Skip to content
SarvaKosh
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1540 of 1855

Read in context
Page 1540

गाय के दूध से मिले हुए सोम टपकते हैं. सोम अपने को मिलाने के लिए दूध के साथ
छनते हैं. जल जिस प्रकार सागर में जाता है, उसी प्रकार सोम का रस द्रोणकलश में जाता है.
नशीला सोम नशा करने के लिए निचोड़ा जाता है. (९)
आ सोम सुवानो अद्रिभिस्तिरो वाराण्यव्यया.
जनो न पुरि चम्वोर्विशद्धरिः सदो वनेषु दधिषे.. (१०)
हे पत्थरों की सहायता से निचुड़े हुए सोम! तुम भेड़ के बालों से बने दशापवित्र को पार
करके छनते हो. हरे रंग के सोम चमू नामक पात्रों में इस प्रकार प्रवेश करते हैं, जिस प्रकार
मनुष्य नगर में प्रवेश करता है. हे सोम! तुम द्रोणकलश में स्थान बनाते हो. (१०)
स मामृजे तिरो अण्वानि मेष्यो मीळ्हे सप्तिर्न वाजयूः.
अनुमाद्यः पवमानो मनीषिभिः सोमो विप्रेभिर्ऋक्वभिः.. (११)
विजयाभिलाषी लोग जिस प्रकार युद्ध में जाने वाले घोड़े को सजाते हैं, उसी प्रकार
भेड़ के बालों से बने दशापवित्र को पार करने वाले एवं अन्नाभिलाषी सोम सजाए जाते हैं.
(११)
प्र सोम देववीतये सिन्धुर्न पिप्ये अर्णसा.
अंशोः पयसा मदिरो न जागृविरच्छा कोशं मधुश्रुतम्.. (१२)
हे सोम! सागर को जिस प्रकार जल से भरते हैं, उसी प्रकार तुम्हें भी देवों के पीने के
लिए जल से पूर्ण किया जाता है. हे शराब के समान नशीले एवं जागरणशील सोम! तुम
सोमलता के रस के साथ रस एकत्र करने वाले द्रोणकलश में जाते हो. (१२)
आ हर्यतो अर्जुने अत्के अव्यत प्रियः सूनुर्न मर्ग्यः.
तमीं हिन्वन्त्यपसो यथा रथं नदीष्वा गभस्त्योः.. (१३)
अभिलाषा करने योग्य, सबको प्रसन्न करने वाले एवं पुत्र के समान शुद्ध बनाने योग्य
सोम सफेद रंग के दशापवित्र पर जाते हैं. वेग वाले लोग रथ को जिस प्रकार तेजी से संग्राम
की ओर दौड़ाते हैं, उसी प्रकार दोनों हाथों की उंगलियां सोम को जल में मसलती हैं. (१३)
अभि सोमास आयवः पवन्ते मद्यं मदम्.
समुद्रस्याधि विष्टपि मनीषिणो मत्सरासः स्वर्विदः.. (१४)
गमनशील सोम अपने नशीले रस को चारों ओर बहाते हैं. मनीषी, नशीले एवं सबको
जानने वाले सोम द्रोणकलश के ऊपर दशापवित्र के ऊंचे भाग पर रस गिराते हैं. (१४)
तरत्समुद्रं पवमान ऊर्मिणा राजा देव ऋतं बृहत्.
अर्षन्मित्रस्य वरुणस्य धर्मणा प्र हिन्वान ऋतं बृहत्.. (१५)
ebook converter DEMO Watermarks*