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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages
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सुरक्षा में रहेंगे. तुम हमें बड़े एवं छोटे पाप से बचाओ. तुम्हारी रक्षा उपद्रवरहित व शोभन है.
(८)
अदितिर्न उरुष्यत्वदितिः शर्म यच्छतु.
माता मित्रस्य रेवतोऽर्यम्णो वरुणस्य चानेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (९)
अदिति हमारी रक्षा करें एवं हमें सुख दें. अदिति मित्र, धनस्वी अर्यमा एवं वरुण की
माता हैं. अदिति की रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है. (९)
यद्देवाः शर्म शरणं यद्भद्रं यदनातुरम्.
त्रिधातु यद्गुरूथ्यं१ तदस्मासु वि यन्तनानेहसो व ऊतय सुऊतयो व ऊतयः.. (१०)
हे आदित्यो! हमें शरण लेने योग्य, शरण के योग्य, सबके द्वारा सेवनीय, रोगरहित, तीन
गुणों से युक्त एवं घर के अनुकूल सुख प्रदान करो. तुम्हारी रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है.
(१०)
आदित्या अव हि ख्यताधि कूलादिव स्पशः.
सुतीर्थमर्वतो यथानु नो नेषथा सुगमनेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (११)
हे आदित्यो! जिस प्रकार तट पर खड़ा हुआ व्यक्ति जल को देखता है, उसी प्रकार तुम
हम निम्नस्थ लोगों को देखो. घोड़े को जिस प्रकार उत्तम घाट पर ले जाते हैं उसी प्रकार हमें
शोभन मार्ग पर ले जाओ. तुम्हारी रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है. (११)
नेह भद्रं रक्षस्विने नावयै नोपया उत.
गवे च भद्रं धेनवे वीराय च श्रवस्यतेऽनेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (१२)
हे आदित्यो! हमसे द्वेष करने वाले शक्तिशाली को इस धरती पर सुख न मिले. तुम्हारा
सुख गाय, नई ब्याई धेनु एवं अन्न की अभिलाषा रखने वाले शोभन पुत्र को प्राप्त हो. तुम्हारी
रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है. (१२)
यदाविर्यदपीच्यं१ देवासो अस्ति दुष्कृतम्.
त्रिते तद्विश्वमाप्त्य आरे अस्मद्धातनानेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (१३)
हे आदित्य देवो! जो छिपे हुए अथवा स्पष्ट पाप हैं, उन में से एक भी मुझ आप्त्यत्रित
को न हो. मुझसे पापों को दूर रखो. तुम्हारी रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है. (१३)
यच्च गोषु दुष्ष्वप्न्यं यच्चास्मे दुहितर्दिवः.
त्रिताय तद्विभावर्याप्त्याय परा वहानेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (१४)
हे स्वर्ण की पुत्री एवं विभावरी उषा! हमारी गायों में अथवा हम में जो दुःख छिपा है,
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वह मुझ आप्त्यत्रित के कल्याण के लिए दूर करो. तुम्हारी रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है.
(१४)
निष्कं वा घा कृणवते स्रजं वा दुहितर्दिवः.
त्रिते दुष्वप्न्यं सर्वमाप्त्ये परि दद्मस्यनेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (१५)
हे स्वर्ग की पुत्री उषा! आभरण बनाने वाले सुनार अथवा माला बनाने वाले का जो
दुःख है वह मुझ आप्त्यत्रित के पास से दूर चला जावे. तुम्हारी रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन
है. (१५)
तदन्नाय तदपसे तं भागमुपसेदुषे.
त्रिताय च द्विताय चोषो दुष्वप्न्यं वहानेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (१६)
हे उषा! मुझ आप्त्यत्रित द्वारा स्वप्न में मधु, खीर आदि भोजन पाने पर दुःस्वप्न का कष्ट
दूर करो. तुम्हारी रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है. (१६)
यथा कलां यथा शफं यथ ऋणं संनयामसि.
एवा दुष्वप्न्यं सर्वमाप्त्ये सं नयामस्यनेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (१७)
हे उषा! जिस प्रकार यज्ञ में बलि दिए गए पशु के हृदय, खुर, सींग आदि अंग क्रम से
लिए जाते हैं अथवा जिस प्रकार ऋण धीरे-धीरे दिया जाता है, उसी प्रकार आप्त्यत्रित के
सभी बुरे स्थान धीरे-धीरे दूर करो. तुम्हारी रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है. (१७)
अजैष्माद्यासनाम चाभूमानागसो वयम्.
उषो यस्माद्दुष्वप्न्यादभैष्माप तदुच्छत्वनेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (१८)
हे देवी उषा! आज हम जीतेंगे एवं पापरहित होंगे. आज हम सुख प्राप्त करेंगे. हम
जिस बुरे स्वप्न से डर रहे हैं, उसके पाप से हमें बचाओ. तुम्हारी रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन
है. (१८)
सूक्त—४८ देवता—सोम
स्वादोर्भक्षि वयसः सुमेधाः स्वाध्यो वरिवोवित्तस्य.
विश्वे यं देवा उत मर्त्यासो मधु ब्रुवन्तो अभि सञ्चरन्ति.. (१)
शोभन-बुद्धि एवं अध्ययन से युक्त मैं अत्यंत पूजा प्राप्त करने वाले एवं स्वादिष्ट अन्न का
भक्षण कर सकूं. विश्वेदेव एवं सभी मनुष्य उस अन्न को मधु कहते हुए घूमते हैं. (१)
अन्तश्च प्रागा अदितिर्भवास्यवयाता हरसो दैव्यस्य.
इन्दविन्द्रस्य सख्यं जुषाणः श्रौष्टीव धुरमनु राय ऋध्याः.. (२)
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हे सोम! तुम हृदय के भीतर गमन करने वाले, दीनतारहित एवं देवों का क्रोध दूर करने
वाले हो. हे सोम! तुम इंद्र की मित्रता प्राप्त करके शीघ्र आकर उसी प्रकार हमारा धन वहन
करो, जिस प्रकार घोड़ा बोझा ढोता है. (२)
अपाम सोमममृता अभूमागन्म ज्योतिरविदाम देवान्.
किं नूनमस्मान्कृणवदरातिः किमु धूर्तिरमृत मर्त्यस्य.. (३)
हे मरणरहित सोम! हम तुम्हें पीकर अमर बनेंगे, स्वर्ग में जाएंगे एवं देवों को प्राप्त
करेंगे. शत्रु हमारा क्या कर लेगा? मुझ मनुष्य का हिंसक शत्रु क्या बिगाड़ लेगा. (३)
शं नो भव हृद आ पीत इन्दो पितेव सोम सूनवे सुशेवः.
सखेव सख्य उरुशंस धीरः प्र ण आयुर्जीवसे सोम तारीः.. (४)
हे सोम! पीने के पश्चात् तुम हृदय के उसी प्रकार सुखदाता बनो, जिस प्रकार पिता पुत्र
को सुख पहुंचाता है. तुम इस प्रकार सुखदाता बनो, जिस प्रकार मित्र मित्र को सुख देता है.
हे अनेक जनों द्वारा प्रशंसित धीर सोम! जीवन के लिए हमारी आयु बढ़ाओ. (४)
इमे मा पीता यशस उरुष्यवो रथं न गावः समनाह पर्वसु.
ते मा रक्षन्तु विस्रसश्चरित्रादुत मा सामाद्यवयन्तिन्वन्दवः.. (५)
यह पिए हुए, यशकारक एवं रक्षण के इच्छुक सोम मुझे इस प्रकार यज्ञकर्मों से बांध दें,
जिस प्रकार बधिया बैल रस्सी की गांठों द्वारा रथ से बंधा रहता है. सोम मुझे भ्रष्ट चरित्र से
बचावें एवं व्यभिचार से दूर करें. (५)
अग्निं न मा मथितं सं दीदीपः प्र चक्षय कृणुहि वस्यसो नः.
