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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

सूक्त—२ देवता—आप्री

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हे अग्नि! मेरे लिए तुम अन्नों को विशेषरूप से शुद्ध करना. हे देव! हम हव्ययुक्तों को
तुम अन्न दो. हम यजमान और स्तोता दोनों तुम्हारे दान के पात्र बनें. सदा कल्याणों द्वारा
हमारा पालन करो. (२५)
सूक्त—२ देवता—आप्री
जुषस्व नः समिधमग्ने अद्य शोचा बृहद्यजतं धूममृण्वन्.
उप स्पृश दिव्यं सानु स्तूपैः सं रश्मिभिस्ततनः सूर्यस्य.. (१)
हे अग्नि! आज हमारी समिधा को स्वीकार करो. यज्ञ के योग्य एवं प्रशंसनीय धुआं
उठाते हुए जलों एवं अपनी गर्म लपटों से ऊंचे आकाश को छुओ. तुम सूर्य से मिल जाओ.
(१)
नराशंसस्य महिमानमेषामुप स्तोषाम यजतस्य यज्ञैः.
ये सुक्रतवः शुचयो धियंधाः स्वदन्ति देवा उभयानि हव्या.. (२)
जो देव शोभनकर्म वाले, तेजस्वी, यज्ञकर्मों के धारक एवं दोनों प्रकार के हव्यों को
स्वीकार करने वाले हैं, हम उन देवों के बीच में यज्ञयोग्य एवं मनुष्यों द्वारा प्रशंसनीय अग्नि
की महिमा का वर्णन स्तुतियों द्वारा करते हैं. (२)
ईळेन्यं वो असुरं सुदक्षमन्तर्दूतं रोदसी सत्यवाचम्.
मनुष्वदग्निं मनुना समिद्धं समध्वराय सदमिन्महेम.. (३)
हे अध्वर्युगण! तुम स्तुति के योग्य, शक्तिशाली, शोभनबुद्धि वाले, धरती-आकाश के
बीच में देवों के दूतरूप में विचरण करने वाले, सत्यवचन, मनुष्य के समान और मन द्वारा
प्रज्वलित अग्नि को यज्ञ के लिए पूजते हो. (३)
सपर्यवो भरमाणा अभिज्ञु प्र वृञ्जते नमसा बर्हिरग्नौ.
आजुह्वाना घृतपृष्ठं पृषद्वदध्वर्यवो हविषा मर्चयध्वम्.. (४)
सेवा करने के अभिलाषी एवं घुटनों के सहारे बैठकर पात्रों में सोमरस भरते हुए अध्वर्यु
हव्य के साथ अग्नि को बर्हि देते हैं. हे अध्वर्युगण! घी से भीगे हुए एवं बड़ी-बड़ी बूंदों वाले
बर्हि को हव्य के साथ अग्नि में वहन करो. (४)
स्वाध्यो३ वि दुरो देवयन्तोऽशिश्रयू रथयुर्देवताता.
पूर्वी शिशुं न मातरा रिहाणे समग्रुवो न समनेष्वञ्जन्.. (५)
शोभनकर्म वाले, देवों की अभिलाषा करने वाले एवं रथ चाहने वाले लोगों ने यज्ञ में
द्वारों का सहारा लिया, अध्वर्युगण यज्ञ में प्राचीना जुहू एवं उपभृति को नदी के समान घी से
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सींचते हैं. वे अग्नि को इसी प्रकार चाटती हैं, जिस प्रकार गाय अपने बछड़े को चाटती है.
(५)
उत योषणे दिव्ये मही न उषासानक्ता सुदुघेव धेनुः.
बर्हिषदा पुरुहूते मघोनी आ यज्ञिये सुविताय श्रयेताम्.. (६)
युवा, दिव्य, महान्, कुशों पर बैठे हुए, बहुतों द्वारा स्तुत, संपत्ति के स्वामी एवं यज्ञ के
पात्र निशा-दिवस कामधेनु गाय के समान कल्याण के निमित्त हमारा आश्रय लें. (६)
विप्रा यज्ञेषु मानुषेषु कारू मन्ये वां जातवेदसा यजध्यै.
