ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—६८ देवता—इंद्र व वरुण
सरल-गति, शत्रु-पराभवकारी तथा कामवर्षी सोमरस को प्रस्तुत करते हैं, उस समय तुम घर
देने के लिए आते हो और तुम्हारा दिया हुआ घर नष्ट नहीं होता. (११)
सूक्त—६८ देवता—इंद्र व वरुण
श्रुष्टी वां यज्ञ उद्यतः सजोषा मनुष्वद् वृक्तबर्हिषो यजध्यै.
आ य इन्द्रावरुणाविषे अद्य महे सुम्नाय मह आववर्तत्.. (१)
हे महान् इंद्र व वरुण! आज यज्ञ में ऋत्विजों द्वारा तुम्हारे निमित्त वही सोमरस तैयार
किया गया है, जो मनु के समान यजमान द्वारा कुश बिछाने के पश्चात् महान् एवं सुख के लिए
किया जाता है. (१)
ता हि श्रेष्ठा देवताता तुजा शूराणां शविष्ठा ता हि भूतम्.
मघोनां मंहिष्ठा तुविशुष्म ऋतेन वृत्रतुरा सर्वसेना.. (२)
हे इंद्र व वरुण! तुम श्रेष्ठ, यज्ञ में धन देने वाले एवं शूरों में अतिशय शक्तिशाली हो. तुम
दानकर्त्ताओं में अति महान्, अतिशय बलयुक्त, सत्य द्वारा शत्रुओं की हिंसा करने वाले एवं
सभी सेनाओं के स्वामी हो. (२)
ता गृणीहि नमस्येभिः शूषैः सुम्नेभिरिन्द्रावरुणा चकाना.
वज्रेणान्यः शवसा हन्ति वृत्रं सिषक्त्यन्यो वृजनेषु विप्रः.. (३)
हे भरद्वाज! स्तुतियोग्य, शक्तिशालीयों व सुखी लोगों द्वारा प्रशंसित इंद्र एवं वरुण की
स्तुति करो. इन में एक वज्र द्वारा वृत्र को मारता है और दूसरा बुद्धिमान् शक्ति द्वारा स्तोताओं
के उपद्रवों में रक्षक बनता है. (३)
ग्नाश्च यन्नरश्च वावृधन्त विश्वे देवासो नरां स्वगूर्ताः.
प्रैभ्य इन्द्रावरुणा महित्वा द्यौश्च पृथिवि भूतमूर्वी.. (४)
हे इंद्र एवं वरुण! मनुष्यों में स्त्रियां और पुरुष एवं सब देव स्वयं तत्पर होकर जब
स्तुतियों द्वारा तुम्हारी वृद्धि करते हैं, तब तुम इन स्तोताओं के स्वामी बनो. हे द्यावा-पृथ्वी!
तुम भी इनके स्वामी बनो. (४)
स इत्सुदानुः स्ववाँ ऋतावेन्द्रा यो वां वरुण दाशति त्मन्.
इषा स द्विषस्तरेद्दास्वान्वंसद रयिं रयिवतश्च जनान्.. (५)
हे इंद्र एवं वरुण! जो यजमान अपने आप तुम्हें हव्य देता है, वह शोभनदान वाला,
धनवान् एवं यज्ञकर्त्ता बने. ऐसा दाता जयशील शत्रु से जीतता है एवं धन के साथ
संपत्तिशाली-पुत्र प्राप्त करता है. (५)
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यं युवं दाश्वधराय देवा रयिं धत्थो वसुमन्तं पुरुक्षुम्.
अस्मे स इन्द्रावरुणावापि ष्यात्प्र यो भनक्ति वनुषामशस्तीः.. (६)
हे इंद्र एवं वरुण देवो! तुम हव्य देने वाले यजमान को संपत्ति एवं बहुविध अन्न वाला जो
धन देते हो, शत्रुओं संबंधी अपयश को मिटाने वाला वही धन हमें दो. (६)
उत नः सुत्रात्रो देवगोपाः सुरिभ्य इन्द्रावरुणा रयिः ष्यात्.
