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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सूक्त—२२ देवता—इंद्र

सूक्त—२२ देवता—इंद्र
त्रिकद्रुकेषु महिषो यवाशिरं तुविशुष्मस्तृपत्सोममपिबद्विष्णुना सुतं यथावशत्.
स ईं ममाद महि कर्म कर्तवे महामुरुं सैनं सश्चद्देवो देवं सत्यमिन्द्रं सत्य इन्दुः.. (१)
पूज्य, परम शक्तिशाली एवं सबको तृप्त करने वाले इंद्र ने पूर्वकाल में की हुई कामना
के अनुसार जौ के सत्तुओं से मिला हुआ सोमरस विष्णु के साथ पिया. महान् सोमरस ने इंद्र
को महान् कर्म करने की प्रेरणा दी. सत्य एवं दीप्त सोमरस सच्चे एवं दीप्त इंद्र को व्याप्त
करे. (१)
अध त्विषीमाँ अभ्योजसा क्रिविं युधाभवदा रोदसी अपृणदस्य मज्मना प्रवावृधे.
अधत्तान्यं जठरे प्रेमरिरिच्यत सैनं सश्चद्देवो देवं सत्यमिन्द्रं सत्य इन्तुः.. (२)
इंद्र ने अपने बल से किवि असुर को युद्ध के द्वारा पराजित एवं धरती-आकाश को चारों
ओर से पूर्ण किया. इंद्र पिए हुए सोमरस के बल से वृद्धि प्राप्त करते हैं. इंद्र ने आधा सोम
अपने पेट में रख लिया और आधा अन्य देवों में बांट दिया. सत्य एवं दीप्त सोमरस सच्चे तथा
दीप्त इंद्र को व्याप्त करे. (२)
साकं जात: क्रतुना साकमोजसा ववक्षिथ साकं वृद्धो वीर्यैः सासहिर्मृधो विचर्षणिः.
दाता राधः स्तुवते काम्यं वसु सैनं सश्चद्देवो देवं सत्यमिन्द्रं सत्य इन्दुः.. (३)
हे इंद्र! तुम यज्ञ के साथ उत्पन्न हुए हो एवं अपनी शक्ति से विश्व को वहन करना चाहते
हो. तुमने वीर कर्मों से वृद्धि प्राप्त करके हिंसकों को हराया एवं भले-बुरे का विचार किया.
तुम स्तुतिकर्त्ता को मनोवांछित धन दो. सत्य एवं दीप्त सोमरस सच्चे एवं तेजस्वी इंद्र को
व्याप्त करे. (३)
तव त्यन्नर्यं नृतोऽप इन्द्र प्रथमं पूर्व्यं दिवि प्रवाच्यं कृतम्.
यद्देवस्य शवसा प्रारिणा असुं रिणन्नपः.
भुवद्विश्वमभ्यादेवमोजसा विदादूर्जं शतक्रतुर्विदादिषम्.. (४)
हे सबको नचाने वाले इंद्र! तुम्हारे द्वारा प्राचीन समय में किया गया मानव हितसाधक
कर्म स्वर्ग में प्रसिद्ध हुआ, तुमने अपने बल से वृत्र असुर के प्राण हरण करके उसके द्वारा
रोका हुआ जल प्रवाहित किया. इंद्र ने अंधकार रूप से समस्त विश्व को व्याप्त करने वाले
असुर को अपने बल से नष्ट किया. वे शतक्रतु इंद्र अन्न एवं हव्य प्राप्त करें. (४)
सूक्त—२३ देवता—ब्रह्मणस्पति एवं
बृहस्पति
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गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम्.
ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम्.. (१)
हे ब्रह्मणस्पति! तुम देव-समूह में गणपति, कवियों में अप्रतिम कवि, प्रशंसनीय लोगों में
सर्वोच्च एवं मंत्रों के स्वामी हो. हम तुम्हारा आह्वान करते हैं. तुम हमारी स्तुतियां सुनते हुए
यज्ञशाला में बैठो और हमारी रक्षा करो. (१)
देवाश्चित्ते असुर्य प्रचेतसो बृहस्पते यज्ञियं भागमानशुः.
उस्राइव सूर्यो ज्योतिषा महो विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि.. (२)
हे असुरनाशक एवं उत्तम ज्ञानसंपन्न बृहस्पति! तुम्हारा यज्ञसंबंधी भाग देवों ने पाया है.
तेज के कारण पूज्य सूर्य जिस प्रकार किरणें उत्पन्न करता है, उसी प्रकार तुम मंत्रों के
जन्मदाता हो. (२)
आ विबाध्या परिरापस्तमांसि च ज्योतिष्मन्तं रथमृतस्य तिष्ठसि.