ऊर्ध्वं नो अध्वरं कृतं इवेषु ता देवेषु वनथो वार्याणि.. (७)
हे मेधावी, धनसंपन्न एवं मनुष्यों द्वारा किए जा रहे यज्ञों में काम करने वाले होताओ! मैं
यज्ञ करने के हेतु तुम्हारी स्तुति करता हूं. स्तुतियां पूर्ण हो जाने पर हमारे यज्ञ को देवों की
ओर प्रेरित करो एवं देवों के पास विद्यमान धन हमें दो. (७)
आ भारती भारतीभिः सजोषो इळा देवैर्मनुष्येभिरग्निः.
सरस्वती सारस्वतेभिरर्वाक् तिस्रो देवीर्बर्हिरिदं सदन्तु.. (८)
सूर्य की पत्नी भारती अर्थात् अग्नि सूर्यसंबंधियों तथा इस मनुष्यलोक के देवों के साथ
आवें. सरस्वती मध्यस्थित देवों के साथ पधारें. तीनों देवियां यज्ञ में कुशों पर बैठें. (८)
तन्नस्तुरीपमध पोषयित्नु देव त्वष्टर्वि रराणः स्यस्व.
यतो वीरः कर्मण्यः सुदक्षो युक्तग्रावा जायते देवकामः.. (९)
हे त्वष्टा देव! तुम प्रसन्न होते हुए ऐसा शीघ्रताकारक एवं पोषक वीर्य हमें प्रदान करो,
जिसके द्वारा हम कार्यकुशल, शक्तिशाली, सोम निचोड़ने हेतु पत्थर उठाने वाले, देवाभिलाषी
एवं वीरपुत्र उत्पन्न करें. (९)
वनस्पतेऽव सृजोप देवानग्निर्हविः शमिता सूदयाति.
सेदु होता सत्यतरो यजाति यथा देवानां जनिमानि वेद.. (१०)
हे वनस्पति! देवों को हमारे पास लाओ. अग्निरूप वनस्पति संस्कारक होकर देवों के
प्रति हव्य को प्रेरित करें. वे ही देवों के बुलाने वाले बनकर यज्ञ करते हैं. वे देवों का जन्म
जानते हैं. (१०)
आ याह्यग्ने समिधानो अर्वाङ् इन्द्रेण देवैः सरथं तुरेभिः.
बर्हिर्न आस्तामदितिः सुपुत्रा स्वाहा देवा अमृता मादयन्ताम्.. (११)
हे प्रज्वलित अग्नि! तुम इंद्र एवं शीघ्रता करने वाले अन्य देवों के साथ एक रथ पर
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बैठकर हमारे सामने आओ. शोभनपुत्रों वाली अदिति हमारे कुशों पर बैठें. मरणरहित देवगण
स्वाहा के साथ एकाकार बनकर प्रसन्न हों. (११)
सूक्त—३ देवता—अग्नि
अग्निं वो देवमग्निभिः सजोषा यजिष्ठं दूतमध्वरे कृणुध्वम्.
यो मर्त्येषु निध्रुविॠतावा तपुर्मूर्धा घृतान्नः पावकः.. (१)
हे देवो! तुम अन्य अग्नियों के साथ प्रकाशित एवं अतिशय यज्ञपात्र उन अग्नि देव को
यज्ञों में देवों का दूत बनाओ, जो मनुष्यों में अधिक स्थिर, यज्ञयुक्त, तापसहित तेज वाले,
घृतयुक्त अन्न वाले व शुद्धिकर्त्ता हैं. (१)
प्रोथदश्वो न यवसेऽविष्यन्यदा महः संवरणाद्व्यस्थात्.