येषां शुष्मः पृतनासु साह्वान्प्र सद्यो द्युम्ना तिरते ततुरिः.. (७)
हे इंद्र एवं वरुण! हम स्तोताओं को सुरक्षित व देवों द्वारा रक्षित धन दो. हमारा बल
युद्धों में शत्रुओं को पराजित एवं हिंसित करके उनके यशों का शीघ्र तिरस्कार करे. (७)
नू न इन्द्रावरुणा गृणाना पृङ्क्तं रयिं सौश्रवसाय देवा.
इत्था गृणन्तो महिनस्य शर्धोऽपो न नावा दुरिता तरेम.. (८)
हे इंद्र एवं वरुण देवो! तुम हमारी स्तुति सुनकर हमें शोभन अन्न के लिए धन दो. हम
महान् कहकर तुम्हारे बल की स्तुति करते हैं. जैसे लोग नाव के सहारे जल को पार करते हैं,
उसी प्रकार हम पापों से पार हों. (८)
प्र सम्राजे बृहते मन्म नु प्रियमर्च देवाय वरुणाय सप्रथः.
अयं य उर्वी महिना महिव्रतः क्रत्वा विभात्यजरो न शोचिषा.. (९)
हे स्तोता! राजाओं के शासक एवं विराट वरुण देव के निमित्त प्रिय एवं सभी प्रकार
विशाल स्तोत्र पढ़ो. वे महत्त्वयुक्त, महान् कर्मों वाले, बुद्धिमान्, तेजस्वी एवं जरारहित होने के
साथ-साथ धरती-आकाश को प्रकाशित करते हैं. (९)
इन्द्रावरुणा सुतपाविमं सुतं सोमं पिबतं मद्यं धृतव्रता.
युवो रथो अध्वरं देववीतये प्रति स्वरसरमुप याति पीतये.. (१०)
हे सोमकर्त्ता इंद्र एवं वरुण! इस नशीले एवं निचोड़े हुए सोमरस को पिओ. हे
व्रतधारको! तुम्हारा रथ देवों के साथ सोमपान के निमित्त यज्ञ के मार्ग पर बढ़ता है. (१०)
इन्द्रावरुणा मधुमत्तमस्य वृष्णः सोमस्य वृषणा वृषेथाम्.
इदं वामन्धः परिषिक्तमस्मे आसद्यास्मिन्बर्हिषि मादयेथाम्.. (११)
हे कामवर्षी इंद्र व वरुण! तुम अतिशय मधुर, अभिलाषापूरक एवं वृद्धिकर्त्ता सोम का
पान करो. हमने यह सोमरूप अन्न तुम्हारे लिए ही पात्रों में रखा. इन कुशों पर बैठकर
सोमपान से प्रसन्न बनो. (११)
सूक्त—६९ देवता—इंद्र व विष्णु
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सं वां कर्मणा समिषा हिनोमीन्द्राविष्णू अपसस्पारे अस्य.
जुषेथां यज्ञं द्रविणं च धत्तमरिष्टैर्नः पथिभिः पारयन्ता.. (१)
हे इंद्र एवं विष्णु! मैं तुम्हारे निमित्त स्तोत्र एवं हवि प्रदान करता हूं. इस उक्थ की
समाप्ति पर तुम यज्ञ का सेवन करना. हमें उपद्रवरहित मार्ग पर पार ले जाने वाले तुम दोनों
धन दो. (१)
या विश्वासां जनितारा मतीनामिन्द्राविष्णू कलशा सोमधाना.
प्र वां गिरः शस्यमाना अवन्तु प्र स्तोमासो गीयमानासो अर्कैः.. (२)
हे समस्त स्तुतियों के जनक एवं कलशरूप में सोमरस के आधार इंद्र एवं विष्णु! बोली
जाती हुई स्तुतियां तुम्हें प्राप्त हों. स्तोताओं द्वारा गाए जाते हुए स्तोत्र तुम्हारे पास पहुंचें. (२)
इन्द्राविष्णू मदपती मदानामा सोमं यातं द्रविणो दधाना.
