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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सूक्त—१२१ देवता—इंद्र

हे धन सहित रथ! मेरा वंश विस्तार करो. अश्विनीकुमार उस सुखकारी रथ को
स्तोताओं के सोमपान वाले स्थान पर ले जाते हैं. (११)
अध स्वप्रस्य निर्विदेऽभुञ्जतश्च रेवतः. उभा ता बस्नि नश्यतः.. (१२)
मैं प्रातःकाल के स्वप्न एवं दूसरों को रक्षा न करने वाले धनी से घृणा करता हूं. ये दोनों
शीघ्र नष्ट हो जाते हैं. (१२)
सूक्त—१२१ देवता—इंद्र
कदित्था नूँः पात्रं देवयतां श्रवद्गिरो अङ्गिरसां तुरण्यन्.
प्र यदानड्दिश आ हर्म्यस्योरु क्रंसते अध्वरे यजत्रः.. (१)
स्तोताओं के पालक एवं गोरूप धन के देने वाले इंद्र अपने भक्त अंगिरा की स्तुति कब
सुनेंगे? वे जब गृहस्वामी यजमान के ऋत्विजों को सामने देखते हैं, तभी यज्ञपात्र बनकर यज्ञ
में स्वयं आ जाते हैं. (१)
स्तम्भीद्ध द्यां स धरुणं पुषायद्भुर्वजाय द्रविणं नरो गोः.
अनु स्वजां महिषश्चक्षत व्रां मेनामश्वस्य परि मातरं गोः.. (२)
उसने आकाश को धारण किया, असुरों द्वारा चुराई गई गायों को निकाला एवं परम
भासमान होकर प्राणियों द्वारा सेवित एवं अन्न का कारण वर्षाजल बिखेरा. वह महान् अपनी
पुत्री उषा के पश्चात् उदय होता है. उसने घोड़ी को गाय की माता बनाया. (२)
नक्षद्धवमरुणीः पूर्व्यं राट् तुरो विशामङ्गिरसामनु द्यून्.
तक्षद्वज्रं नियुतं तस्तम्भद् द्यां चतुष्पदे नर्य्याय द्विपादे.. (३)
अरुण वर्ण की उषा को रंजित करने वाले वे पूर्ववर्ती ऋषियों द्वारा निर्मित स्तोत्र सुनें. वे
अंगिरागोत्रीय ऋषियों को प्रतिदिन धनदाता, वज्र को तीखा करने वाले एवं मानवों के हितार्थ
द्विपाद एवं चतुष्पाद की रक्षा करते तथा आकाश को धारण करते हैं. (३)
अस्य मदे स्वर्यं दा ऋतायापीवृतमुस्रियाणामनीकम्.
यद्ध प्रसर्गे त्रिककुम्निवर्तदप दृहो मानुषस्य दुरो वः.. (४)
तुमने सोमपान से प्रसन्न होकर पणियों द्वारा चुराई हुई गायों का यज्ञ के लिए प्रशंसनीय
दान दिया था. तीनों लोकों में उत्तम इंद्र जब युद्ध में संलग्न थे, तब वे मानवद्रोही असुरों का
द्वार गायों के निकलने के लिए खोल देते थे. (४)
तुभ्यं पयो यत्पितरावनीतां राधः सुरेतस्तुरणे भुरण्यू.
शुचि यत्ते रेक्ण आयजन्त सबर्दुघायाः पय उस्रियायाः.. (५)
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हे क्षिप्रकारी इंद्र! तुम्हारे लिए जगत् के माता-पिता, धरती और आकाश ने बलवर्धक,
वीर्यसंपन्न एवं धनयुक्त दुधारू गायों का दूध जिस समय अग्नि में अर्पित किया, तभी तुमने
पणियों का द्वार खोल दिया था. (५)
अध प्र जज्ञे तरणिर्ममत्तु प्र रोच्यस्या उषसो न सूरः.