आदस्य वातो अनु वाति शोचिरध स्म ते व्रजनं कृष्णमस्ति.. (२)
जिस समय दारुरूप अग्नि घास खाते एवं हिनहिनाने वाले घोड़ों के समान पेड़ों में
स्थित रहते हैं, उस समय उनकी दीप्ति वायु के सहारे प्रकाशित होती है. हे अग्नि! इसके
पश्चात् तुम्हारा मार्ग काले रंग का हो जाता है. (२)
उद्यस्य ते नवजातस्य वृष्णोऽग्ने चरन्त्यजरा इधानाः.
अच्छा द्यामरुषो धूम एति सं दूतो अग्न ईयसे हि देवान्.. (३)
हे नवजात एवं कामपूरक अग्नि! तुम्हारी जो धूमरहित ज्वालाएं उठती हैं, उनको प्रकट
करता हुआ धुआं आकाश में जाता है. हे अग्नि! तुम दूत बनकर देवों के पास जाते हो. (३)
वि यस्य ते पृथिव्यां पाजो अश्रेत्तृषु यदन्ना समवृक्त जम्भैः.
सेनेव सृष्टा प्रसितिष्ट एति यवं न दस्म जुह्वा विवेक्षि.. (४)
हे अग्नि! जिस समय तुम ज्वलारूपी दांतों से काष्ठरूपी अन्न को खाते हो, उस समय
तुम्हारा तेज शीघ्रता से धरती पर फैलता है. तुम्हारी ज्वाला सेना के समान उन्मुक्त होकर
जाती है. हे दर्शनीय अग्नि! तुम अपनी ज्वालाओं से काष्ठों में जौ आदि के समान प्रवेश करते
हो. (४)
तमिद्दोषा तमुषसि यविष्ठमग्निमर्त्यं न मर्जयन्त नरः.
निशिशाना अतिथिमस्य योनौ दीदाय शोचिराहुतस्य वृष्णः.. (५)
अतिशय युवा अतिथि के समान पूज्य अग्नि को यज्ञशाला में रात-दिन प्रज्वलित करते
हुए लोग सततगामी अश्व के समान उनकी पूजा करते हैं. बुलाए हुए एवं अभिलाषापूरक
अग्नि की शिखा दीप्त होती है. (५)
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सुसन्दृक्ते स्वनीक प्रतीकं वि यद्द्युक्मो न रोचस उपाके.
दिवो न ते तन्यतुरेति शुष्मश्चित्रो न सूरः प्रति चक्षि भानुम्.. (६)
हे शोभनतेज वाले अग्नि! तुम जिस समय सूर्य के समान हमारे पास विशेषरूप से
चमकते हो. उस समय तुम्हारा रूप भली-भांति दर्शनीय होता है. तुम्हारा तेज स्वर्ग से वज्र के
समान निकलता है. तुम सुंदर सूर्य के समान अपना प्रकाश फैलाते हो. (६)
यथा वः स्वाहाग्नये दाशेम परीळाभिर्घृतवद्भिश्च हव्यैः.
तेभिर्नो अग्ने अमितैर्महोभिः शतं पूर्भिरायसीभिर्नि पाहि.. (७)
हे अग्नि! हम जिस प्रकार गव्य एवं घी आदि मिले हव्य द्वारा स्वाहा शब्द के साथ तुम्हें
आहुति देते हैं, उसी प्रकार तुम असीमित तेजों के साथ लौहनिर्मित सौ नगरियों द्वारा हमारी
रक्षा करो. (७)
या वा ते सन्ति दाशुषे अधृष्टा गिरो वा याभिर्नृवतीरुरुष्याः.
