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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सूक्त—५५ देवता—विश्वेदेव, अग्नि आदि

सूक्त—५५ देवता—विश्वेदेव, अग्नि आदि
उषसः पूर्वा अध यद्व्यूषुर्महद्द्वि जज्ञे अक्षरं पदे गोः.
व्रता देवानामुप नु प्रभूषन्महद्देवानामसुरत्वमेकम्.. (१)
पूर्ववर्तिनी उषा जब समाप्त होती है, तब अविनाशी सूर्य नामक महान् ज्योति आकाश
अथवा सागर से उत्पन्न होती है. इसके बाद देव-संबंधी कर्म आरंभ हो जाते हैं एवं यजमान
देवों के समीप उपस्थित होते हैं. देवों का प्रमुख बल एक ही है. (१)
मो षू णो अत्र जुहुरन्त देवा मा पूर्वे अग्ने पितरः पदज्ञाः.
पुराण्योः सद्मनोः केतुरन्तर्महद्देवानामसुरत्वमेकम्.. (२)
हे अग्नि! इस समय देवगण एवं कर्मानुसार देवपद पाने वाले पुरातन पितर हमारे कर्म
में बाधा न डालें. पुरातन धरती-आकाश के मध्य उदित एवं यज्ञ का संकेत करने वाले सूर्य
हमारी हिंसा न करें. देवों का प्रमुख बल एक ही है. (२)
वि मे पुरुत्रा पतयन्ति कामाः शम्यच्छा दीद्ये पूर्व्याणि.
समिद्धे अग्नावृतमिद्वदेम महद्देवानामसुरत्वमेकम्.. (३)
हे अग्नि! मेरी अनेक अभिलाषाएं इधर-उधर जाती हैं. अग्निष्टोम आदि के बहाने हम
पुरानी स्तुतियां प्रकाशित करते हैं. यज्ञ के निमित्त अग्नि के प्रज्वलित होने पर हम सत्य
बोलेंगे. देवों का प्रमुख बल एक ही है. (३)
समानो राजा विभृतः पुरुत्रा शये शयासु प्रयुतो वनानु.
अन्या वत्सं भरति क्षेति माता महद्देवानामसुरत्वमेकम्.. (४)
दीप्यमान एक ही अग्नि यज्ञ के निमित्त अनेक स्थानों पर व्यवहार में लाए जाते हैं. वे
वेदी पर सोते हैं एवं काष्ठों से बनी अरणि में विभक्त होकर निवास करते हैं. इनके धरती-
आकाशरूपी माता-पिता में से एक इन्हें उत्पन्न होते ही भरण करता है एवं दूसरी माता केवल
धारण करती है. देवों का प्रमुख बल एक ही है. (४)
आक्षित्पूर्वास्वपरा अनूरुत्सद्यो जातासु तरुणीष्वन्तः.
अन्तर्वतीः सुवते अप्रवीता महद्देवानामसुरत्वमेकम्.. (५)
अग्नि सूखे प्राचीन वृक्षों में वर्तमान हैं, नए वृक्षों में उत्पत्ति क्रम से रहते हैं तथा इसी
समय उत्पन्न पल्लवित वनस्पतियों में अंतर्भूत होते हैं, ओषधियां किसी अन्य के गर्भाधान के
बिना केवल अग्नि के संसर्ग से गर्भवती होकर पुष्प, फल आदि को जन्म देती हैं. देवों का
प्रमुख बल एक ही है. (५)
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शयुः परस्तादध नु द्विमाताऽबन्धनश्चरति वत्स एकः.
मित्रस्य ता वरुणस्य व्रतानि महद्देवानामसुरत्वमेकम्.. (६)
धरती-आकाशरूपी माता-पिता के पुत्र सूर्य छिपते समय पश्चिम दिशा में सोते हैं.
उदयकाल में वे ही सूर्य बन्धनरहित होकर आकाश में चलते हैं. यह सारा काम मित्र और वरुण
का है. देवों का प्रमुख बल एक ही है. (६)
द्विमाता होता विदथेषु सम्राळन्वग्रं चरति क्षेति बुध्नः.
प्र रण्वानि रण्यवाचो भरन्ते महद्देवानामसुरत्वमेकम्.. (७)
दो लोकों के बनाने वाले, यज्ञ के होता एवं यज्ञ में भली-भांति सुशोभित अग्नि सूर्यरूप
से, आकाश में घूमते हैं एवं सभी कर्मों के मूलकारण बनकर धरती पर रहते हैं. मधुर वाणी
वाले स्तोता उनके लिए मधुर स्तोत्र बोलते हैं. देवों का प्रमुख बल एक ही है. (७)
शूरस्येव युध्यतो अन्तमस्य प्रतीचीनं ददृशे विश्वमायत्.