इन्दुर्यैभिर्राष्ट स्वेदुहव्यैः सुवेण सिञ्चञ्जजरणाभि धाम.. (६)
उषा के समीपवर्ती सूर्य के समान चमकते हुए शत्रुविजयी इंद्र इस समय प्रकट हुए हैं. वे
हमें प्रसन्न बनावें. हम भी स्तुतिपात्र सोमरस को स्रुच से यज्ञस्थल में छिड़कते हुए पीते हैं.
(६)
स्विध्मा यद्धनधितिरपस्यात्सूरो अध्वरे परि रोधना गोः.
यद्ध प्रभासि कृत्व्याँ अनु द्यूननर्विशे पश्विषे तुराय.. (७)
प्रकाशयुक्त मेघमाला जिस समय अपना कर्म करने को तत्पर होती है, उस समय प्रेरक
इंद्र यज्ञ के निमित्त वर्षा का आवरण दूर करते हैं. हे इंद्र! तुम जब कार्य योग्य दिवसों को
प्रकाशित करते हो, तब गाड़ी वाले एवं चरवाहे अपने काम में शीघ्र सफल होते हैं. (७)
अष्टा महो दिव आदो हरी इह द्युम्नासाहमभि योधन उत्सम्.
हरिं यत्ते मन्दिनं दुक्षन्व्धे गोरभसमद्रिभिर्वाताप्यम्.. (८)
जब ऋत्विज् तुम्हारी बुद्धि के लिए मनोहर, मादक, बलकारी, एवं उपभोग योग्य
सोमरस को पत्थरों की सहायता से निचोड़ें, तब तुम अपने हर्षदाता एवं सोमरस का भोग
करने वाले दोनों घोड़ों को इस यज्ञ में सोम पिलाओ एवं हमारे धन का अपहरण करने वाले
शत्रुओं को हराओ. (८)
त्वमायसं प्रति वर्तयो गोर्दिवो अश्मानमुपनीतमृभ्वा.
कुत्साय यत्र पुरुहूत वन्वञ्छुष्णमनन्तैः परियासि वधैः.. (९)
हे इंद्र! तुमने आकाश से ऋभु द्वारा लाए गए, शत्रु के प्रति शीघ्र जाने वाले लौहमय वज्र
को गमनशील शुष्ण असुर की ओर फेंका था. हे पुरुहूत! उस समय तुमने कुत्स ऋषि के
कल्याण के लिए शुष्ण को अनेकविध हनन साधनों से हिंसा करते हुए छेड़ा था. (९)
पुरा यत्सूरस्तमसो अपीतेस्तमद्रिवः फलिगं हेतिमस्य.
शुष्णस्य चित्परिहितं यदोजो दिवस्परि सुग्रथितं तदादः.. (१०)
हे वज्रधारक! प्राचीन काल में जब सूर्य अंधकार के साथ हुए संग्राम से निवृत्त हुए, उस
समय तुमने मेघ का विनाश किया. सूर्य को आच्छादित करने एवं सूर्य में संलग्न होने वाले
शुष्ण के बल को तुमने समाप्त कर दिया था. (१०)
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अनु त्वा मही पाजसी अचक्रे द्यावाक्षामा मदतामिन्द्र कर्मन्.
त्वं वृत्रमाशयानं सिरासु महो वज्रेण सिष्वपो वराहम्.. (११)
हे इंद्र! विशाल शक्तिसंपन्न एवं सर्वत्र व्यापक धरती और आकाश ने तुम्हें वृत्रवध के
पश्चात् प्रसन्न किया था. इसके बाद तुमने सर्वत्र वर्तमान एवं शोभन आहार वाले वृत्र असुर को
महान् वज्र से मारकर पानी में गिरा दिया. (११)
त्वमिन्द्र नर्यो याँ अवो नॄन्तिष्ठा वातस्य सुयुजो वहिष्ठान्.
यं ते काव्य उशना मन्दिनं दाद्वृत्रहणं पार्यं ततक्ष वज्रम्.. (१२)
हे मानव हितकारी इंद्र! तुम जिन अश्वों की रक्षा करते हो, उन वायु तुल्य शीघ्रगामी एवं
शोभन रथ में जुते हुए अश्वों पर आरोहण करो. कविपुत्र उशना द्वारा प्रदत्त मदकारक वज्र को
तुमने वृत्रघातक एवं शत्रु अतिक्रमणकारी के रूप में तेज किया है. (१२)
त्वं सूरो हरितो रामयो नॄन्भरच्चक्रमेतशो नायमिन्द्र.
