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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

सूक्त—५७ देवता—इंद्र

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के समान इस समय कमजोर हम लोगों को पहले के समान न मारे. (२०)
वि षु द्वेषो व्यंहतिमादित्यासो वि संहितम्. विष्वग्वि वृहता रपः.. (२१)
हे आदित्यो! हमारे द्वेषियों एवं पापियों का विनाश करो तथा इस जाल एवं सब जगह
फैले हुए पाप का नाश करो. (२१)
सूक्त—५७ देवता—इंद्र
आ त्वा रथं यथोतये सुम्नाय वर्तयामसि.
तुविकूर्मिमृतीषहमिन्द्र शविष्ठ सत्पते.. (१)
हे अतिशय शक्तिशाली, हिंसकों को हराने वाले, बहुत कर्म करने वाले एवं
सज्जनपालक इंद्र! हम सुरक्षा और सुख पाने के लिए तुम्हें रथ के समान बार-बार बुलाते हैं.
(१)
तुविशुष्म तुविक्रतो शचीवो विश्‍वया मते. आ पप्रथ महित्वना.. (२)
हे अधिक शक्तिशाली, अनेक कर्म करने वाले, अधिक बुद्धिमान् एवं पूजनीय इंद्र! तुमने
विश्वव्यापक महत्त्व द्वारा संसार को व्याप्त किया है. (२)
यस्य ते महिना महः परि ज्मायन्तमीयतुः. हस्ता वज्रं हिरण्ययम्.. (३)
हे महान् इंद्र! तुम्हारी महिमा के कारण तुम्हारे हाथ धरती में सब जगह व्याप्त
हिरण्यमय वज्र को पकड़ते हैं. (३)
विश्वानरस्य वस्पतिमाननतस्य शवसः. एवैश्च चर्षणीनामूती हुवे रथानाम्.. (४)
हे मरुतो! मैं समस्त शत्रुओं पर आक्रमण करने वाले एवं शत्रुओं द्वारा न झुकने वाली
शक्ति के स्वामी इंद्र को तुम्हारी सेनाओं एवं रथों के गमनों के साथ बुलाता हूं. (४)
अभिष्टये सदावृधं स्वर्मीळ्हेषु यं नरः. नाना हवन्त ऊतये.. (५)
हे यजमानो! मैं तुम्हारी सहायता के लिए सदा बढ़ने वाले इंद्र को आने के लिए निवेदन
करता हूं. उन्हें मनुष्य युद्धों में अपनी श्रद्धा के निमित्त भांति-भांति से बुलाते हैं. (५)
परोमात्रमृचीषममिन्द्रमुग्रं सुराधसम्. ईशानं चिद्वसूनाम्.. (६)
मैं असीमित शरीर वाले, स्तुति के अनुरूप रूपधारी, उग्र, शोभनधन से युक्त एवं
संपत्तियों के स्वामी इंद्र को बुलाता हूं. (६)
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तं तमिद्राधसे मह इन्द्रं चोदामि पीतये.
यः पूर्व्यामनुष्टुतिमीशे कृष्टीनां नृतुः.. (७)
मैं नेता, यज्ञ के प्रमुख स्थान में बैठने वाले एवं मनुष्यों की क्रमबद्ध स्तुति सुनने वाले इंद्र
को महान् धन पाने की आशा से सोमरस पीने के लिए बुलाता हूं. (७)
न यस्य ते शवसान सख्यमानंश मर्त्यः. नकिः शवांसि ते नशत्.. (८)
हे शक्तिशाली इंद्र! मनुष्य तुम्हारी मित्रता प्राप्त नहीं कर सकता. तुम्हारी शक्तियों को
भी कोई नहीं पा सकता. (८)
त्वोतासस्त्वा युजाप्सु सूर्ये महद्धनम्. जयेम पृत्सु वज्रिवः.. (९)
हे वज्रधारी इंद्र! हम तुम्हारे द्वारा रक्षित होकर तुम्हारी सहायता से युद्धों में महान् धन
जीतेंगे. जिससे जल में स्नान एवं सूर्यदर्शन कर सकें. (९)
तं त्वा यज्ञेभिरीमहे तं गीर्भिर्गिर्वणस्तम.
