ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—८७ देवता—इंद्र
कदा न इन्द्र राय आ दशस्येर्विश्वप्स्न्यस्य स्पृहयाय्यस्य राजन्.. (१५)
हे शूर एवं विविध रूपधारी इंद्र! तुम्हारा प्रसिद्ध सत्य मेरी रक्षा करे. हे वज्रधारी इंद्र!
नाविक जिस प्रकार जल से पार करता है, उसी प्रकार तुम हमें महान् पाप से पार करो. हे
राजा इंद्र! तुम विविध रूप वाला एवं अभिलाषा करने योग्य धन हमें कब दोगे? (१५)
सूक्त—८७ देवता—इंद्र
इन्द्राय साम गायत विप्राय बृहते बृहत्. धर्मकृते विपश्चिते पनस्यवे.. (१)
हे उद्गाताओ! मेधावी, महान्, यज्ञकर्मकर्त्ता, विद्वान् एवं स्तोत्रों के अभिलाषी इंद्र को
बृहत् साम गाकर सुनाओ. (१)
त्वमिन्द्राभिभूरसि त्वं सूर्यमरोचय:. विश्वकर्मा विश्वदेवो मवाँ असि.. (२)
हे इंद्र! तुम शत्रुओं को हराने वाले हो. तुमने सूर्य को तेजस्वी बनाया है. तुम विश्वकर्मा,
विश्वदेव एवं महान् हो. (२)
विभ्राजञ्ज्योतिषा स्वर्अगच्छो रोचनं दिव:. देवास्त इन्द्र सख्याय येमिरे.. (३)
हे इंद्र! तुम अपनी ज्योति द्वारा सूर्य के प्रकाशक बनकर स्वर्ग को दीप्तिशाली बनाने
गए थे. देवों ने तुम्हारी मित्रता के लिए प्रयत्न किया था. (३)
एन्द्र नो गधि प्रिय: सत्राजिदगोह्य:. गिरिनं विश्वतस्पृथु: पतिर्दिव:.. (४)
हे प्रियतम, महान् लोगों को जीतने वाले, किसी के द्वारा न छिपने वाले, पर्वत के समान
चारों ओर विस्तृत एवं स्वर्ग के स्वामी इंद्र! तुम हमारे पास आओ. (४)
अभि हि सत्य सोमपा उभे बभूथ रोदसी. इन्द्रासि सुन्वतो वृध: पतिर्दिव:.. (५)
हे सत्यरूप वाले एवं सोमपानकर्त्ता इंद्र! तुमने द्यावा-पृथिवी को पराजित किया है. तुम
सोमरस निचोड़ने वाले के वर्धक एवं स्वर्ग के स्वामी हो. (५)
त्वं हि शश्वतीनामिन्द्र दर्ता पुरामसि. हन्ता दस्योर्मनोर्वृध: पतिर्दिव:.. (६)
हे इंद्र! तुम शत्रुओं की अनेक नगरियों को तोड़ने वाले हो. तुम दस्युजनों के हंता,
मनुष्यों को बढ़ाने वाले और स्वर्ग के स्वामी हो. (६)
अधा हीन्द्र गिर्वण उप त्वा कामान्मह: ससृज्महे. उदेव यन्त उदभि:.. (७)
हे स्तुति-योग्य इंद्र! जिस प्रकार जलक्रीड़ा करते हुए लोग दूसरों पर जल उछालते हैं,
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उसी प्रकार हम महान् एवं चाहने योग्य स्तोत्र तुम्हारी ओर भेजते हैं. (७)
वार्ण त्वा यव्याभिर्वर्धन्ति शूर ब्रह्माणि. वावृध्वान्सं चिदद्रिवो दिवेदिवे.. (८)
हे शूर एवं वज्रधारी इंद्र! जिस प्रकार नदियां जल से सागर को बढ़ाती हैं, उसी प्रकार
स्तोता तुम्हें बढ़ाते हैं. तुम स्तोत्रों द्वारा बढ़ने वाले हो. (८)
युञ्जन्ति हरी इषिरस्य गाथयोरौ रथ उरुयुगे. इन्द्रवाहा वचोयुजा.. (९)
स्तोता गतिशील इंद्र के विशाल जुए वाले महान् रथ में इंद्र को ढोने वाले एवं आज्ञा मात्र
से जुड़ जाने वाले हरि नामक अश्वों को स्तोत्रों के साथ जोड़ते हैं. (९)
त्वं न इन्द्रा भरँ ओजो नृम्णं शतक्रतो विचर्षणे. आ वीरं पृतनाषहम्.. (१०)
हे बहु कर्म करने वाले, विशेषरूप से देखने वाले, शक्तियुक्त एवं सेना को पराजित करने
वाले इंद्र! हम तुमसे शक्ति और बल मांगते हैं. (१०)
त्वं हि नः पिता वसो त्वं माता शतक्रतो बभूविथ. अधा ते सुम्नमीमहे.. (११)
हे निवासस्थान देने वाले एवं बहुकर्मकर्त्ता इंद्र! तुम हमारे पिता एवं माता बनो. हम
तुमसे सुख की याचना करेंगे. (११)
त्वां शुष्मिन् पुरुहूत वाजयन्तमुप ब्रुवे शतक्रतो. स नो रास्व सुवीर्यम्.. (१२)
हे शक्तिशाली, बहुतों द्वारा बुलाए गए एवं बहुकर्मकर्त्ता इंद्र! तुम बल की इच्छा करने
वाले हो. हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम हमें शोभन संतान वाला धन दो. (१२)
सूक्त—८८ देवता—इंद्र
त्वामिदा ह्यो नरोऽपीप्यन्वज्रिन्भूर्णयः.