प्रास्य पारं नवतिं नाव्यानामपि कर्तमवर्तयोऽयज्यून्.. (१३)
हे इंद्र! सूर्य रूप में अपने हरि नामक घोड़ों को रोको. एतश नाम का घोड़ा तुम्हारे रथ
का पहिया आगे चलाता है. तुम नाव द्वारा पार होने योग्य नब्बे नदियों के पार जाकर
यज्ञविहीन असुरों के पास पहुंचो एवं उन्हें कर्त्तव्य में लगाओ. (१३)
त्वं नो अस्या इन्द्र दुर्हणायाः पाहि वज्रिवो दुरितादभीके.
प्र नो वाजान्रथ्यो३ अश्वबुध्यानिषे यन्धि श्रवसे सूनृतायै.. (१४)
हे वज्रधारणकर्त्ता! इस शक्तिशाली दरिद्रता से हमारी रक्षा करो, समीपवर्ती संग्राम में
हमें पाप से बचाओ तथा कीर्ति एवं सत्यभाषण के निमित्त रथ एवं अश्वयुक्त धन प्रदान करो.
(१४)
मा सा ते अस्मत्सुमतिर्वि दसद्वाजप्रमहः समिषो वरन्त.
आ नो भज मघवन्गोष्त्वर्यो मंहिष्ठास्ते सधमादः स्याम.. (१५)
हे संपत्तियों के कारण पूजनीय इंद्र! तुम्हारी अनुग्रह बुद्धि हमसे अलग न हो. हे मघवन्!
तुम धन के स्वामी हो, हमें गाय प्राप्त कराओ. तुम्हारी विशाल स्तुतियों से वृद्धि प्राप्त करने
वाले पुत्र-पौत्रादि के साथ आनंदित हों. (१५)
सूक्त—१२२ देवता—विश्वेदेव
प्र वः पान्तं रघुमन्यवोऽन्धो यज्ञं रुद्राय मीळहुषे भरध्वम्.
दिवो अस्तोष्यसुरस्य वीरैरिषुध्येव मरुतो रोदस्योः.. (१)
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हे क्रोधहीन ऋत्विजो! तुम कर्मों का फल देने वाले रुद्र को पालक एवं यज्ञसाधन अन्न
अधिक मात्रा में दो. मैं स्वर्ग के देव रुद्र तथा उनके अनुचरों एवं आकाश और धरती के बीच
निवास करने वाले मरुद्गण की स्तुति करता हूं. रुद्र अपने वीरों अर्थात् मरुतों की सहायता
से शत्रुओं को उसी प्रकार भगा देते हैं, जैसे तूणीर में रहने वाले बाणों द्वारा शत्रु को भगाया
जाता है. (१)
पत्नीव पूर्वहूतिं वावृधध्या उषासानक्ता पुरुधा विदाने.
स्तरीनार्कं व्युतं वसाना सूर्यस्य श्रिया सुदृशी हिरण्यैः.. (२)
जिस प्रकार पत्नी पति की पहली पुकार सुनकर शीघ्र दौड़ती आती है, उसी प्रकार
दिवस एवं रात्रि नामक देवता अनेक प्रकार की स्तुतियों से ज्ञायमान होकर हमारे पहले
आह्वान पर शीघ्र आवें. उषादेवी शत्रुनाशक सूर्य के समान सुनहरी किरणों से युक्त होकर एवं
महान् रूप धारण करके आवें. उषा सूर्य की शोभा को धारण करे. (२)
ममत्तु नः परिज्मा वसर्हा ममत्तु वातो अपां वृषण्वान्.
