ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—१ देवता—पवमान सोम
नवम मंडल
सूक्त—१ देवता—पवमान सोम
स्वादिष्ठया मदिष्ठया पवस्व सोम धारया. इन्द्राय पातवे सुतः.. (१)
हे सोम! इंद्र के पीने के लिए तुम्हें निचोड़ा गया है. तुम अतिशय मादक और मादक धारा से निचुड़ो. (१)
रक्षोहा विश्वचर्षणिरभि योनिमयोहतम्. द्रुणा सधस्थमासदत्.. (२)
राक्षसों के हंता और सबके दर्शक सोम स्वर्ण द्वारा चोट खाकर एवं द्रोणकलश में स्थित होकर यज्ञवेदी पर बैठते हैं. (२)
वरिवोधातमो भव मंहिष्ठो वृत्रहन्तमः. पर्षि राधो मघोनाम्.. (३)
हे सोम! तुम धनों के अतिशय दाता, दाताओं में श्रेष्ठ एवं शत्रुओं का सर्वदा वध करने वाले बनो. तुम धनी शत्रुओं का धन हमें दो. (३)
अभ्यर्ष महां देवानां वीतिमन्धसा. अभि वाजमुत श्रवः.. (४)
हे सोम! तुम अन्न लेकर महान् देवों के यज्ञ के समीप आओ. तुम हमें बल और अन्न दो. (४)
त्वामच्छा चरामसि तदिदर्थं दिवेदिवे. इन्दो त्वे न आशसः.. (५)
हे सोम! हम प्रतिदिन तुम्हारी भली प्रकार सेवा करते हैं. हमारा यही काम है. हमारी आशा तुम्हारे अतिरिक्त दूसरी जगह नहीं है. (५)
पुनाति ते परिस्रुतं सोमं सूर्यस्य दुहिता. वारेण शश्वता तना.. (६)
हे सोम! सूर्य की पुत्री श्रद्धा तुम्हारे निचुड़े हुए रस को विस्तृत तथा नित्य दशापवित्र से शुद्ध करती है. (६)
तमीमण्वीः समर्य आ गृभ्णन्ति योषणो दश. स्वसारः पार्ये दिवि.. (७)
यज्ञ में सोमरस निचोड़ने वाले दिन सभी बहिनों के समान दस उंगलियां सोम को भली
प्रकार ग्रहण करती हैं. (७)
तमीं हिन्वन्त्यग्रुवो ध्मन्ति बाकुरं दृतिम्. त्रिधातु वारणं मधु.. (८)
उंगलियां ही सोम को निचोड़ने वाले स्थान पर ले जाती हैं एवं निचोड़ती हैं. सोमरूप
मधु तीन स्थानों में रहता है तथा शत्रुओं का नाश करने वाला है. (८)
अभी३ ममघ्न्या उत श्रीणन्ति धेनवः शिशुम्. सोममिन्द्राय पातवे.. (९)
हिंसा के अयोग्य गाएं इस बछड़ेरूपी सोम को इंद्र के पीने के लिए अपने दूध का
मिश्रण करके शुद्ध बनाती हैं. (९)
अस्येदिन्द्रो मदेष्वा विश्वा वृत्राणि जिघ्नते. शूरो मघा च मंहते.. (१०)
शूर इंद्र इसी सोम के नशे में मतवाले होकर सभी शत्रुओं का नाश करते हैं तथा
यजमानों को धन देते हैं. (१०)
सूक्त—२ देवता—पवमान सोम
पवस्व देववीरति पवित्रं सोम रंह्या. इन्द्रमिन्दो वृषा विश.. (१)
हे सोम! तुम देवाभिलाषी बनकर वेग से निचुड़ो तथा पवित्र बनो. हे अभिलाषापूरक
सोम! तुम इंद्र में प्रवेश करो. (१)
आ वच्यस्व महि प्सरो वृषेंदो द्युम्नवत्तमः. आ योनिं धर्णसिः सदः.. (२)
हे महान्! अभिलाषापूरक, अतिशय यशस्वी तथा सबको धारण करने वाले सोम! तुम
जल के रूप में हमारे पास आओ एवं अपने स्थान पर बैठो. (२)
अधुक्षत प्रियं मधु धारा सुतस्य वेधसः. अपो वसिष्ट सुक्रतुः.. (३)
निचोड़े हुए एवं अभिलाषापूरक सोमरस की प्रिय उंगलियां मधु को दुहती हैं.
