ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—३५ देवता—विश्वेदेव
तन्न इन्द्रो वरुणो मित्रो अग्निरप ओषधीर्वनिनो जुषन्त.
शर्मन्त्स्याम मरुतामुपस्थे यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (२५)
इंद्र, वरुण, मित्र, अग्नि, जल, ओषधियां एवं वृक्ष हमारे इस स्तोत्र को सुनें. मरुतों के
समीप रहकर हम सुखी रहेंगे. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (२५)
सूक्त—३५ देवता—विश्वेदेव
शं न इन्द्राग्नी भवतामवोभिः शं न इन्द्रावरुणा रातहव्या.
शमिन्द्रासोमा सुविताय शं योः शं न इन्द्रापूषणा वाजसातौ.. (१)
इंद्र एवं अग्नि अपने रक्षासाधनों द्वारा हमारे लिए शांतिकारक हों. यजमानों द्वारा हव्य
प्राप्त करने वाले इंद्र एवं वरुण हमारे लिए शांतिदाता हों. इंद्र एवं सोम हमारे लिए शांति तथा
सुख के कारण बनें. इंद्र तथा पूषा हमें युद्ध में शांतिकारक हों. (१)
शं नो भगः शमु नः शंसो अस्तु शं नः पुरन्धिः शमु सन्तु रायः.
शं नः सत्यस्य सुयमस्य शंसः शं नो अर्यमा पुरुजातो अस्तु.. (२)
भग एवं नराशंस हमारे लिए शांति देने वाले हों. पुरंधि एवं समस्त संपत्तियां हमें शांति
दें. शोभन यम से युक्त सत्य का वचन हमें शांतिदाता हो. अनेक बार उत्पन्न अर्यमा हमारे लिए
शांति दें. (२)
शं नो धाता शमु धर्ता नो अस्तु शं न उरूची भवतु स्वधाभिः.
शं रोदसी बृहती शं नो अद्रिः शं नो देवानां सुहवानि सन्तु.. (३)
धाता देव एवं धर्ता वरुण हमें शांति दें. अन्नों के साथ धरती हमें शांति दे. विशाल द्यावा-
पृथिवी हमें शांति दें. देवों की उत्तम स्तुतियां हमें शांति दें. (३)
शं नो अग्निर्ज्योतिरनीको अस्तु शं नो मित्रावरुणावश्विना शम्.
शं नः सुकृतां सुकृतानि सन्तु शं न इषिरो अभि वातु वातः.. (४)
ज्योतिरूपी मुख वाले अग्नि हमें शांति दें. मित्र, वरुण एवं अश्विनीकुमार हमें शांति दें.
उत्तम कर्म करने वाले के उत्तम कर्म हमें शांति दें. चलने वाली हवा हमें शांति दे. (४)
शं नो द्यावापृथिवी पूर्वहूतौ शमन्तरिक्षं दृशये नो अस्तु.
शं न ओषधीर्वनिनो भवन्तु शं नो रजसस्पतिरस्तु जिष्णुः.. (५)
द्यावा-पृथिवी पहली बार पुकारने पर ही हमें शांति दें. अंतरिक्ष हमारे देखने के लिए
शांतिदाता हो. ओषधियां तथा वृक्ष हमें शांति दें. लोक के पति इंद्र हमें शांति दें. (५)
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शं न इन्द्रो वसुभिर्देवो अस्तु शमादित्येभिर्वरुणः सुशंसः.
शं नो रुद्रो रुद्रेभिर्जलाषः शं नस्त्वष्टा ग्नाभिरिह शृणोतु.. (६)
वसुओं के साथ इंद्र देव हमें शांति दें. शोभनस्तुति वाले वरुण आदित्यों के साथ हमें
शांति दें. दुःखनाशक रुद्र रुद्रों के साथ हमें शांति दें. इस यज्ञ में त्वष्टादेव पत्नियों के साथ हमें
शांति दें एवं हमारी स्तुतियां सुनें. (६)
शं नः सोमो भवतु ब्रह्म शं नः शं नो ग्रावाणः शमु सन्तु यज्ञाः.
शं नः स्वरूणां मितयो भवन्तु शं नः प्रस्व१: शम्वस्तु वेदिः.. (७)
सोम एवं स्तुतिसमूह हमें शांति दें. सोम कूटने के साधन पत्थर एवं यज्ञ हमें शांति दें.
यूपों के नाम हमें शांति दें. ओषधियां एवं यज्ञदेवी हमारे लिए शांतिकारक हों. (७)
शं नः सूर्य उरुचक्षा उदेतु शं नश्चतस्रः प्रदिशो भवन्तु.
