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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1548 of 1855

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Page 1548

जाओ. तुम हमारे अंगों के विनाशक बनकर शत्रुओं को मारने के लिए जाओ. (१)
अनु हि त्वा सुतं सोम मदामसि महे समर्यराज्ये.
वाजाँ अभि पवमान प्र गाहसे.. (२)
हे निचुड़े हुए सोम! हमारे ऋत्विज् तुम्हारी स्तुति करते हैं. हे शुद्ध होते हुए सोम! तुम
अपने महान् राज्य में मनुष्यों का पालन करने के लिए शत्रुओं की सेना की ओर जाते हो. (२)
अजीजनो हि पवमान सूर्यं विधारे शक्मना पयः.
गोजीरया रंहमाणः पुरन्ध्या.. (३)
हे शुद्ध होते हुए सोम! तुमने जलधारण करने वाले अंतरिक्ष में अपने बल से सूर्य को
उत्पन्न किया है. तुम स्तोताओं को गाएं देने वाले, ज्ञानों से युक्त एवं वेगशाली हो. (३)
अजीजनो अमृत मर्त्येष्वॉ ऋतस्य धर्मन्नमृतस्य चारुणः.
सदासरो वाजमच्छा सनिष्यदत्.. (४)
हे मरणरहित सोम! तुमने सच्चे एवं कल्याणकारी जल को धारण करने वाले अंतरिक्ष
में सूर्य को इसलिए उत्पन्न किया था कि वह मनुष्यों के सामने जा सके. तुम सबकी सेवा
करते हुए सदा संग्राम की ओर जाते हो. (४)
अभ्यभि हि श्रवसा ततर्दिथोत्सं न कं चिज्जनपानमक्षितम्.
शर्याभिर्न भरमाणो गभस्त्योः.. (५)
हे सोम! जिस प्रकार कोई मनुष्य दूसरे लोगों के पानी पीने के लिए नित्यजल वाला
तालाब खोदता है अथवा कोई भुजाओं की दसों उंगलियों से अंजलि बना कर जल भरता है,
उसी प्रकार तुम अन्नप्राप्ति के लिए दशापवित्र को पार करके जाते हो. (५)
आदीं के चित्पश्यमानास आप्यं वसुरुचो दिव्या अभ्यनूषत.
वारं न देवः सविता व्यूर्णते.. (६)
दीप्तिशाली सूर्य तब तक अंधकार भी नहीं हटा पाए थे कि तभी सूर्य को देखने वाले
एवं दिव्य वसुरुच नामक लोगों ने अपने मित्र सोम की स्तुति आरंभ कर दी थी. (६)
त्वे सोम प्रथमा वृक्तबर्हिषो महे वाजाय श्रवसे धियं दधुः.
स त्वं नो वीर वीर्याय चोदय.. (७)
हे सोम! प्राचीन एवं यज्ञ के निमित्त कुश तोड़ने वाले यजमानों ने महान् बल और अन्न
पाने के लिए तुम में अपनी बुद्धि को धारण किया था. हे वीर सोम! तुम संग्राम में बल प्रदर्शन
के लिए हमें भी भेजो. (७)
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