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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1308 of 1855

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Page 1308

हे रक्षक देवो! हमसे मीठे वचन बोलो. स्वप्न हमें अपने वश में न करें और निंदा करने
वाले हमारी निंदा न करें. हम सदा सोम के प्रिय रहें एवं शोभन संतान पाकर स्तुतियों का
उच्चारण करें. (१४)
त्वं नः सोमविश्वतो वयोधास्त्वं स्वर्विदा विशा नृचक्षाः.
त्वं न इन्द ऊतिभिः सजोषोः पाहि पश्चातादुत वा पुरस्तात्.. (१५)
हे चारों ओर से अन्न देने वाले, स्वर्ग प्राप्त कराने वाले एवं सब मनुष्यों को देखने वाले
सोम! तुम प्रवेश करो. हे इंदु! तुम रक्षासाधनों को साथ लेकर पीछे और आगे से हमारी रक्षा
करो. (१५)
सूक्त—४९ देवता—अग्नि
अग्न आ याह्यग्निभिर्होतारं त्वा वृणीमहे.
आ त्वामनक्तु प्रयता हविष्मती यजिष्ठं बर्हिरासदे.. (१)
हे अग्नि! तुम यज्ञ के योग्य अन्य अग्नियों के साथ आओ. हम होता के रूप में तुम्हारा
वरण करते हैं. अध्वर्युजनों द्वारा हाथों में उठाया गया एवं घृतपूर्ण स्रुच तुम्हें कुशों पर सब
ओर बैठावे. (१)
अच्छा हि त्वा सहसः सूनो अङ्गिरः स्रुचश्चरन्त्यध्वरे.
ऊर्जां नपातं घृतकेशमीमहेऽग्निं यज्ञेषु पूर्व्यम्.. (२)
हे बल के पुत्र एवं अंगिरागोत्रीय अग्नि! यज्ञ में तुम्हें प्राप्त करने के लिए स्रुच चलते हैं.
हम पालनकर्त्ता, प्रदीप्त ज्वाला वाले एवं प्राचीन अग्नि की यज्ञ में स्तुति करते हैं. (२)
अग्ने कविर्वेधा असि होता पावक यक्ष्यः.
मन्द्रो यजिष्ठो अध्वरेष्वीड्यो विप्रेभिः शुक्र मन्मभिः.. (३)
हे अग्नि! तुम मेधावी, कर्मफलों का निर्माण करने वाले, पवित्रकर्त्ता, देवों को बुलाने
वाले एवं यज्ञ के योग्य हो. हे दीप्त अग्नि! तुम प्रसन्न करने योग्य, अतिशय यज्ञपात्र एवं यज्ञों
में मेधावी ऋत्विजों द्वारा मननीय स्तोत्रों द्वारा स्तुति करने योग्य हो. (३)
अद्रोग्धमा वहोशतो यविष्ठ्य देवाँ अजस्र वीतये.
अभि प्रयांसि सुधिता वसो गहि मन्दस्व धीतिभिर्हितः.. (४)
हे अतिशय युवा एवं नित्य अग्नि! मुझ द्रोहशून्य यजमान की अभिलाषा करने वाले देवों
को हव्यभक्षण के लिए लाओ. हे निवासस्थान देने वाले अग्नि! सुनिहित अन्नों को लेकर
आओ एवं स्तुतियों द्वारा स्थापित होकर प्रसन्न बनो. (४)
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