अथा हि ते मद आ सोम मन्ये रेवाँ इव प्र चरा पुष्टिमच्छ.. (६)
हे सोम! पीने के बाद तुम मुझे मथित अग्नि के समान भली प्रकार दीप्त करो, भली
प्रकार देखो एवं अतिशय धनशाली बनाओ. मैं तुम्हारे मद के लिए स्तुति करता हूं. तुम
धनवान् बनकर पुष्ट बनो. (६)
इषिरेण ते मनसा सुतस्य भक्षीमहि पित्र्यस्येव रायः.
सोम राजन् प्र ण आयूंषि तारीरहानीव सूर्यो वासराणि.. (७)
हम अभिलाषापूर्ण मन से निचोड़े हुए सोमरस को पैतृक धन के समान प्रयोग में लाएंगे.
हे राजा सोम! हमारी आयु इस प्रकार बढ़ाओ, जिस प्रकार सूर्य दिनों को बढ़ाते हैं. (७)
सोम राजन् मृळया नः स्वस्ति तव स्मसि व्रत्या३ स्तस्य विद्धि.
अलर्ति दक्ष उत मन्युरिन्दो मा नो अर्यो अनुकामं परा दाः.. (८)
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हे राजा सोम! हमें विनाशरहित बनाने के लिए सुखी करो. व्रतधारी हम तुम्हारे ही हैं,
इसे जानो. हे इंद्र! हमारा शत्रु क्रोध में भरा हुआ एवं वृद्धि प्राप्त करके जा रहा है. इसके क्रोध
से हमारा उद्धार करो. (८)
त्वं हि नस्तन्वः सोम गोपा गात्रेगात्रे निषसत्था नृचक्षाः.
यत्ते वयं प्रमिनाम व्रतानि स नो मृळ सुषखा देव वस्यः.. (९)
हे सोम! तुम हमारे शरीर के रक्षक यज्ञकर्म के प्रत्येक अंग के नेताओं को देखने वाले
एवं बैठने वाले हो. हे देव! हम तुम्हारे व्रतों में विघ्न डालते हैं, फिर भी तुम उत्तम मित्र एवं
श्रेष्ठ अन्न वाले बनकर हमें सुखी करो. (९)
ऋदूदरेण सख्या सचेय यो मा न रिष्येद्धर्यश्व पीतः.
अयं यः सोमो न्यधाय्यस्मे तस्मा इन्द्रं प्रतिरमेम्यायुः.. (१०)
मैं उदर को बाधा न पहुंचाने वाले सखा सोम से मिलूंगा. पिए हुए सोम मेरी हिंसा न
करें. हे हरि नामक अश्वों वाले इंद्र! मैं याचना करता हूं कि पिया हुआ सोम चिरकाल तक
हमारे उदर में रहे. (१०)
अप त्या अस्थुरनिरा अमीवा निरत्रसन्तमिषीचीरभैषुः.
आ सोमो अस्माँ अरुहद्विहाया अगन्म यत्र प्रतिरन्त आयुः.. (११)
कठिनता से हटने वाली एवं दृढ़ पीड़ाएं दूर हों. वे पीड़ाएं शक्तिशालिनी बनकर हमें
कंपित और भयभीत करती हैं. महान् सोम हमारे समीप आया है. जिस सोम के पीने से
हमारी आयु बढ़ती है, उसे हम प्राप्त करें. (११)
यो न इन्दुः पितरो हृत्सु पीतोऽमर्त्यो मर्त्याँ आविवेश.
तस्मै सोमाय हविषा विधेम मृळीके अस्य सुमतौ स्याम.. (१२)
हे पितरो! जो मरणरहित सोम पिए जाने पर हम मानवों के हृदय में प्रविष्ट हुआ है, हम
हव्यधारणकर्त्ता यजमान उसी सोम की सेवा करेंगे एवं उसकी कृपा दृष्टि में रहेंगे. (१२)
त्वं सोम पितृभिः संविदानोऽनु द्यावापृथिवी आ ततन्थ.
तस्मै त इन्दो हविषा विधेम वयं स्याम पतयो रयीणाम्.. (१३)
हे सोम! तुम पितरों के साथ मिलकर द्यावा-पृथिवी का विस्तार करते हो. हम हवि के
द्वारा तुम्हारी सेवा करें एवं धन के स्वामी बनें. (१३)
त्रातारो देवा अधि वोचता नो मा नो निद्रा ईशत मोत जल्पिः.
वयं सोमस्य विश्वह प्रियासः सुवीरासो विदथमा वदेम.. (१४)
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हे रक्षक देवो! हमसे मीठे वचन बोलो. स्वप्न हमें अपने वश में न करें और निंदा करने
वाले हमारी निंदा न करें. हम सदा सोम के प्रिय रहें एवं शोभन संतान पाकर स्तुतियों का
उच्चारण करें. (१४)
त्वं नः सोमविश्वतो वयोधास्त्वं स्वर्विदा विशा नृचक्षाः.
त्वं न इन्द ऊतिभिः सजोषोः पाहि पश्चातादुत वा पुरस्तात्.. (१५)
हे चारों ओर से अन्न देने वाले, स्वर्ग प्राप्त कराने वाले एवं सब मनुष्यों को देखने वाले
सोम! तुम प्रवेश करो. हे इंदु! तुम रक्षासाधनों को साथ लेकर पीछे और आगे से हमारी रक्षा
करो. (१५)
सूक्त—४९ देवता—अग्नि
अग्न आ याह्यग्निभिर्होतारं त्वा वृणीमहे.
आ त्वामनक्तु प्रयता हविष्मती यजिष्ठं बर्हिरासदे.. (१)
हे अग्नि! तुम यज्ञ के योग्य अन्य अग्नियों के साथ आओ. हम होता के रूप में तुम्हारा
वरण करते हैं. अध्वर्युजनों द्वारा हाथों में उठाया गया एवं घृतपूर्ण स्रुच तुम्हें कुशों पर सब
ओर बैठावे. (१)
अच्छा हि त्वा सहसः सूनो अङ्गिरः स्रुचश्चरन्त्यध्वरे.
ऊर्जां नपातं घृतकेशमीमहेऽग्निं यज्ञेषु पूर्व्यम्.. (२)
हे बल के पुत्र एवं अंगिरागोत्रीय अग्नि! यज्ञ में तुम्हें प्राप्त करने के लिए स्रुच चलते हैं.
हम पालनकर्त्ता, प्रदीप्त ज्वाला वाले एवं प्राचीन अग्नि की यज्ञ में स्तुति करते हैं. (२)
अग्ने कविर्वेधा असि होता पावक यक्ष्यः.
मन्द्रो यजिष्ठो अध्वरेष्वीड्यो विप्रेभिः शुक्र मन्मभिः.. (३)
हे अग्नि! तुम मेधावी, कर्मफलों का निर्माण करने वाले, पवित्रकर्त्ता, देवों को बुलाने
वाले एवं यज्ञ के योग्य हो. हे दीप्त अग्नि! तुम प्रसन्न करने योग्य, अतिशय यज्ञपात्र एवं यज्ञों
में मेधावी ऋत्विजों द्वारा मननीय स्तोत्रों द्वारा स्तुति करने योग्य हो. (३)
अद्रोग्धमा वहोशतो यविष्ठ्य देवाँ अजस्र वीतये.
अभि प्रयांसि सुधिता वसो गहि मन्दस्व धीतिभिर्हितः.. (४)
हे अतिशय युवा एवं नित्य अग्नि! मुझ द्रोहशून्य यजमान की अभिलाषा करने वाले देवों
को हव्यभक्षण के लिए लाओ. हे निवासस्थान देने वाले अग्नि! सुनिहित अन्नों को लेकर
आओ एवं स्तुतियों द्वारा स्थापित होकर प्रसन्न बनो. (४)
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त्वमित्सप्रथा अस्यग्ने त्रातर्ऋतस्कविः.