इन्द्र यथा चिदाविथ वाजेषु पुरुमाय्यम्.. (१०)
हे स्तुतियों द्वारा अत्यधिक प्रसिद्ध इंद्र! मुझ अधिक बुद्धि वाले को तुम जिस प्रकार की
स्तुतियों और यज्ञों के कारण बचा सको, मैं उसी प्रकार की स्तुतियों और यज्ञों द्वारा तुमसे
याचना करता हूं. (१०)
यस्य ते स्वादु सख्यं स्वाद्धी प्रणीतिरद्रिवः. यज्ञो वितन्तसाय्यः.. (११)
हे वज्रधारी इंद्र! तुम्हारी मित्रता एवं धनादि का निर्माण अत्यंत हर्षकारक है. तुम्हारा
यज्ञ विशेषरूप से विस्तृत करने योग्य है. (११)
उरु णस्तन्वे३ तन उरु क्षयाय नस्कृधि. उरु णो यन्धि जीवसे.. (१२)
हे इंद्र! तुम हमारे पुत्र, पौत्र एवं निवासस्थान के निमित्त प्रचुर धन दो. तुम हमारे जीवन
के लिए हमारी मनचाही वस्तुएं दो. (१२)
उरुं नृभ्य उरुं गव उरुं रथाय पन्थाम्. देववीतिं मनामहे.. (१३)
हे इंद्र! हम तुमसे प्रार्थना करते हैं कि हमारे मनुष्यों, गायों एवं रथों के मार्गों का
कल्याण करो. हम तुमसे यज्ञ की प्रार्थना करते हैं. (१३)
उप मा षड् द्वाद्वा नरः सोमस्य हर्ष्या. तिष्ठन्ति स्वादुरातयः.. (१४)
सोमरस पीने से उत्पन्न नशे के कारण छः राजा स्वादिष्ट भोग साथ लेकर दो-दो के
समूह में हमारे पास आते हैं. (१४)
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ऋज्राविन्द्रोत आ ददे हरी ऋक्षस्य सूनवि. आश्वमेधस्य रोहिता.. (१५)
राजपुत्र इंद्रोत से मैंने सरल गति वाले दो घोड़े प्राप्त किए हैं एवं ऋक्ष के पुत्र से हरे रंग
के तथा अश्वमेध के पुत्रों से लाल रंग के घोड़े पाए हैं. (१५)
सुरथाँ अतिथिग्वे स्वभीशूँराक्षै. आश्वमेधे सुपेशसः.. (१६)
मैंने अतिथिग्व के पुत्र इंद्रोत से सुंदर रथ वाले एवं ऋक्ष के पुत्र से सुंदर लगाम वाले
घोड़ों को पाया है. मैंने अश्वमेध से सुंदर घोड़े पाए हैं. (१६)
षळश्वाँ अतिथिग्व इन्द्रोते वधूमतः. सचा पूतक्रतौ सनम्.. (१७)
मैंने ऋक्ष एवं अश्वमेध के पुत्रों द्वारा दिए गए घोड़ों के साथ ही शुद्ध यज्ञकर्म वाले एवं
अतिथिग्व के पुत्र इंद्रोत द्वारा घोड़ियों सहित दिए गए घोड़ों को ग्रहण किया है. (१७)
ऐषु चेतद्वृषण्वत्यन्तर्ऋज्रेष्वरुषी. स्वभीशुः कशावती.. (१८)
इन सरल गति वाले घोड़ों में गर्भाधान योग्य घोड़ों से युक्त, शोभायमान एवं सुंदर लगाम
वाली घोड़ियां भी जान पड़ती हैं. (१८)
न युष्मे वाजबन्धवो निनित्सुश्चन मर्त्यः. अवद्यमधि दीधरत्.. (१९)
हे अन्न देने वाले छः राजाओ! निंदा करने वाला व्यक्ति भी तुम्हारे सामने निंदा का वचन
नहीं बोलता. (१९)
सूक्त-५८ देवता-वरुण
प्र वस्त्रिष्ठुभमिषं मन्दद्वीरायेन्दवे. धिया वो मेधसातये पुरन्ध्या विवासति.. (१)
हे अध्वर्युगण! तुम वीरों को हर्षित करने वाले इंद्र के लिए तीन स्तंभों से युक्त अन्न का
संग्रह करो. इंद्र परम बुद्धियुक्त यज्ञकर्म द्वारा यज्ञ आरंभ करने के लिए तुम्हारा सत्कार करते
हैं. (१)
नदं व ओदतीनां नदं योयुवतीनाम्. पतिं वो अघ्न्यानां धेनूनामिषुध्यसि.. (२)
हे यजमानो! उषाओं को उत्पन्न करने वाले, नदियों को शब्दायमान करने वाले एवं
अवध्य गायों के पालक इंद्र को बुलाओ. तुम गायों के दूध की इच्छा करते हो. (२)
ता अस्य सूददोहसः सोमं श्रीणन्ति पृश्नयः.
