ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
बनते. धरती पर ऊंचे खड़े पर्वतों को कोई झुका नहीं सकता. (१)
मायावी असुर एवं विद्वान् इंद्र आदि देवों के प्रथम स्थिर एवं प्रसिद्ध कर्मों में बाधा नहीं
डालते. द्वेष-भाव से हीन धरती-आकाश प्रजाओं के साथ देवों के लिए विघ्नकारक नहीं
बनते. धरती पर ऊंचे खड़े पर्वतों को कोई झुका नहीं सकता. (१)
षड्भाराँ एको अचरन्बिभर्त्यृतं वर्षिष्ठमुप गाव आगुः.
तिस्रो महीरुपरास्तस्थुरत्या गुहा द्वे निहिते दर्शैका.. (२)
एक स्थिर वर्ष छः ऋतुओं को धारण करता है. सत्य एवं अतिशय वृद्ध सूर्यरूप संवत्सर
को किरणें प्राप्त करती हैं. उत्पन्न और नष्ट होने वाले तीनों लोक एक-दूसरे के ऊपर स्थित हैं.
उन में ही स्वर्ग और अंतरिक्ष गुहा में छिपे हैं. एकमात्र धरती ही दिखाई देती है. (२)
त्रिपाजस्यो वृषभो विश्वरूप उत त्र्युधा पुरुध प्रजावान्.
त्र्यनीकः पत्यते महिनावान्त्स रेतोधा वृषभः शश्वतीनाम्.. (३)
ग्रीष्म, वर्षा एवं हेमंत-तीन ऋतुएं संवत्सर का हृदय हैं एवं वसंत, शरद् एवं हेमंत तीन
ऋतुएं स्तन हैं. जल बरसाने वाला, विविध रूपधारी, जौ, गेहूं आदि अनेक प्रकार की प्रजाओं
से युक्त, ग्रीष्म, वर्षा तथा शीत तीन गुणों सहित एवं महत्त्वशाली संवत्सर आता है. वह वीर्य
धारण में समर्थ है एवं सबके लिए जल लाता है. (३)
अभीक आसां पदवीरबोध्यादित्यानामह्वे चारु नाम.
आपश्चिदस्मा अरमन्त देवीः पृथग्व्रजन्तीः परि षीमवृञ्जन्.. (४)
संवत्सर ओषधियों के समीप रहकर फल-पुष्पादि उत्पादन के लिए सावधान रहते हैं. मैं
आदित्यों का चैत्र आदि मनोहर नाम बोलता हूं. द्योतमान एवं अलग-अलग बहने वाले जल
चार मास तक संवत्सर को प्रसन्न करते हैं एवं शेष आठ मासों में छोड़ देते हैं. (४)
त्री षधस्था सिन्धवस्त्रिः कवीनामुत त्रिमाता विदथेषु सम्राट्.
ऋतावरीर्योषणास्तिस्रो अप्यास्त्रिरा दिवो विदथे पत्यमानाः.. (५)
हे नदियो! तीन गुण वाले तीन लोक देवों के निवासस्थान हैं. तीनों लोकों के बनाने वाले
सूर्य यज्ञों के राजा हैं. जलपूर्ण एवं आकाश में गमन करने वाली इला, सरस्वती एवं भारती
परस्पर मिली हुई देवियां यज्ञ के तीनों सवनों में आवें. (५)
त्रिरा दिवः सवितर्वार्याणि दिवेदिवे आ सुव त्रिर्नो अह्नः.
त्रिधातु राय आ सुवा वसूनि भग त्राताधिषणे सातये धाः.. (६)
हे आदित्य! स्वर्गलोक से प्रतिदिन तीन बार आकर हम लोगों को धन दो. हे सबके द्वारा
सेवा योग्य एवं सबके रक्षक आदित्य! हमें पशु, कनक एवं रत्न रूप तीन प्रकार का धन दो.
हे वाग्देवी! हमें धनलाभ के लिए प्रेरित करो. (६)
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त्रिरा दिवः सविता सोषवीति राजाना मित्रावरुणा सुपाणी.
आपश्चिदस्य रोदसी चिदुर्वी रत्नं भिक्षन्त सवितुः सवाय.. (७)
सविता दिन में तीन बार हमें धन दें. दीप्तिमान् एवं शोभन हाथों वाले हम विस्तृत
धरती-आकाश, मित्र-वरुण, अंतरिक्ष एवं सविता देव की प्रेरणा से मनचाहा अर्थ चाहते हैं.
(७)
त्रिरुत्तमा दूणशा रोचनानि त्रयो राजन्त्यसुरस्य वीराः.