शिशीतमन्द्रापर्वता युवं नस्तन्नो विश्वे वरिवस्यन्तु देवाः.. (३)
निवास के योग्य एवं सर्वत्र गतिशील सूर्य हमें प्रसन्न करें. जल बरसाने वाला वायु हमें
प्रमुदित करे. इंद्र एवं मेघ हमारी वृद्धि करें. इस प्रकार विश्वेदेव हमें पर्याप्त अन्न प्रदान करें.
(३)
उत त्या मे यशसा श्वेतनायै व्यन्ता पान्तौशिजो हुवध्यै.
प्र वो नपातमपां कृणुध्वं प्र मातरा रास्पिनस्यायोः.. (४)
हे ऋत्विजो! उषिज के पुत्र मुझ कक्षीवान् के कल्याण के लिए यज्ञीय अन्न के भक्षक,
सोमपानकर्ता एवं स्तुति के योग्य अश्विनीकुमारों को विश्वप्रकाशक उषाकाल में बुलाओ. तुम
जल के नाती अग्नि की स्तुति करो. मुझ जैसे व्यक्तियों की मातृतुल्य अहोरात्र देवताओं की
भी स्तुति करो. (४)
आ वो रुवण्युमौशिजो हुवध्यै घोषेव शंसमर्जुनस्य नंशे.
प्र वः पूष्णे दावन आँ अच्छा वोचेय वसुतातिमग्नेः.. (५)
हे देवगण! उषिज का पुत्र मैं कक्षीवान् आपको बुलाने के लिए आपके अनुकूल स्तोत्र
का पाठ करता हूं. हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार ब्रह्मवादिनी महिला घोषा ने अपने श्वेत कुष्ठ
रोग के विनाश के लिए तुम्हारी स्तुति की थी, उसी प्रकार मैं भी तुम्हारी स्तुति करता हूं. मैं
फल देने वाले पूषा एवं धन देने वाले अग्नि की स्तुति करता हूं. (५)
श्रुतं मे मित्रावरुणा हवेमोत श्रुतं सदने विश्वतः सीम्.
श्रोतु नः श्रोतुरातिः सुश्रोतुः सुक्षेत्रा सिन्धुरद्भिः.. (६)
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हे मित्र और वरुण! मेरे आह्वान के साथ-साथ यज्ञमंडप में वर्तमान अन्य लोगों का भी
आह्वान सुनो. हमारे आह्वान को भली प्रकार सुनने वाले जलदेवता सिंधु हमारे फसलों वाले
खेतों को जल से सींचते हुए हमारी स्तुति सुनें. (६)
स्तुषे सा वां वरुण मित्र रातिर्गवां शता पृक्षयामेषु पज्रे.
श्रुतरथे प्रियरथे दधानाः सद्यः पुष्टिं निरुन्धानासो अग्मन्.. (७)
हे मित्र और वरुण! मैं अन्न का नियमन करने वाले स्तोत्रों द्वारा तुम्हारी स्तुति करता हूं.
इसलिए मुझ कक्षीवान् को तुम अनगिनत गाएं दो. तुम लोग प्रसिद्ध एवं सुंदर रथ पर बैठकर
एवं मुझ कक्षीवान् के प्रति प्रसन्न होकर आओ एवं मेरी पुष्टि को स्थायी करो. (७)
अस्य स्तुषे महिमघस्य राधः सचा सनेम नहुषः सुवीराः.
जनो यः पज्रेभ्यो वाजिनीवानश्वावतो रथिनो मह्यं सूरिः.. (८)
मैं पवित्र धन वाले देवसमूह के धन की स्तुति करता हूं. वे कक्षीवान् के प्रिय व्यक्ति हैं.
हम पुत्र-पौत्रादि के साथ मिलकर प्रेम से इस धन का उपभोग करें, मैं अंगिरा गोत्र वाले
कक्षीवान् को प्रसन्नतापूर्वक अन्न, घोड़े और रथ देने वाले देवसमूह की स्तुति करता हूं. (८)
जनो यो मित्रावरुणावभिध्रुगपो न वां सुनोत्यक्षणयाध्रुक्.