जन्मन्देवानां विशस्त्रिष्वारोचने दिवः.. (३)
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वे चितकबरे रंग की गाएं तीनों सवनों में इंद्र से संबंधित सोमरस को अपने दूध से
मिश्रित करती हैं जो देवों के जन्मस्थान एवं आदित्य के मनपसंद द्युलोक में प्रवेश कर सकती
हैं एवं जिनके दूध से कुआं भर सकता है. (३)
अभि प्र गोपर्ति गिरेन्द्रमर्च यथा विदे. सूनुं सत्यस्य सत्पतिम्.. (४)
गायों के पालक, यज्ञ के पुत्र एवं साधुओं का पालन करने वाले इंद्र की स्तुति उसी
प्रकार करो, जिस प्रकार वे यज्ञ के प्रति जाने का रास्ता जान सकें. (४)
आ हरयः ससृजिरेऽरुषीरधि बर्हिषि. यत्राभि सन्नवामहे.. (५)
दीप्तिशाली एवं हरितवर्ण के अश्व इंद्र को कुश पर स्थापित करें. हम वहां स्थित इंद्र की
स्तुति करेंगे. (५)
इन्द्राय गाव आशिरं दुदुहे वज्रिणे मधु. यत्सीमुपह्वरे विदत्.. (६)
जिस समय वज्रधारी इंद्र समीप में रखे हुए सोमरस को प्राप्त करते हैं, उस समय गाएं
इंद्र के लिए मधुर दूध देती हैं जो सोमरस में मिलाया जा सके. (६)
उद्वद् ब्रध्नस्य विष्टपं गृहमिन्द्रश्च गन्वहि.
मध्वः पीत्वा सचेवहि त्रिः सप्त सख्युः पदे.. (७)
मैं एवं इंद्र जिस समय सूर्य के निवासस्थान में जाते हैं, उस समय मधुर सोमरस पीकर
सबके सखा आदित्य के इक्कीस स्थानों में हम एकत्रित हों. (७)
अर्चत प्रार्चत प्रियमैधासो अर्चत. अर्चन्तु पुत्रका उत पुरं न धृष्ण्वर्चत.. (८)
हे प्रियमेध ऋषि के वंश वाले लोगो! इंद्र की विशेष रूप से पूजा करो. तुम्हारे पुत्र और
तुम इंद्र की इस प्रकार पूजा करो, जिस प्रकार शत्रु का नगर नष्ट करने वाले वीर की पूजा की
जाती है. (८)
अव स्वराति गर्गरो गोधा परि सनिष्षणत्.
पिङ्गा परि चनिष्कददिन्द्राय ब्रह्मोद्यतम्.. (९)
घर्घर ध्वनि करता हुआ युद्ध का बाजा बज रहा है. हाथों पर बंधा हुआ गोह का चमड़ा
भी शब्द कर रहा है. पीले रंग की धनुषडोरी शब्द कर रही है. इंद्र को लक्ष्य करके इस समय
स्तुति बोलो. (९)
आ यत्पतन्त्येन्यः सुदुघा अनपस्फुरः.
अपस्फुरं गृभायत सोममिन्द्राय पातवे.. (१०)
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जिस समय सफेद रंग की, शोभन जल देने वाली एवं बहुत अधिक बढ़ी हुई नदियां
बहती हैं, उस समय तुम इंद्र के पीने के लिए सोमरस को ले जाओ. (१०)
अपादिन्द्रो अपादग्निर्विश्वे देवा अमत्सत.
वरुण इदिह क्षयत्तमापो अभ्यनूषत वत्सं संशिश्वरीरिव.. (११)
इंद्र ने सोमरस पिया एवं अग्नि ने सोमरस पिया. देवगण सोमरस पीकर तृप्त हुए. वरुण
सोमरस पीने के लिए यज्ञशाला में निवास करें. गाएं जिस प्रकार बछड़े से मिलने दौड़ती हैं,
उसी प्रकार उक्थ मंत्र वरुण की स्तुति करते हैं. (११)
सुदेवो असि वरुण यस्य ते सप्त सिन्धव:.
