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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

सूक्त—५५ देवता—पवमान सोम

Page 1440Permalink

हे निचुड़ते हुए एवं इंद्राभिलाषी सोम! तुम हमारे यज्ञ के लिए चारों ओर से गायों से
युक्त अन्न बरसाओ. (४)
सूक्त—५५ देवता—पवमान सोम
यवयवं नो अन्धसा पुष्टम्पुष्टं परि स्रव. सोम विश्वा च सौभगा.. (१)
हे सोम! तुम हमें अन्न के साथ पके हुए जौ अधिक मात्रा में दो तथा अन्य
सौभाग्यसूचक संपत्तियां भी दो. (१)
इन्दो यथा तव स्तवो यथा ते जातमन्धसः. नि बर्हिषि प्रिये सदः.. (२)
हे सोमरूप अन्न! तुम अपनी स्तुतियों एवं जन्म के अनुरूप हमारे यज्ञ में अपने प्रिय
कुशों पर बैठो. (२)
उत नो गोविदश्ववित्पवस्व सोमान्धसा. मक्षूतमेभिरहभिः.. (३)
हे सोम! तुम हमें गाएं एवं घोड़े देते हो. तुम थोड़े दिनों में ही अन्न के साथ धारा के रूप
में टपको. (३)
यो जिनाति न जीयते हन्ति शत्रुम्भीत्य. स पवस्व सहस्रजित्.. (४)
हे असंख्य शत्रुओं को जीतने वाले सोम! तुम शत्रुओं को मारते हो, शत्रु तुम्हें नहीं मार
सकते. तुम टपको. (४)
सूक्त—५६ देवता—पवमान सोम
परि सोम ऋतं बृहदाशुः पवित्रे अर्षति. विघ्नन्नक्षांसि देवयुः.. (१)
शीघ्रगति वाले व देवों के अभिलाषी सोम दशापवित्र पर स्थित होकर राक्षसों को नष्ट
करते हैं एवं हमें विशाल अन्न देते हैं. (१)
यत्सोमो वाजमर्षति शतं धारा अपस्युवः. इन्द्रस्य सख्यमाविशन्.. (२)
जब सोम की यज्ञाभिलाषिणी सौ धाराएं इंद्र की मित्रता प्राप्त करती हैं, तब वह हमारे
लिए अन्न देते हैं. (२)
अभि त्वा योषणो दश जारं न कन्यान्षत. मृज्यसे सोम सातये.. (३)
हे सोम! कन्या जिस प्रकार अपने यार को बुलाती है, उसी प्रकार शब्द करती हुई दस
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