ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextतुम्हारे ही निमित्त नवीन स्तुतियां अर्पित करते हैं. (११)
पूर्वीश्चिद्धि ते तुविकूर्मिन्नाशसो हवन्त इन्द्रोतयः.
तिरश्चिदर्यः सवना वसो गहि शविष्ठ श्रुधि मे हवम्.. (१२)
हे अनेक कर्म करने वाले इंद्र! तुमसे बहुत सी आशाएं संबंधित हैं एवं स्तोता तुम्हें
बुलाते हैं. इसलिए तुम हमारे शत्रुओं के यज्ञों का तिरस्कार करके हमारे यज्ञों में आओ. हे
अतिशय शक्तिशाली इंद्र! मेरी पुकार सुनो. (१२)
वयं घा ते त्वे इद्धिन्द्र विप्रा अपि ष्मसि.
नहि त्वदन्यः पुरुहूत कश्चन मघवन्नस्ति मर्डिता.. (१३)
हे इंद्र! हम तुम्हारे ही हैं और तुम्हारी स्तुति करते हैं. हे बहुतों द्वारा बुलाए गए एवं
धनस्वामी इंद्र! तुम्हारे अतिरिक्त कोई भी सुख देने वाला नहीं है. (१३)
त्वं नो अस्या अमतेरुत क्षुधो३ भिशस्तेरव स्पृधि.
त्वं न ऊती तव चित्रया धिया शिक्षा शचिष्ठ गातुवित्.. (१४)
हे इंद्र! तुम हमें दरिद्रता, भूख एवं निंदा से बचाओ. हे महाबली एवं मार्ग जानने वाले
इंद्र! तुम अपनी रक्षा एवं विचित्र यज्ञकर्मों के साथ हमें हमारे मनचाहे पदार्थ दो. (१४)
सोम इद्धः सुतो अस्तु कलयो मा बिभीतन.
अपेदेष ध्वस्मायति स्वयं घैषो अपायति.. (१५)
हे महर्षि कलि के पुत्रो! तुम्हारा निचोड़ा हुआ सोमरस इंद्र के लिए ही हो. तुम मत डरो.
ये राक्षस आदि तुमसे दूर जा रहे हैं. वे स्वयं ही भाग रहे हैं. (१५)
सूक्त—५६ देवता—आदित्य
त्यान्नु क्षत्रियाँ अव आदित्यान्याचिषामहे. सुमृळीकाँ अभिष्टये.. (१)
हम अभिलषित धन पाने के लिए क्षत्रिय जाति वाले एवं भली प्रकार सुखदाता
आदित्यों से रक्षा की याचना करते हैं. (१)
मित्रो नो अत्यंहतिं वरुणः पर्षदर्यमा. आदित्यासो यथा विदुः.. (२)
मित्र, वरुण, अर्यमा और आदित्य हमें पाप से पार उतारें, क्योंकि वे हमारे दुःसह कार्यों
को जानते हैं. (२)
तेषां हि चित्रमुक्थ्यं१ वरूथमस्ति दाशुषे. आदित्यानामरण्कृते.. (३)
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