अनुक्षरन्ति काकुदं सूम्यं सुषिरामिव.. (१२)
हे वरुण! तुम शोभन देव हो. तुम्हारे समुद्ररूपी तालु में गंगा आदि सात नदियां इस
प्रकार गिरती हैं जिस प्रकार सूर्य के सामने किरणें गिरती हैं. (१२)
यो व्यतीँरफाणयत् सुयुक्ताँ उप दाशुषे.
तक्वो नेता तदिद्वपुरुपमा यो अमुच्यत.. (१३)
जो इंद्र विविध गमन वाले के रथ में भली प्रकार जुते हुए घोड़ों को हव्यदाता यजमान
के पास जाने के लिए चलाते हैं, वे उपमा देने योग्य हैं, यज्ञ में आते हैं, यज्ञ के फल के नेता हैं
एवं उदक उत्पन्न करते हैं. वे असुर आदि से मुक्त रहते हैं. (१३)
अतीदु शक्र ओहत इन्द्रो विश्वा अति द्विष:.
भिनत्कनीन ओदनं पच्यमानं परो गिरा.. (१४)
शक्र (इंद्र) युद्ध में सभी शत्रुओं का अतिक्रमण करके चलते हैं. वे सभी द्वेषियों को
छोड़ देते हैं. सुंदर एवं मेघों के ऊपर वर्तमान इंद्र गर्जन एवं वज्र के शब्द से ताड़ित करके
मेघों का भेदन करते हैं. (१४)
अर्भको न कुमारकोऽधि तिष्ठन्नवं रथम्.
स पक्षन्महिषं मृगं पित्रे मात्रे विभुक्रतुम्.. (१५)
बालक के समान छोटे शरीर वाले कुमार इंद्र प्रशंसनीय रथ पर बैठते हैं. इंद्र महान् एवं
माता-पिता के सामने इधरधर दौड़ने वाले मृगशावक के समान अनेक कर्मों वाले मेघ को वर्षा
के लिए प्रेरित करते हैं. (१५)
आ तू सुशिप्र दम्पते रथं तिष्ठा हिरण्ययम्.
अध द्युक्षं सचेवहि सहस्रपादमरुषं स्वस्तिगामनेहसम्.. (१६)
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हे शोभन-नासिका वाले एवं गृहस्वामी इंद्र! तुम रथरूपी घर में बैठो. वह रथ सोने का
बना हुआ है, दीप्त, अनेक पहियों वाला, कुशलतापूर्वक चलने वाला एवं पापरहित है. हम
दोनों उस रथ में मिलें. (१६)
तं घेमित्था नमस्विन उप स्वराजमासते.
अर्थं चिदस्य सुधितं यदेतव आवर्तयन्ति दावने.. (१७)
हव्य-अन्न धारण करने वाले लोग इस प्रकार विराजमान इंद्र की उपासना करते हैं. जब
इंद्र को चलकर स्वयं आने एवं दान के योग्य स्तुतियां प्रेरित करती हैं, तब इंद्र का भली प्रकार
स्थापित धन प्राप्त होता है. (१७)
अनु प्रत्नस्यौकसः प्रियमेधास एषाम्.
पूर्वामनु प्रयतिं वृक्त बर्हिषो हितप्रयस आशत.. (१८)
प्रियमेध ऋषि के परिवार वाले लोगों ने देवों के पुराने स्थान अर्थात् स्वर्ग को प्राप्त
किया है, मुख्य दान के लक्ष्य से कुशों का विस्तार किया है तथा सोमरस आदि प्राप्त किया है.
(१८)
सूक्त—५९ देवता—इंद्र
यो राजा चर्षणीनां याता रथेभिरध्रिगुः.
विश्वासां तरुता पृतनानां ज्येष्ठो यो वृत्रहा गृणे.. (१)
मैं प्रजाओं के राजा, रथ द्वारा चलने वाले, गमन में निर्बाध, सभी सेनाओं को तारने
वाले, ज्येष्ठ एवं वृत्रहंता इंद्र की स्तुति करता हूं. (१)
इन्द्रं तं शुम्भ पुरुहन्मन्नवसे यस्य द्विता विधर्तरि.