स इन्द्र स्तोमवाहसामिह श्रुध्युप स्वसरमा गहि.. (१)
हे वज्रधारी इंद्र! हवि धारण करने वाले यजमानों ने तुम्हें आज और कल सोमरस
पिलाया था. तुम हम स्तोत्रधारियों की स्तुतियां सुनो एवं हमारे घर के पास आओ. (१)
मत्स्वा सुशिप्र हरिवस्तदीमहे त्वे आ भूषन्ति वेधसः.
तव श्रवांस्युपमान्युक्थ्या सुतेष्विन्द्र गिर्वणः.. (२)
हे शोभन साफा वाले, घोड़ों के स्वामी एवं स्तुतियोग्य इंद्र! सेवक तुम्हारे लिए सोमरस
निचोड़ते हैं. तुम उसे पीकर प्रसन्न बनो, हम तुमसे यही याचना करते हैं. सोमरस निचुड़ जाने
पर तुम्हारे अन्न उपमायोग्य एवं प्रशंसनीय हों. (२)
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श्रायन्तइव सूर्य्यं विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत.
वसूनि जाते जनमान ओजसा प्रति भागं न दीधिम.. (३)
हे सेवको! सूर्य की किरणें जिस प्रकार सूर्य से मिली रहती हैं, उसी प्रकार तुम सूर्य के
सभी धनों का भोग करो. इंद्र ने शक्ति द्वारा धन उत्पन्न किए हैं. भविष्य में भी वह धन उत्पन्न
करेंगे. हम उनका धन पैतृक भाग के समान लेंगे. (३)
अनर्शरातिं वसुदामुप स्तुहि भद्रा इन्द्रस्य रातयः.
सो अस्य कामं विधतो न रोषति मनो दानाय चोदयन्.. (४)
हे स्तोता! इंद्र की स्तुति करो. वह पापरहित को धन देते हैं एवं दानशील हैं. इंद्र का दान
कल्याणकारी है. इंद्र यजमान के लिए धन देने को अपने मन को प्रेरित करते हैं, उसकी
अभिलाषाओं में बाधा नहीं डालते. (४)
त्वमिन्द्र प्रतूर्तिष्वभि विश्वा असि स्पृधः.
अशास्तिहा जनिता विश्वतूरसि त्वं तूर्य तरुष्यतः.. (५)
हे इंद्र । तुम युद्धों में सभी शत्रुसेनाओं को पराजित करते हो. हे शत्रुबाधक इंद्र! तुम
दैत्यहंता, असुरों के शत्रुओं को उत्पन्न करने वाले एवं समस्त शत्रुओं के हिंसक हो. (५)
अनु ते शुष्मं तुरयन्तमियतूः क्षोणी शिशुं मातरा.
विश्वास्ते स्पृधः श्रथयन्त मन्यवे वृत्रं यदिन्द्र तूर्वसि.. (६)
हे इंद्र! जिस प्रकार माता पुत्र के पीछे चलती है, उसी प्रकार द्यावा-पृथिवी तुम्हारी
शत्रुनाशक बल के पीछे चलती हैं. हे इंद्र! जब तुम वृत्र का वध करते हो, तब तुम्हारे क्रोध को
देखकर सभी सेनाएं छिन्न होती हैं. (६)
इत ऊती वो अजरं प्रहेतारमप्रहितम्.
आशुं जेतारं हेतारं रथीतममतूर्तं तुग्र्यावृधम्.. (७)
हे सेवको! तुम अपनी रक्षा के लिए जरारहित, शत्रुओं को भगाने वाले, किसी से
प्रभावित न होने वाले, शीघ्रगामी, शत्रुजयी व जल को बढ़ाने वाले इंद्र को आगे करो. (७)
इष्कर्तारमनिष्कृतं सहस्कृतं शतमूर्तिं शतक्रतुम्.
समानमिन्द्रमवसे हवामहे वसवानं वसूजुवम्.. (८)
हम शत्रुविनाशक, दूसरों द्वारा नष्ट न होने वाले, अनेक रक्षासाधनों से युक्त, अनेक कर्मों
वाले, सबके प्रति समान, धनों को घेरने वाले एवं यजमानों के पास धन भेजने वाले इंद्र को
अपनी रक्षा के लिए बुलाते हैं. (८)
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