ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextहे पवित्र करने वाले अग्नि! हमें अन्न बढ़ाने वाला एवं प्रशंसनीय धन दो. हे समीपवर्ती
एवं संपत्तिरूप अग्नि! हमें अपने शोभन नेतृत्व द्वारा ऐसा धन दो जो बहुतों द्वारा चाहने योग्य
एवं अतिशय कीर्ति देने वाला हो. (११)
येन वंसाम पृतनासु शर्धतस्तरन्तो अर्य आदिशः.
स त्वं नो वर्ध प्रयसा शचीवसो जिन्वा धियो वसुविदः.. (१२)
हे अग्नि! हमें वह धन दो, जिसकी सहायता से हम युद्ध में वेगशाली शत्रुओं एवं शस्त्र
फेंकने वालों को जीतें एवं उन्हें मारें. हे बुद्धि द्वारा निवासस्थान देने वाले अग्नि! हमें बढ़ाओ
एवं हमारे धन देने वाले यज्ञों को पूरा करो. (१२)
शिशानो वृषभो यथाग्निः शृङ्गे दविध्वत्.
तिग्मा अस्य हनवो न प्रतिधृषे सुजम्भः सहसो यहुः.. (१३)
अग्नि बैल के समान अपने सींग बढ़ाते हुए ज्वालाओं को कंपित करते हैं. अग्नि की
ठोड़ीरूपी ज्वालाएं तीखी हैं. इन्हें कोई रोक नहीं सकता. बलपुत्र अग्नि के दांत शोभन हैं.
(१३)
नहि ते अग्ने वृषभ प्रतिधृषे जम्भासो यद्वितिष्ठसे.
स त्वं नो होतः सुहुतं हविष्कृधि वंस्वा नो वार्या पुरु.. (१४)
हे अभिलाषापूरक अग्नि! तुम्हारे दांतों के समान ज्वालाओं को कोई रोक नहीं सकता,
इसलिए तुम बढ़ते हो. हे होता अग्नि! तुम हमारे हव्य का भली प्रकार हवन करो एवं हमें
वरण करने योग्य धन अधिक मात्रा में दो. (१४)
शेषे वनेषु मात्रोः सं त्वा मर्तास इन्धते.
अतन्द्रो हव्या वहसि हविष्कृत आदिद्देवेषु राजसि.. (१५)
हे अग्नि! अरणियां तुम्हारी माताएं हैं. उनके भीतर रहकर तुम वनों में सोते हो. मनुष्य
तुम्हें भली प्रकार जलाते हैं. तुम आलस्यरहित होकर हव्यदाता यजमान के कल्याण के लिए
देवों को पास ले आओ तथा उनके बीच सुशोभित बनो. (१५)
सप्त होतारस्तमिदीळते त्वाग्ने सुत्यजमद्यह्वम्.
भिनत्स्यद्रिं तपसा वि शोचिषा प्राग्ने तिष्ठ जनाँ अति.. (१६)
हे अभिमत देने वाले, क्षीणतारहित एवं अपने तापपूर्ण तेज से मेघ को छिन्न-भिन्न करने
वाले अग्नि! सात स्तोता तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम मनुष्यों को लांघकर हमारे पास आओ.
(१६)
अग्निमग्निं वो अध्रिगुं हुवेम वृक्तबर्हिषः.
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