स्वयं स यक्ष्मं हृदये नि धत्त आप यदीं होत्राभिर्ऋतावा.. (९)
हे मित्र और वरुण! जो व्यक्ति तुम्हारा यज्ञ न करके द्रोह करता है अथवा तुम्हारे निमित्त
सोमरस न निचोड़कर तुमसे शत्रुता बढ़ाता है, वह मूर्ख मनुष्य अपने आप ही अपने हृदय में
यक्ष्मा रोग को धारण करता है. जो व्यक्ति यज्ञ करने वाला है एवं स्तुतिपाठ करता हुआ
सोमरस निचोड़ता है, वह कुशल अश्व प्राप्त करता है. (९)
स व्राधतो नहुषो दंसुजूतः शर्धस्तरो नरां गूर्तश्रवाः.
विसृष्टरातिर्याति बाळ्हसृत्वा विश्वासु पृत्सु सदमिच्छूरः.. (१०)
वह कुशल अश्व प्राप्त करता है, मनुष्यों को हराने वाला तथा अपने समान लोगों में अन्न
के लिए प्रसिद्ध होता है. अतिथियों का धन से स्वागत करने वाला ऐसा व्यक्ति हिंसक शत्रुओं
से सदा निडर होकर सभी प्रकार के युद्धों में जाता है. (१०)
अध ग्मन्ता नहुषो हवं सुरेः श्रोता राजानो अमृतस्य मन्द्राः.
नभोजुवो यन्निरवस्य राधः प्रशस्तये महिना रथवते.. (११)
हे सर्वेश्वर एवं आनंददाता देवगण! मुझ स्तुतिकर्त्ता एवं मरणशील व्यक्ति की स्तुति सुनो
और इस यज्ञ में पधारो. हे आकाशव्यापी देवो! तुम ऐसे यजमान को महान् बनाने वाले हव्य
की प्रशंसा करना चाहते हो, जिसका रक्षक तुम्हारे अतिरिक्त कोई न हो. (११)
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एतं शर्धं धाम यस्य सूरेरित्यवोचन्दशतयस्य नंशे.
द्युम्नानि येषु वसुताती रारन्विश्वे सन्वन्तु प्रभृथेषु वाजम्.. (१२)
जिन देवों ने यह कहा कि हमने उस यजमान को विजय का साधन बल प्रदान किया,
जिसके दस इंद्रियपोषक सोम को ग्रहण करने के लिए हम आए हैं, ऐसे देवों का प्रकाशवान्
अन्न एवं विस्तृत धन अत्यंत शोभा पाता है. समस्त देव उत्तम यज्ञों में हमें अन्न प्रदान करें.
(१२)
मन्दामहे दशतयस्य धासेर्द्धिर्यतपञ्च बिभ्रतो यन्त्यन्ना.
किमिष्टाश्व इष्टरश्मिरेत ईशानासस्तरुष ऋञ्जते नॄन्.. (१३)
जब-जब हम विश्वदेवों की स्तुति करते हैं, तब-तब ऋत्विज् दस प्रकार की इंद्रियों को
पुष्ट करने वाले दस प्रकार के अन्नों को धारण करके यज्ञ मंडप की ओर चलते हैं. इष्टाश्व एवं
इष्टरश्मि नाम के राजा शत्रुनाशक एवं नेता-रूप वरुण आदि देवताओं को बिलकुल प्रसन्न
नहीं कर सकते. (१३)
हिरण्यकर्णं मणिग्रीवमर्णस्तन्नो विश्वे वरिवस्यन्तु देवा:.
अर्यो गिर: सद्य आ जग्मुषीरोसाश्चाकन्तूभयेष्वस्मे.. (१४)
समस्त देव हमें ऐसे सुंदर पुत्र दें जो कानों में स्वर्णाभूषण एवं ग्रीवा में रत्नमाला धारण
करते हों. समस्त आदरणीय देवों का समूह हमारे आने के तुरंत बाद ही स्तुतियों एवं हव्य की
अभिलाषा करे. (१४)
चत्वारो मा मशर्शारस्य शिश्वस्त्रयो राज्ञ आयवसस्य जिष्णो:.