अन्तर्मतिश्चरति निष्षिधं गोर्महद्देवानामसुरत्वमेकम्.. (८)
समीप में वर्तमान अग्नि के सामने आने वाले सभी प्राणी इस प्रकार पीछे भागते हैं,
जैसे युद्ध करने वाले शूर के सामने से कायर लोग भागते हैं. सबके द्वारा जाने गए अग्नि जल
का नाश करने वाली ज्वाला अपने भीतर धारण करते हैं. देवों का प्रमुख बल एक ही है. (८)
नि वेवेति पलितो दूत आस्वन्तर्महांश्चरति रोचनेन.
वपूंषि बिभ्रदभि नो वि चष्टे महद्देवानामसुरत्वमेकम्.. (९)
सबके पालनकर्त्ता एवं देवों के दूत अग्नि इन ओषधियों में आवश्यक रूप से वर्तमान हैं
एवं सूर्य के साथ-साथ धरती-आकाश के बीच में चलते हैं. नाना रूप धारण करने वाले वह
अग्नि हम यज्ञकर्त्ताओं को विशेष कृपादृष्टि से देखते हैं. देवों का प्रमुख बल एक ही है. (९)
विष्णुर्गोपाः परमं पाति पाथः प्रिया धामान्यमृता दधानः.
अग्निष्टा विश्वा भुवनानि वेद महद्देवानामसुरत्वमेकम्.. (१०)
व्याप्त, रक्षक, प्रिय एवं क्षयरहित तेज धारण करने वाले अग्नि परम स्थान की रक्षा
करते हैं. अग्नि उन सब भुवनों को जानते हैं. देवों का प्रमुख बल एक ही है. (१०)
नाना चक्राते यम्या३ वपूंषि तयोरन्यद्रोचते कृष्णमन्यत्.
श्यावी च यदरुषी च स्वसारौ महद्देवानामसुरत्वमेकम्.. (११)
रात और दिन का जोड़ा नाना प्रकार के रूप धारण करता है. इन दो बहिनों में एक
काले रंग की है और दूसरी शुक्ल वर्ण होने के कारण दीप्त होती है. देवों का प्रमुख बल एक
ही है. (११)
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माता च यत्र दुहिता च धेनू सबर्दुघे धापयेते समीची.
ऋतस्य ते सदसीळे अन्तर्महद्देवानामसुरत्वमेकम्.. (१२)
माता धरती और पुत्री द्यौ अंतरिक्ष में दूध देने वाली गायों के समान मिलकर एकदूसरी
को अपना रस पिलाती हैं. जल के स्थान अंतरिक्ष के मध्य स्थित धरती-आकाश की मैं स्तुति
करता हूं. देवों का प्रमुख बल एक ही है. (१२)
अन्यस्या वत्सं रिहती मिमाय कया भुवा नि दधे धेनूरूधः.
ऋतस्य सा पयसापिन्वतेळा महद्देवानामसुरत्वमेकम्.. (१३)
धरती के पुत्र अग्नि को जल धारारूपी जिह्वा से चाटती हुई द्यौ बादल के गर्जन के रूप
में शब्द करती है. द्यौ रूपी गाय धरती को जलहीन बनाकर अपने मेघ रूप स्तनों को जल से
भरती है. सूखी धरती सूर्य के जल से भीगती है. देवों का प्रमुख बल एक ही है. (१३)
पद्या वस्ते पुरुरूपा वपूंष्यूर्ध्वा तस्थौ त्र्यविं रेरिहाणा.
ऋतस्य सद्म वि चरामि विद्वान्महद्देवानामसुरत्वमेकम्.. (१४)
धरती बहुत से स्थावर-जंगम रूपों से अपने को ढकती है एवं उन्नत होकर तीन लोकों
को व्याप्त करने वाले सूर्य को चाटती हुई ठहरती है. मैं आदित्य के स्थान को जानता हुआ
उनकी सेवा करता हूं. देवों का प्रमुख बल एक ही है. (१४)
पदे इव निहिते दस्मे अन्तस्तयोरन्यद् गुह्यमाविरन्यत्.
सध्रीचीना पथ्या३ सा विषूची महद्देवानामसुरत्वमेकम्.. (१५)
शोभन दिवारात्रि धरती-आकाश के मध्य रखे हुए दो चरणों के समान जान पड़ते हैं.