सं वामञ्जन्वक्तुभिर्मतीनां सं स्तोमासः शस्यमानास उक्थैः.. (३)
हे मदकारक-सोम के स्वामी इंद्र एवं विष्णु! तुम धन देते हुए सोमरस के सामने आओ.
स्तोताओं के स्तोत्र एवं बोले जाते हुए उक्थ तुम्हें तेज के साथ प्राप्त हों. (३)
आ वामश्वासो अभिमातिषाह इन्द्राविष्णू सधमादो वहन्तु.
जुषेथां विश्वा हवना मतीनामुप ब्रह्माणि शृणुतं गिरो मे.. (४)
हे इंद्र एवं विष्णु! हिंसकों को हराने वाले एवं परस्पर प्रसन्न होने वाले घोड़े तुम्हें वहन
करें. तुम स्तोताओं के समस्त स्तोत्रों के साथ-साथ मेरे स्तुतिवचनों को भी सुनो. (४)
इन्द्राविष्णू तत्पनयाय्यं वां सोमस्य मद उरु चक्रमाथे.
अकृणुतमन्तरिक्षं वरीयोऽप्रथतं जीवसे नो रजांसि.. (५)
हे इंद्र एवं विष्णु! तुम सोम के नशे में महान् कर्म करते हो, अंतरिक्ष को विस्तृत बनाते
हो एवं लोगों को हमारे जीवन में उपयोगी बनाते हो. ये सब कर्म प्रशंसा के योग्य हैं. (५)
इन्द्राविष्णू हविषा वावृधानाग्रा मद्द्वाना नमसा रातहव्या.
घृतासुती द्रविणं धत्तमस्मे समुद्रः स्थः कलशः सोमधानः.. (६)
हे सोम द्वारा बढ़े हुए इंद्र एवं विष्णु! तुम घी एवं अन्न से युक्त हो. तुम सोम के उत्तम
भाग का सेवन करने वाले यजमानों द्वारा नमस्कार के साथ हव्य प्रदान करने वाले हो. तुम
सागर एवं कलश के रूप में सोम के आधार हो. तुम हमें धन दो. (६)
इन्द्राविष्णू पिबतं मध्वो अस्य सोमस्य दस्रा जठरं पृणेथाम्.
आ वामन्धांसि मदिराण्यूग्मन्नुप ब्रह्माणि शृणुतं हवं मे.. (७)
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हे दर्शनीय इंद्र एवं विष्णु! तुम इस नशीले सोमरस को पीकर अपना पेट भरो. नशीला
सोम अन्न के रूप में तुम्हें प्राप्त हो. तुम मेरी स्तुतियां और पुकार सुनो. (७)
उभा जिग्यथुर्न परा जयेथे न परा जिग्ये कतरश्चनैनोः.
इन्द्रश्च विष्णो यदपस्पृधेथां त्रेधां सहस्रं वि तदैरयेथाम्.. (८)
हे विजयी इंद्र एवं विष्णु! तुम कभी हारते नहीं हो. इन दोनों में कोई भी हारने वाला
नहीं है. तुमने जिसे तीन स्थानों पर स्थित किया एवं असंख्य वस्तुओं के लिए असुरों के साथ
स्पर्धा की, उसे अपने पराक्रम से पा लिया. (८)
सूक्त—७० देवता—द्यावा-पृथ्वी
घृतवती भुवनानामभिश्रियोर्वी पृथ्वी मधुदुघे सुपेशसा.
द्यावापृथिवी वरुणस्य धर्मणा विष्कभिते अजरे भूरिरेतसा.. (१)
हे द्यावा-पृथ्वी! तुम जलयुक्त, प्राणियों के आश्रय-स्थल, विस्तीर्ण, अनेक कार्य के रूप
में प्रसिद्ध, जल-दोहन करने वाली, सुंदररूप वाली, सबके नियामक वरुण द्वारा अलग-अलग
धारित, नित्य एवं बहुत शक्ति वाली हो. (१)
असश्चन्ती भूरिधारे पयस्वती घृतं दुहाते सुकृते शुचिव्रते.
