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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

ब्रह्मणस्पते त्वमस्य यन्ता सूक्तस्य बोधि तनयं च जिन्व.

हे अंगिरावंशोत्पन्न बृहस्पति! गायों को छिपाने वाला पर्वत तुम्हारे कल्याण के लिए खुल
गया और गाएं बाहर आ गईं. उस समय तुमने इंद्र की सहायता से वृत्र द्वारा रोकी गई
जलधारा को नीचे की ओर बहाया था. (१८)
ब्रह्मणस्पते त्वमस्य यन्ता सूक्तस्य बोधि तनयं च जिन्व.
विश्वं तद्भद्रं यदवन्ति देवा बृहद्वदेम विदथे सुवीरा:.. (१९)
हे संसार के नियामक ब्रह्मणस्पति! इस सूक्त को जानो एवं हमारी संतान की रक्षा करो.
देवगण जिसकी रक्षा करते हैं, वह सभी कल्याण प्राप्त करता है. हम शोभन पुत्र एवं पौत्र
प्राप्त करके इस यज्ञ में बहुत सी स्तुतियां बोलेंगे. (१९)
सूक्त—२४ देवता—बृह्मणस्पति
सेमामविद्धि प्रभृतिं य ईशिषेऽया विधेम नवया महा गिरा.
यथा नो मीढ्वान्त्स्तवते सखा तव बृहस्पते सीषधः सोत नो मतिम्.. (१)
हे ब्रह्मणस्पति! तुम इस विश्व के स्वामी हो. तुम हमारी स्तुति को भली प्रकार जानो.
इस नवीन एवं विशाल स्तुति के द्वारा हम तुम्हारी सेवा करते हैं. हम तुम्हारे मित्र हैं, इसलिए
हमें मनोवांछित फल प्रदान करो तथा हमारी स्तुति को सफल करो. (१)
यो नन्त्वान्यनमन्न्योजसोतादर्दर्मन्युना शम्बराणि वि.
प्राच्यावयदच्युता ब्रह्मणस्पतिरा चाविशद्वसुमन्तं वि पर्वतम्.. (२)
बृहस्पति ने अपनी शक्ति द्वारा दमनीय राक्षसों को वश में किया, क्रोध करके शंबर
असुर का नाश किया, स्थिर जल को नीचे की ओर गिराया एवं गोरूपी धन से पूर्ण पर्वत में
प्रवेश किया. (२)
तद्देवानां देवतमाय कृत्वमश्रन्थन्दृळ्हाव्रदन्त वीळिता.
उद्गा आजदभिनद्ब्रह्मणा वलमगूहत्तमो व्यचक्षयत्स्वः.. (३)
इंद्रादि देवों में श्रेष्ठ बृहस्पति के कर्म से दृढ़ पर्वत शिथिल हुए थे एवं स्थिर वृक्ष टूट गए
थे. बृहस्पति ने गायों का उद्धार किया, मंत्र रूपी शक्ति द्वारा बल असुर को समाप्त किया एवं
अंधकार को समाप्त करके सूर्य को प्रकाशित किया. (३)
अश्मास्यमवतं ब्रह्मणस्पतिर्मधुधारमभि यमोजसातृणत्.
तमेव विश्वे पपिरे स्वर्दृशो बहु साकं सिसिचुरुत्समुद्रिणम्.. (४)
बृहस्पति ने पत्थर के समान दृढ़ मुख वाले एवं झुके हुए मेघ को शक्ति द्वारा नष्ट किया.
सूर्य किरणों ने उसका जल पिआ. उन्होंने बादल के साथ ही वर्षा द्वारा अधिक मात्रा में
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सिंचन किया. (४)
सना ता का चिद्भवना भवीत्वा माद्भिः शरद्भिरुद्नरो वरन्त वः.
अयतन्ता चरतो अन्यदन्यदिद्या चकार वयुना ब्रह्मणस्पतिः.. (५)
हे ऋत्विजो! तुम्हारे कल्याण के लिए ही बृहस्पति ने नित्य एवं विचित्र ज्ञान से प्रतिमान
और प्रतिवर्ष होने वाली जलवर्षा का द्वार भिन्न किया था. बृहस्पति ने इस ज्ञान को मंत्र का
विषय बनाया, जिससे धरती और आकाश एक-दूसरे को प्रसन्न करते रहें. (५)
अभिनक्षन्तो अभि ये तमानशुर्निधिं पणीनां परमं गुहा हितम्.
ते विद्वांसः प्रतिचक्ष्यानृता पुनर्यत उ आयन्तदुदीयुरराविशम्.. (६)
अंगिरागोत्रीय विद्वान् ऋषियों ने चारों ओर घूमते हुए पणियों द्वारा गुफा में छिपाए हुए
गोरूपी धन को प्राप्त किया. वे असुरों की माया को देखकर जिस स्थान से निकले थे, वहीं
प्रवेश कर गए. (६)
ऋतावानः प्रतिचक्ष्यानृता पुनरात आ तस्थुः कवयो महस्पथः.
ते बाहुभ्यां धमितमग्निमश्मनि नकिः षो अस्त्यरणो जहुर्हि तम्.. (७)
सत्यवादी एवं क्रांतदर्शी अंगिरागोत्रीय ऋषि राक्षसों की माया को देखकर वहां आने की
इच्छा से फिर प्रधान मार्ग पर पहुंच गए. उन्होंने हाथों द्वारा प्रज्वलित अग्नि को पर्वत पर
फेंका. इससे पहले वे अग्नि वहां नहीं थे. (७)
ऋतज्येन क्षिप्रेण ब्रह्मणस्पतिर्यत्र वष्टि प्र तदश्नोति धन्वना.
