ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 1547 of 1855
Read in contextप्र सुवानो अक्षाः सहस्रधारस्तिरः पवित्रं वि वारमव्यम्.. (१६)
छाने जाते हुए एवं हजार धाराओं वाले सोम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र को पार
करके अनेक प्रकार से बहते हैं. (१६)
स वाज्यक्षाः सहस्ररेता अद्भिर्मृजानो गोभिः श्रीणानः.. (१७)
शक्तिशाली, अधिक जल वाले व जलों में मसले जाते हुए सोम सभी ओर बहते हैं.
(१७)
प्र सोम याहीन्द्रस्य कुक्षा नृभिर्येमानो अद्रिभिः सुतः.. (१८)
हे ऋत्विजों द्वारा संयमित एवं पत्थरों की सहायता से निचोड़े गए सोम! तुम इंद्र के पेट
में जाओ. (१८)
असर्जि वाजी तिरः पवित्रमिन्द्राय सोमः सहस्रधारः.. (१९)
शक्तिशाली एवं हजार धाराओं वाले सोम दशापवित्र के द्वारा छान कर इंद्र के लिए
तैयार किए जाते हैं. (१९)
अञ्जन्त्येनं मध्वो रसेनेन्द्राय वृष्ण इन्दुं मदाय.. (२०)
ऋत्विज् अभिलाषापूरक इंद्र के नशे के लिए गाय के मीठे दूध के साथ सोम को मिलाते
हैं. (२०)
देवेभ्यस्त्वा वृथा पाजसेऽपो वसानं हरिं मृजन्ति.. (२१)
हे जल में रहने वाले हरितवर्ण सोम! ऋत्विज् तुम्हें बिना श्रम के देवों के पीने एवं उन्हें
शक्ति देने के लिए शुद्ध करते हैं. (२१)
इन्दुरिन्द्राय तोशते नि तोशते श्रीणन्नुग्रो रिणन्नपः.. (२२)
जल एवं दूध के साथ मिले हुए, शक्तिदाता एवं जलों के प्रेरक सोम इंद्र के लिए निचोड़े
जाते हैं. (२२)
सूक्त—११० देवता—पवमान सोम
पर्यूषु प्र धन्व वाजसातये परि वृत्राणि सक्षणिः.
द्विषस्तरध्या ऋणया न ईयसे.. (१)
हे सोम! तुम अन्न पाने के लिए युद्ध में जाओ. हे सहनशील सोम! तुम शत्रुओं के पास
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