राजन्ती अस्य भुवनस्य रोदसी अस्मे रेतः सिञ्चतं यन्मनुर्हितम्.. (२)
हे परस्पर पृथक्, अनेक धाराओं वाली, जलयुक्त एवं पवित्र कर्म वाली द्यावा-पृथ्वी!
तुम उत्तमकर्म करने वाले व्यक्ति को जल देती हो. इस संसार की स्वामिनी द्यावा-पृथ्वी! तुम
मानव हितकारी शक्ति हमें दो. (२)
यो वामृजवे क्रमणाय रोदसी मर्तो ददाश धिष्णे स साधति.
प्र प्रजाभिर्जायते धर्मणस्परि युवोः सिक्ता विषुरूपाणि सव्रता.. (३)
हे सकल भुवन की निवास द्यावा-पृथ्वी! जो मनुष्य तुम्हारे सरल गमन के लिए हव्य
देता है, वह अपनी कामनाएं पूर्ण करता है एवं पुत्र-पौत्रादि के द्वारा उन्नति करता है. कर्मों के
ऊपर वर्तमान तुम्हारा वीर्य नानारूप धारण करता है. (३)
घृतेन द्यावापृथिवी अभीवृते घृतश्रिया घृतपृचा घृतावूधा.
उर्वी पृथ्वी होतूर्वूर्ये पुरोहिते ते इद्विप्रा ईळते सुम्नमिष्टये.. (४)
द्यावा-पृथ्वी जल से ढकी हुई, जल को सहारा देती हुई, जल से व्याप्त, जल की वृद्धि
करने वाली, विस्तृत, प्रसिद्ध व यज्ञ में यजमानों द्वारा पुरस्कृत हैं. विद्वान् यज्ञ करने के
निमित्त इनसे सुख की याचना करते हैं. (४)
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मधु नो द्यावापृथिवी मिमिक्षतां मधुश्चुता मधुदुघे मधुव्रते.
दधाने यज्ञं द्रविणं च देवता महि श्रवो वाजमस्मे सुवीर्यम्.. (५)
जल क्षरण करने वाली, जल टपकाने वाली, जल के निमित्त कर्म करने वाली,
देवतारूप, हम लोगों को यज्ञ, धन, विशाल-यश, अन्न एवं शोभनवीरता देती हुई द्यावा-पृथ्वी
हमें मधु से सींचें. (५)
ऊर्जं नो द्यौश्च पृथिवी च पिन्वतां पिता माता विश्वविदा सुदंससा.
संरराणे रोदसी विश्वशम्भुवा सनिं वाजं रयिमस्मे समिन्वताम्.. (६)
हे पिता द्यौ एवं माता पृथ्वी! हमें अन्न दो. सबको जानने वाली, शोभनकर्म वाली,
परस्पर रमण करती हुई एवं सबको सुख देने वाली द्यावा-पृथ्वी हमें संतान, बल एवं धन दें.
(६)
सूक्त—७१ देवता—सविता
उदु ष्य देवः सविता हिरण्यया बाहू अयंस्त सवनाय सुक्रतुः.
घृतेन पाणी अभि प्रुष्णुते मखो युवा सुदक्षो रजसो विधर्मणि.. (१)
शोभनकर्म वाले सविता देव अपनी स्वर्णमय भुजाओं को दान के लिए उठाते हैं. महान्,
नित्ययुवा व शोभनबुद्धि सविता लोक को धारण करने के लिए अपने जलपूर्ण हाथों को
बढ़ाते हैं. (१)
देवस्य वयं सवितुः सवीमनि श्रेष्ठे स्याम वसुनश्च दावने.
यो विश्वस्य द्विपदो यश्चतुष्पदो निवेशने प्रसवे चासि भूमनः.. (२)
हम उन्हीं सविता देव के अनुज्ञात एवं प्रशंसनीय दान पाने में समर्थ हों, जो सभी द्विपद
एवं चतुष्पद और प्राणियों की स्थिति और जन्म में स्वतंत्र हैं. (२)
अदब्धेभिः सवितः पायुभिष्ट्वं शिवेभिरद्य परि पाहि नो गयम्.