त्वां विप्रासः समिधान दीदिव आ विवासन्ति वेधसः.. (५)
हे अग्नि! तुम रक्षक, सच्चे, अधिक बुद्धिमान् एवं सभी प्रकार विशाल हो. हे भली
प्रकार दीप्त अग्नि! मेधावी स्तोता तुम्हारी सेवा करते हैं. (५)
शोचा शोचिष्ठ दीदिहि विशे मयो रास्व स्तोत्रे महाँ असि.
देवानां शर्मन् मम सन्तु सूरयः शत्रूषाहः स्वग्नयः.. (६)
हे अतिशय पवित्र अग्नि! तुम स्वयं दीप्त बनो एवं हमें दीप्त बनाओ तथा प्रजा और
स्तोता को सुख दो. तुम महान् हो. मेरे स्तोता देवों द्वारा दिया हुआ सुख प्राप्त करें एवं शोभन
अग्नि वाले बनें. (६)
यथा चिद्वृद्धमतसमग्ने सञ्जूर्वसि क्षमि.
एवा दह मित्रमहो यो अस्मध्रुग् दुर्मन्मा कश्च वेनति.. (७)
हे मित्रों के पूजक अग्नि! तुम धरती पर जिस प्रकार सूखे काठ को जलाते हो, उसी
प्रकार जो हमारा द्रोही है एवं जो हमारे प्रति दुष्ट बुद्धि रखता है, उसे जलाओ. (७)
मा नो मर्ताय रिपवे रक्षस्विने माघशंसाय रीरधः.
अस्रेधद्भिस्तरणिभिर्यविष्ठ्य शिवेभिः पाहि पायुभिः.. (८)
हे अतिशय युवा अग्नि! हमें शक्तिशाली शत्रु मानव एवं अनिष्ट चाहने वाले के वश में
मत करना. तुम हिंसारहित, तारने वाले एवं सुखकर पालनोपायों द्वारा हमारी रक्षा करो. (८)
पाहि नो अग्न एकया पाह्युत द्वितीयया.
पाहि गीर्भिस्तिसृभिरूर्जाम्पते पाहि चतसृभिर्वसो.. (९)
हे शक्ति के स्वामी एवं निवासस्थान देने वाले अग्नि! पहली, दूसरी, तीसरी एवं चौथी
ऋचा से प्रसन्न होकर हमारी रक्षा करो. (९)
पाहि विश्वस्माद्रक्षसो अराव्णः प्र स्म वाजेषु नोऽव.
त्वामिद्धि नेदिष्ठं देवतातय आपिं नक्षामहे वृधे.. (१०)
हे अग्नि! सभी राक्षसों एवं दानरहित लोगों से हमारी रक्षा करो तथा हमें युद्ध में शत्रुओं
से बचाओ. हे समीपतम एवं बंधु अग्नि! हम यज्ञसिद्धि एवं आत्मवृद्धि के लिए तुम्हारा यजन
करते हैं. (१०)
आ नो अग्ने वयोवृधं रयिं पावक शंस्यम्.
रास्वा च न उपमातं पुरुस्पृहं सुनीती स्वयशस्तरम्.. (११)
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हे पवित्र करने वाले अग्नि! हमें अन्न बढ़ाने वाला एवं प्रशंसनीय धन दो. हे समीपवर्ती
एवं संपत्तिरूप अग्नि! हमें अपने शोभन नेतृत्व द्वारा ऐसा धन दो जो बहुतों द्वारा चाहने योग्य
एवं अतिशय कीर्ति देने वाला हो. (११)
येन वंसाम पृतनासु शर्धतस्तरन्तो अर्य आदिशः.
स त्वं नो वर्ध प्रयसा शचीवसो जिन्वा धियो वसुविदः.. (१२)
हे अग्नि! हमें वह धन दो, जिसकी सहायता से हम युद्ध में वेगशाली शत्रुओं एवं शस्त्र
फेंकने वालों को जीतें एवं उन्हें मारें. हे बुद्धि द्वारा निवासस्थान देने वाले अग्नि! हमें बढ़ाओ
एवं हमारे धन देने वाले यज्ञों को पूरा करो. (१२)
शिशानो वृषभो यथाग्निः शृङ्गे दविध्वत्.
तिग्मा अस्य हनवो न प्रतिधृषे सुजम्भः सहसो यहुः.. (१३)
अग्नि बैल के समान अपने सींग बढ़ाते हुए ज्वालाओं को कंपित करते हैं. अग्नि की
ठोड़ीरूपी ज्वालाएं तीखी हैं. इन्हें कोई रोक नहीं सकता. बलपुत्र अग्नि के दांत शोभन हैं.
(१३)
नहि ते अग्ने वृषभ प्रतिधृषे जम्भासो यद्वितिष्ठसे.
स त्वं नो होतः सुहुतं हविष्कृधि वंस्वा नो वार्या पुरु.. (१४)
हे अभिलाषापूरक अग्नि! तुम्हारे दांतों के समान ज्वालाओं को कोई रोक नहीं सकता,
इसलिए तुम बढ़ते हो. हे होता अग्नि! तुम हमारे हव्य का भली प्रकार हवन करो एवं हमें
वरण करने योग्य धन अधिक मात्रा में दो. (१४)
शेषे वनेषु मात्रोः सं त्वा मर्तास इन्धते.
अतन्द्रो हव्या वहसि हविष्कृत आदिद्देवेषु राजसि.. (१५)
हे अग्नि! अरणियां तुम्हारी माताएं हैं. उनके भीतर रहकर तुम वनों में सोते हो. मनुष्य
तुम्हें भली प्रकार जलाते हैं. तुम आलस्यरहित होकर हव्यदाता यजमान के कल्याण के लिए
देवों को पास ले आओ तथा उनके बीच सुशोभित बनो. (१५)
सप्त होतारस्तमिदीळते त्वाग्ने सुत्यजमद्यह्वम्.
भिनत्स्यद्रिं तपसा वि शोचिषा प्राग्ने तिष्ठ जनाँ अति.. (१६)
हे अभिमत देने वाले, क्षीणतारहित एवं अपने तापपूर्ण तेज से मेघ को छिन्न-भिन्न करने
वाले अग्नि! सात स्तोता तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम मनुष्यों को लांघकर हमारे पास आओ.
(१६)
अग्निमग्निं वो अध्रिगुं हुवेम वृक्तबर्हिषः.
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अग्निं हितप्रयसः शश्वतीष्वा होतारं चर्षणीनाम्.. (१७)
हे यजमानो! कुश छिन्न करने वाले एवं हव्य डालने वाले हम तुम्हारे लिए अग्नि को
बुलाते हैं. अग्नि सर्वदा घर में वर्तमान, होता एवं सब प्रजाओं के यज्ञकर्मों को धारण करने
वाले हैं. (१७)
केतेन शर्मन्त्सचते सुशामण्यग्ने तुभ्यं चिकित्वना.
इषण्यया नः पुरुरूपमा भर वाजं नेदिष्ठमूतये.. (१८)
हे अग्नि! यजमान शोभन सामवेद वाले एवं सुखसाधन यज्ञ में बुद्धिमान् मनुष्यों से
मिलकर स्तुतियों द्वारा प्रशंसा करते हैं. तुम हमारी रक्षा के लिए अपनी इच्छा से समीप में
वर्तमान एवं अनेक रूपों वाले अन्न लाओ. (१८)
अग्ने जरितर्विशपतिस्तेपानो देव रक्षसः.