शोभनकर्म वाले सोम जल को ढकते हैं. (३)
महान्तं त्वा महीरन्वापो अर्षन्ति सिन्धवः. यद्गोभिर्वासयिष्यसे.. (४)
हे महान् सोम! यज्ञ में जिस समय तुम्हें गोदुग्ध की धाराएं ढकती हैं, उस समय बहने
वाले महान् जल तुम्हारी ओर आते हैं. (४)
समुद्रो अप्सु मामृजे विष्टम्भो धरुणो दिवः. सोमः पवित्रे अस्मयुः.. (५)
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रसक्षरण करने वाले एवं स्वर्ग के धारणकर्त्ता सोम संसार को धारण करते हुए हमें
चाहते हैं एवं जल में शुद्ध होते हैं. (५)
अचिक्रदद्वृषा हरिमहान्मित्रो न दर्शंत:. सं सूर्येण रोचते.. (६)
कामवर्षक हरितवर्ण, महान् एवं मित्र के समान दर्शनीय सोम क्रंदन करते एवं सूर्य के
समान चमकते हैं. (६)
गिरस्त इन्द ओजसा मर्मृज्यन्ते अपस्युवः. याभिर्मदाय शुम्भसे.. (७)
हे इंद्र! यज्ञकर्म की इच्छा संबंधी वे ही स्तुतियां तुम्हारे बल द्वारा शुद्ध होती हैं, जिन
स्तुतियों द्वारा तुम प्रमत्त बनने के लिए सुशोभित होते हो. (७)
तं त्वा मदाय घृष्वय उ लोककृत्नुमीमहे. तव प्रशस्तयो महीः.. (८)
हे सोम! तुम्हारी प्रशंसाएं महान् हैं. तुमने शत्रुओं को पराजित करने वाले यजमानों के
लिए उत्तम लोगों की रचना की है. हम पद पाने के लिए तुम्हारी याचना करते हैं. (८)
अस्मभ्यमिन्दविन्द्रयुर्मध्वः पवस्व धारया. पर्जन्यो वृष्टिमॉँ इव.. (९)
हे इंद्र की अभिलाषा करने वाले सोम! तुम वर्षा करने वाले मेघ के समान हमारे सामने
मादक अमृत की धाराओं के समान गिरो. (९)
गोषा इन्दो नृषा अस्यश्वसा वाजसा उत. आत्मा यज्ञस्य पूर्व्यः.. (१०)
हे यज्ञ की प्राचीन आत्मा सोम! तुम गाएं, संतान, घोड़े एवं अन्न देने वाले हो. (१०)
सूक्त—३ देवता—पवमान सोम
एष देवो अमर्त्यः पर्णवीरिव दीयति. अभि द्रोणान्यासदम्.. (१)
ये मरणरहित एवं दीप्तिशाली सोम स्थित होने के लिए कलश की ओर पक्षी के समान
जाते हैं. (१)
एष देवो विपा कृतोऽति ह्ररांसि धावति. पवमानो अदाभ्यः.. (२)
उंगलियों द्वारा निचोड़ा गया सोमरस टपकता हुआ शत्रुओं को मारने के लिए जाता है.
