक्णस्वत्यभि या वाममेति.
सा नो अमा सो अरणे नि पातु स्वावेशा भवतु देवगोपा.. (१६)
जो धरती मार्ग पर चलने के लिए कल्याणकारिणी है, सर्वोत्तम धनसंपन्न एवं यज्ञ की
उत्तर वेदी पर प्राप्त होने वाली है, वह घर एवं वन दोनों में हमारी रक्षा करे. देवों द्वारा सुरक्षित
वह धरती हमारे लिए सुखपूर्वक रहने योग्य हो. (१६)
एवा प्लतेः सूनुरवीवृधद्धो विश्व आदित्या अदिते मनीषी.
ईशानासो नरो अमर्त्येनास्तावि जनो दिव्यो गयेन.. (१७)
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