ताभिर्नः सूनो सहसो नि पाहि स्मत्सूरीञ्जरितॄञ्जातवेदः.. (८)
हे बलपुत्र जातवेद एवं दानशील अग्नि! तुम अपनी शिखाओं एवं संतानयुक्त प्रजाओं
की रक्षा करने वाले वचनों द्वारा हमारी रक्षा करो तथा प्रशंसनीय हव्य देने वाले स्तोताओं की
रक्षा करो. (८)
निर्यत्पूतेव स्वधितिः शुचिर्गात् स्वया कृपा तन्वा३ रोचमानः.
आ यो मात्रोरुशेन्त्यो जनिष्ट देवयज्याय सुक्रतुः पावकः.. (९)
विशुद्ध अग्नि जिस समय अपनी विशाल कृपा से दीप्त होकर काष्ठ से तेज फरसे के
समान निकलते हैं, उस समय कमनीय, शोभनकर्मों वाले, पावक एवं मातारूप दो अरणियों
से उत्पन्न अग्नि यज्ञ के योग्य बनते हैं. (९)
एता नो अग्ने सौभगा दिदीह्यपि क्रतुं सुचेतसं वतेम.
विश्वा स्तोतृभ्यो गृणते च सन्तु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (१०)
हे अग्नि! हमें ये ही धन प्रदान करो. हम यज्ञकर्म करने वाला तथा उत्तम ज्ञानयुक्त पुत्र
प्राप्त करें. सारा धन स्तोताओं एवं गान करने वालों को मिले. तुम कल्याणसाधनों द्वारा
हमारी सदा रक्षा करो. (१०)
सूक्त—४ देवता—अग्नि
प्र वः शुक्राय भानवे भरध्वं हव्यं मतिं चाग्नये सुपूतम्.
यो दैव्यानि मानुषा जनूंष्यन्तर्विश्वानि विद्मना जिगाति.. (१)
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हे हव्यवहन करने वाले लोगो! तुम शुभ एवं दीप्ति के लिए शुद्ध हव्य एवं स्तुति समर्पित
करो. अग्नि देवों तथा मानवों से उत्पन्न सभी पदार्थों के मध्य अपनी बुद्धि द्वारा चलते हैं. (१)
स गृत्सो अग्निस्तरुणश्चिदस्तु यतो यविष्ठो अजनिष्ट मातुः.
सं यो वना युवते शुचिदन् भूरि चिदन्ना समिदत्ति सद्यः.. (२)
जो अतिशय युवा अग्नि मातारूप अरणियों से उत्पन्न हुए हैं, वे ही मेधावी अग्नि तरुण
बनें. दीप्ति ज्वालारूपी दांतों वाले अग्नि वनों को आत्मसात् करते हैं एवं शीघ्र ही बहुत से
अन्नों को खाते हैं. (२)
अस्य देवस्य संसद्यनीके यं मर्तासः श्येतं जगृभ्रे.
नि यो गृभं पौरुषेयीमुवोच दुरोकमग्निरयवे शुशोच.. (३)
मनुष्य शुभ्र अग्नि को प्रमुख स्थान में गृहीत करते हैं. अग्नि मनुष्यों द्वारा की गई सेवा
स्वीकार करते हैं. वे मानवों के कल्याण के लिए इस प्रकार दीप्त होते हैं कि शत्रु उन्हें सहन
नहीं कर पाते. (३)
अयं कविरकविषु प्रचेता मर्तेष्वग्निरमृतो नि धायि.
स मा नो अत्र जुहुरः सहस्वः सदा त्वे सुमनसः स्याम.. (४)
कवि, प्रकाशक एवं मरणरहित अग्नि अकवि एवं मरणधर्मा लोगों में विराजमान हैं. हे
शक्तिशाली अग्नि! हम लोक में तुम्हारे प्रति शोभनमन वाले हों. तुम हमारी हिंसा मत करना.
(४)
आ यो योनिं देवकृतं ससाद क्रत्वा ह्य१ग्निरमृताँ अतारीत्.