हस्ताय वज्रः प्रति धायि दर्शतो महो दिवे न सूर्यः.. (२)
हे पुरुहन्मा ऋषि! तुम अपनी रक्षा के लिए इंद्र को अलंकृत करो. तुम्हारे विधाता इंद्र
का स्वभाव उग्र एवं कोमल दो प्रकार का है. इंद्र अपने हाथ में दर्शनीय एवं आकाश में सूर्य
के समान दिखाई देने वाला वज्र धारण करते हैं. (२)
नकिष्टं कर्मणा नशद्यश्चकार सदावृधम्.
इन्द्रं न यज्ञैर्विश्वगूर्तमृभ्वसमधृष्टं धृष्ण्वोजसम्.. (३)
जो यज्ञसाधनों द्वारा सदा वृद्धि करने वाले, सबके स्तुतियोग्य, महान् अन्यों द्वारा
पराभवरहित एवं सबको दबाने वाली शक्ति से युक्त इंद्र को यज्ञसाधनों द्वारा अपने अनुकूल
बना लेते हैं, उनके कर्म में कोई व्यक्ति बाधा उत्पन्न नहीं कर सकता. (३)
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अषाळ्हमुग्रं पृतनासु सासहिं यस्मिन्महीरुरुजयः.
सं धेनवो जायमाने अनोनवुर्द्यावः क्षामो अनोनवुः.. (४)
मैं दूसरों के लिए असहनीय, उग्र व शत्रु सेनाओं को पराजित करने वाले इंद्र की स्तुति
करता हूं. इंद्र के जन्म के समय विशाल एवं वेगशालिनी गायों ने, द्युलोक तथा धरती ने स्तुति
की थी. (४)
यद् द्याव इन्द्र ते शतं शतं भूमीरुत स्युः.
न त्वा वज्रिन्सहस्रं सूर्या अनु न जातमष्ट रोदसी.. (५)
हे इंद्र! यदि सौ द्यौ एवं सौ भूमियां हो जावें, तब भी तुम्हें नापा नहीं जा सकता. हे
वज्रधारी इंद्र! सौ सूर्य तुम्हें प्रकाशित नहीं कर सकते और न आठ द्यावा-पृथिवी तुम्हारी सीमा
बना सकते हैं. (५)
आ पप्राथ महिना वृष्ण्या वृषन्विश्वा शविष्ठ शवसा.
अस्माँ अव मघवन्गोमति व्रजे वज्रिश्चित्राभिरूतिभिः.. (६)
हे अभिलाषापूरक, अतिशय शक्तिशाली, धनस्वामी एवं वज्रधारी इंद्र! तुमने अपनी
महान् शक्ति द्वारा शत्रुओं की आयुध बरसाने वाली सेनाओं को वश में किया है. तुम नाना
रक्षासाधनों द्वारा शत्रुओं से हमारी गोशाला की रक्षा करो. (६)
न सीमदेव आपदिषं दीर्घायो मर्त्यः.
एतग्वा चिद्य एतशा युयोजते हरी इन्द्रो युयोजते.. (७)
हे दीर्घ आयु वाले इंद्र! देवों को न मानने वाला मनुष्य सब अन्न प्राप्त नहीं करता. जो
मनुष्य इंद्र के श्वेतवर्ण अश्वों को रथ में जोड़ता है, इंद्र अपने घोड़ों की सहायता से उसी के
यज्ञ में आते हैं. (७)
तं वो महो महाय्यमिन्द्रं दानाय सक्षणम्.
यो गाधेषु य आरणेषु हव्या वाजेष्वस्ति हव्यः.. (८)
हे महान् ऋत्विजो! दान पाने के लिए तुम उस पूज्य इंद्र की सेवा करो. इंद्र जलप्राप्ति
के लिए निचले स्थानों में पहुंचने के लिए तथा युद्ध में विजय पाने के लिए बुलाने योग्य हैं.
(८)
उद् षु णो वसो महे मृशस्व शूर राधसे.
उद् षु मह्यै मघवन्मघत्तय उदिन्द्र श्रवसे महे.. (९)
हे निवासस्थान देने वाले एवं शूर इंद्र! महान् अन्न देने के लिए हमें उन्नत करो. हे
धनस्वामी एवं शूर इंद्र! हमें महान् धन एवं विशाल कीर्ति देने का प्रयास करो. (९)
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त्वं न इन्द्र ऋतयुस्त्वानिदो नि तृम्पसि.
