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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1318 of 1855

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Page 1318

बळ्त्वित्याय धाम्न ऋक्वभिः शूर नोनुमः. जेषामेन्द्र त्वया युजा.. (११)
हे यज्ञकाल में उत्पन्न, तेजस्वी एवं शूर इंद्र! हम मंत्रों द्वारा तुम्हारी वास्तविक स्तुति
करेंगे एवं तुम्हारी सहायता से शत्रुओं को जीतेंगे. (११)
अस्मे रुद्रा मेहना पर्वतासो वृत्रहत्ये भरहूतौ सजोषाः.
यः शंसते स्तुवते धायि पज्र इन्द्रज्येष्ठा अस्माँ अवन्तु देवाः.. (१२)
भयंकर एवं वर्षा करने वाले बादल एवं युद्ध में पुकार सुनकर शत्रु का नाश करने वाले
इंद्र मंत्रपाठ करने वाले एवं स्तोता के समीप जल्दी आते हैं. वे इंद्र एवं प्रमुख देव हमारी रक्षा
करें. (१२)
सूक्त—५३ देवता—इंद्र
उत्त्वा मन्दन्तु स्तोमाः कृणुष्व राधो अद्रिवः. अव ब्रह्मद्विषो जहि.. (१)
हे वज्रधारी इंद्र! स्तुतियां तुम्हें अधिक प्रसन्न करें. तुम हमें धन दो एवं ब्राह्मणद्वेषियों को
मारो. (१)
पदा पणीँरराधसो नि बाधस्व महाँ असि. नहि त्वा कश्चन प्रति.. (२)
हे इंद्र! तुम पणियों और यज्ञधनरहित लोगों को पैर से दबाकर पीड़ित करो. हे महान्
इंद्र! कोई भी तुम्हारा प्रतिद्वंद्वी नहीं है. (२)
त्वमीशिषे सुतानामिन्द्र त्वमसुतानाम्. त्वं राजा जनानाम्.. (३)
हे इंद्र! तुम निचोड़े हुए सोम एवं बिना निचोड़े हुए सोम के स्वामी तथा अन्न के राजा
हो. (३)
एहि प्रेहि क्षयो दिव्या३ घोषञ्जर्षणीनाम्. ओभे पृणासि रोदसी.. (४)
हे इंद्र! आओ. तुम मानवकल्याण के लिए यज्ञशाला को शब्दपूर्ण करते हुए स्वर्ग से
आओ. तुम वर्षा द्वारा धरती व आकाश को भर देते हो. (४)
त्यं चित्पर्वतं गिरिं शतवन्तं सहस्रिणम्. वि स्तोतृभ्यो रुरोजिथ.. (५)
हे इंद्र! तुमने स्तोताओं के कल्याण के लिए टुकड़ों वाले एवं सैकड़ों तथा हजारों जलों
से युक्त मेघ को वज्र से भिन्न किया था. (५)
वयमु त्वा दिवा सुते वयं नक्तं हवामहे. अस्माकं काममा पृण.. (६)
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