अप्रोषिवान्गृहपतिर्महाँ असि दिवस्पायुर्दुरोणयुः.. (१९)
हे स्तुति योग्य अग्नि देव! तुम प्रजापालक, राक्षसों को कष्ट देने वाले. यजमान के घर
के रक्षक, गृहस्वामी, महान् एवं द्युलोक का पालन करने वाले हो. तुम यजमान के घर में सदा
रहते हो. (१९)
मा नो रक्ष आ वेशीदाघृणीवसो मा यातुर्यातुमावताम्.
परोगव्यूत्यनिरामप क्षुधमग्ने सेध रक्षस्विनः.. (२०)
हे दीप्तिरूपी धन वाले अग्नि! हमारे भीतर राक्षस एवं पीड़ा का प्रवेश न हो. अन्नाभाव
एवं बलवान् राक्षसों को हमसे दूर रखो. (२०)
सूक्त—५० देवता—इंद्र
उभयं शृणवच्च न इन्द्रो अर्वागिदं वचः.
सत्राच्या मघवा सोमपीतये धिया शविष्ठ आ गमत्.. (१)
इंद्र हमारे दोनों प्रकार के वचनों को शीघ्र सुनें. इंद्र हमारे यज्ञकर्म के साथ रहकर
धनवान् तथा शक्तिशाली हों एवं सोमरस पीने के लिए आवें. (१)
तं हि स्वराजं वृषभं तमोजसे धिषणे निष्टतक्षतुः.
उतोपमानां प्रथमो नि षीदसि सोमकामं हि ते मनः.. (२)
द्यावा-पृथिवी ने स्वयं सुशोभित एवं अभिलाषापूरक इंद्र का संस्कार तेज पाने के लिए
किया था. हे इंद्र! तुम अपने समान देवों में प्रमुख बनकर यज्ञवेदी पर बैठो. तुम्हारा मन
सोमरस का इच्छुक है. (२)
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आ वृषस्व पुरूवसो सुतस्येन्द्रान्धसः.
विद्या हि त्वा हरिवः पृत्सु सासहिमधृषं चिद्धृष्वणिम्.. (३)
हे अधिक धनी इंद्र! तुम निचोड़े हुए सोमरस से अपने उदर को सींचो. हे हरि नामक
अश्वों के स्वामी इंद्र! हम इन्हें संग्राम में शत्रु को हराने वाला, दूसरों द्वारा पराजित न होने
वाला एवं दूसरों को दबाने वाला जानते हैं. (३)
अप्राभिसत्य मघवन्तत्थेदसदिन्द्र क्रत्वा यथा वशः.
सनेम वाजं तव शिप्रिन्नवसा मक्षू चिद्यन्तो अद्रिवः.. (४)
हे इंद्र! यह सत्य है कि तुम धन के स्वामी एवं सत्य के रक्षक हो. हम अपने यज्ञकर्मों
द्वारा फलों के अभिलाषी हों. हे टोपधारी इंद्र! तुम्हारी रक्षा के कारण हम अन्न का सेवन करें.
हे वज्रधारी इंद्र! हम शीघ्र ही शत्रुओं को पराजित करेंगे. (४)
शग्ध्यू३ षु शचीपत इन्द्र विश्वाभिरूतिभिः.
भगं न हि त्वा यशसं वसुविद्मनु शूर चरामसि.. (५)
हे शक्ति के स्वामी इंद्र! अपने समस्त रक्षासाधनों द्वारा हमें अभीष्ट फल दो. हे शूर,
यशस्वी एवं धनदाता इंद्र! हम भाग्य के समान तुम्हारी सेवा करेंगे. (५)
पौरो अश्वस्य पुरुकृद् गवामस्युत्सो देव हिरण्ययः.
नकिर्हि दानं परिमर्धिषत्तवे यद्यद्यामि तदा भर.. (६)
हे इंद्र! तुम अश्वों को पूर्ण करने वाले, गायों की संख्या बढ़ाने वाले, सोने के शरीर वाले
एवं झरने के समान हो. हमें तुम जो दान देना चाहते हो उसे कोई रोक नहीं सकता, इसलिए
हम जब-जब मांगें, तब-तब हमें धन देना. (६)
त्वं ह्योहि चेरवे विदा भगं वसुत्तये. उद्वावृषस्व मघवन् गविष्टय उदिन्द्राश्वमिष्टये.. (७)
हे इंद्र! तुम आओ और धनदान के लिए हमें भोग के योग्य धन दो. हे धनस्वामी इंद्र!
मुझ गाय चाहने वाले को गाय दो और अश्व चाहने वाले को अश्व दो. (७)
त्वं पुरू सहस्राणि शतानि च यूथा दानाय मंहसे.
आ पुरन्दरं चकृम विप्रवचस इन्द्रं गायन्तोऽवसे.. (८)
हे इंद्र! तुम अनेक हजार एवं सौ गायों का समूह देने के लिए स्वीकृति देते हो. हम
विविध उत्तम वचन बोलते हुए एवं नगरों का भेदन करने वाले इंद्र की स्तुति करते हुए अपनी
रक्षा के हेतु उन्हें अपनी ओर ले आवेंगे. (८)
अविप्रो वा यदविधद् विप्रो वेन्द्र ते वचः.
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स प्र ममन्दत्त्वाया शतक्रतो प्राचामन्यो अहंसन.. (९)
हे अनेक कर्म करने वाले, प्राचीन-क्रोध वाले एवं संग्राम में अपना महत्त्व प्रकाशित
करने वाले इंद्र! कोई व्यक्ति बुद्धिरहित हो या बुद्धिमान् हो, यदि वह तुम्हारी स्तुति करता है
तो तुम्हारी दया से आनंद प्राप्त करता है. (९)
उग्रबाहुर्मृक्षकृत्वा पुरन्दरो यदि मे शृणवद्धवम्.
वसूयवो वसुपतिं शतक्रतुं स्तोमैरिन्द्रं हवामहे.. (१०)
ऊपर भुजा उठाए हुए, शत्रुओं का वध करने वाले एवं शत्रुनगरों को ध्वस्त करने वाले
इंद्र यदि मेरी पुकार सुनें तो धन की कामना करने वाले हम लोग धनस्वामी एवं असीमित
बुद्धि वाले इंद्र को स्तोत्रों द्वारा बुलावेंगे. (१०)
न पापासो मनामहे नारायासो न जल्हव:.
यदिन्विन्द्रं वृषणं सचा सुते सखायं कृणवामहै.. (११)
पुण्य न करने वाले हम इंद्र को नहीं मानते. धनरहित एवं अग्नि की उपासना करने वाले
हम इंद्र को नहीं मानते. इस समय सोमरस निचुड़ जाने पर हम अभिलाषापूर्वक इंद्र को
अपना मित्र बनाते हैं. (११)
उग्रं युयुज्म पृतनासु सासहिम्णकातिमदाभ्यम्.
वेदा भृमं चित्सनिता रथीतमॊ वाजिनं यमिदू नशत्.. (१२)
हम उग्र, युद्धों में शत्रुओं को जीतने वाले, ऋण के समान फलप्रद स्तुति वाले एवं किसी
से न दबने वाले इंद्र को अपनी ओर मिलाते हैं. रथस्वामियों में श्रेष्ठ इंद्र तेज चलने वाले घोड़े
को पहचानते हैं. दाता इंद्र अनेक यजमानों में व्याप्त हैं. (१२)
यत इन्द्र भयामहे ततो नो अभयं कृधि.
मघवञ्छग्धि तव तन्न ऊतिभिर्वि द्विषो वि मृधो जहि.. (१३)
हे इंद्र! हम जिस हिंसक से डरते हैं, उससे हमें भयरहित बनाओ. हे धनस्वामी एवं
शक्तिशाली इंद्र! हमें भयरहित करने के लिए अपने रक्षक पुरुषों द्वारा हमारे हिंसक शत्रुओं
को मारो. (१३)
त्वं हि राधस्पते राधसो महः क्षयस्यासि विधतः.