मध्ये वसिष्व तुविन्मृणोर्वोर्नि दासं शिश्नथो हथैः.. (१०)
हे यज्ञाभिलाषी इंद्र! तुम अपने निंदक का धन छीनकर बहुत प्रसन्न होते हो. हे अधिक
धन वाले इंद्र! हमारी रक्षा के लिए तुम हमें अपनी दोनों जांघों के बीच छिपा लो एवं हमसे
द्वेष करने वाले दासों को आयुधों द्वारा मारो. (१०)
अन्यव्रतममानुषमयज्वानमदेवयुम्.
अव स्वः सखा दुधुवीत पर्वतः सुघ्नाय दस्युं पर्वतः.. (११)
हे इंद्र! तुम्हारे मित्र पर्वत ऋषि तुम्हारे अतिरिक्त किसी अन्य के लिए यज्ञ करने वाले,
मानव से भिन्न, यज्ञरहित व देवों को न मानने वाले को स्वर्ग से नीचे गिरा देते हैं एवं दस्यु को
मृत्यु की ओर प्रेरित करते हैं. (११)
त्वं न इन्द्रासां हस्ते शविष्ठ दावने.
धानानां न सं गृभायास्मयुर्द्धिः सं गृभायास्मयुः.. (१२)
हे शक्तिशाली इंद्र! तुम हमें देने की अभिलाषा से गायों को इस प्रकार ग्रहण करो, जिस
प्रकार जौ हाथ में लिए जाते हैं. तुम हमें देने की अभिलाषा से अधिक वस्तुएं हाथ में लो.
(१२)
सखायः क्रतुमिच्छत कथा राधाम शरस्य.
उपस्तुतिं भोजः सूरियों अहयः.. (१३)
अध्वर्यु मित्रो! तुम इंद्र संबंधी यज्ञ करने की इच्छा करो. हम शत्रुहिंसक इंद्र की स्तुति
कैसे करेंगे? शत्रुओं को खाने वाले एवं मित्रों के रक्षक इंद्र शत्रुओं को झुकाते हैं. (१३)
भूरिभिः समह ऋषिभिर्बर्हिष्मद्भिः स्तविष्यसे.
यदित्यमेकेमेकमिच्छर वत्सानपराददः.. (१४)
हे सब लोगों द्वारा पूज्य इंद्र! बहुत से ऋषियों और ऋत्विजों द्वारा तुम्हारी स्तुति की
जाती है. हे शत्रुनाशक इंद्र! तुम स्तोताओं को एक-एक करके अनेक प्रकार से बछड़े देते हो.
(१४)
कर्णगृह्या मघवा शौरदेव्यो वत्सं नस्त्रिभ्य आनयत्. अजां सूरिर्न धातवे.. (१५)
धनी इंद्र संग्राम में शत्रुओं से छीनी हुई गायों को एवं उनके बछड़ों को कान पकड़कर
हमारे पास इस प्रकार ले आवें, जिस प्रकार बालक बकरी को पानी पिलाने ले जाता है. (१५)
सूक्त—६० देवता—अग्नि

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त्वं नो अग्ने महोभिः पाहि विश्वस्या अरातेः. उत द्विषो मर्त्यस्य.. (१)
हे अग्नि! तुम महाधन देकर दानरहित लोगों से हमारी रक्षा करो एवं हमें शत्रु लोगों से बचाओ. (१)
नहि मन्युः पौरुषेय ईशे हि वः प्रियजात. त्वमिदसि क्षपावान्.. (२)
हे प्रिय जन्म वाले अग्नि! पुरुषों का क्रोध तुम्हें बाधा नहीं पहुंचा सकता. तुम ही रात में तेजस्वी हो. (२)
स नो विश्वेभिर्देवेभिरूर्जो नपाद्द्रशोचे. रयिं देहि विश्ववारम्.. (३)
हे शक्ति के नाती एवं स्तुति योग्य प्रकाश वाले अग्नि! तुम सब देवों के साथ मिलकर हमें सबके वरण करने योग्य धन दो. (३)
न तमग्ने अरातयो मर्तं युवन्त रायः. यं त्रायसे दाश्वांसम्.. (४)
हे अग्नि! तुम जिस हव्यदाता यजमान का पालन करते हो, उसे धनी एवं दानरहित लोग अपने से अलग नहीं कर सकते. (४)
यं त्वं विप्र मेधसातावग्ने हिनोषि धनाय. स तवोती गोषु गन्ता.. (५)
