ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—४० देवता—दधिक्रा
सूक्त—४० देवता—दधिक्रा
दधिक्राव्ण इदु न चर्किक्राम विश्वा इन्मामुषसः सूदयन्तु.
अपामग्नेरुषसः सूर्यस्य बृहस्पतेराङ्गिरसस्य जिष्णोः.. (१)
हम दधिक्रा देव की शीघ्र स्तुति करते हैं. समस्त उषाएं हमें यज्ञकर्म की प्रेरणा दें. हम
जल, अग्नि, उषा, सूर्य, बृहस्पति एवं अंगिरापुत्र जिष्णु की स्तुति करेंगे. (१)
सत्वा भरिषो गविषो दुवन्यसच्छ्रवस्यादिष उषसस्तुरण्यसत्.
सत्यो द्रवो द्रवरः पतङ्गरो दधिक्रावेषमूर्जं स्वर्जनत्.. (२)
चलने वाले, भरणकुशल, गायों को प्रेरित करने वाले एवं सेवा के इच्छुकों में रहने वाले
दधिक्रा देव इच्छित उषाकाल में अन्न की कामना करें. शीघ्रता से चलने वाले, सत्यरूप से
चलने वाले, वेगशाली एवं उछल-उछल कर चलने वाले दधिक्रा देव अन्न, बल एवं स्वर्ग को
उत्पन्न करें. (२)
उत स्मास्य द्रवतस्तुरण्यतः पर्णं न वेरनु वाति प्रगर्धिनः.
श्येनस्येव ध्रजतो अङ्कसं परि दधिक्राव्णः सहोर्जा तरित्रतः.. (३)
जिस प्रकार पक्षीसमूह पक्षियों के पीछे-पीछे उड़ता है, उसी प्रकार वेगवान् लोग शीघ्र
चलने वाले एवं अधिक अभिलाषायुक्त दधिक्रा देव का अनुगमन करें. वे श्येन पक्षी के समान
तेज उड़ने वाले एवं रक्षक हैं. सब लोग अन्न की इच्छा से इनके साथ चलते हैं. (३)
उत स्य वाजी क्षिपणिं तुरण्यति ग्रीवायां बद्धो अपिकक्ष आसनि.
क्रतुं दधिक्रा अनु संतवीत्वत्पथामङ्कांस्यन्वापनीफणत्.. (४)
अश्वरूपी दधिक्रा देव ग्रीवा, कक्षा एवं मुख में बंधे होकर भी चलने के लिए शीघ्रता
करते हैं. ये अधिक बलशाली होकर यज्ञ की ओर जाने वाले टेढ़े रास्तों पर सब जगह शीघ्र
चलते हैं. (४)
हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत्.
नृषद्वरसदृतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतम्.. (५)
सूर्य दीप्तिशाली आकाश में रहते हैं. वायु अंतरिक्ष में निवास करते हैं. होता वेदी पर
स्थित रहते हैं. अतिथि घर में निवास करते हैं. ऋत मनुष्यों में, उत्तम स्थान में, यज्ञ में एवं
आकाश में निवास करते हैं तथा जल, सूर्यकिरणों, सत्य एवं पर्वतों में उत्पन्न हुए हैं. (५)
सूक्त—४१ देवता—इंद्र एवं वरुण
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इन्द्रा को वां वरुणा सुम्नमआप स्तोमो हविष्माँअमृतो न होता.
यो वां हृदि क्रतुमाँ अस्मदुक्तः पस्पर्शदिन्द्रावरुणा नमस्वान्.. (१)
हे इंद्र एवं वरुण! अमर होता अग्नि जिस प्रकार तुम्हें प्राप्त होता है, उसी प्रकार कौन
सी हव्यसहित स्तुति तुम्हारी कृपा करेगी? हे इंद्र एवं वरुण! हमारे द्वारा कही गई स्तुतियां यज्ञ
एवं हव्य से युक्त तुम दोनों को पसंद आवें। (१)
इन्द्रा ह यो वरुणा चक्र आपी देवौ मर्तः सख्याय प्रयस्वान्.