हिरण्यजिह्वः सुविताय नव्यसे रक्षा माकिर्नो अघशंस ईशत.. (३)
हे सविता! तुम अपने अहिंसित एवं सुखकारक तेजों द्वारा हमारे घर की रक्षा करो. हे
हिरण्यवाक्! तुम नवीन सुख एवं रक्षा के कारण बनो. हमारा अहित चाहने वाला हमारा
स्वामी न हो. (३)
उदु ष्य देवः सविता दमूना हिरण्यपाणिः प्रतिदोषमस्थात्.
अयोहनुर्यजतो मन्द्रजिह्व आ दाशुषे सुवति भूरि वामम्.. (४)
दानयुक्त मन वाले, स्वर्णमय हाथों वाले, सोने की ठोड़ी वाले, यज्ञ के पात्र व प्रसन्नवचन
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वाले सविता देव रात्रि की समाप्ति पर उठें. वे हव्यदाता यजमान के लिए बहुत सा अन्न दें.
(४)
उद् अयाँ उपवक्तेव बाहू हिरण्यया सविता सुप्रतीका.
दिवो रोहांस्यरुहत्पृथिव्या अरीरमतपतयत् कच्चिदध्वम्.. (५)
सविता व्याख्यानदाता के समान अपने स्वर्णमय एवं शोभन अवयवों वाले हाथों को
उठावें. वे धरती से आकाश के स्थानों में पहुंचें एवं सभी गतिशील वस्तुओं को आनंद दें. (५)
वाममद्य सवितर्वाममु श्वो दिवेदिवे वाममस्मभ्यं सावीः.
वामस्य हि क्षयस्य देव भूरेरया धिया वामभाजः स्याम.. (६)
हे सविता! हमें आज धन दो एवं कल भी धन देना. हमें प्रतिदिन धन दो. हे देव! तुम
निवास के कारणरूप विशाल धन के दाता हो. हम इस स्तुति द्वारा धन के भागी बनेंगे. (६)
सूक्त—७२ देवता—इंद्र व सोम
इन्द्रासोमा महि तद्वां महित्वं युवं महानि प्रथमानि चक्रथुः.
युवं सूर्यं विविदुथुर्युवं स्व१र्विश्वा तमांस्यहतं निदश्च.. (१)
हे इंद्र एवं सोम! तुम्हारा महत्त्व बड़ा है. तुमने महान् भूतों को बनाया था. तुमने सूर्य
और जल की खोज की है एवं सभी निंदकों व अंधकारों का नाश किया है. (१)
इन्द्रासोमा वासयथ उषामुत्सूर्यं नयथो ज्योतिषा सह.
उप द्यां स्कम्भथुः स्कम्भनेनाप्रथतं पृथिवीं मातरं वि.. (२)
हे इंद्र एवं सोम! तुम उषा को प्रकाशित करो एवं सूर्य को उसकी ज्योति के साथ ऊपर
उठाओ. तुम अंतरिक्ष के द्वारा स्वर्ग को स्थिर करो एवं पृथ्वी माता को प्रसिद्ध बनाओ. (२)
इन्द्रासोमावहिमपः परिष्ठां हथो वृत्रमनु वां द्यौरमन्यत.
प्रार्णांस्यैरयतं नदीनामा समुद्राणि पप्रथुः पुरूणि.. (३)
हे इंद्र एवं सोम! तुम जल को रोकने वाले वृत्र नामक राक्षस का वध करो. स्वर्ग ने तुम्हें
माना है. तुम नदियों के जल को प्रेरित करो व समुद्र को जल से भर दो. (३)
इन्द्रासोमा पक्वमामास्वन्तर्नि गवामिद्दधथुर्वक्षणासु.
जगृभतुरनपिनद्धमासु रुशच्चित्रासु जगतीष्वन्तः.. (४)
हे इंद्र एवं सोम! तुमने गायों के कोमल थनों में पुष्टिकारक दूध धारण किया है. तुमने
भिन्न-भिन्न रंग वाली गायों में किसी के द्वारा न रुकने वाला तथा श्वेतवर्ण का दूध धारण किया
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