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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सूक्त—४७ देवता—जल

हमारी रक्षा करो. (४)
सूक्त—४७ देवता—जल
आपो यं वः प्रथमं देवयन्त इन्द्रपानमूर्निमकृण्वतेळः.
तं वो वयं शुचिमरिप्रमद्य घृतप्रुषं मधुमन्तं वनेम.. (१)
हे जलरूप देवो! देवाभिलाषी अध्वर्युओं ने तुम्हारी सहायता से इंद्र के पीने के योग्य,
धरती से उत्पन्न जो सोमरस पहले तैयार किया था, इस समय हम भी तुम्हारे उसी शुद्ध,
पापरहित, वर्षारूपी जल से सींचने योग्य एवं मधुर सोमरस का सेवन करेंगे. (१)
तमूर्मिमापो मधुमत्तं वोऽपां नपादवत्वाशुहेमा.
यस्मिन्निन्द्रो वसुभिर्मादयाते तमश्याम देवयन्तो वो अद्य.. (२)
हे अप देवो! तुम्हारे उस मधुर सोम नामक रस की शीघ्रगति वाले अपांनपात् अर्थात्
अग्नि रक्षा करें. वसुओं के साथ इंद्र जिस में प्रसन्न होते हैं, हम आज देवों की कामना करते
हुए उसी का सेवन करेंगे. (२)
शतपवित्राः स्वधया मदन्तीर्देवीर्देवानामति यन्ति पाथः.
ता इन्द्रस्य न मिनन्ति व्रतानि सिन्धुभ्यो हव्यं घृतवज्जुहोत.. (३)
सैकड़ों पवित्र रूपों वाले एवं अपने अन्न के द्वारा मनुष्यों को प्रसन्न करते हुए जल देव
इंद्रादि देवों के भी स्थान में प्रवेश करते हैं. वे इंद्र के यज्ञकर्मों का विनाश नहीं करते हैं. हे
अध्वर्युजनो! सिंधु के लिए घी से मिले हव्य का हवन करो. (३)
याः सूर्यो रश्मिभिराततान याभ्य इन्द्रो अरदद् गातुमूर्मिम्.
ते सिन्धवो वारिवो धातना नो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (४)
हे सिंधुरूप जलो! सूर्य अपनी किरणों द्वारा जिनका विस्तार करते हैं एवं जिनके लिए
इंद्र ने गमनयोग्य मार्ग का उद्घाटन किया है, तुम वे ही हो. तुम हमारे लिए धन धारण करो. हे
देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (४)
सूक्त—४८ देवता—ऋभु
ऋभुक्षणो वाजा मादयध्वमस्मे नरो मघवानः सुतस्य.
आ वोऽर्वाचः क्रतवो न यातां विभ्वो रथं नर्यं वर्तयन्तु.. (१)
हे नेता एवं धनस्वामी ऋभुओ! तुम हमारा सोमरस पीकर मतवाले बनो. अब तुम
जाओ. तुम्हारे कार्यकर्त्ता एवं समर्थ अश्व तुम्हारे मानवहितकारी रथ को हमारी ओर मोड़ें. (१)
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ऋभुऋभुभिरभि वः स्याम विभ्वो विभुभिः शवसा शवांसि.
वाजो अस्माँ अवतु वाजसाताविन्द्रेण युजा तरुषेम वृत्रम्.. (२)
हे ऋभुओ! हम तुम्हारी सहायता से विस्तृत एवं धनवान् बनें. हम तुम्हारी शक्ति से
शत्रुओं को पराजित करें. युद्ध में वाज हमारी रक्षा करें. हम इंद्र को पाकर शत्रुओं से पार पा
लेंगे. (२)
ते चिद्धि पूर्वीर्भि सन्ति शासा विश्वाँ अर्य उपरताति वन्वन्.
इन्द्रो विभ्वाँ ऋभुक्षा वाजो अर्यः शत्रोर्मिंथत्या कृणवन्वि नृम्णम्.. (३)
इंद्र एवं ऋभु हमारे शत्रुओं की अनेक सेनाओं को अपनी आज्ञा से मार डालते हैं. वे
युद्ध में समस्त शत्रुओं का हनन करते हैं. शत्रुनाशक इंद्र, ऋभुक्षा एवं वाज शत्रु के बल को
समाप्त करेंगे. (३)
नू देवासो वरिवः कर्तना नो भूत नो विश्वेऽवसे सजोषाः.
समस्मे इषं वसवो ददीरन् यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (४)
दीप्तिशाली ऋभुओ! हमें आज धन दो. तुम सब समानरूप से प्रसन्न होकर हमारे रक्षक
बनो. प्रसिद्ध ऋभु हमें अन्न दें. हे देवो! तुम अपने कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा
करो. (४)
सूक्त—४९ देवता—जल
समुद्रज्येष्ठाः सलिलस्य मध्यात्पुनाना यन्त्यनिविशमानाः.