स हन्ति वृत्रा समिथेषु शत्रूनवोभिर्वा महद्भिः स प्र शृण्वे.. (२)
हे इंद्र एवं वरुण! जो व्यक्ति हव्यरूप में अन्न लेकर मित्रता के लिए तुम दोनों को भाई
बनाता है, वह अपने पापों का नाश करता है. वह युद्ध में शत्रुओं को नष्ट करके महान्
रक्षासाधनों के कारण प्रसिद्ध होता है. (२)
इन्द्रा ह रत्नं वरुणा धेष्ठेत्था नृभ्यः शशमानेभ्यस्ता.
यदी सखाया सख्याय सोमैः सुतेभिः सुप्रयसा मादयैते.. (३)
हे इंद्र एवं वरुण! तुम इस प्रकार स्तुति करने वाले हम मनुष्यों के लिए रमणीय धन देने
वाले बनो. यदि तुम दोनों मित्र यजमान के सखा हो एवं उसके द्वारा निचोड़े हुए सोमरस से
प्रसन्न हो तो हमें धन दो. (३)
इन्द्रा युवं वरुणा दिद्युमस्मिन्नोजिष्ठमुग्रा नि वधिष्टं वज्रम्.
यो नो दुरेवो वृकतिर्दभीतिस्तस्मिन्निमाथामभिभूत्योजः.. (४)
हे उग्र इंद्र एवं वरुण! तुम अपना तेजस्वी एवं दीप्त वज्र नामक आयुध शत्रुओं पर
चलाओ. जो शत्रु हमारे द्वारा दमन नहीं किया जा सकता, दान नहीं देता एवं हिंसा करने
वाला है, उसके प्रति तुम अपना शत्रुपराजयकारी बल प्रयोग करो. (४)
इन्द्रा युवं वरुणा भूतमस्या धियः प्रेतारा वृषभेव धेनोः.
सा नो दुहीयदद्यवसेव गत्वी सहस्रधारा पयसा मही गौः.. (५)
हे इंद्र एवं वरुण! बैल जिस प्रकार गाय को प्रसन्न करता है, उसी प्रकार तुम स्तुति को
प्रसन्न करो. जिस प्रकार गाय घास खाकर हजारों धारों के रूप में दूध देती हैं, उसी प्रकार
स्तुतिरूपी गाय हमारी इच्छा पूरी करे. (५)
तोके हिते तनय उर्वरासु सूरो दृशीके वृषणश्च पौंस्ये.
इन्द्रा नो अत्र वरुणा स्यातामवोभिर्दस्मा परितक्म्यायाम्.. (६)
हे इंद्र एवं वरुण! हमें पुत्र-पौत्र के साथ-साथ उपजाऊ भूमि की प्राप्ति कराने, बहुत
समय तक सूर्य के दर्शन कराने एवं संतान उत्पत्ति की शक्ति प्रदान करने के लिए अंधेरी रात
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में रक्षासाधन लेकर तुम शत्रुओं के नाश को तैयार हो जाओ. (६)
युवामिद्ध्यावसे पूर्व्याय परि प्रभूती गविषः स्वापी.
वृणीमहे सख्याय प्रियाय शूरा मंहिष्ठा पितरेव शम्भू.. (७)
हे इंद्र एवं वरुण! हम गाय पाने की इच्छा से तुम्हारे पास प्रसिद्ध रक्षा की प्रार्थना लेकर
आए हैं. तुम शक्तिशाली, बंधुतुल्य, शूर एवं अतिशय पूज्य देवों से हम उसी प्रकार मित्र एवं
प्रेम मांगते हैं, जिस प्रकार पुत्र पिता से याचना करता है. (७)
ता वां धियोऽवसे वाजयन्तीराजिं न जग्मुर्युवयूँः सुदानू.