तस्य साध्वीरिषवो याभिरस्यति नृचक्षसो दृशये कर्णयोनयः.. (८)
ब्रह्मणस्पति सत्यरूप ज्या वाले धनुष से जो चाहते हैं, वही पा लेते हैं. वे कान से
उत्पन्न, दर्शनीय एवं कार्य साधन में कुशल बाणों को फेंकते हैं. (८)
स संनयः स विनयः पुरोहितः स सुष्टुतः स युधि ब्रह्मणस्पतिः.
चाक्ष्मो यद्वाजं भरते मती धनादित्सूर्यस्तपति तप्यतुर्वृथा.. (९)
देवों द्वारा आगे स्थापित बृहस्पति अलग-अलग पदार्थों को मिलाते और मिले हुए को
भिन्न-भिन्न करते हैं एवं युद्ध में प्रकट होते हैं. वे सर्वद्रष्टा जिस समय अन्न एवं धन धारण
करते हैं, उस समय सूर्य अनायास ही चमक उठते हैं. (९)
विभु प्रभु प्रथमं मेहनावतो बृहस्पतेः सुविद्त्राणि राध्या.
इमा सातानि वेन्यस्य वाजिनो येन जना उभये भुञ्जते विशः.. (१०)
वर्षा करने वाले बृहस्पति का धन व्याप्त, प्रौढ़, मुख्य एवं सुलभ है. यह धन सुंदर एवं
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अन्नस्वामी बृहस्पति ने प्रदान किया है. स्तोता एवं यजमान दोनों प्रकार के मनुष्य ध्यानमग्न
होकर उस धन को भोगते हैं. (१०)
योऽवरे वृजने विश्वथा विभुर्महामु रण्वः शवसा ववक्षिथ.
स देवो देवान्प्रति पप्रथे पृथु विश्वेदु ता परिभूर्ब्रह्मणस्पतिः.. (११)
सब प्रकार व्याप्त एवं स्तुतियोग्य बृहस्पति अति बलवान् एवं निर्बल दोनों प्रकार के
स्तोताओं की रक्षा अपनी शक्ति से करते हैं. वे समस्त देवों के प्रतिनिधि रूप में परम प्रसिद्ध
हैं एवं सबके स्वामी हैं. (११)
विश्वं सत्यं मघवाना युवोरिदापश्न प्र मिनन्ति व्रतं वाम्.
अच्छेन्द्राब्रह्मणस्पती हविर्नोऽन्नं युजेव वाजिना जिगातम्.. (१२)
हे धनस्वामी इंद्र एवं बृहस्पति! तुम्हारी सभी स्तुतियां सत्य हैं. तुम्हारे व्रत को जल नष्ट
नहीं कर सकता, रथ में जुते हुए घोड़े जिस प्रकार घास की ओर दौड़ते हैं, उसी प्रकार तुम
हमारे हवि के सम्मुख आओ. (१२)
उताशिष्ठा अनु शृण्वन्ति वह्नयः सभेयो विप्रो भरते मती धना.
वीळुद्वेषा अनु वश ऋणमाददिः स ह वाजी समिथे ब्रह्मणस्पतिः.. (१३)
ब्रह्मणस्पति के शीघ्रगामी घोड़े हमारे स्तोत्र को सुनते हैं. सभ्य एवं बुद्धिमान् अध्वर्यु
सुंदर स्तोत्रों द्वारा हव्य प्रदान करते हैं. वह प्रबल राक्षसों से द्वेष करने वाले, अपनी इच्छा से
ऋण स्वीकार करने एवं अन्न के स्वामी हैं. वे युद्ध में हमारा हव्य स्वीकार करें. (१३)
ब्रह्मणस्पतेरभवद्यथावशं सत्यो मन्युर्महि कर्मा करिष्यतः.
यो गा उदाजत्स दिवे वि चाभजन्महीव रीतिः शवसासरात्पृथक्.. (१४)
महान् कर्म करने वाले ब्रह्मणस्पति का मंत्र उनकी इच्छा के अनुसार सत्य होता है.
उन्होंने गायों को बाहर करके आकाश का विभाग किया है. जिस प्रकार नदियों का जल
विभिन्न धाराओं में नीचे की ओर बहता है, उसी प्रकार गाएं अपनी शक्ति के अनुसार विभिन्न
देवों के घर गईं. (१४)
ब्रह्मणस्पते सुयमस्य विश्वहा रायः स्याम रथ्यो३ वयस्वतः.
वीरेषु वीराँ उप पृङ्धि नस्त्वं यदीशानो ब्रह्मणा वेषि मे हवम्.. (१५)
हे ब्रह्मणस्पति! हम ऐसे धन के स्वामी बनें जो सदा नियंत्रित एवं अन्नयुक्त हो. तुम
सबके ईश्वर हो, इसलिए हमारे वीर पुत्रों को पौत्रयुक्त करो. तुम हवि एवं अन्न के साथ-साथ
हमारी स्तुति को जानो. (१५)
ब्रह्मणस्पते त्वमस्य यन्ता सूक्तस्य बोधि तनयं च जिन्व.
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