ऋतावान इषिरा दूळभासस्त्रिरा दिवो विदथे सन्तु देवाः.. (८)
द्युतिमान तीन उत्तम स्थान हैं, जिन्हें कोई नष्ट नहीं कर सकता. इन तीनों स्थानों में
संवत्सर के अग्नि, वायु एवं सूर्य तीन पुत्र सुशोभित होते हैं. यज्ञादि कर्मों से युक्त, शीघ्र गति
वाले एवं अतिरस्करणीय देवगण हमारे यज्ञ के तीनों सवनों में आवें. (८)
सूक्त—५७ देवता—विश्वेदेव
प्र मे विविक्वाँ अविदन्मनीषां धेनुं चरन्तीं प्रयुतामगोपाम्.
सद्यश्चिद्या दुदुहे भूरि धासेरिन्द्रस्तदग्निः पनितारो अस्याः.. (१)
ज्ञानवान् इंद्र इधर-उधर जाती हुई, अकेली इच्छानुसार घूमती हुई गाय के समान मेरी
देव-संबंधी स्तुति को जानें. इंद्र और अग्नि इस स्तुतिरूपी गाय की प्रशंसा करें, जिससे तुरंत
ही अधिक अभिलषित फल दुहा जाता है. (१)
इन्द्रः सु पूषा वृषणा सुहस्ता दिवो न प्रीताः शशयं दुदुह्रे.
विश्वे यदस्यां रणयन्त देवाः प्र वोऽत्र वसवः सुम्नमश्याम्.. (२)
इंद्र! पूषा, कामवर्षी एवं शोभन हाथों वाले अश्विनीकुमार प्रसन्न होकर आकाश में सोने
वाले मेघ से मनचाही वृष्टि प्राप्त करते हैं. हे निवासस्थान देने वाले विश्वेदेव! इस वेदी पर
रमण करो, जिससे हम तुम्हारे द्वारा दिया हुआ सुख पा सकें. (२)
या जामयो वृष्ण इच्छन्ति शक्तिं नमस्यन्तीर्जानते गर्भमस्मिन्.
अच्छा पुत्रं धेनवो वावशाना महश्चरन्ति बिभ्रतं वपूंषि.. (३)
जो ओषधियां जल बरसाने वाले इंद्र की शक्ति को चाहती हैं, वे नम्र होकर इंद्र की
गर्भाधान की शक्ति जानती हैं. फल की कामना करने वाली एवं सबको प्रसन्न करने वाली
ओषधियां भांति-भांति के रूप धारण करने वाले जौ, गेहूं आदि पुत्रों के समान घूमती हैं. (३)
अच्छा विवक्मि रोदसी सुमेके ग्राव्णो युजानो अध्वरे मनीषा.
इमा उ ते मनवे भूरिवारा ऊर्ध्वा भवन्ति दर्शता यजत्राः.. (४)
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यज्ञ में सोमरस निचोड़ने के लिए पत्थर लेकर हम शोभन रूप वाले धरती-आकाश के
सामने होकर स्तुति रूप वाणी से प्रशंसा करते हैं. अग्नि को वरण करने योग्य, दर्शनीय एवं
पूज्य दीप्तियां मनुष्यों के व्यवहार के लिए ऊपर मुख करती हैं. (४)
या ते जिह्वा मधुमती सुमेधा अग्ने देवेषूच्यत उरूची.
तयेह विश्वाँ अवसे यजत्राना सादय पायया चा मधूनि.. (५)
हे अग्नि! तुम्हारी जो ज्वाला-रूपिणी जीभ जलपूर्ण एवं बुद्धियुक्त है एवं देवों को
बुलाने के लिए प्रेरणा देती है, उसी जिह्वा से यज्ञ के योग्य समस्त देवों को हमारी रक्षा के
निमित्त इस यज्ञ में बैठाओ एवं मादक सोम पिलाओ. (५)
या ते अग्ने पर्वतस्येव धारास्रवन्ती पीपयद्देव चित्रा.
तामस्मभ्यं प्रमतिं जातवेदो वसो रास्व सुमतिं विश्वजन्याम्.. (६)
हे अग्नि देव! विविध रूपधारिणी एवं हमें त्यागकर अन्यत्र न जाने वाली तुम्हारी उत्तम-
बुद्धि हम लोगों को उसी प्रकार बढ़ाए, जिस प्रकार बादलों से उत्पन्न जलधारा वनस्पतियों
को बढ़ाती है. हे निवासदाता एवं जातवेद अग्नि! हमें वही परहितसमर्थ एवं
सर्वजनहितकारिणी बुद्धि दो. (६)
सूक्त—५८ देवता—अश्विनीकुमार
धेनुः प्रत्नस्य काम्यं दुहानान्तः पुत्रश्चरति दक्षिणायाः.