रथो वां मित्रावरुणा दीर्घाप्सा: स्यूमगभस्ति: सूरो नाद्यौत्.. (१५)
मशशरि राजा के चार एवं जयशील अयवस राजा के तीन पुत्र मुझ कक्षीवान् को कष्ट
पहुंचाते हैं. हे मित्र और वरुण! तुम्हारा अत्यंत विस्तृत एवं सुखकर प्रकाश वाला रथ सूर्य के
समान चमकता है. (१५)
सूक्त—१२३ देवता—उषा
पृथू रथो दक्षिणाया अयोज्यैनं देवासो अमृतासो अस्थु:.
कृष्णा दुदस्थादर्या३ विहायाश्चिकित्सन्ती मानुषाय क्षयाय.. (१)
अपने व्यापार में कुशल उषा देवी के रथ में घोड़े जोड़े गए. उस रथ में मरणरहित
देवसमूह यज्ञ में जाने के लिए बैठ गया. पूजा के योग्य एवं विविध गमन वाली उषा काले रंग
के अंधकार से उत्पन्न होती है एवं अंधकार निवारण रूपी चिकित्सा करती हुई मानवों के
निवासस्थान की ओर आती है. (१)
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पूर्वा विश्वस्माद्भुवनादबोधि जयन्ती वाजं बृहती सनुत्री.
उच्चा व्यख्यद्युवतिः पुनर्भूरोषा अगन्प्रथमा पूर्वहूतौ.. (२)
गमनशील प्रकाश द्वारा अंधकार पर विजय प्राप्त करने वाली, महती एवं विश्व को सुख
देने वाली उषा समस्त प्राणियों से पहले जागती है. वह नित्य यौवना उषा पुनः पुनः उत्पन्न
होती है. सारे संसार को देखती हुई वह हमारे एक बार बुलाने पर ही आ जाती है. (२)
यदद्य भागं विभजासि नृभ्य उषो देवि मर्त्यत्रा सुजाते.
देवो नो अत्र सविता दमूना अनागसो वोचति सूर्याय.. (३)
हे सुजाता एवं मानवपालिका उषादेवी! तुम इस समय मनुष्यों के लिए अपने प्रकाश
का जो अंश देती हो, उसीको हमें सविता देव प्रदान करें तथा हमारे यज्ञस्थल में सूर्य के
आगमन के निमित्त हमें पापरहित कहकर अनुगृहीत करें. (३)
गृहङ्गहमहना यात्यच्छा दिवेदिवे अधि नामा दधाना.
सिषासन्ती द्योतना शश्वदागादग्रमग्रमिद्भजते वसूनाम्.. (४)
भोग की इच्छा से युक्त एवं सारे संसार को प्रकाशित करती हुई उषा प्रतिदिन नम्र भाव
से प्रत्येक घर की ओर आती है एवं हवि-रूप धन का श्रेष्ठ भाग स्वीकार कर लेती है. (४)
भगस्य स्वसा वरुणस्य जामिरुषः सूनृते प्रथमा जरस्व.
पश्चा स दघ्या यो अघस्य धाता जयेम तं दक्षिणया रथेन.. (५)
हे उषा! तुम मनुष्यों की शोभन नेत्री हो. तुम आदित्य की स्वसा एवं अंधकार निवारक
सविता की भगिनी तथा अन्य देवों की अपेक्षा श्रेष्ठ हो. समस्त देव तुम्हारी स्तुति करें. तुम्हारी
प्रसन्नता के पश्चात् जो दुःख देने वाला आएगा, हम तुम्हारी सहायता प्राप्त करके उसे अपने
रथ आदि साधन से जीत लेंगे. (५)
उदीरतां सूनृता उत्पुरन्धीरुरुद्ग्नयः शुशुचानासो अस्थुः.
स्पार्हा वसूनि तमसापगूळ्हाविष्कृणवन्त्युषसो विभातीः.. (६)
हे ऋत्विजो! प्रिय एवं सच्ची बातें स्तुति रूप में कहो, बुद्धि का प्रमाण देने वाले यज्ञकर्म
करो तथा दीप्तिशाली अग्नि प्रज्वलित करो. ऐसा करने से विविध प्रकाश वाली उषा अंधकार
से ढके हुए एवं यज्ञसाधन धनों को प्रकट करती है. (६)
अपान्यदेत्यभ्य१न्येदेति विषुरूपे अहनी सं चरेते.