तमोषधीश्च वनिनश्च गर्भं भूमिश्च विश्वधायसं बिभर्ति.. (५)
अग्नि ने बुद्धि द्वारा देवों को तारा है. वे देवों द्वारा बनाए हुए स्थान पर बैठते हैं.
ओषधियां, वृक्ष एवं भूमि सबके धारणकर्त्ता एवं गर्भरूप को अपने में रखते हैं. (५)
ईशे ह्य१ग्निरमृतस्य भूरेरीशे रायः सुवीर्यस्य दातोः.
मा त्वा वयं सहसावन्नवीरा माप्सवः परि षदाम मादुवः.. (६)
अग्नि अधिक मात्रा में अमृत देने में समर्थ हैं. वे उत्तम वीर्य वाला धन दे सकते हैं. हे
बलवान् अग्नि! हम संतानहीन, रूपरहित एवं बिना सेवा के न बैठें. (६)
परिषद्यं ह्यररणस्य रेक्णो नित्यस्य रायः पतयः स्याम.
न शेषो अग्ने अन्यजातमस्त्यचेतानस्य मा पथो वि दुक्षः.. (७)
ऋणरहित व्यक्ति का धन पर्याप्त होता है. हम नित्य धन के स्वामी हों. हे अग्नि! हमारी
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संतान दूसरों से उत्पन्न नहीं है. तुम हमारा मार्ग अज्ञानियों का मत समझो. (७)
नहि ग्रभायारणः सुशेवोऽन्योदर्यो मनसा मन्तवा उ.
अधा चिदोकः पुनरित्स एत्या नो वाज्यभीषाळेतु नव्यः.. (८)
अन्य से उत्पन्न पुत्र प्रसन्नता एवं सुख देने वाला होने पर भी मन से पुत्ररूप में ग्रहण
नहीं होता. वह अपने ही स्थान पर पहुंच जाता है. अन्न का स्वामी, शत्रुओं को हराने वाला एवं
नव उत्पन्न पुत्र हमारे समीप आवे. (८)
त्वमग्ने वनुष्यतो नि पाहि त्वमु नः सहसावन्नवद्यात्.
सं त्वा ध्वस्मन्वदभ्येतु पाथः सं रयिः स्पृहयाय्यः सहसी.. (९)
हे अग्नि! तुम हिंसक से हमारी रक्षा करो. हे शक्तिशाली अग्नि! तुम हमें पाप से
बचाओ. दोषरहित अन्न हवि के रूप में तुम्हें प्राप्त हो. हमें हजारों प्रकार का अभिलषणीय
धन मिले. (९)
एता नो अग्ने सौभगा दिदीह्यपि क्रतुं सुचेतसं वतेम.
विश्वा स्तोतृभ्यो गृणते च सन्तु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (१०)
हे अग्नि! हमें ये ही धन प्रदान करो. हम यज्ञकर्म करने वाला तथा उत्तम ज्ञानयुक्त पुत्र
प्राप्त करें. सारा धन स्तोताओं और गान करने वालों को मिले. तुम कल्याणसाधनों द्वारा
हमारी सदा रक्षा करो. (१०)
सूक्त—५ देवता—वैश्वानर अग्नि
प्राग्नये तवसे भरध्वं गिरं दिवो अरतये पृथिव्याः.
यो विश्वेषाममृतानामुपस्थे वैश्वानरो वावृधे जागृवद्भिः.. (१)
हे स्तोताओ! प्रवृद्ध एवं अंतरिक्ष व धरती पर चलने वाले अग्नि की स्तुति करो. वे
वैश्वानर अग्नि यज्ञ में जागने वाले मरणरहित देवों के साथ बढ़ते हैं. (१)
पृष्टो दिवि धाय्यग्निः पृथिव्यां नेता सिन्धूनां वृषभः स्तियानाम्.
