ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 1549 of 1855
Read in contextदिवः पीयूषं पूर्व्यं यदुक्थ्यं महो गाहाद्दिव आ निरधुक्षत.
इन्द्रमभि जायमानं समस्वरन्.. (८)
लोग स्वर्ग से पीने योग्य, प्राचीन व प्रशंसनीय सोम को महान् तथा गहन अंतरिक्ष के
अभिमुख होकर दुहते हैं. स्तोता इंद्र को लक्ष्य करके उत्पन्न सोम की स्तुति करते हैं. (८)
अध यदिमे पवमान रोदसी इमा च विश्वा भुवनाभि मज्मना.
यूथे न निःष्ठा वृषभो वि तिष्ठसे.. (९)
हे शुद्ध होते हुए सोम! तुम इस द्यावा-पृथिवी, लोकों एवं सभी प्राणियों पर अपने बल
से इस प्रकार अधिकार कर लेते हो, जिस प्रकार कोई बैल गायों के झुंड का अधिकारी बन
जाता है. (९)
सोमः पुनानो अव्यये वारे शिशुर्न क्रीळन्पवमानो अक्षाः.
सहस्रधारः शतवाज इन्दुः.. (१०)
हजारों धाराओं वाले, सैकड़ों शक्तियों से युक्त, दीप्तिशाली एवं छनते हुए सोम भेड़ के
बालों से बने दशापवित्र पर बच्चे के समान खेल करते हैं. (१०)
एष पुनानो मधुमाँ ऋतावेन्द्रायेन्दुः पवते स्वादूरूर्मिः.
वाजसनिर्वरिवोविद्वयोधाः.. (११)
शुद्ध होते हुए, मधुरता युक्त, यज्ञ वाले, दीप्तिशाली, निचुड़ने वाले, स्वादिष्ट रस धारा के
समूहरूप, अन्न के दाता, धन लाभ कराने वाले एवं आयु देने वाले सोम इंद्र के लिए छनते हैं.
(११)
स पवस्व सहमानः पृतन्यून्त्सेधन्न्रक्षांस्यप दुर्गहाणि.
स्वायुधः सासह्वान्त्सोम शत्रून्.. (१२)
हे सोम! तुम युद्धाभिलाषी शत्रुओं को हराते हुए, दुर्गम राक्षसों को दूर भगाते हुए एवं
शोभन आयुध धारा करके शत्रुओं को दुःखी करते हुए शुद्ध बनो. (१२)
सूक्त—१११ देवता—पवमान सोम
अया रुचा हरिण्या पुनानो विश्वा द्वेषांसि तरति स्वयुग्वभिः सूरो न स्वयुग्वभिः.
धारा सुतस्य रोचते पुनानो अरुषो हरिः.
विश्वा यद्रूपा परियात्यृक्वभिः सप्तास्येभिर्ऋक्वभिः.. (१)
शुद्ध होते हुए सोम अपने हरे रंग वाली एवं सुंदर धारा से इसी प्रकार सब राक्षसों का
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