ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextमैं हजारों गायों के ऊपर धारण किए हुए, महान्, विस्तृत, आह्लादकारक एवं निर्मल
हिरण्य को स्वीकार करता हूं. (११)
नपातो दुर्गहस्य मे सहस्रेण सुराधसः. श्रवो देवेष्वक्रत.. (१२)
मुझ अरक्षित एवं दुःखी के संबंधी लोग हजारों धनों वाले हों. देवों की प्रसन्नता अन्न देती
है. (१२)
सूक्त—५५ देवता—इंद्र
तरोभिर्वो विदद्वसुमिन्द्र सबाध ऊतये.
बृहद् गायन्तः सुतसोमे अध्वरे हुवे भरं न कारिणम्.. (१)
हे ऋत्विजो! तुम दुःखी होने पर वेगशाली अश्वों द्वारा आकर धन देने वाले इंद्र की सेवा
बृहत्साम गाकर करो. मैं निचोड़े हुए सोमरस वाले यज्ञ में इंद्र को उसी प्रकार बुलाता हूं, जिस
प्रकार कोई कुटुंबपोषक एवं हितकारी को बुलाता है. (१)
न यं दुध्रा वरन्ते न स्थिरा मुरो मदे सुशिप्रमन्धसः.
य आदृत्या शशमानाय सुन्वते दाता जरित्र उक्थ्यम्.. (२)
दुर्धर्ष असुर, स्थिरदेव एवं मरणशील मनुष्य युद्ध में जिस इंद्र का निवारण नहीं कर
सकते, ऐसे इंद्र सोमरस पीने के कारण उत्पन्न होने वाला आनंद पाने के लिए अपने स्तोता
को प्रशंसनीय धन देते हैं. (२)
यः शक्रो म्क्षो अश्व्यो यो वा कीजो हिरण्ययः.
स ऊर्वस्य रेजयत्यपावृतिमिन्द्रो गव्यस्य वृत्रहा.. (३)
शक्र सेवा करने योग्य, अश्वविद्या में निपुण, अद्भुत सोने के शरीर वाले एवं वृत्रनाशक
इंद्र विपुल गायों को बाहर लाकर कंपित करते हैं. (३)
निखातं चिद्यः पुरुसम्भृतं वसुद्धिदपति दाशुषे.
वज्री सुशिप्रो हर्यश्व इत् करदिन्द्रः क्रत्वा यथा वशत्.. (४)
हव्य देने वाले यजमान का धरती में गड़ा हुआ एवं संगृहीत बहुत धन ऊपर उठाने वाले,
वज्रधारी, शोभन नासिका वाले एवं हरि नामक घोड़ों के स्वामी इंद्र जो चाहते हैं, उसे यज्ञादि
के द्वारा पूरा कर देते हैं. (४)
यद्भावन्थ पुरुष्टुत पुरा चिच्छूर नृणाम्.
वयं तत्त इन्द्र सं भरामसि यज्ञमुक्थं तुरं वचः.. (५)
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