स मानुषीरभि विशो वि भाति वैश्वानरो वावृधानो वरेण.. (२)
सरिताओं के नेता, जलों को बरसाने वाले एवं तेजयुक्त जो अग्नि धरती और आकाश में
गतिशील होते हैं, वे ही वैश्वानर अग्नि उत्तम हव्य के द्वारा बढ़ते हुए मानव प्रजाओं के सामने
शोभा पाते हैं. (२)
त्वद्विया विश आयन्नसिक्नीरसमना जहतीर्भोजनानि.
वैश्वानर पूरवे शोशुचानः पुरो यदग्ने दरयन्नदीदेः.. (३)
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हे वैश्वानर अग्नि! उस समय तुम्हारे भय से काले रंग की प्रजाएं आपस में बिखरकर
भोजन त्यागती हुई भाग गई थीं, जिस समय तुमने दीप्त होकर राजा पुरु के कल्याण के लिए
उसके शत्रु के नगरों को जलाया था। (३)
तव त्रिधातु पृथिवी उत द्यौर्वैश्वानर व्रतमग्ने सचन्त.
त्वं भासा रोदसी आ ततन्थाजस्रेण शोचिषा शोशुचान:.. (४)
हे वैश्वानर अग्नि! धरती, आकाश और स्वर्ग-तीनों तुम्हें प्यारा लगने वाला काम करते
हैं. तुम नित्य तेज से दीप्तिमान होकर धरती-आकाश को विस्तृत करते हो. (४)
त्वामग्ने हरितो वावशाना गिर: सचन्ते धुनयो घृताची:.
पतिं कृष्टीनां रथ्यं रयीणां वैश्वानरमुषसां केतुमह्नाम्.. (५)
हे वैश्वानर अग्नि! तुम प्रजाओं के स्वामी, धनों के नेता तथा उषाओं व दिवसों के केतु
हो. तुम्हारी कामना करते हुए अश्व एवं मानवों की पापरहित तथा हव्ययुक्त स्तुतियां तुम्हारी
सेवा करती हैं. (५)
त्वे असुर्यं१ वसवो न्यृण्वन्क्रतुं हि ते मित्रमहो जुषन्त.
त्वं दस्यूँरोकसो अग्न आज उरु ज्योतिर्जनयन्नार्याय.. (६)
हे मित्रों की पूजा करने वाले अग्नि! वसुओं ने तुम में बल धारण किया है एवं तुम्हारे
यज्ञ को स्वीकार किया है. तुम यज्ञकर्त्ता के लिए अधिक तेज उत्पन्न करते हुए दस्युओं को
उनके स्थान से निकालो. (६)
स जायमान: परमे व्योमन्वायोर्न पाथ: परि पासि सद्य:.
त्वं भुवना जनयन्नभि क्रन्नपत्याय जातवेदो दशस्यन्.. (७)
हे वैश्वानर! परम व्योम में तुम सूर्यरूप से उत्पन्न होकर वायु के समान सबसे पहले
सोमरस पीते हो. हे जातवेद अग्नि! तुम जलों को उत्पन्न करते हुए एवं पुत्रवत् पालनीय
यजमान की अभिलाषाएं पूरी करते हुए बिजली के रूप में गरजते हो. (७)
तामग्ने अस्मे इषमेरयस्व वैश्वानर द्युमतीं जातवेद:.
यया राध: पिन्वसि विश्ववार पृथु श्रवो दाशुषे मर्त्याय.. (८)
हे जातवेद, सबके द्वारा वरणीय एवं वैश्वानर अग्नि! तुम हमें वही दीप्तिमान अन्न दो,
जिसके द्वारा तुम धन की रक्षा करते हो एवं हव्यदाता मनुष्य को विस्तृत कीर्ति देते हो. (८)
तं नो अग्ने मघवद्भ्य: पुरुक्षुं रयिं नि वाजं श्रुत्यं युवस्व.
वैश्वानर महि न: शर्म यच्छ रुद्रेभिरग्ने वसुभि: सजोषा:.. (९)
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