तं त्वा वयं मघवन्निन्द्र गिर्वणः सुतावन्तो हवामहे.. (१४)
हे धनस्वामी इंद्र! तुम्हीं सेवक का महान् धन एवं घर बढ़ाते हो. हे धनस्वामी एवं
स्तुतिपात्र अग्नि! हम सोमरस निचोड़ने वाले तुम्हें बुलाते हैं. (१४)
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इन्द्रः स्पळुत वृत्रहा परस्पा नो वरेण्यः.
स नो रक्षिश्वचरमं स मध्यमं स पश्चात्पातु नः पुरः.. (१५)
सर्वज्ञ, वृत्रहंता, दूसरों का पालन करने वाले एवं वरणीय इंद्र हमारे बड़े एवं बीच वाले
पुत्र की रक्षा करें. इंद्र आगे और पीछे से हमारी रक्षा करें. (१५)
त्वं नः पश्चादधरादुत्तरात्पुर इन्द्र नि पाहि विश्वतः.
आरे अस्मत्कृणुहि दैव्यं भयमारे हेतीरदेवीः.. (१६)
हे इंद्र! तुम पीछे, आगे, नीचे, ऊपर एवं सब ओर से हमारी रक्षा करो. तुम हमारे पास से
राक्षसों के आयुध एवं देवों का भय दूर करो. (१६)
अद्याद्या श्वः श्व इन्द्र त्रास्व परे च नः.
विश्वा च नो जरितृन्त्सत्पते अहा दिवा नक्तं च रक्षिषः.. (१७)
हे इंद्र! आज, कल एवं परसों हमारी रक्षा करना. हे साधुपालक इंद्र! हम स्तोताओं की
रक्षा रात एवं दिन सब समय करना. (१७)
प्रभङ्गी शूरो मघवा तुवीमघः सम्मिश्लो वीर्याय कम्.
उभा ते बाहू वृषणा शतक्रतो नि या वज्रं मिमिक्षतुः.. (१८)
धनस्वामी, दूसरों को हराने वाले, शूर एवं अधिक संपत्ति वाले इंद्र वीरता के लिए सबसे
मिलते हैं. हे बहुत कर्मों वाले इंद्र! तुम्हारी दोनों अभिलाषापूरक भुजाएं वज्र धारण करें.
(१८)
सूक्त—५१ देवता—इंद्र
प्रो अस्मा उपस्तुतिं भरता यज्जुजोषति.
उक्थैरिन्द्रस्य माहिनं वयो वर्धन्ति सोमिनो भद्रा इन्द्रस्य रातयः.. (१)
हे ऋत्विजो! इंद्र सेवा करते हैं, इसलिए उनके पास जाकर स्तुति करो. लोग सोमरस
पीने वाले इंद्र के अन्न को उक्थ मंत्रों द्वारा बढ़ाते हैं. इंद्र के दान कल्याण करने वाले हैं. (१)
अयुजो असमो नृभिरेकः कृष्टीरयास्यः.
पूर्वीरति प्र वावृधे विश्वा जातान्योजसा भ्रदा इन्द्रस्य रातयः.. (२)
किसी की सहायता न लेने वाले, अद्वितीय, देवों में प्रमुख और विनाशरहित इंद्र प्राचीन
प्रजाओं का अतिक्रमण करके बढ़ते हैं. इंद्र के दान कल्याण करने वाले हैं. (२)
अहितेन चिदर्वता जीरदानुः सिषासति.

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प्रवाच्यमिन्द्र तत्तव वीर्याणि करिष्यतो भद्रा इन्द्रस्य रातयः.. (३)
शीघ्र दान करने वाले इंद्र अपने द्वारा अप्रेरित घोड़े के द्वारा भोग करना चाहते हैं. हे
सामर्थ्य देने वाले इंद्र! तुम्हारा महत्त्व स्तुति के योग्य है. इंद्र के दान कल्याण करने वाले हैं.
(३)
आ याहि कृणवाम त इन्द्र ब्रह्माणि वर्धना.
येभिः शविष्ठ चाकनो भद्रमिह श्रवस्यते भद्रा इन्द्रस्य रातयः.. (४)
हे इंद्र! आओ. हम तुम्हारी उत्साहवर्धक स्तुतियां करते हैं. हे अतिशय शक्तिशाली इंद्र!
तुम ये स्तुतियां सुनकर अन्न चाहने वाले स्तोता का कल्याण करने की अभिलाषा करते हो.
इंद्र का दान कल्याण करने वाला है. (४)
धृषतश्चिद्धृषन्मनः कृणोषीन्द्र यत्त्वम्.
तीव्रैः सोमैः सपर्यतो नमोभिः प्रतिभूषतो भद्रा इन्द्रस्य रातयः.. (५)
हे इंद्र! तुम्हारा मन अतिशय शत्रुधर्षक है. तुम नशीले सोमों द्वारा सेवा करने वाले एवं
नमस्कारों द्वारा अलंकृत करने वाले यजमान को असीम फल देते हो. इंद्र के दान कल्याण
करने वाले हैं. (५)
अव चष्ट ऋचीषमोऽवताँ इव मानुषः.
जुष्ट्वी दक्षस्य सोमिनः सखायं कृणुते युजं भद्रा इन्द्रस्य रातयः.. (६)
मनुष्य जिस प्रकार कुएं को देखता है, उसी प्रकार स्तुतियों से घिरे हुए इंद्र हमें
कृपापूर्वक देखते हैं एवं देखने के बाद सोमरस वाले यजमान को अपना मित्र बना लेते हैं. इंद्र
के दान कल्याण करने वाले हैं. (६)
विश्वे त इन्द्र वीर्यं देवा अनु क्रतुं ददुः.
भुवो विश्वस्य गोपतिः पुरुष्टुत भद्रा इन्द्रस्य रातयः.. (७)
हे इंद्र तुम्हारा अनुकरण करते हुए सभी देव शक्ति एवं बुद्धि को धारण करते हैं. हे सभी
गायों के स्वामी इंद्र! तुम बहुतों द्वारा स्तुत हो. इंद्र के दान कल्याण करने वाले हैं. (७)
गृणे तदिन्द्र ते शव उपमं देवतातये.
यद्धंसि वृत्रमोजसा शचीपते भद्रा इन्द्रस्य रातयः.. (८)
हे इंद्र! तुम्हारी उपमा देने योग्य शक्ति की मैं यज्ञ के निमित्त स्तुति करता हूं. हे
यज्ञस्वामी इंद्र! तुमने बल द्वारा वृत्र का हनन किया था. इंद्र के दान कल्याण करने वाले हैं.
(८)
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समनेव वपुष्यतः कृण्वन्मानुषा युगा.
विदे तदिन्द्रश्चेतनमध श्रुतो भद्रा इन्द्रस्य रातयः.. (९)
प्रेम रखने वाली युवती जिस प्रकार शरीर चाहने वाले पुरुषों को वश में करती है, उसी
प्रकार इंद्र मनुष्यों को वश में रखते हैं. इंद्र लोगों को काल का ज्ञान कराते हैं. इंद्र के दान
कल्याणकारक हैं. (९)
उज्जातामिन्द्र ते शव उत्त्वामुत्तव क्रतुम्.
भूरिगो भूरि वावृधुर्मघवन्तव शर्मणि भद्रा इन्द्रस्य रातयः.. (१०)
हे अनेक पशुओं वाले एवं धनस्वामी इंद्र! जो लोग तुम्हारे द्वारा दिया हुआ सुख भोगते
हैं, वे तुम्हारे बल को तुम्हें एवं तुम्हारे यज्ञों को अधिक मात्रा में बढ़ाते हैं. इंद्र का दान
कल्याणकारक है. (१०)
अहं च त्वं च वृत्रहन्त्सं युज्याव सनिभ्य आ.