सोमरस को कोई पराजित नहीं कर सकता. (२)
एष देवो विपन्युभिः पवमान ऋतायुभिः. हरिर्वाजाय मृज्यते.. (३)
टपकने वाला दीप्तिशाली सोमरस यज्ञाभिलाषी स्तोताओं द्वारा इस तरह सजाया जाता
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है, जैसे युद्ध के लिए घोड़े को सजाया जाता है. (३)
एष विश्वानि वार्या शूरो यन्निव सत्वभिः. पवमानः सिषासति.. (४)
ये शूर सोम अपनी शक्तियों द्वारा सभी संपत्तियों को लाकर हमें बांटना चाहते हैं. (४)
एष देवो रथर्यति पवमानो दशस्यति. आविष्कृणोति वग्वनुम्.. (५)
टपकते हुए सोमदेव हमारे यज्ञ में आने के लिए रथ चाहते हैं, हमारी अभिलाषाएं पूरी
करते हैं एवं शब्द प्रकट करते हैं. (५)
एष विप्रैरभिष्टुतोऽपो देवो वि गाहते. दधद्रत्नानि दाशुषे.. (६)
स्तोताओं द्वारा स्तुत ये सोमदेव हव्यदाता यजमान को रत्न देते हुए जलों में प्रवेश करते
हैं. (६)
एष दिवं वि धावति तिरो रजांसि धारया. पवमानः कनिक्रदत्.. (७)
ये टपकने वाले सोम शब्द करते हुए सारे संसार को तिरस्कृत करते हुए स्वर्ग को जाते
हैं. (७)
एष दिवं व्यासर्त्तरो रजांस्यस्पृतः. पवमानः स्वध्वरः.. (८)
शोभन यज्ञ वाले एवं अपराजित पवमान सोम सभी लोकों को तिरस्कृत करते हुए स्वर्ग
को जाते हैं. (८)
एष प्रत्नेन जन्मना देवो देवेभ्यः सुतः. हरिः पवित्रे अर्षति.. (९)
हरे रंग वाले एवं दीप्तिशाली सोम पुराने जन्मों से ही देवों के लिए निचुड़ कर दशापवित्र
में रहने के लिए जाते हैं. (९)
एष उ स्य पुरुव्रतो जज्ञानो जनयन्निषः. धारया पवते सुतः.. (१०)
ये अनेक कर्मों वाले सोम उत्पन्न होते ही अन्नों को जन्म देते हुए निचुड़कर धारारूप में
गिरते हैं. (१०)
सूक्त—४ देवता—पवमान सोम
सना च सोम जेषि च पवमान महि श्रवः. अथा नो वस्यसस्कृधि.. (१)
हे महान्, अन्न एवं पवमान सोम! हमारे यज्ञ में देवों की सेवा करो, शत्रुओं को जीतो एवं
हमें श्रेय प्रदान करो. (१)
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सना ज्योतिः सना स्व१र्विश्वा च सोम सौभगा. अथा नो वस्यसस्कृधि.. (२)
हे सोम! हमें ज्योति, स्वर्ग, समस्त-सौभाग्य एवं कल्याण दो. (२)
सना दक्षमृत क्रतुमप सोम मृधो जहि. अथा नो वस्यसस्कृधि.. (३)
हे सोम! हमें बल एवं ज्ञान दो. शत्रुओं को मारो तथा हमें सौभाग्य दो. (३)
पवीतारः पुनीतन सोममिन्द्राय पातवे. अथा नो वस्यसस्कृधि.. (४)
हे सोमरस निचोड़ने वालो! इंद्र के पीने के लिए सोमरस निचोड़ो एवं हमारे लिए
कल्याण प्रदान करो. (४)
त्वं सूर्ये न आ भज तव क्रत्वा तवोतिभिः. अथा नो वस्यसस्कृधि.. (५)
हे सोम! अपने कार्यों एवं रक्षणों द्वारा तुम हमें सूर्य के समीप पहुंचाओ एवं हमें मंगल
प्रदान करो. (५)
तव क्रत्वा तवोतिभिर्ज्योक्पश्येम सूर्यम्. अथा नो वस्यसस्कृधि.. (६)
हे सोम! हम तुम्हारे यज्ञों एवं रक्षाओं के कारण चिरकाल तक सूर्य को देखें. तुम हमारा
कल्याण करो. (६)
अभ्यर्ष स्वायुध सोम द्विबर्हसं रयिम्. अथा नो वस्यसस्कृधि.. (७)
हे शोभन आयुधों वाले सोम! तुम द्युलोक एवं धरती पर बढ़ने वाला धन हमें दो एवं
हमारा कल्याण करो. (७)
अभ्य१र्षणपच्युतो रयिं समत्सु सासहिः. अथा नो वस्यसस्कृधि.. (८)
हे संग्रामों में शत्रुओं द्वारा अपराजित तथा शत्रुपराभवकारी सोम! तुम हमें धन दो तथा
हमारा कल्याण करो. (८)
त्वां यज्ञैरवीवृधन् पवमान विधर्मणि. अथा नो वस्यसस्कृधि.. (९)
हे पवमान सोम! लोगों ने अपनी वृद्धि के लिए तुम्हें यज्ञों के द्वारा बढ़ाया था. तुम हमें
कल्याण दो. (९)
रयिं नश्चित्रमश्विनमिन्दो विश्वायुमा भर. अथा नो वस्यसस्कृधि.. (१०)
हे सोम! तुम हमें घोड़ों के समान सर्वत्र जाने वाला तथा विचित्र धन दो एवं हमारा
कल्याण करो. (१०)
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