श्रिये न गाव उप सोममस्थुरिन्द्रं गिरो वरुणं मे मनीषाः.. (८)
हे शोभन फल देने वाले दोनों देवो! रत्न की अभिलाषा करती हुई हमारी स्तुतियां रक्षा
के निमित्त उसी प्रकार तुम्हारे पास जाती हैं, जिस प्रकार वीर पुरुष संग्राम की अभिलाषा
करता है. जिस प्रकार गाएं सोमरस की शोभा बढ़ाने के हेतु उसके समीप रहती हैं, उसी
प्रकार हमारी स्तुतियां इंद्र और वरुण के समीप जाती हैं. (८)
इमा इन्द्रं वरुणं मे मनीषा अगमन्नुप द्रविणमिच्छमानाः.
उपेमस्थुर्जोष्टार इव वस्वो रघ्वीरिव श्रवसो भिक्षमाणाः.. (९)
जिस प्रकार धन पाने की इच्छा से लोग धनी के पास जाते हैं, उसी प्रकार हमारी
स्तुतियां धन पाने की अभिलाषा से इंद्र और वरुण के पास जाती हैं. लोग भिखारिणी स्त्रियों
के समान अन्न को मांगते हुए इंद्र के पास जाते हैं. (९)
अश्वस्य त्मना रथस्य पुष्टेर्नित्यस्य रायः पतयः स्याम.
ता चक्राणा ऊतिभिर्नव्यसीभिरस्मत्रा रायो नियतः सचन्ताम्.. (१०)
हम लोग अपने-आप घोड़ों, रथों, पुष्टि एवं स्थायी संपत्ति के स्वामी बनें. वे दोनों
गतिशील देव रक्षा के नवीन साधनों के साथ हमारे सामने घोड़े और धन उपस्थित करें. (१०)
आ नो बृहन्ता बृहतीभिरूती इन्द्र यातं वरुण वाजसातौ.
यद्विद्यवः पृतनासु प्रक्रीळान्तस्य वां स्याम सनितार आजेः.. (११)
हे महान् इंद्र एवं वरुण! तुम दोनों विशाल रक्षा साधनों के साथ आओ. अन्न प्राप्ति के
हेतु होने वाले जिस युद्ध में शत्रुओं के आयुध चमकते हैं, हम उस युद्ध में तुम्हारी कृपा से
विजयी हों. (११)
सूक्त—४२ देवता—त्रसदस्यु आदि
मम द्विता राष्ट्रं क्षत्रियस्य विश्वायोर्विश्वे अमृता यथा नः.
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ऋतुं सचन्ते वरुणस्य देवा राजामि कृष्टेरुपमस्य वव्रेः.. (१)
क्षत्रिय जाति में उत्पन्न एवं समस्त प्रजाओं के स्वामी हम लोगों का राज्य दो प्रकार का
है. समस्त देव हमारे हैं, जैसे कि सारी प्रजा हमारी है. रूपवान् एवं समस्त प्रजाओं के
धारणकर्त्ता हम लोगों के यज्ञ की सेवा देव करते हैं. हम सबसे श्रेष्ठ हैं. (१)
अहं राजा वरुणो मह्यं तान्यसुर्याणि प्रथमा धारयन्त.
क्रतुं सचन्ते वरुणस्य देवा राजामि कृष्टेरुपमस्य वव्रेः.. (२)
हम ही राजा वरुण हैं. देवगण असुरनाशकारी श्रेष्ठ-बल हमारे लिए ही धारण करते हैं.
रूपवान् एवं समस्त प्रजाओं के धारणकर्त्ता हम लोगों के यज्ञ की सेवा देव करते हैं. हम
सबसे श्रेष्ठ हैं. (२)
अहमिन्द्रो वरुणस्ते महित्वोर्वी गभीरे रजसी सुमेके.
त्वष्टेव विश्वा भुवनानि विद्वान्तस्मैरयं रोदसी धारयं च.. (३)
हम ही इंद्र और वरुण हैं. महत्ता के कारण विस्तृत, गंभीर एवं सुंदर रूप वाले धरती-
आकाश भी हम हैं. विद्वान् हम त्वष्टा के समान समस्त प्राणियों को प्रेरणा देते हैं एवं धरती-
आकाश को धारण करते हैं. (३)
अहमपो अपिन्वमुक्षमाणा धारयं दिवं सदन ऋतस्य.