शं नः पर्वता ध्रुवयो भवन्तु शं नः सिन्धवः शमु सन्त्वापः.. (८)
विस्तृत तेज वाला सूर्य हमारी शांति के लिए उदित हो. चारों महादिशाएं हमारी शांति के
लिए हों. दृढ़ पर्वत हमें शांति दें. नदियां एवं जल हमें शांति दें. (८)
शं नो अदितिर्भवतु व्रतेभिः शं नो भवन्तु मरुतः स्वर्काः.
शं नो विष्णुः शमु पूषा नो अस्तु शं नो भवित्रं शम्वस्तु वायुः.. (९)
यज्ञकर्मों के साथ अदिति हमें शांति दें. शोभनस्तुति वाले मरुद्गण हमारे लिए
शांतिकारक हों. विष्णु एवं पूषा हमारे लिए शांति दें. अंतरिक्ष एवं वायु हमारे लिए शांति दें.
(९)
शं नो देवः सविता त्रायमाणः शं नो भवन्तूषसो विभातीः.
शं नः पर्जन्यो भवतु प्रजाभ्यः शं नः क्षेत्रस्य पतिरस्तु शम्भुः.. (१०)
रक्षा करते हुए सविता देव हमें शांति दें. अंधकार का नाश करती हुई उषाएं हमें शांति
दें. बादल हमारी प्रजा के लिए शांतिकारक हों. सुख देने वाले क्षेत्रपति हमें शांति दें. (१०)
शं नो देवा विश्वदेवा भवन्तु शं सरस्वती सह धीभिरस्तु.
शमभिषाचः शमु रातिषाचः शं नो दिव्याः पार्थिवाः शं नो अप्याः.. (११)
दीप्तियुक्त विश्वेदेव हमें शांति दें. सरस्वती यज्ञकर्मों के साथ हमें शांति दें. यज्ञ एवं दान
करने वाले हमें शांति दें. स्वर्ग, पृथिवी एवं अंतरिक्ष हमें शांति दें. (११)
शं नः सत्यस्य पतयो भवन्तु शं नो अर्वन्तः शमु सन्तु गावः.
शं न ऋभवः सुकृतः सुहस्ताः शं नो भवन्तु पितरो हवेषु.. (१२)
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सत्यपालक देव हमारे लिए शांति के कारण हों. घोड़े एवं गाएं हमें शांति दें. शोभनकर्म
एवं हाथों वाले ऋभु हमें शांति दें. स्तुतियां बोली जाने पर पितर हमें शांति दें. (१२)
शं नो अज एकपाद्देवो अस्तु शं नोऽहिर्बुध्न्यः शं समुद्रः.
शं नो अपां नपात्पेरुरस्तु शं नः पृश्रिर्भवतु देवगोपा.. (१३)
अजएकपाद देव हमें शांति दें. अहिर्बुध्न्य एवं समुद्र हमें शांति दें. उपद्रव से पार पहुंचाने
वाले अपांनपात् हमें शांति दें. देवों द्वारा रक्षित पृश्नि हमें शांति दें. (१३)
आदित्या रुद्रा वसवो जुषन्तेदं ब्रह्म क्रियमाणं नवीयः.
शृण्वन्तु नो दिव्याः पार्थिवासो गोजाता उत ये यज्ञियासः.. (१४)
आदित्यों, रुद्रों एवं वसुओं का समूह हमारे इस नए बनाए हुए स्तोत्र को सुने. स्वर्ग में
उत्पन्न, धरती पर उत्पन्न एवं पृश्नि से उत्पन्न यज्ञपात्र अन्य देव भी इसे सुनें. (१४)
ये देवानां यज्ञिया यज्ञियानां मनोर्यजत्रा अमृता ऋतज्ञाः.
ते नो रासन्तामुरुगायमद्य यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (१५)
जो देव यज्ञपात्र देवों के भी यज्ञपात्र एवं मनु के यजनीय हैं, जो मरणरहित एवं सत्य
जानने वाले हैं, वे आज हमें विशाल कीर्ति वाला पुत्र दें एवं कल्याणसाधनों से सदा हमारी
रक्षा करें. (१५)
सूक्त—३६ देवता—विश्वेदेव
प्र ब्रह्मैतु सदनादृतस्य वि रश्मिभिः ससृजे सूर्यो गाः.