आ द्योतनिं वहति शुभ्रयामोषाः स्तोमो अश्विनावजीगः.. (१)
प्रसन्न करने वाली उषा पुरातन-अग्नि के निमित्त सुंदर दूध देती है. उषा का पुत्र सूर्य
उषा के भीतर विचरण करता है. उज्ज्वल गति वाला दिवस सर्वप्रकाशक सूर्य को धारण
करता है. उषा से पहले ही अश्विनीकुमारों की स्तुति करने वाले जागते हैं. (१)
सुयुग्वहन्ति प्रति वामृतेनोर्ध्वा भवन्ति पितरेव मेधाः.
जरेथामस्मद्दि पणेर्मनीषां युवोरवश्वकृमा यातमर्वाक्.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! रथ में भली प्रकार जुड़े हुए घोड़े सत्यरूपी रथ के द्वारा यज्ञ में आने
के लिए तुम्हें वहन करते हैं. पुत्र जिस प्रकार माता-पिता को देखकर जाता है, उसी प्रकार
यज्ञ तुम्हारे सामने जाते हैं. आसुरी बुद्धि को हमसे बहुत दूर करो. हम तुम्हारे लिए हव्य तैयार
करते हैं. तुम हमारे सामने आओ. (२)
सुयुग्भिरश्वैः सुवृता रथेन दस्राविमं शृणुतं श्लोकमद्रेः.
किमङ्ग वां प्रत्यवर्तिं गमिष्ठाहुर्विप्रासो अश्विना पुराजाः.. (३)
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हे अश्विनीकुमारो! सुंदर पहियों वाले रथ में बैठकर एवं भली प्रकार जुते हुए अश्वों द्वारा
खींचे जाकर तुम दोनों स्तोताओं की स्तुतियां सुनो. मेधावी पुरातन ऋषियों ने क्या तुमसे नहीं
कहा कि तुम दोनों हमारी वृत्ति की हानि मत करो. (३)
आ मन्येथामा गतं कच्चिद्देवैर्विश्वे जनासो अश्विना हवन्ते.
इमा हि वां गोऋजीका मधूनि प्रमित्रासो न ददुरूस्रो अग्रे.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! हमारी स्तुति को जानो और अश्वों द्वारा यज्ञ में पधारो. सभी स्तोता
तुम्हें बुलाते हैं. वे मित्रों के समान तुम्हें दूध मिला हुआ एवं मादक सोमरस देते हैं. सूर्य उषा के
आगे उदय होते हैं. (४)
तिरः पुरू चिदश्विना रजांस्याङ्गूषो वां मघवाना जनेषु.
एह यातं पथिभिर्देवयानैर्दसाविमे वां निधयो मधूनाम्.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! अनेक लोकों को अपने तेज से तिरस्कृत करते हुए तुम दोनों देवमार्ग
द्वारा यहां आओ. संपत्तिशाली अश्विनीकुमारो! स्तोताओं के पास तुम्हारे लिए बोला जाने
वाला स्तोत्र है. हे शत्रुनाशको! तुम्हारे लिए मदकारक सोमरस के पात्र तैयार हैं. (५)
पुराणमोकः सख्यं शिवं वां युवोर्रनरा द्रविणं जह्नाव्याम्.
पुनः कृण्वानाः सख्या शिवानि मध्वा मदेम सह नू समानाः.. (६)
हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों की पुरानी मित्रता सेवा करने योग्य एवं कल्याण करने
वाली है. हे हमारे यज्ञकर्म के नेताओ! तुम्हारा धन जाह्नवी गंगा में है. तुम दोनों की सुख मैत्री
को बार-बार प्राप्त करते हुए मादक सोमरस से हम भी शीघ्र प्रसन्न हों. (६)
अश्विना वायुना युवं सुदक्षा नियुद्भिश्न सजोषसा युवाना.
नासत्या तिरोअह्नयं जुषाण सोमं पिबतमस्रिधा सुदानू.. (७)
हे शोभन सामर्थ्य से युक्त, नित्य तरुण, असत्यरहित एवं शोभन फल देने वाले
अश्विनीकुमारो! वायु और नियुतों के साथ मिलकर स्थायी प्रेमयुक्त एवं नाशरहित तुम दोनों
दिवस छिपने पर सोम पान करो. (७)
अश्विना परि वामिषः पुरूचीरीयुर्गीर्भिर्यतमाना अमृध्राः.
रथो ह वामृतजा अद्रिजूतः परि द्यावापृथिवी याति सद्यः.. (८)
हे अश्विनीकुमारो! बहुत से हविरूपी अन्न तुम्हारे समीप जाते हैं. तिरस्कारहीन एवं
यज्ञकर्म में संलग्न स्तोता स्तुतियों द्वारा तुम्हारी सेवा करते हैं. स्तोताओं द्वारा खींचा गया
तुम्हारा जल बरसाने वाला रथ धरती-आकाश के बीच में शीघ्र गमन करता है. (८)
अश्विना मधुषुत्तमो युवाकुः सोमस्तं पातमा गतं दुरोणे.
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