बृहस्पते भीमममित्रदम्भनं रक्षोहणं गोत्रभिदं स्वर्विदम्.. (३)
हे बृहस्पति! तुम चारों ओर के निंदकों और अंधकार को समाप्त करके प्रकाशयुक्त, यज्ञ
प्राप्त कराने वाले, भयानक शत्रुओं का नाश करने वाले, राक्षसों के हंता, मेघ को भिन्न करने
वाले एवं स्वर्ग प्राप्त कराने वाले रथ में बैठते हो. (३)
सुनीतिभिर्नयसि त्रायसे जनं यस्तुभ्यं दाशान्न तमंहो अश्नवत्.
ब्रह्मद्विषस्तपनो मन्युमीरसि बृहस्पते महि तत्ते महित्वनम्.. (४)
हे बृहस्पति! जो तुम्हें हव्य अन्न देता है, उसे तुम न्यायपूर्ण मार्ग से ले जाकर पाप से
बचाते हो. तुम्हारा यही महत्त्व है कि तुम यज्ञ का विरोध करने वाले को कष्ट देते एवं शत्रुओं
की हिंसा करते हो. (४)
न तमंहो न दुरितं कुतश्चन नारातयस्तितिरुर्न द्वयाविनः.
विश्वा इदस्मादध्वरसो वि बाधसे यं सुगोपा रक्षसि ब्रह्मणस्पते.. (५)
हे ब्रह्मणस्पति! तुम जिसकी रक्षा करते हो, उसे कोई पाप या दुःख बाधा नहीं पहुंचा
सकता. हिंसक एवं ठग भी उसे दुःखी नहीं कर सकते. उसे नष्ट करने वाली सभी सेनाओं को
तुम रोकते हो. (५)
त्वं नो गोपाः पथिकृद्विचक्षणस्तव व्रताय मतिभिर्जरामहे.
बृहस्पते यो नो अभि ह्वरो दधे स्वां तं मर्मर्तु दुच्छुना हरस्वती.. (६)
हे बृहस्पति! तुम हमारे रक्षक, सच्चा मार्ग बताने वाले एवं कुशल हो. हम तुम्हारा यज्ञ
पूर्ण करने के लिए स्तोत्रों द्वारा तुम्हारी प्रार्थना करते हैं. जो व्यक्ति हमारे प्रति कुटिलता
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रखता है, उसकी वेगशाली दुर्बुद्धि उसका प्राणनाश करे. (६)
उत वा यो नो मर्चयादनागसोऽरातीवा मर्तः सानुको वृकः.
बृहस्पते अप तं वर्तया पथः सुगं नो अस्यै देववीतये कृधि.. (७)
हे बृहस्पति! जो उन्नत एवं धन छीनने वाला व्यक्ति हमारे सामने आकर हम निर्दोषों की
हिंसा करता है, उसे उत्तम मार्ग से हटा दो तथा देवयज्ञ के लिए हमारा मार्ग सरल बनाओ.
(७)
त्रातारं त्वा तनूनां हवामहेऽवस्पतैरधिवक्तारमस्मयुम्.
बृहस्पते देवनिदो नि बर्हय मा दुरेवा उत्तरं सुम्नमुन्नशन्.. (८)
हे बृहस्पति! तुम सबको उपद्रवों से बचाने वाले एवं हमारे पुत्र-पौत्रादि का पालन करने
वाले हो. तुम हमारे प्रति पक्षपातपूर्ण वचन बोलकर प्रसन्नता व्यक्त करते हो. हम तुम्हें बुलाते
हैं. तुम देवनिंदकों का विनाश करो. दुर्बुद्धि के शत्रु उत्तम सुख प्राप्त करें. (८)
त्वया वयं सुवृधा ब्रह्मणस्पते स्पार्हा वसु मनुष्या ददीमहि.
या नो दूरे तळितो या अरातयोऽभि सन्ति जम्भया ता अनप्रसः.. (९)
हे ब्रह्मणस्पति! तुम्हारे द्वारा वृद्धि प्राप्त करके हम अन्य मनुष्यों से चाहने योग्य धन
प्राप्त करें. जो शत्रु हमारे समीप या दूर रहकर हमारा पराभव करते हैं, उन दानहीन व्यक्तियों
का नाश करो. (९)
त्वया वयमुत्तमं धीमहे वयो बृहस्पते पप्रिणा सस्निना युजा.
मा नो दुःशंसो अभिदिप्सुरीशत प्र सुशंसा मतिभिस्तारिषिमहि.. (१०)
हे कामपूरक एवं शुद्ध बृहस्पति! तुम्हारी सहायता से हम उत्तम अन्न प्राप्त करेंगे. हमें
हराने की इच्छा रखने वाले हमारे स्वामी न बनें. हम उत्तम स्तुतियां करते हुए पुण्य लाभ करें
एवं सबसे उत्कृष्ट बनें. (१०)
अनानुदो वृषभो जग्मिराहवं निष्तप्ता शत्रुं पृतनासु सासहिः.