अरातीवा चिदद्रिवोऽनु नौ शूर मंसते भद्रा इन्द्रस्य रातयः.. (११)
हे वृत्रहंता इंद्र! जब तक धन प्राप्त न हो जाए, तब तक हम और तुम मिलकर रहें. हे
वज्रधारी एवं शूर इंद्र! दान न देने वाला भी तुम्हारे दान की प्रशंसा करता है. इंद्र के दान
कल्याणकारक हैं. (११)
सत्यमिद्धा उ तं वयमिन्द्रं स्तवाम नानृतम्.
महाँ असुन्वतो वधो भूरि ज्योतींषि सुन्वतो भद्रा इन्द्रस्य रातयः.. (१२)
हम निश्चित रूप से इंद्र की सच्ची स्तुति करेंगे. हम झूठ नहीं बोलेंगे. इंद्र सोमरस न
निचोड़ने वालों का वध करते हैं एवं सोमरस निचोड़ने वालों को अधिक ज्योति देते हैं. (१२)
सूक्त—५२ देवता—इंद्र
स पूर्व्यो महानां वेनः क्रतुभिरानजे.
यस्य द्वारा मनुष्विता देवेषु धिय आनजे.. (१)
प्रमुख एवं पूजनीय यजमानों को यज्ञकर्मों में सुंदर इंद्र आते हैं. देवों के मध्य में प्रजाओं
के पालक मनु ने ही इंद्र को पाने का द्वार प्राप्त किया था. (१)
दिवो मानं नोत्सद्न्तसोमपृष्ठासो अद्रयः. उक्था ब्रह्म च शंस्या.. (२)
सोमरस कुचलने के साधन पत्थरों ने स्वर्ग का निर्माण करने वाले इंद्र का त्याग नहीं
किया. उक्थमंत्र एवं स्तुतियां बोलने योग्य हैं. (२)
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स विद्वाँ अङ्गिरोभ्य इन्द्रो गा अवृणोदप. स्तुषे तदस्य पौंस्यम्.. (३)
उपाय जानने वाले इंद्र ने अंगिरागोत्रीय ऋषियों के लिए गायों को प्रकट किया था. इंद्र
के उस वीर कर्म की मैं स्तुति करता हूं. (३)
स प्रत्नथा कविवृध इन्द्रो वाकस्य वक्षणि:.
शिवो अर्कस्य होमन्यस्मत्रा गन्तववसे.. (४)
पहले के समान इस समय भी कवियों को बढ़ाने वाले, स्तोता का कार्य वहन करने वाले
एवं सुखकर इंद्र पूजनीय सोमरस के होम के समय हमारी रक्षा के लिए आवें. (४)
आदू नु ते अनु क्रतुं स्वाहा वरस्य यज्यव:.
श्वात्रमर्का अनुष्टतेन्द्र गोत्रस्य दावने.. (५)
हे इंद्र! स्वाहा देवी के पति अग्नि का यज्ञ करने वाले लोग अनुक्रम से तुम्हारे ही कर्म की
प्रशंसा करते हैं, स्तोता शीघ्र धन पाने के लिए तुम्हारी स्तुति करते हैं. (५)
इन्द्रे विश्वानि वीर्या कृतानि कत्वानि च. यमर्का अध्वरं विदु:.. (६)
स्तोतागण जिस इंद्र को हिंसारहित जानते हैं, उन्हीं इंद्र में समस्त शक्तियां एवं
कर्त्तव्यकर्म वर्तमान हैं. (६)
यत्पाञ्चजन्यया विशेन्द्रे घोषा असृक्षत.
अस्तृणाद् बर्हणा विपो३ ऽर्यो मानस्य य क्षय:.. (७)
जब चारों वर्ण एवं निषाद प्रजा के साथ इंद्र की स्तुति करते हैं, तब स्वामी इंद्र अपनी
महिमा से शत्रुओं का वध करते हैं एवं मेधावी के आदर के पात्र बनते हैं. (७)
इयमु ते अनुष्टुतिश्चकृषे यानि पौंस्या. प्रावश्चक्रस्य वर्तनिम्.. (८)
हे इंद्र! तुम्हारी यह स्तुति इसलिए की जा रही है, क्योंकि तुमने वीरतापूर्ण कार्यों को
किया है. तुम रथ के पहिए की रक्षा करो. (८)
अस्य वृष्णो व्योदन उरु क्रमिष्ट जीवसे. यवं न पश्च आ ददे.. (९)
वर्षाकारक इंद्र द्वारा विविध अन्न पाकर लोग जीवन के लिए तरह-तरह के काम करते हैं
एवं शत्रुओं के समान जौ खाते हैं. (९)
तद्दधाना अवस्यवो युष्माभिर्दक्षपितर:. स्याम मरुत्वतो वृधे.. (१०)
हे ऋत्विजो! स्तोत्र धारण करने वाले एवं रक्षाभिलाषी हम तुम्हारे साथ मिलकर मरुतों
सहित इंद्र की वृद्धि करने के लिए अन्न के पालक हों. (१०)
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अस्मे रुद्रा मेहना पर्वतासो वृत्रहत्ये भरहूतौ सजोषाः.

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बळ्त्वित्याय धाम्न ऋक्वभिः शूर नोनुमः. जेषामेन्द्र त्वया युजा.. (११)
हे यज्ञकाल में उत्पन्न, तेजस्वी एवं शूर इंद्र! हम मंत्रों द्वारा तुम्हारी वास्तविक स्तुति
करेंगे एवं तुम्हारी सहायता से शत्रुओं को जीतेंगे. (११)
अस्मे रुद्रा मेहना पर्वतासो वृत्रहत्ये भरहूतौ सजोषाः.
यः शंसते स्तुवते धायि पज्र इन्द्रज्येष्ठा अस्माँ अवन्तु देवाः.. (१२)
भयंकर एवं वर्षा करने वाले बादल एवं युद्ध में पुकार सुनकर शत्रु का नाश करने वाले
इंद्र मंत्रपाठ करने वाले एवं स्तोता के समीप जल्दी आते हैं. वे इंद्र एवं प्रमुख देव हमारी रक्षा
करें. (१२)
सूक्त—५३ देवता—इंद्र
उत्त्वा मन्दन्तु स्तोमाः कृणुष्व राधो अद्रिवः. अव ब्रह्मद्विषो जहि.. (१)
हे वज्रधारी इंद्र! स्तुतियां तुम्हें अधिक प्रसन्न करें. तुम हमें धन दो एवं ब्राह्मणद्वेषियों को
मारो. (१)
पदा पणीँरराधसो नि बाधस्व महाँ असि. नहि त्वा कश्चन प्रति.. (२)
हे इंद्र! तुम पणियों और यज्ञधनरहित लोगों को पैर से दबाकर पीड़ित करो. हे महान्
इंद्र! कोई भी तुम्हारा प्रतिद्वंद्वी नहीं है. (२)
त्वमीशिषे सुतानामिन्द्र त्वमसुतानाम्. त्वं राजा जनानाम्.. (३)
हे इंद्र! तुम निचोड़े हुए सोम एवं बिना निचोड़े हुए सोम के स्वामी तथा अन्न के राजा
हो. (३)
एहि प्रेहि क्षयो दिव्या३ घोषञ्जर्षणीनाम्. ओभे पृणासि रोदसी.. (४)
हे इंद्र! आओ. तुम मानवकल्याण के लिए यज्ञशाला को शब्दपूर्ण करते हुए स्वर्ग से
आओ. तुम वर्षा द्वारा धरती व आकाश को भर देते हो. (४)
त्यं चित्पर्वतं गिरिं शतवन्तं सहस्रिणम्. वि स्तोतृभ्यो रुरोजिथ.. (५)
हे इंद्र! तुमने स्तोताओं के कल्याण के लिए टुकड़ों वाले एवं सैकड़ों तथा हजारों जलों
से युक्त मेघ को वज्र से भिन्न किया था. (५)
वयमु त्वा दिवा सुते वयं नक्तं हवामहे. अस्माकं काममा पृण.. (६)
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हे इंद्र! सोमरस निचुड़ जाने पर हम तुम्हें रात एवं दिन में बुलाते हैं. तुम हमारी
अभिलाषा पूरी करो. (६)
क्व१ स्य वृषभो युवा तुविग्रीवो अनानतः. ब्रह्मा कस्तं सपर्यति.. (७)
वर्षा करने वाले, नित्य युवक, विशाल गरदन वाले और न झुकने वाले इंद्र कहां हैं?