ऋतेन पुत्रो अदितेर्ऋतावोत त्रिधातु प्रथयद्वि भूम.. (४)
सींचने वाले जल को हमने ही बरसाया था एवं जल के स्थान आकाश को धारण किया
था. जल के कारण ही हम अदिति-पुत्र अर्थात् यज्ञ के स्वामी बने थे. हमने ही व्याप्त आकाश
को तीन भागों में बांटा था. (४)
मां नरः स्वश्वा वाजयन्तो मां वृताः समरणे हवन्ते.
कृणोम्याजिं मघवाहमिन्द्र इयर्मि रेणुमभिभूत्योजाः.. (५)
सुंदर घोड़ों के स्वामी एवं युद्ध के अभिलाषी नेता हमारे ही पीछे चलते हैं एवं युद्धस्थल
में एकत्र होकर हमें ही पुकारते हैं. हम ही इंद्र बनकर युद्ध करते हैं एवं शत्रुपराभवकारी बल
से युक्त होकर धूल उड़ाते हैं. (५)
अहं ता विश्वा चकरं नकिर्मा दैव्यं सहो वरते अप्रतीतम्.
यन्मा सोमासो ममदन्यदुक्थोभे भयेते रजसी अपारे.. (६)
सब प्रसिद्ध काम हमने ही किए हैं. देवों के न हारने वाले बल से युक्त होने के कारण
हमें कोई नहीं रोक सकता. जब सोमरस एवं स्तुतियां हमें मतवाला कर देती हैं, तब विस्तृत
धरती-आकाश भी डर जाते हैं. (६)
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विदुष्टे विश्वा भुवनानि तस्य ता प्र ब्रवीषि वरुणाय वेधः.
त्वं वृत्राणि शृण्विषे जघन्वान्त्वं वृताँ अरिणा इन्द्र सिन्धून्.. (७)
हे वरुण! तुम्हारे कामों को सारा संसार जानता है. हे स्तोता! वरुण के निमित्त स्तुति
बोलो. हे इंद्र! ऐसा सुना जाता है कि तुमने बैरियों का वध किया था. तुमने ढकी हुई नदियों
को प्रवाहित किया था. (७)
अस्माकमत्र पितरस्त आसन्सप्त ऋषयो दौर्गहे बध्यमाने.
त आयजन्त त्रसदस्युमस्या इन्द्रं न वृत्रतुरमर्धदेवम्.. (८)
दुर्गह के पुत्र पुरुकुत्स जब कैद कर लिए गए तो सप्तऋषि हमारे इस राज्य के
पालनकर्त्ता बने थे. उन्होंने पुरुकुत्स की पत्नी के कल्याण के लिए यज्ञ करके त्रसदस्यु को
पाया था. वह इंद्र के समान शत्रुनाशक एवं आधा देव था. (८)
पुरुकुत्सानी हि वामदाशद्धव्येभिरिन्द्रावरुणा नमोभिः.
अथा राजानं त्रसदस्युमस्या वृत्रहणं दथुरर्धदेवम्.. (९)
हे इंद्र एवं वरुण! सप्तऋषियों की प्रेरणा से पुरुकुत्स की पत्नी ने हव्य एवं स्तुतियों
द्वारा तुम्हें प्रसन्न किया था. इसके बाद तुमने उसे शत्रुनाशकारी एवं आधे देव त्रसदस्यु को
प्रदान किया था. (९)
राया वयं ससवांसो मदेम हव्येन देवा यवसेन गावः.
तां धेनुमिन्द्रावरुणा युवं नो विश्वाहा धत्तमनपस्फुरन्तीम्.. (१०)
हम तुम दोनों की स्तुति करके धन द्वारा प्रसन्न हों. देवगण हव्य द्वारा एवं गाएं घास से
संतुष्ट हों. हे इंद्र एवं वरुण! विश्व का नाश करने वाले तुम दोनों हमें हिंसारहित धन दो. (१०)
सूक्त—४३ देवता—अश्विनीकुमार
क उ श्रवत्कतमो यज्ञियानां वन्दारु देवः कतमो जुषाते.