असि सत्य ऋणया ब्रह्मणस्पत उग्रस्य चिद्गमिता वीळुहर्षिणः.. (११)
हे ब्रह्मणस्पति! तुम अद्वितीय दाता, मन की इच्छा पूर्ण करने वाले, युद्ध में जाकर
शत्रुओं का विनाश करने वाले एवं युद्धभूमि में शत्रुओं को हराने वाले हो. तुम सच्चे पराक्रमी,
ऋण चुकाने वाले तथा मतवाले उग्र लोगों के दमनकर्त्ता हो. (११)
अदेवेन मनसा यो रिषण्यति शासामुग्रो मन्यमानो जिघांसति.
बृहस्पते मा प्रणक्तस्य नो वधो नि कर्म मन्युं दुरेवस्य शर्धतः.. (१२)
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हे बृहस्पति! देवों को न मानने वाला जो व्यक्ति मन से हमारी हिंसा करता है एवं असुरों
का नाश करने वाले हम लोगों को मारना चाहता है, उसका आयुध हमें छू भी न सके. हम
उस शक्तिशाली एवं दुष्ट शत्रु का क्रोध समाप्त कर दें. (१२)
भरेषु हव्यो नमसोपसद्यो गन्ता वाजेषु सनिता धनंधनम्.
विश्वा इदर्यो अभिदिप्सो३ मृधो बृहस्पतिर्वि ववर्हा रथाँ इव.. (१३)
बृहस्पति युद्धकाल में आह्वान करने एवं नमस्कार सहित पूजा करने योग्य हैं. वे संग्राम
में भक्त की सहायता के लिए जाते तथा सब प्रकार का धन देते हैं. जिस प्रकार युद्ध में
शत्रुओं के रथों को नष्ट कर दिया जाता है, उसी प्रकार बृहस्पति विजय की इच्छुक शत्रु
सेनाओं को नष्टभ्रष्ट कर देते हैं. (१३)
तेजिष्ठया तपनी रक्षसस्तप ये त्वा निदे दधिरे दृष्टवीर्यम्.
आविस्तत्कृष्व यदसत्त उक्थ्यं१ बृहस्पते वि परिरपो अर्दय.. (१४)
हे बृहस्पति! जिन राक्षसों ने युद्धों में तुम्हारा पराक्रम देखकर भी तुम्हारी निंदा की है,
अत्यंत तीव्र एवं संतापकारिणी तलवार द्वारा उन राक्षसों को संतप्त करो, अपने प्राचीन
प्रशंसा योग्य बल को प्रकट करो तथा निंदकों का नाश करो. (१४)
बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद्द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु.
यद्दीदयच्छवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्.. (१५)
हे यज्ञ से उत्पन्न बृहस्पति! हमें श्रेष्ठ लोगों द्वारा पूज्य, दीप्त एवं ज्ञान से युक्त,
यज्ञकर्त्ताओं में सुशोभित तेज तथा दीप्तियुक्त विचित्र धन प्रदान करो. (१५)
मा नः स्तेनेभ्यो ये अभि द्रुहस्पदे निरामिणो रिपवोऽन्नेषु जागृधुः.
आ देवानामोहते वि व्रयो हृदि बृहस्पते न परः साम्नो विदुः.. (१६)
हे बृहस्पति! हमें चोरों, द्रोह करके प्रसन्न होने वालों, शत्रुओं, पराए धन के इच्छुकों एवं
देवस्तुति एवं यज्ञ विरोधियों के हाथ में मत सौंपना. (१६)
विश्वेभ्यो हि त्वा भुवनेभ्यस्परि त्वष्टाजनत्साम्नः साम्नः कविः.
स ऋणचिदृणया ब्रह्मणस्पतिर्द्रुहो हन्ता मह ऋतस्य धर्तरि.. (१७)
हे बृहस्पति! त्वष्टा ने तुम्हें समस्त संसार से उत्तम बनाया है. तुम समस्त साममंत्रों के
ज्ञाता हो. बृहस्पति यज्ञ आरंभ करने वाले यजमान का समस्त ऋण स्वीकार करके उसे
उतारते हैं. वे यज्ञ के विद्रोही को नष्ट कर देते हैं. (१७)
तव श्रिये व्यजिहीत पर्वतो गवां गोत्रमुदसृजो यदङ्गिरः.
इन्द्रेण युजा तमसा परीवृतं बृहस्पते निरपामौब्जो अर्णवम्.. (१८)
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