कौन स्तोता उनकी पूजा करता है? (७)
कस्य स्वित्सवनं वृषा जुजुष्वाँ अव गच्छति. इन्द्रं क उ स्विदा चके.. (८)
वर्षा करने वाले इंद्र प्रसन्न होकर आते हैं. कौन यजमान इंद्र की स्तुति करना जानता है.
(८)
कं ते दाना असक्षत वृत्रहन्कं सुवीर्या. उक्थे क उ स्विदन्तमः.. (९)
हे वृत्रहंता इंद्र! यजमानों द्वारा दिए हुए दान क्या तुम्हारी सेवा करते हैं? मंत्र पढ़ते समय
क्या शोभन-स्तोत्र तुम्हारी सेवा करते हैं? युद्ध में कौन तुम्हारे अधिक समीप रहता है? (९)
अयं ते मानुषे जने सोमः पुरुषु सूयते. तस्येहि प्र द्रवा पिब.. (१०)
हे इंद्र! मैं मानवों के बीच में तुम्हारे लिए सोमरस निचोड़ता हूं. तुम सोमरस के पास
आओ एवं उसे पिओ. (१०)
अयं ते शर्यणावति सुषोमायामधि प्रियः. आर्जीकीये मदिन्तमः.. (११)
हे इंद्र! यह सोमरस तुम्हें कुरुक्षेत्र के तृणों वाले तालाब में अधिक प्रसन्न करता है. वह
तालाब आर्जीक देश की सुषोमा नदी के तट पर है. (११)
तमद्य राधसे महे चारुं मदाय घृष्वये. एहीमिन्द्र द्रवा पिब.. (१२)
हे इंद्र! हमारा धन बढ़ाने एवं शत्रुनाशक मद के लिए उसी सुंदर सोमरस को पिओ एवं
सोमरस की ओर जल्दी जाओ. (१२)
सूक्त—५४ देवता—इंद्र
यदिन्द्र प्रागपागुदङन्यग्वा हूयसे नृभिः. आ याहि तूयमाशुभिः.. (१)
हे इंद्र! तुम हमारे अध्वर्युजनों द्वारा पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं नीचे की दिशा में बुलाए जाते
हो. तुम अपने घोड़ों की सहायता से जल्दी आओ. (१)
यद्वा प्रस्रवणे दिवो मादयासे स्वणरि. यद्वा समुद्रे अन्धसः.. (२)
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हे इंद्र! तुम स्वर्गलोक के अमृत टपकाने वाले स्थान पर स्वर्ग प्राप्त कराने वाले, धरती
के यज्ञस्थल अथवा अन्न देने वाले अंतरिक्ष में प्रसन्न होते हो. (२)
आ त्वा गीर्भिर्महामुरुं हुवे गामिव भोजसे. इन्द्र सोमस्य पीतये.. (३)
हे महान् एवं विशाल इंद्र! मैं तुम्हें सोमरस पीने के लिए उसी प्रकार बुलाता हूं, जिस
प्रकार गाय को घास खाने के लिए बुलाया जाता है. (३)
आ त इन्द्र महिमानं हरयो देव ते महः. रथे वहन्तु बिभ्रतः.. (४)
हे इंद्र! रथ में जुड़े हुए घोड़े तुम्हारे महत्त्व को तेज करके भली प्रकार वहन करें. (४)
इन्द्र गृणीष उ स्तुषे महाँ उग्र ईशानकृत्. एहि नः सुतं पिब.. (५)
हे महान्, उग्र एवं ऐश्वर्यकारी इंद्र! लोगों द्वारा तुमसे याचना की जाती है एवं तुम्हारी
स्तुति की जाती है. आकर हमारा सोमरस पिओ. (५)
सुतावन्तस्त्वा वयं प्रयस्वन्तो हवामहे. इदं नो बर्हिरासदे.. (६)
हे इंद्र हम सोमरस निचोड़कर एवं चरु पुरोडाश आदि लेकर अपने इन कुशों पर बैठने
के लिए तुम्हें बुलाते हैं. (६)
यच्चिद्धि शश्वतामसीन्द्र साधारणस्त्वम्. तं त्वा वयं हवामहे.. (७)
हे इंद्र! तुम बहुत से यजमानों के प्रति समान व्यवहार करने वाले हो. इसलिए हम तुम्हें
बुलाते हैं. (७)
इदं ते सोम्यं मध्वधुक्षन्नद्रिभिर्नरः. जुषाण इन्द्र तत्पिब.. (८)
हे इंद्र! हमारे अध्वर्युगण पत्थरों की सहायता से तुम्हारे लिए मधुर सोमरस निचोड़ते हैं.
तुम प्रसन्न होकर उसे पिओ. (८)
विश्वाँ अर्यो विपश्चितोऽति ख्यस्तूम्या गहि. अस्मे धेहि श्रवो बृहत्.. (९)
हे स्वामी इंद्र! तुम सभी स्तोताओं का अतिक्रमण करके मुझे देखो, शीघ्र आओ एवं
विस्तृत यश दो. (९)
दाता मे पृषतीनां राजा हिरण्यवीनाम्. मा देवा मघवा रिषत्.. (१०)
हिरण्यवर्ण गाएं देने वाले इंद्र हमारे राजा हों. हे देवो! इंद्र हमारी हिंसा न करें. (१०)
सहस्रे पृषतीनामधिश्चन्द्रं बृहत्पृथु. शुक्रं हिरण्यमा ददे.. (११)

सूक्त—५५ देवता—इंद्र

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मैं हजारों गायों के ऊपर धारण किए हुए, महान्, विस्तृत, आह्लादकारक एवं निर्मल
हिरण्य को स्वीकार करता हूं. (११)
नपातो दुर्गहस्य मे सहस्रेण सुराधसः. श्रवो देवेष्वक्रत.. (१२)
मुझ अरक्षित एवं दुःखी के संबंधी लोग हजारों धनों वाले हों. देवों की प्रसन्नता अन्न देती
है. (१२)
सूक्त—५५ देवता—इंद्र
तरोभिर्वो विदद्वसुमिन्द्र सबाध ऊतये.
बृहद् गायन्तः सुतसोमे अध्वरे हुवे भरं न कारिणम्.. (१)
हे ऋत्विजो! तुम दुःखी होने पर वेगशाली अश्वों द्वारा आकर धन देने वाले इंद्र की सेवा
बृहत्साम गाकर करो. मैं निचोड़े हुए सोमरस वाले यज्ञ में इंद्र को उसी प्रकार बुलाता हूं, जिस
प्रकार कोई कुटुंबपोषक एवं हितकारी को बुलाता है. (१)
न यं दुध्रा वरन्ते न स्थिरा मुरो मदे सुशिप्रमन्धसः.
