ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextसुरक्षा में रहेंगे. तुम हमें बड़े एवं छोटे पाप से बचाओ. तुम्हारी रक्षा उपद्रवरहित व शोभन है.
(८)
अदितिर्न उरुष्यत्वदितिः शर्म यच्छतु.
माता मित्रस्य रेवतोऽर्यम्णो वरुणस्य चानेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (९)
अदिति हमारी रक्षा करें एवं हमें सुख दें. अदिति मित्र, धनस्वी अर्यमा एवं वरुण की
माता हैं. अदिति की रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है. (९)
यद्देवाः शर्म शरणं यद्भद्रं यदनातुरम्.
त्रिधातु यद्गुरूथ्यं१ तदस्मासु वि यन्तनानेहसो व ऊतय सुऊतयो व ऊतयः.. (१०)
हे आदित्यो! हमें शरण लेने योग्य, शरण के योग्य, सबके द्वारा सेवनीय, रोगरहित, तीन
गुणों से युक्त एवं घर के अनुकूल सुख प्रदान करो. तुम्हारी रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है.
(१०)
आदित्या अव हि ख्यताधि कूलादिव स्पशः.
सुतीर्थमर्वतो यथानु नो नेषथा सुगमनेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (११)
हे आदित्यो! जिस प्रकार तट पर खड़ा हुआ व्यक्ति जल को देखता है, उसी प्रकार तुम
हम निम्नस्थ लोगों को देखो. घोड़े को जिस प्रकार उत्तम घाट पर ले जाते हैं उसी प्रकार हमें
शोभन मार्ग पर ले जाओ. तुम्हारी रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है. (११)
नेह भद्रं रक्षस्विने नावयै नोपया उत.
गवे च भद्रं धेनवे वीराय च श्रवस्यतेऽनेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (१२)
हे आदित्यो! हमसे द्वेष करने वाले शक्तिशाली को इस धरती पर सुख न मिले. तुम्हारा
सुख गाय, नई ब्याई धेनु एवं अन्न की अभिलाषा रखने वाले शोभन पुत्र को प्राप्त हो. तुम्हारी
रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है. (१२)
यदाविर्यदपीच्यं१ देवासो अस्ति दुष्कृतम्.
त्रिते तद्विश्वमाप्त्य आरे अस्मद्धातनानेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (१३)
हे आदित्य देवो! जो छिपे हुए अथवा स्पष्ट पाप हैं, उन में से एक भी मुझ आप्त्यत्रित
को न हो. मुझसे पापों को दूर रखो. तुम्हारी रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है. (१३)
यच्च गोषु दुष्ष्वप्न्यं यच्चास्मे दुहितर्दिवः.
त्रिताय तद्विभावर्याप्त्याय परा वहानेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (१४)
हे स्वर्ण की पुत्री एवं विभावरी उषा! हमारी गायों में अथवा हम में जो दुःख छिपा है,
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