इनमें से रात्रि रूपी चरण गूढ़ एवं दूसरा दिवस रूपी चरण स्पष्ट है. इनके मिलन मार्ग अर्थात्
काल को पुण्यात्मा एवं पापात्मा दोनों ही प्राप्त करते हैं. देवों का प्रमुख बल एक ही है. (१५)
आ धेनवो धुनयन्तामशिश्वीः सबर्दुघाः शशया अप्रदुग्धाः.
नव्यानव्या युवतयो भवन्तीर्महद्देवानामसुरत्वमेकम्.. (१६)
वर्षा द्वारा सबको प्रसन्न करने वाली, शिशुरहिता, आकाश में वर्तमान, रसहीन न होने
वाली, जल रूप दूध देने वाली, परस्पर मिलित एवं अत्यंत नवीन दिशाएं कांपती रहें. देवों का
प्रमुख बल एक ही है. (१६)
यदन्यासु वृषभो रोरवीति सो अन्यस्मिन्यूथे नि दधाति रेतः.
स हि क्षपावान्त्स भगः स राजा महद्देवानामसुरत्वमेकम्.. (१७)
जल बरसाने वाले बादल रूपी इंद्र अन्य दिशाओं में बार-बार गर्जन करते हैं एवं अन्य
दिशा में जल की वर्षा करते हैं. वह जल फेंकने वाले, सबके सेवनीय एवं राजा हैं. देवों का
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प्रमुख बल एक ही है. (१७)
वीरस्य नु स्वश्व्यं जनासः प्र नु वोचाम विदुरस्य देवाः.
षोळहा युक्ताः पञ्चपञ्चा वहन्ति महद्देवानामसुरत्वमेकम्.. (१८)
हे मनुष्यो! शूर इंद्र के सुंदर घोड़ों का हम शीघ्र भांति-भांति से वर्णन करते हैं. उन्हें
देवगण जानते हैं. वे ऋतुओं के रूप में छः एवं हेमंत, शिशिर के मिलकर एक हो जाने से
पांच अश्वों के रूप में इंद्र को ढोते हैं. देवों का प्रमुख बल एक ही है. (१८)
देवस्त्वष्टा सविता विश्वरूपः पुपोष प्रजाः पुरुधा जजान.
इमा च विश्वा भुवनान्यस्य महद्देवानामसुरत्वमेकम्.. (१९)
सबके प्रेरक एवं नाना रूप धारी त्वष्टा देव प्रजाओं को अनेक प्रकार से उत्पन्न करते हैं
एवं पालते हैं. संपूर्ण भुवन उन्हीं के हैं. देवों का प्रमुख बल एक ही है. (१९)
मही समैरच्चम्वा समीची उभे ते अस्य वसुना न्युष्टे.
शृण्वे वीरो विन्दमानो वसूनि महद्देवानामसुरत्वमेकम्.. (२०)
इंद्र ने विशाल एवं एक-दूसरे से मिले हुए धरती-आकाश दोनों को पशुपक्षियों से पूर्ण
किया है. ये दोनों इंद्र के तेज से पूरी तरह व्याप्त हैं. वीर इंद्र शत्रुओं की संपत्ति छीनने के लिए
प्रसिद्ध हैं. देवों का प्रमुख बल एक ही है. (२०)
इमां च नः पृथिवीं विश्वधाया उप क्षेति हितमित्रो न राजा.
पुरःसदः शर्मसदो न वीरा महद्देवानामसुरत्वमेकम्.. (२१)
विश्व का पालन करने वाले एवं हमारे राजा इंद्र धरती एवं आकाश के समीप रहते हैं.
वीर मरुत् संग्राम में इंद्र के आगे रहते हैं तथा उनके घर में निवास करते हैं. देवों का प्रमुख
बल एक ही है. (२१)
निष्षिध्वरीस्त ओषधीरुतापो रयिं त इन्द्र पृथिवी बिभर्ति.
सखायस्ते वामभाजः स्याम महद्देवानामसुरत्वमेकम्.. (२२)
हे मेघ रूप इंद्र! ओषधियों ने तुमसे सिद्धि पाई है, जल तुम्हीं से निकले हैं एवं धरती
तुम्हारे भोग के योग्य धन को धारण करती है. तुम्हारे मित्र हम धन के भागी बनें, देवों का
प्रमुख बल एक ही है. (२२)
सूक्त—५६ देवता—विश्वेदेव
न ता मिनन्ति मायिनो न धीरा व्रत देवानां प्रथमा धुवाणि.
न रोदसी अद्गुहा वेद्याभिर्न पर्वता निनमे तस्थिवांसः.. (१)
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