वि सानुना पृथिवी सस्र उर्वी पृथु प्रतीकमध्येधे अग्निः.. (१)
हमारा स्तोत्र यज्ञशाला से सूर्य आदि देवों के पास भली प्रकार जावें. सूर्य ने अपनी
किरणों से वर्षा का जल बनाया है. पृथिवी अपने पर्वतों की चोटियों द्वारा विस्तृतस्वरूप में फैली
है. धरती के विस्तृत अंगों के ऊपर अग्नि प्रज्वलित होते हैं. (१)
इमां वां मित्रावरुणा सुवृक्तिमिषं न कृण्वे असुरा नवीयः.
इनो वामन्यः पदवीरदब्धो जनं च मित्रो यतिति ब्रुवाणः.. (२)
हे शक्तिशाली मित्र एवं वरुण! मैं हव्यरूप अन्न के समान नवीन स्तुति तुम्हें सुनाता हूं.
तुम में एक वरुण सबके स्वामी, शत्रुओं द्वारा अपराजित एवं धर्माधर्म के निर्णायक हैं एवं
दूसरे मित्र हमारी स्तुति सुनकर प्राणियों को अपने काम में लगाते हैं. (२)
आ वातस्य ध्रजतो रन्त इत्या अपीपयन्त धेनवो न सूदाः.
महो दिवः सदने जायमानोऽचिक्रदद् वृषभः सस्मिन्नूधन्.. (३)
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वायु की गतियां सब ओर शोभा पाती हैं. दूध देने वाली गायों की वृद्धि होती है. महान्
एवं सूर्य के स्थान अंतरिक्ष में उत्पन्न वर्षाकारक मेघ अंतरिक्ष में गरजता है. (३)
गिरा य एता युनजद्धरी त इन्द्र प्रिया सुरथा शूर धायू.
प्र यो मन्युं रिरिक्षतो मिनात्या सुक्रतुमर्यमणं ववृत्याम्.. (४)
हे शूर इंद्र! जो व्यक्ति तुम्हारे प्यारे, शोभनगति एवं भारवाहक हरि नामक घोड़ों को
स्तुति करता हुआ रथ में जोड़ता है, तुम उसके यज्ञ में आओ. मैं उन शोभनकर्म वाले अर्यमा
को स्तुति के द्वारा बुलाता हूं, जो हिंसा करने वाले मेरे शत्रु का क्रोध नष्ट करते हैं. (४)
यजन्ते अस्य सख्यं वयश्च नमस्विनः स्व ऋतस्य धामन्.
वि पृक्षो बाबधे नृभिः स्तवान इदं नमो रुद्राय प्रेष्ठम्.. (५)
अन्न वाले यजमान अपने यज्ञ में स्थित रहकर कर्म करते हुए रुद्र की मित्रता चाहते हैं.
रुद्र नेताओं को स्तुति सुनकर अन्न देते हैं. मैं रुद्र को नमस्कार करता हूं. (५)
आ यत्साकं यशसो वावशानाः सरस्वती सप्तथी सिन्धुमाता.
याः सुष्वयन्त सुदुघाः सुधारा अभि स्वेन पयसा पीप्यानाः.. (६)
जिन नदियों में सिंधु जलों की माता है, सरस्वती जिन में सातवीं हैं, वे अभिलाषा पूर्ण
करने में समर्थ एवं शोभनधाराओं वाली सरिताएं प्रवाहित होती हैं. अपने जल से भरी हुई
अन्न वाली एवं कामना करती हुई नदियां एक साथ आवें. (६)
उत त्ये नो मरुतो मन्दसाना धियं तोकं च वाजिनोऽवन्तु.
मा नः परि ख्यदक्षरा चरन्त्यवीवृधन्न्युज्यं ते रयं नः.. (७)
प्रसन्न एवं वेगशाली मरुद्गण हमारे यज्ञ और पुत्र की रक्षा करें. व्याप्त एवं संचरण
करने वाली वाग्देवी सरस्वती हमारे अतिरिक्त किसी को न देखें. ये दोनों मिलकर हमारे धन
को बढ़ावें. (७)
प्र वो महीमरमतिं कृणुध्वं प्र पूषणं विदथ्यं१ न वीरम्.
भगं धियोऽवितारं नो अस्याः सातौ वाजं रातिषाचं पुरन्धिम्.. (८)
हे स्तोताओ! तुम सोमरहित एवं विस्तृत धरती को बुलाओ. यज्ञ के योग्य एवं वीर पूषा
को बुलाओ. तुम इस यज्ञ में हमारे कर्मों के रक्षक भग एवं दानकुशल व प्राचीन बाज को
बुलाओ. (८)
अच्छांयं वो मरुतः श्लोक एत्वच्छा विष्णुं निषिक्तमपामवोभिः.
उत प्रजायै गृणते वयो धुर्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (९)
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