इन्द्रो या वज्री वृषभो रराद ता आपो देवीरिह मामवन्तु.. (१)
समुद्र जिन में बड़ा है, ऐसे जल सबको शुद्ध करते हैं, सदा गतिशील हैं एवं अंतरिक्ष के
मध्य से जाते हैं. वज्रधारी एवं अभिलाषापूरक इंद्र ने जिन्हें रुका होने पर स्वच्छंद किया था,
वे जल देवता इस स्थान में हमारी रक्षा करें. (१)
या आपो दिव्या उत वा स्रवन्ति खनित्रिमा उत वाप याः स्वयञ्जाः.
समुद्रार्था याः शुचयः पावकास्ता आपो देवीरिह मामवन्तु.. (२)
जो जल अंतरिक्ष से उत्पन्न होते हैं, नदी के रूप में बहते हैं, जो खोद कर निकाले जाते
हैं अथवा जो अपने आप उत्पन्न होकर सागर की ओर गति करते हैं, जो दीप्तियुक्त एवं पवित्र
करने वाले हैं, वे देवीरूप जल यहां हमारी रक्षा करें. (२)
यासां राजा वरुणो याति मध्ये सत्यानृते अवपश्यञ्जनानाम्.
मधुश्चुतः शुचयो याः पावकास्ता आपो देवीरिह मामवन्तु.. (३)
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जिन जलों के राजा वरुण अपनी जलरूपी प्रजाओं में सत्य एवं मिथ्या को जानते हुए
मध्यम लोक में जाते हैं, वे मधुरस बरसाने वाली, दीप्तियुक्त एवं पवित्र करने वाली जलरूपी
देवियां यहां हमारी सदा रक्षा करें. (३)
यासु राजा वरुणो यासु सोमो विश्वे देवा यासूर्जं मदन्ति.
वैश्वानरो यास्वग्निः प्रविष्टस्ता देवीरिह मामवन्तु.. (४)
जिन में राजा वरुण एवं सोम रहते हैं, समस्त देव जिन में अन्न पाकर प्रमुदित होते हैं
एवं वैश्वानर अग्नि जिन में प्रविष्ट होते हैं, वे ही जलरूपी देवियां यहां हमारी रक्षा करें. (४)
सूक्त—५० देवता—मित्र आदि
आ मां मित्रावरुणेह रक्षतं कुलाययद् विश्वयन्मा न आ गन्.
अजकावं दुर्द्दशीकं तिरो दिधे मा मां पद्येन रपसा विदत्सरुः.. (१)
हे मित्र एवं वरुण! इस लोक में हमारी रक्षा करो. स्थान बनाने वाला एवं विशेषरूप से
बढ़ने वाला विष हमारी ओर न आवे. अज का दुर्द्दशीक नामक विष समाप्त हो. सांप हमारे
पैर की ध्वनि न पहचान सके. (१)
यद्विजामन्यपरुषि वन्दनं भुवदष्ठीवन्तौ परि कुल्फौ च देहत्.
अग्निष्टच्छोचन्नप बाधतामितो मा मां पद्येन रपसा विदत्सरुः.. (२)
हे दीप्तिशाली अग्नि! पेड़ों की डालियों में अनेक रूप का बंदन नामक जो विष होता है
एवं जो घुटने एवं टखने को फुला देता है, हमारे लोगों से उस विष को दूर करो. छिपकर आने
वाला सांप हमें पगध्वनि से न पहचान सके. (२)
यच्छल्मलौ भवति यन्नदीषु यदोषधीभ्यः परि जायते विषम्.
विश्वे देवा निरितस्तत्सुवन्तु मा मां पद्येन रपसा विदत्सरुः.. (३)
जो विष शाल्मली नामक वृक्ष में होता है एवं जो विष नदियों एवं ओषधियों में जन्म
लेता है, विश्वेदेव उस विष को हमसे दूर करें. छिपकर आने वाला सांप हमारी पगध्वनि न
पहचान सके. (३)
याः प्रवतो निवत उद्धत उदन्वतीरनुदकाश्च याः.
ता अस्मभ्यं पयसा पिन्वमानाः शिवा देवीरशिपदा भवन्तु सर्वा नद्यो अशिमिदा
भवन्तु.. (४)
ऊंचे देशों में, नीचे देशों में, शक्तिशाली देशों में, जल वाले देशों में एवं बिना पानी वाले
देशों में बहती हुई जो नदियां हमें जल से भिगोती हैं, वे कल्याणकारिणी नदीरूपी देवियां
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