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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

सूक्त—७५ देवता—पवमान सोम

Page 1481Permalink

अद्भिः सोम पपृचानस्य ते रसोऽव्यो वारं वि पवमान धावति.
स मृज्यमानः कविभिर्मदिन्तम स्वदस्वेन्द्राय पवमान पीतये.. (९)
हे पवमान सोम! जल में मिलने वाला तुम्हारा रस भेड़ के बालों से बने दशापवित्र की
ओर अनेक प्रकार से दौड़ता है. हे अतिशय नशीले सोम! तुम बुद्धिमान् ऋत्विजों द्वारा पवित्र
होकर इंद्र के पीने हेतु स्वादिष्ट बनो. (९)
सूक्त—७५ देवता—पवमान सोम
अभि प्रियाणि पवते चनोहितो नामानि यह्वो अधि येषु वर्धते.
आ सूर्यस्य बृहतो बृहन्नधि रथं विश्वञ्चमरुहद्विचक्षणः.. (१)
अन्न के लिए हितकारी सोम संसार के प्रिय एवं नीचे बहने वाले जलों के चारों ओर
टपकते हैं. महान् सोम जलों के भीतर बढ़ते हैं. सबको देखने वाले सोम महान् सूर्य के
विशाल एवं सब ओर चलने वाले रथ पर चढ़ते हैं. (१)
ऋतस्य जिह्वा पवते मधु प्रियं वक्ता पतिर्धियो अस्या अदाभ्यः.
दधाति पुत्रः पित्रोरपीच्यं१ नाम तृतीयमधि रोचने दिवः.. (२)
सत्यरूप यज्ञ की जिह्वा के समान सोम प्यारा एवं मादक रस टपकाते हैं. सोम शब्द
करने वाले, इस यज्ञकर्म के पालक एवं राक्षसों द्वारा अपराजेय हैं. द्युलोक को दीप्त करने
वाला सोम जब निचोड़ा जाता है, तब यजमान ऐसा नाम धारण करता है जिसे उसके माता-
पिता भी नहीं जानते. (२)
अव द्युतानः कलशाँ अचिक्रदन्नृभिर्येमानः कोश आ हिरण्यये.
अभीमृतस्य दोहना अनूषताधि त्रिपृष्ठ उषसो वि राजति.. (३)
यज्ञ का दोहन करने वाले ऋत्विज् दीप्तिशाली एवं नेताओं द्वारा स्वर्णमय चमड़े पर रखे
गए सोम को निचोड़ते हैं. सोम शब्द करते हुए द्रोणकलश की ओर जाते हैं. तीनों सवनों में
वर्तमान सोम यज्ञ के दिन प्रातःकाल सुशोभित होते हैं. (३)
अद्रिभिः सुतो मतिभिश्चनोहितः प्ररोचयन्नोदसी मातरा शुचिः.
रोमाण्यव्या समया वि धावति मधोर्धारा पिन्वमाना दिवेदिवे.. (४)
पत्थरों की सहायता से निचोड़े गए, अन्न के लिए हितकारक एवं शुद्ध सोम जगत् का
निर्माण करने वाली द्यावा-पृथिवी को प्रकाशित करके भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर
जाते हैं एवं जल से मिली हुई मादक सोम की धार प्रतिदिन दशापवित्र पर गिरती है. (४)
परि सोम प्र धन्वा स्वस्तये नृभिः पुनानो अभि वासयाशिरम्.
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