कस्वेमां देवीममृतेषु प्रेष्ठां हृदि श्रेषाम सुष्टुतिं सुहव्याम्.. (१)
यज्ञ के योग्य देवों में कौन देव इस स्तुति को सुनेगा? कौन वंदनशील देव इसे स्वीकार
करेगा? हम इस अतिशय प्रिय, द्युतियुक्त, शोभन-अन्न से युक्त, इस उत्तम स्तुति को किस देव
के हृदय में स्थान दिलाएं? (१)
को मृळाति कतम आगमिष्ठो देवानामु कतमः शम्भविष्ठः.
रथं कमाहुर्द्रवदश्वमाशुं यं सूर्यस्य दुहितावृणीत.. (२)
हमें कौन सा देवता सुखी करेगा? कौन देवता हमारे यज्ञ में सबसे पहले आएगा? देवों
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के मध्य कौन सा देव हमारा अधिक कल्याण करेगा? शीघ्र दौड़ने वाला रथ कौन सा है,
जिसने सूर्य की पुत्री का वरण पाया है? तात्पर्य यह है कि उक्त गुण केवल अश्विनीकुमारों में
ही हैं। (२)
मक्षू हि ष्मा गच्छथ ईवतो द्यूनिन्द्रो न शक्तिं परितक्म्यायाम्.
दिव आजाता दिव्या सुपर्णा कया शचीनां भवथः शचिष्ठा.. (३)
रात्रि बीतने पर इंद्र अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं. हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों उसी
प्रकार गतिशील होकर सोम निचोड़ने वाले दिवसों में शीघ्र आओ. स्वर्ग से आए हुए, दिव्य
गुणयुक्त एवं शोभन गति वाले तुम दोनों के कर्मों में कौन सा कर्म श्रेष्ठ है? (३)
का वां भूदुपमातिः कया न आश्विना गमथो हूयमाना.
को वां महश्चित्यजसो अभीक उरुष्यतं माध्वी दसा न ऊती.. (४)
कौन सी स्तुति तुम दोनों के गुणों की सीमा हो सकती है? हे अश्विनीकुमारो! किस
स्तुति द्वारा बुलाए जाने पर तुम दोनों हमारे पास आओगे? तुम्हारे महान् क्रोध को समीप में
कौन सह सकता है? हे जल निर्माता एवं शत्रुनाशकारी अश्विनीकुमारो! हमारी रक्षा करो. (४)
उरु वां रथः परि नक्षति द्यामा यत्समुद्रादभि वर्तते वाम्.
मध्वा माध्वी मधु वां पृषायन्त्सीं वां पृक्षो भुरजन्त पक्वाः.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों का रथ स्वर्गलोक के चारों ओर भली प्रकार चलता है एवं
समुद्र से तुम्हारे पास आता है. हे जल-निर्माता एवं शत्रुविनाशक अश्विनीकुमारो! अध्वर्यु लोग
मधुर दूध के साथ सोमरस मिलाते हुए भुने हुए जौ लेकर उपस्थित हैं. (५)
सिन्धुर्ह वां रसया सिञ्चदश्वान्घृणा वयोऽरुषासः परि ग्मन्.
तदू षु वामजिरं चेति यानं येन पती भवथः सूर्यायाः.. (६)
बादल ने अपने जल से तुम दोनों के घोड़ों को भिगोया था. तुम्हारे दीप्तियुक्त घोड़े
पक्षियों के समान तेज चलते हैं. तुम्हारा वह रथ भली प्रकार प्रसिद्ध है, जिस पर तुम सूर्यपुत्री
को बैठाकर लाए थे. (६)
इहेह यद्वां समना पपृक्षे सेयमस्मे सुमतिर्वाजरत्ना.