हे अग्नि! जिस हव्यदाता यजमान का तुम यज्ञ में धन देने के लिए प्रेरित करते हो, वह तुम्हारे द्वारा सुरक्षित होकर गायों वाला बनता है. (५)
त्वं रयिं पुरुवीरमग्ने दाशुषे मर्ताय. प्र णो नय वस्यो अच्छ.. (६)
हे अग्नि! तुम हव्य देने वाले मनुष्य को अनेक वीर पुत्रों से युक्त धन देते हो, इसलिए हमें भी निवासस्थान देने योग्य धन दो. (६)
उरुष्या णो मा परा दा अघायते जातवेदः. दुराध्ये३ मर्ताय.. (७)
हे जातवेद अग्नि! हमारी रक्षा करो. हमें पाप की इच्छा करने वाले एवं हिंसकबुद्धि मनुष्य को मत सौंपो. (७)
अग्ने माकिष्टे देवस्य रातिमदेवो युयोत. त्वमीशिषे वसूनाम्.. (८)
हे दीप्तिशाली अग्नि! तुम धनों के स्वामी हो. कोई भी देवरहित व्यक्ति तुम्हारे दान को दूर नहीं कर सकता. (८)
स नो वस्व उप मास्यूर्जो नपान्माहिनस्य. सखे वसो जरितृभ्यः.. (९)
हे बल के नाती, सखा एवं निवासस्थान देने वाले अग्नि! तुम हम स्तोताओं को महान्
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धन दो. (९)
अच्छ नः शीरशोचिषं गिरो यन्तु दर्शतम्.
अच्छा यज्ञासो नमसा पुरूवसुं पुरुप्रशस्तमूतये.. (१०)
हमारी स्तुतियां जलाने वाली ज्वालाओं से युक्त एवं दर्शनीय अग्नि के सामने जावें. रक्षा
पाने के लिए हमारे यज्ञ हव्य अन्न से युक्त होकर अधिक धन वाले एवं बहुतों द्वारा प्रशंसित
अग्नि के समीप जाएं. (१०)
अग्निं सूनुं सहसो जातवेदसं दानाय वार्याणाम्.
द्विता यो भूदमृतो मर्त्येष्वो होता मन्द्रतमो विशि.. (११)
सभी स्तुतियां वरण करने योग्य, धनदान के निमित्त, बल के पुत्र एवं जातधन अग्नि के
सामने जाएं. मरणरहित अग्नि मनुष्यों में दो रूपों में रहते हैं. देवों में अमर एवं मानवों में होम
पूरा करने वाले तथा प्रजाओं में अतिशय प्रसन्न करने वाले. (११)
अग्निं वो देवयज्ययाग्निं प्रयतध्वरे.
अग्निं धीषु प्रथममग्निमर्वत्यग्निं क्षेत्राय साधसे.. (१२)
हे यजमानो! मैं तुम्हारे देवसंबंधी यज्ञ के आरंभ होने पर अग्नि की स्तुति करता हूं. मैं
यज्ञ प्रारंभ करने के समय, बंधु-भाव प्राप्त होने पर एवं क्षेत्र-लाभ होने पर सब देवों से पहले
अग्नि की स्तुति करता हूं. (१२)
अग्निरिषां सख्ये ददातु न ईशे यो वार्याणाम्.
अग्निं तोके तनये शश्वदीमहे वसुं सन्तं तनूषाम्.. (१३)
वरण करने योग्य धनों के स्वामी अग्नि हम मित्रों को अन्न दें. हम निवासस्थान देने वाले
एवं अंगों का पालन करने वाले अग्नि से अपने पुत्र और पौत्र के लिए बहुत सा धन मांगते हैं.
(१३)
अग्निमीळिष्वावसे गाथाभिः शीरशोचिषम्.
अग्निं राये पुरुमीळ्ह श्रुतं नरोऽग्निं सुदीतये छर्दिः.. (१४)
हे पुरुमीढ ऋषि! तुम मंत्रों द्वारा दाहक ज्वालाओं वाले अग्नि की स्तुति रक्षा एवं धन
पाने के लिए करो. अन्य यजमान भी अग्नि की स्तुति करते हैं. तुम अग्नि से मेरे लिए घर
मांगो. (१४)
अग्निं द्वेषो योतवै नो गृणीमस्यग्निं शं योश्च दातवे.
विश्वासु विश्ववितेव हव्यो भुवद्वस्तुतॄंऋषूणाम्.. (१५)
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