परिक्षितोस्तमो अन्या गुहाकरद्यौदुषाः शोशुचता रथेन.. (७)
नाना रूपवान् अहोरात्र—दोनों देवता व्यवधान रहित होकर चलते हैं. वे एक-दूसरे के
विरुद्ध गति वाले हैं. एक आता है तो दूसरा जाता है. बारीबारी से आने वाले इन देवताओं में
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एक पदार्थों को छिपाते हैं और दूसरे अपने अत्यंत प्रकाशवान् रथ के द्वारा उन्हें प्रकाशित
करते हैं. (७)
सदृशीरद्य सदृशीरिदु श्वो दीर्घं सचन्ते वरुणस्य धाम.
अनवद्यास्त्रिंशतं योजनान्येकैका क्रतुं परि यन्ति सद्यः.. (८)
उषा आज जितनी सुंदर है, उसी के समान कल भी सुंदर होगी. सूर्य जहां रहता है, उषा
प्रतिदिन उससे तीस योजन आगे रहती है. एक ही उषा सूर्य के उदयकाल में आने और जाने
का—दोनों कार्य करती है. (८)
जानत्यह्नः प्रथमस्य नाम शुक्ला कृष्णादजनिष्ट श्वितीची.
ऋतस्य योषा न मिनाति धामाहरहर्निष्कृतमाचरन्ती.. (९)
दीप्त एवं श्वेत वर्ण वाली तथा काले रंग के अंधकार से उत्पन्न होने वाली उषा दिन के
पहले अंश को जानती है. उत्पन्न होने पर उषा सूर्य के तेज में मिल जाती है. उसके तेज का
पराभव नहीं करती, अपितु प्रतिदिन उसकी शोभा बढ़ाती है. (९)
कन्येव तन्वा३ शाशदानाँ एषि देवि देवमियक्षमाणम्.
संस्मयमाना युवतिः पुरस्तादाविर्वक्षांसि कृणुषे विभाती.. (१०)
हे उषादेवी! तुम कन्या के समान अपने अंगों को स्पष्ट करती हुई दानशील एवं
प्रकाशयुक्त सूर्य रूपी प्रिय के समीप आओ. तुम युवती के समान अत्यंत प्रकाशयुक्त होती
हुई तथा हंसती हुई सूर्य के सामने अपने गोपनीय अंगों को वस्त्ररहित करो. (१०)
सुसङ्काशा मातृमृष्टेव योषाविस्तन्वं कृणुषे दृशे कम्.
भद्रा त्वमुषो वितरं व्युच्छ न तत्ते अन्या उषसो नशन्त.. (११)
जिस प्रकार माता द्वारा स्नान आदि से शुद्ध किए जाने पर कन्या का रूप दर्शनीय हो
जाता है, उसी प्रकार तुम भी सबको दिखाने के लिए अपना शरीर प्रकाशित करो. हे कल्याण
करने वाली उषा! अंधकार मिटाओ. अन्य उषाएं तुम्हारे कार्य व्याप्त नहीं करेंगी. (११)
अश्वावतीर्गोमतीर्विश्ववारा यतमाना रश्मिभिः सूर्यस्य.
परा च यन्ति पुनरा च यन्ति भद्रा नाम वहमाना उषासः.. (१२)
उषा देवियां अश्वों एवं गायों से संपन्न एवं सभी कालों में रहने वाली हैं. वे सूर्य की
किरणों के साथ नित्य ही अंधकार का नाश करने का प्रयत्न करती हैं. वे सबके अनुकूल होने
के कारण कल्याणकर नाम धारण करके आती-जाती हैं. (१२)
ऋतस्य रश्मिमनुयच्छमाना भद्रम्भद्रं ऋतुमस्मासु धेहि.
उषो नो अद्य सुहवा व्युच्छास्मायु रायो मघवत्सु च स्युः.. (१३)
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