ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—१८५ देवता—द्यावा व पृथ्वी
आयु प्राप्त कर सकें. (६)
सूक्त—१८५ देवता—द्यावा व पृथ्वी
कतरा पूर्वा कतरापरायोः कथा जाते कवयः को वि वेद.
विश्वं त्मना बिभृतो यद्ध नाम वि वर्तेते अहनी चक्रियेव.. (१)
हे क्रांतदर्शियो! धरती और आकाश में कौन पहले उत्पन्न हुआ है, कौन बाद में? इनके
उत्पन्न होने का क्या कारण है? संसार के समस्त पदार्थों को ये स्वयं ही धारण किए हुए हैं एवं
पहियों के समान घूमते रहते हैं. (१)
भूरिं द्वे अचरन्ती चरन्तं पद्द्वन्तं गर्भमपदी दधाते.
नित्यं न सूनूं पित्रोरुपस्थे द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्.. (२)
अचल एवं चरणसहित धरती और आकाश चलने वाले तथा चरणयुक्त प्राणियों को गर्भ
के समान धारण करते हैं. जैसे माता-पिता की गोद में बालक रहता है, उसी प्रकार ये सबको
रखते हैं. हे धरती और आकाश! हमें महापाप से बचाओ. (२)
अनेहो दात्रमदितेरनर्वं हुवे स्वर्वदवधं नमस्वत्.
तद्रोदसी जनयतं जरित्रे द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्.. (३)
हे धरती और आकाश! हम अदिति से जिस पापरहित, अक्षीण, स्वर्ग के तुल्य
हिंसाशून्य एवं अन्नयुक्त धन की प्रार्थना करते हैं, तुम वही धन स्तुतिकर्त्ता यजमानों को देते
हो. हे धरती और आकाश! हमें पाप से बचाओ. (३)
अतप्यमाने अवसावन्ती अनु ष्याम रोदसी देवपुत्रे.
उभे देवानामुभयेभिरह्नां द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्.. (४)
प्रकाशयुक्त दिन और रात्रि के दोनों प्रकार के धन के लिए दुःखरहित एवं अन्न द्वारा रक्षा
करने वाले धरती और आकाश का हम अनुगमन करें. हे धरती और आकाश! हमें पाप से
बचाओ. (४)
सङ्गच्छमाने युवती समन्ते स्वसारा जामी पित्रोरुपस्थे.
अभिजिघ्रन्ती भुवनस्य नाभिं द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्.. (५)
हे एक-दूसरे से मिले हुए, नित्य तरुण, समान सीमा वाले, बहिन और भाई के समान
माता और पिता की गोदी में स्थित, प्राणियों की नाभिरूप जल को सूंघते हुए धरती और
आकाश! हमें पाप से बचाओ. (५)
उर्वी सझनी बृहती ऋतेन हुवे देवानामवसा जनित्री.
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दधाते ये अमृतं सुप्रतीके द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्.. (६)
धरती और आकाश विस्तृत, निवास करने योग्य, महान् एवं शस्य आदि को उत्पन्न करने
वाले हैं. मैं देवों की प्रसन्नता के लिए इन्हें यज्ञ में बुलाता हूं. ये विचित्र रूप वाले एवं जल
धारणकर्त्ता हैं. हे धरती और आकाश! हमें पाप से बचाओ. (६)
उर्वी पृथ्वी बहुले दूरेअन्ते उप ब्रुवे नमसा यज्ञे अस्मिन्.
दधाते ये सुभगे सुप्रतूर्ती द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्.. (७)
मैं इस यज्ञ में नमस्कार संबंधी मंत्रों द्वारा विस्तृत, महान्, अनेक आकारों वाले तथा
अंतहीन धरती और आकाश की स्तुति करता हूं. हे सौभाग्यसंपन्न एवं सुखपूर्वक तरने वाले
धरती और आकाश! हमें पाप से बचाओ. (७)
देवान्वा यच्चकृमा कच्चिदागः सखायं वा सदमिज्जास्पतिं वा.
इयं धीर्भूया अवयानमेषां द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्.. (८)
हे धरती और आकाश! हम देवों, बंधुओं एवं जमाता के प्रति नित्य जो अपराध करते
हैं, हमारे उन अपराधों को दूर करो. तुम हमें पाप से बचाओ. (८)
उभा शंसा नर्या मामविष्ठामुभे मामूती अवसा सचेताम्.
भूरि चिदर्यः सुदास्तरायेषा मदन्त इषयेम देवाः.. (९)
स्तुति के योग्य एवं मानवों के हितकारी धरती और आकाश के प्रति की गई स्तुतियां
मेरी रक्षा करें. उक्त दोनों रक्षक मेरी रक्षा के लिए मिलें. हे देवो! तुम्हारे स्तुतिकर्त्ता हम हव्य
अन्न द्वारा तुम्हें संतुष्ट करते हैं एवं दान करने के लिए अन्न की अभिलाषा करते हैं. (९)
ऋतं दिवे तदवोचं पृथिव्या अभिश्रावाय प्रथमं सुमेधाः.
पातामवद्याद्दुरितादभीके पिता माता च रक्षतामवोभिः.. (१०)
मुझ बुद्धिमान् ने धरती और आकाश के प्रति ऐसी स्तुतियां की हैं, जो चारों दिशाओं में
प्रकाशित हैं. धरती और आकाश रूपी माता-पिता मुझे निंदा-योग्य पाप से बचावें एवं अपने
समीप रखकर मनचाही वस्तुओं से मेरा पालन करें. (१०)
इदं द्यावापृथिवी सत्यमस्तु पितर्मातर्यदिहोपब्रुवे वाम्.
भूतं देवानाभवमे अवोभिर्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्.. (११)
हे माता और पितारूपी धरती और आकाश! इस यज्ञ में मेरे द्वारा की गई स्तुतियों को
सार्थक करो. तुम रक्षा साधनों द्वारा हम स्तुतिकर्त्ताओं के पास आओ, जिससे हम अन्न, बल
और दीर्घ आयु प्राप्त करें. (११)
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