उरुष्यतं जरितारं युवं ह श्रितः कामो नासत्या युवद्रिक्.. (७)
हे समान मन वाले अश्विनीकुमारो! हम जो स्तुति तुम्हारे समीप भेजते हैं, वह हमारे
लिए फल देने वाली हो. हे सुंदर अन्न वाले अश्विनीकुमारो! तुम स्तुति करने वाले की रक्षा
करो. हे नासत्यो! हमारी कामना तुम्हारे ही आश्रित है. (७)
सूक्त—४४ देवता—अश्विनीकुमार
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तं वां रथं वयमद्या हुवेम पृथुज्रयम्श्विना सङ्गतिं गोः.
यः सूर्या वहति वन्धुरायुर्र्गिर्वाहसं पुरुतमं वसूयुम्.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! हम तुम्हारे शीघ्र चलने वाले एवं गायों से मिलाने वाले रथ को
पुकारते हैं. वह रथ सूर्यकन्या को धारण करने वाला, बैठने के निमित्त काष्ठ आसन से युक्त,
स्तुतियां प्राप्त करने वाला एवं अधिक संपत्ति युक्त है. (१)
युवं श्रियमश्विना देवता तां दिवो नपाता वनथः शचीभिः.
युवोर्र्वपुरभि पृक्षः सचन्ते वहन्ति यत्ककुहासो रथे वाम्.. (२)
हे स्वर्गपुत्र अश्विनीकुमारो! तुम दोनों देव अपने कर्मों द्वारा प्रसिद्ध शोभा प्राप्त करते
हो. जब महान् अश्व तुम्हें रथ में ढोते हैं, तब सोमरस तुम्हारे शरीर को प्राप्त करता है. (२)
को वामद्या करते रातहव्य ऊतये वा सुतपेयाय वार्कैः.
ऋतस्य वा वनुषे पूर्य्याय नमो येमानो अश्विना ववर्त्तत्.. (३)
आज सोम देने वाला कौन सा यजमान अपनी रक्षा, सोमरसपान अथवा यज्ञ की पूर्ति
के लिए स्तुतियों द्वारा प्रशंसा करता है? हे अश्विनीकुमारो! नमस्कार करने वाला कौन व्यक्ति
तुम्हें अपने यज्ञ की ओर खींचता है? (३)
हिरण्ययेन पुरुभू रथेनेमं यज्ञं नासत्योप यातम्.
पिबाथ इन्मधुनः सोम्यस्य दधथो रत्नं विधते जनाय.. (४)
हे अनेक रूपधारी अश्विनीकुमारो! तुम दोनों अपने स्वर्णनिर्मित रथ द्वारा इस यज्ञ में
आओ, मधुर सोमरस पिओ एवं सेवा करने वाले यजमान को रमणीय धन दो. (४)
आ नो यातं दिवो अच्छा पृथिव्या हिरण्ययेन सुवृता रथेन.
मा वामन्ये नि यमन्देवयन्तः सं यद्ददे नाभिः पूर्व्या वाम्.. (५)
तुम दोनों स्वर्णनिर्मित एवं भलीप्रकार घूमने वाले रथ द्वारा स्वर्ग से हमारे पास आते हो.
तुम्हारी अभिलाषा करने वाले अन्य यजमान तुम्हें रोक न लें, इसीलिए हमने पहले तुम्हारी
स्तुति कर ली है. (५)
नू नो रयिं पुरुवीरं बृहन्तं दसा मिमाथामुभयेष्वस्मे.
नरो यद्वामश्विना स्तोममावन्सधस्तुतिमाजमीळहासो अगमन्.. (६)
हे अश्विनीकुमारो! तुम अनेक पुत्र-पौत्रों से युक्त महान् धन शीघ्र दो. पुरुमीढ के
ऋत्विजों ने तुम्हारी स्तुति की है और अजमीढ के ऋत्विजों ने उसका साथ दिया है. (६)
इहेह यद्वां समना पपृक्षे सेयमस्मे सुमतिर्वाजरत्ना.
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