य आदृत्या शशमानाय सुन्वते दाता जरित्र उक्थ्यम्.. (२)
दुर्धर्ष असुर, स्थिरदेव एवं मरणशील मनुष्य युद्ध में जिस इंद्र का निवारण नहीं कर
सकते, ऐसे इंद्र सोमरस पीने के कारण उत्पन्न होने वाला आनंद पाने के लिए अपने स्तोता
को प्रशंसनीय धन देते हैं. (२)
यः शक्रो म्क्षो अश्व्यो यो वा कीजो हिरण्ययः.
स ऊर्वस्य रेजयत्यपावृतिमिन्द्रो गव्यस्य वृत्रहा.. (३)
शक्र सेवा करने योग्य, अश्वविद्या में निपुण, अद्भुत सोने के शरीर वाले एवं वृत्रनाशक
इंद्र विपुल गायों को बाहर लाकर कंपित करते हैं. (३)
निखातं चिद्यः पुरुसम्भृतं वसुद्धिदपति दाशुषे.
वज्री सुशिप्रो हर्यश्व इत् करदिन्द्रः क्रत्वा यथा वशत्.. (४)
हव्य देने वाले यजमान का धरती में गड़ा हुआ एवं संगृहीत बहुत धन ऊपर उठाने वाले,
वज्रधारी, शोभन नासिका वाले एवं हरि नामक घोड़ों के स्वामी इंद्र जो चाहते हैं, उसे यज्ञादि
के द्वारा पूरा कर देते हैं. (४)
यद्भावन्थ पुरुष्टुत पुरा चिच्छूर नृणाम्.
वयं तत्त इन्द्र सं भरामसि यज्ञमुक्थं तुरं वचः.. (५)
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हे बहुतों द्वारा स्तुत एवं शूर इंद्र! तुमने प्राचीन यजमानों से जो कामना की थी, उसे हम
तुरंत पूरा कर रहे हैं. हम यज्ञ, उक्थ अथवा स्तुतिवचन तुम्हें शीघ्र समर्पित करते हैं. (५)
सचा सोमेषु पुरुहूत वज्रिवो मदाय द्युक्ष सोमपा:.
त्वमिद्धि ब्रह्मकृते काम्यं वसु देष्ट: सुन्वते भुव:.. (६)
हे बहुतों द्वारा बुलाए हुए, वज्रधारी एवं सोमरस पीने वाले इंद्र! सोमरस निचुड़ जाने पर
तुम नशा करने के लिए हमारे साथ रहो. सोमरस निचोड़ने वाले स्तोता को कमनीय धन तुम्हीं
देते हो. (६)
वयमेनमिदा ह्योऽपीपेमेह वज्रिणम्.
तस्मा उ अद्य समना सुतं भरा नूनं भूषत श्रुते.. (७)
हम इन इंद्र को आज और कल सोमरस पिलाकर तृप्त करेंगे. हे अध्वर्युजनो! उन्हीं इंद्र
के लिए युद्ध में निचोड़ा हुआ सोमरस ले आओ. इंद्र इस समय स्तोत्र सुनकर आवें. (७)
वृकश्चिदस्य वारण उरामथिरा वयुनेषू भूषति.
सेमं न: स्तोमं जुजुषाण आ गहीन्द्र प्र चित्रया धिया.. (८)
चोर सबको हानिकारक एवं पथिकों का विनाशकर्त्ता होकर भी इंद्र के कार्य में
अनुकूलता धारण करता है. हे इंद्र! हमारे स्तोत्र को प्रेम करते हुए एवं विचित्र स्तुतियों से
प्रभावित होकर आओ. (८)
कदू न्व१स्याकृतमिन्द्रस्यास्ति पौंस्यम्.
केनो नु कं श्रोमतेन न शुश्रुवे जनुष: परि वृत्रहा.. (९)
ऐसा कौन सा पुरुषार्थ है जो इंद्र ने न किया हो? किस सुनने योग्य पुरुषार्थ के साथ इंद्र
नहीं सुने जाते? इंद्र की वृत्रवध वाली घटना उनके जन्म से ही सुनी जा रही है. (९)
कदू महीरधृष्टा अस्य तविषी: कदु वृत्रघ्नो अस्तृतम्.
इन्द्रो विश्वान् बेकनाटाँ अहर्दृश उत क्रत्वा पणीँरभि.. (१०)
इंद्र की महती शक्ति कब शत्रुधर्षक नहीं हुई है? इंद्र का वध्य कब वधरहित रहा? इंद्र
सभी सूद खाने वालों, दिन गिनने वाले कर्महीनों एवं पणियों को ताड़न आदि के द्वारा
पराजित करते हैं. (१०)
वयं घा ते अपूर्व्येन्द्र ब्रह्माणि वृत्रहन्.
पुरूतमास: पुरुहूत वज्रिवो भृतिं न प्र भरामसि.. (११)
हे वृत्रहंता, बहुतों द्वारा बुलाए गए एवं वज्रधारी इंद्र! हम बहुत से लोग वेतन के समान
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तुम्हारे ही निमित्त नवीन स्तुतियां अर्पित करते हैं. (११)
पूर्वीश्चिद्धि ते तुविकूर्मिन्नाशसो हवन्त इन्द्रोतयः.
तिरश्चिदर्यः सवना वसो गहि शविष्ठ श्रुधि मे हवम्.. (१२)
हे अनेक कर्म करने वाले इंद्र! तुमसे बहुत सी आशाएं संबंधित हैं एवं स्तोता तुम्हें
बुलाते हैं. इसलिए तुम हमारे शत्रुओं के यज्ञों का तिरस्कार करके हमारे यज्ञों में आओ. हे
अतिशय शक्तिशाली इंद्र! मेरी पुकार सुनो. (१२)
वयं घा ते त्वे इद्धिन्द्र विप्रा अपि ष्मसि.
नहि त्वदन्यः पुरुहूत कश्चन मघवन्नस्ति मर्डिता.. (१३)
हे इंद्र! हम तुम्हारे ही हैं और तुम्हारी स्तुति करते हैं. हे बहुतों द्वारा बुलाए गए एवं
धनस्वामी इंद्र! तुम्हारे अतिरिक्त कोई भी सुख देने वाला नहीं है. (१३)
त्वं नो अस्या अमतेरुत क्षुधो३ भिशस्तेरव स्पृधि.
त्वं न ऊती तव चित्रया धिया शिक्षा शचिष्ठ गातुवित्.. (१४)
हे इंद्र! तुम हमें दरिद्रता, भूख एवं निंदा से बचाओ. हे महाबली एवं मार्ग जानने वाले
इंद्र! तुम अपनी रक्षा एवं विचित्र यज्ञकर्मों के साथ हमें हमारे मनचाहे पदार्थ दो. (१४)
सोम इद्धः सुतो अस्तु कलयो मा बिभीतन.
अपेदेष ध्वस्मायति स्वयं घैषो अपायति.. (१५)
हे महर्षि कलि के पुत्रो! तुम्हारा निचोड़ा हुआ सोमरस इंद्र के लिए ही हो. तुम मत डरो.
ये राक्षस आदि तुमसे दूर जा रहे हैं. वे स्वयं ही भाग रहे हैं. (१५)
सूक्त—५६ देवता—आदित्य
त्यान्नु क्षत्रियाँ अव आदित्यान्याचिषामहे. सुमृळीकाँ अभिष्टये.. (१)
हम अभिलषित धन पाने के लिए क्षत्रिय जाति वाले एवं भली प्रकार सुखदाता
आदित्यों से रक्षा की याचना करते हैं. (१)
मित्रो नो अत्यंहतिं वरुणः पर्षदर्यमा. आदित्यासो यथा विदुः.. (२)
मित्र, वरुण, अर्यमा और आदित्य हमें पाप से पार उतारें, क्योंकि वे हमारे दुःसह कार्यों
को जानते हैं. (२)
तेषां हि चित्रमुक्थ्यं१ वरूथमस्ति दाशुषे. आदित्यानामरण्कृते.. (३)
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