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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1312 of 1855

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Page 1312

आ वृषस्व पुरूवसो सुतस्येन्द्रान्धसः.
विद्या हि त्वा हरिवः पृत्सु सासहिमधृषं चिद्धृष्वणिम्.. (३)
हे अधिक धनी इंद्र! तुम निचोड़े हुए सोमरस से अपने उदर को सींचो. हे हरि नामक
अश्वों के स्वामी इंद्र! हम इन्हें संग्राम में शत्रु को हराने वाला, दूसरों द्वारा पराजित न होने
वाला एवं दूसरों को दबाने वाला जानते हैं. (३)
अप्राभिसत्य मघवन्तत्थेदसदिन्द्र क्रत्वा यथा वशः.
सनेम वाजं तव शिप्रिन्नवसा मक्षू चिद्यन्तो अद्रिवः.. (४)
हे इंद्र! यह सत्य है कि तुम धन के स्वामी एवं सत्य के रक्षक हो. हम अपने यज्ञकर्मों
द्वारा फलों के अभिलाषी हों. हे टोपधारी इंद्र! तुम्हारी रक्षा के कारण हम अन्न का सेवन करें.
हे वज्रधारी इंद्र! हम शीघ्र ही शत्रुओं को पराजित करेंगे. (४)
शग्ध्यू३ षु शचीपत इन्द्र विश्वाभिरूतिभिः.
भगं न हि त्वा यशसं वसुविद्मनु शूर चरामसि.. (५)
हे शक्ति के स्वामी इंद्र! अपने समस्त रक्षासाधनों द्वारा हमें अभीष्ट फल दो. हे शूर,
यशस्वी एवं धनदाता इंद्र! हम भाग्य के समान तुम्हारी सेवा करेंगे. (५)
पौरो अश्वस्य पुरुकृद् गवामस्युत्सो देव हिरण्ययः.
नकिर्हि दानं परिमर्धिषत्तवे यद्यद्यामि तदा भर.. (६)
हे इंद्र! तुम अश्वों को पूर्ण करने वाले, गायों की संख्या बढ़ाने वाले, सोने के शरीर वाले
एवं झरने के समान हो. हमें तुम जो दान देना चाहते हो उसे कोई रोक नहीं सकता, इसलिए
हम जब-जब मांगें, तब-तब हमें धन देना. (६)
त्वं ह्योहि चेरवे विदा भगं वसुत्तये. उद्वावृषस्व मघवन् गविष्टय उदिन्द्राश्वमिष्टये.. (७)
हे इंद्र! तुम आओ और धनदान के लिए हमें भोग के योग्य धन दो. हे धनस्वामी इंद्र!
मुझ गाय चाहने वाले को गाय दो और अश्व चाहने वाले को अश्व दो. (७)
त्वं पुरू सहस्राणि शतानि च यूथा दानाय मंहसे.
आ पुरन्दरं चकृम विप्रवचस इन्द्रं गायन्तोऽवसे.. (८)
हे इंद्र! तुम अनेक हजार एवं सौ गायों का समूह देने के लिए स्वीकृति देते हो. हम
विविध उत्तम वचन बोलते हुए एवं नगरों का भेदन करने वाले इंद्र की स्तुति करते हुए अपनी
रक्षा के हेतु उन्हें अपनी ओर ले आवेंगे. (८)
अविप्रो वा यदविधद् विप्रो वेन्द्र ते वचः.
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